Women Reservation Bill India: पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की विधानसभाओं के चुनावों में प्रचार के लिए मुद्दा पैदा करने के लिए भाजपा ने जो बवंडर खड़ा किया उस के पीछे ‘बड़ेसाब’ तो आरएसएस ही था जो सवर्ण महिलाओं को ले कर दिक्कत में था कि इन का क्या करें, ये तो मंदिरों में भजनपूजन और कलश यात्राओं में ही अच्छी लगती हैं. अगर ये संसद में बड़े पैमाने पर आ गईं तो हिंदू राष्ट्र और ब्राह्मण राज का सपना ध्वस्त हो जाएगा. महिला आरक्षण बिल इसी मकसद से एक साजिश के तहत लाया और फिर गिरवाया गया.

महिला आरक्षण पर भारतीय जनता पार्टी द्वारा संसद में जो बिल लाया गया और जो दोतिहाई बहुमत न पाने के कारण गिर गया, असल में वह एक ढोल पीटना ही था. सरकार की मंशा महिलाओं को न नौकरियों में आरक्षण देने की थी, न समाज में और न ही न्यायपालिका या कार्यपालिका में. यह ढोल केवल संसद और विधानसभाओं में बजाने के लिए था. इस में पोल ही पोल है.

बीती 16 और 17 अप्रैल को महिला आरक्षण बिल के नाम पर संसद में चर्चा और बहस के नाम पर जो प्रायोजित शोबाजी व ड्रामेबाजी जानबूझ कर की गई उस से पहले सरकार अगर कुछ सांसदों का प्रतिनिधि मंडल या अध्ययन मंडल एक बहुत छोटे से नार्डिक देश स्वीडन भेज देती तो शायद ही नहीं, बल्कि तय है कि सब से पहले उस का ध्यान इस तरफ ही जाता कि वहां की संसद में महिलाओं के लिए अलग से कोई आरक्षण नहीं है. इस के बाद भी आधी से जरा ही कम यानी 46 फीसदी महिलाएं संसद में हैं.

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