Religion Vs Science: आज चीन जैसा देश चांद पर जीवन जीने की तकनीक विकसित कर रहा है. वह बगैर सपोर्ट वाले कांच के पारदर्शी मजबूत व टिकाऊ पुल धड़ल्ले से बना रहा है. रूस, अमेरिका जैसे देश फाइटर जेट विमान व हवा से हवा में मार करने वाली सुपरसोनिक मिसाइल बना कर दूसरे देशों पर हुकूमत करने की जुगत लगा रहे हैं.
सीमित आबादी वाले एवं शांतिप्रिय देश जापान में लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए परिवहन वाहनों का अधिक प्रयोग करने के बजाय पैदल चलने पर अधिक जोर व प्रोत्साहन दिया जा रहा है.
इस सब के उलट, हमारे देश में घर पर बैठेबैठे ही धर्म के ठेकेदारों द्वारा रचित कपोलकल्पित कहानियां सुनसुना कर, पढ़पढ़ा कर स्वस्थ व निरोगी रहने की घुट्टी पिलाई जाती है. पौराणिक कथाओं के श्रवण या अनुसरण बनाम अनुकरण से किसी का भला हो या न हो लेकिन मुफ्त की रबड़ीमलाई खाने के आदी हो चुके कुछ विशेष महानुभावों की तिजोरी जरूर भर जाती है.
पिछले कुछ दिनों से ‘सरिता’ के सभी अंक लाजवाब व शानदार अंदाज में पाठकों के समक्ष उत्कृष्ट व सौ प्रतिशत पढ़ने योग्य साहित्य के साथ पेश किए जा रहे हैं. लेखक – विमल वर्मा
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पुस्तकों में रह गए आदर्श
आज अनगिनत युवक व युवतियां विदेशों में बस जाने को विवश हैं. शिक्षित युवा वर्ग भी उज्ज्वल भविष्य की तलाश में विदेशों की ओर भागते हैं. मातापिता दिल पर पत्थर रख कर उन्हें भेज देते हैं. समाज में उन का मानसम्मान बढ़ जाता है कि उन के बेटेबेटियां विदेशों में ऊंची नौकरियां कर रहे हैं. अनेक सुनहरे सपने ले कर ये देसी विदेश पहुंचते हैं और तब उन का सामना वास्तविकता से होता है. अनेक प्रश्न उन के मन को परेशान करने लगते हैं- इतने डौलर, पौंड आदि में किस प्रकार रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था करें.
देसी युवकों को आसानी से घर ही नहीं मिलता क्योंकि हमारे भोजन की महक विदेशियों को पसंद नहीं या उन्हें ऐसा भी लगता है कि ये सफाई से नहीं रहते. भारत देश जैसी सस्ती बाई की सुविधा तो वहां होती ही नहीं. सब काम अपनेआप करने पड़ते हैं. धीरेधीरे शारीरिक समस्याएं व मानसिक तनाव पैदा होने लगते हैं.
अब आती है नौकरी की बारी. काम तो मिल गया था तभी तो विदेश गए थे पर वहां भी कालेगोरे की समस्या. ट्रंप जैसे राष्ट्रपति तो खुलेआम कहते हैं कि अमेरिका अमेरिकनों का है. सो, मुंह बंद कर के सैकंड क्लास सिटिजन के समान रहिए. आप खुशी महसूस कीजिए कि आप को विदेश में नौकरी मिल गई. मुंह बंद कर के, गरदन झुका कर रहिए.
इधर भारत में मातापिता अब वृद्ध हो गए जिन्होंने गर्व से बच्चों को विदेश भेजा था. उन को पूछने वाला कौन है? जब अपने बेटे और बेटियों के पास समय नहीं तब रिश्तेदार भी क्या करें? विदेशों से थोड़ाबहुत पैसा आ जाता है, बस इतना ही संबंध रह गया. अब तो ऊंचेऊंचे आदर्श पुस्तकों में रह गए. अपने बलबूते जीवन बिताइए.
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