Religious Donation Truth: दान की महिमा वाकई में अपरंपार है जिस ने देशभर के 10 ब्रैंडेड मंदिरों की जायदाद को 9 लाख करोड़ रुपए तक पहुंचा दिया है लेकिन इस से किसे क्या हासिल हो रहा है, यह कोई नहीं सोचता. सोचता तो कोई यह भी नहीं कि दान की लत भक्तों को भाग्यवादी बनाने के साथसाथ डर और लालच भी उन के दिलोदिमाग में भर देती है.

न वा उ देवा: क्षुधमिद् वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यव:।

उतो रयि: पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन्मर्डितारं न विन्दते॥अर्थात देवताओं ने भूख को ही मृत्यु का कारण नहीं बनाया है. भोजन करने वाले को भी मृत्यु आती है. दान करने वाले का धन कभी क्षीण नहीं होता जबकि जो नहीं देता उसे कोई सहारा (सांत्वना) नहीं मिलता.

(ऋग्वेद 10.117.1)

ऋगवेद की इस ऋचा की मानें तो दान फुजूलखर्ची या अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को मुफ्त में मुफ्तखोरों पर लुटाना नहीं बल्कि एक लौंग टर्म इन्वैस्टमैंट है जो आप के पैसे को बढ़ाता है और बोनस में देता है दान देने वाले को सुखसम्मान वगैरह. मैसेज बहुत स्पष्ट है कि अगर आप को समाज में नाम और मानसम्मान चाहिए तो पंडेपुजारियों व मठमंदिरों में दान करते रहो नहीं तो कंजूस, कृपण और आजकल की भाषा में कहें तो नास्तिक, वामपंथी और अर्बन नक्सली वगैरह कहलाने के लिए तैयार रहो.

महाभारत के अनुशासन पर्व में मृत्यु शैय्या पर पड़े भीष्म युधिष्ठिर से चर्चा करते हुए नसीहत भी देते हैं कि-

अदत्तदानो नरकं याति अर्थात जो दान नहीं करता वह नर्क में जाता है.

पौराणिक ग्रंथों में दान से ताल्लुक रखते इफरात किस्सेकहानियों में से एक दिलचस्प कहानी राजा भोज की है जो एक बार अपने राजकवि पंडित धनपाल के साथ जंगल से होते कहीं जा रहे थे. रास्ते में भोज ने देखा कि बरगद के एक बड़े पेड़ पर मधुमक्खियों का छत्ता है जो शहद के वजन से लगभग गिरने को ही था. गौर से देखने पर एहसास हुआ कि मधुमक्खियां उस छत्ते से अपने हाथपैर घिस रही हैं. उन्होंने धनपाल से इस की वजह पूछी तो उस ने भोज की शंका दूर करते बताया कि महाराज, दान की बड़ी महिमा है. शिवि, दधीची, कर्ण और बलि जैसे अनेक दानियों के नाम उन के न रहने के बाद भी चल रहे हैं जबकि केवल धन संचय करते रहने वाले बड़ेबड़े राजामहाराजाओं का नाम लेने वाला भी कोई नहीं.

मधुमखियों ने केवल संचय ही किया है, कभी दान नहीं दिया, इसलिए आज अपनी संपत्ति को नष्ट होते देख उन्हें दुख हो रहा है, सो, वे अपने हाथपैर घिस रही हैं. यानी, जरूरत से ज्यादा पैसा इकट्ठा करना दुख का कारण होता है. सार यह कि अगर आप भी धन का संचय करते हैं और दान नहीं देते तो तय है कि आप सनातनविरोधी हैं. इस के बाद भी आप को देश में रहने दिया जा रहा है तो यह आप के पूर्व जन्मों के सुकर्मों का फल है. अब यह और बात है कि दरअसल इस का श्रेय जाता तो संविधान और लोकतंत्र को है जिन की स्थापना में दान की खाने वालों ने कम अड़ंगे नहीं डाले थे.

तमाम पौराणिक ग्रंथ दान की महिमा से भरे पड़े हैं जिन पर थोड़ी सी ईमानदारी या अधिकतम बेईमानी से भी अमल किया जाए तो दान के बिना जिंदगी बेकार लगती है. जीवन सार्थक बना रहे, इसलिए हर हिंदू को बचपन से ही दान करने की लत लगा दी जाती है. लागी छूटे न… की तर्ज पर आदमी जिंदगीभर फिर दान ही करता रहता है और जिस दिन दान न करे, उस दिन उसे अपने नास्तिक और पापी होने का गिल्ट घेरने लगता है, जिसे दूर करने वह फिर दान करने के लिए भागता है. इसे ही मार्क्स ने अफीम का नशा कहा है.

पूरी दुनिया और तमाम धर्मों के मानने वाले इस नशे की लत की गिरफ्त में हैं जिन में होड़ इस बात की लगी है कि कौन ज्यादा से ज्यादा दान करता है. मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे वगैरह किसी ऊपर वाले के नहीं, बल्कि नीचे उस के नाम पर धंधा कर रहे उस के दलालों और कमीशनखोरों के बनाए हुए हैं. हैरानी की बात यह भी है कि इन लूट केंद्रों को बनाने का पैसा भी भक्तों से लिया गया जो जिंदगीभर वे कर्ज, जो असल में कभी लिया ही नहीं, की किस्तों की तरह इसे भरते रहते हैं.

मंदिरों में बरस रहा पैसा

दान के पैसे की एक बड़ी लिस्ट ब्रैंडेड मंदिरों में जाती है, जिस की तुलना भोज वाली कहानी की मधुमक्खियों से की जा सकती है जिन के छत्ते का शहद खुद मधुमक्खियां नहीं बल्कि पंडेपुजारी, मंदिर प्रशासन और ट्रस्ट वगैरह खाते हैं. मधुमक्खियां वे भक्त हैं जो दान देने को इन मंदिरों के इर्दगिर्द मक्खियों की तरह भिनभिनाते रहते हैं. इन भक्तों के दान देने की लत के चलते देश के टौप 10 मंदिरों के पास कुल जमा 9 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा की जायदाद इकट्ठा हो गई है.

ग्लोबल वैल्थ इंडैक्स 2026 के मुताबिक, तिरुपति बालाजी मंदिर सब से टौप पर है जिस की जायदाद 3 लाख करोड़ रुपए के लगभग है. आइए बाकी मंदिरों का हाल भी देखें कि उन में कितनी जायदाद है और औसतन कितना चढ़ावा प्रतिदिन आता है.

टौप-10 अमीर मंदिर

१. पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल).

कुल अनुमानित संपत्ति : 1,50,000-2,50,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 15-25 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 5-6 लाख रुपए.

२. तिरुपति बालाजी (आंध्र प्रदेश).

कुल अनुमानित संपत्ति : 3,00,000- 3,38,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय :5,258 करोड़ रुपए

रोज औसत आय : 4-6 करोड़ रुपए

३. स्वर्ण मंदिर (अमृतसर).

कुल अनुमानित संपत्ति : अमूल्य (ऐतिहासिक व स्वर्ण).

सालाना आय : 1,260 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 1.5-2 करोड़ रुपए.

४. जगन्नाथ मंदिर (पुरी).

कुल अनुमानित संपत्ति : 1,20,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 1,000-1,200 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 5-8 लाख रुपए.

५. साईं बाबा मंदिर (शिरडी).

कुल अनुमानित संपत्ति : 3,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 500-600 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 1-1.5 करोड़ रुपए.

६. श्रीराम मंदिर (अयोध्या).

कुल अनुमानित संपत्ति : 6-9 हजार करोड़ रुपए.

सालाना आय : 327 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 1-1.5 करोड़ रुपए.

७. वैष्णों देवी मंदिर (जम्मू).

कुल अनुमानित संपत्ति : 2,500 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 250-300 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 50-60 लाख रुपए.

८. सिद्धिविनायक मंदिर (मुंबई).

कुल अनुमानित संपत्ति : 800 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 133 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 35-40 लाख रुपए.

९. काशी विश्वनाथ मंदिर (वाराणसी).

कुल अनुमानित संपत्ति : 3,000 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 100-125 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 25-35 लाख रुपए.

१०. सोमनाथ मंदिर (गुजरात).

कुल अनुमानित संपत्ति : 1,100 करोड़ रुपए.

सालाना आय : 40-55 करोड़ रुपए.

रोज औसत आय : 15-20

लाख रुपए.

डर और लालच हैं वजहें

कहने को ही ये और इन जैसे लाखों छोटेबड़े मंदिर आस्था के केंद्र हैं वरना तो सच यह है कि भक्त इन में डर और लालच के चलते पैसा चढ़ाते हैं. उन्हें चाहिए रहती है सुखमय जीवन की गारंटी जो दान के एवज में देने का दावा सिर्फ धर्म करता है लेकिन यहां भी एक डिस्क्लेमर चस्पां है कि सुखमय जिंदगी मिले न मिले, यह भाग्य की बात है. भक्तों को डर नरक का और लालच स्वर्ग का रहता है जहां ऐशोआराम के तमाम साधन मौजूद हैं. नरक का डर इसलिए रहता है कि वहां पापियों, जो जाहिर है दान न करने वाले या हैसियत से कम दान करने वाले होते हैं, को तरहतरह की दिलकंपा देने वाली सजाएं दी जाती हैं.

इन सजाओं का जिक्र गरुड़ पुराण में विस्तार से मिलता है जिस का पाठ घर में किसी मौत के बाद 10 दिनों तक ब्राह्मण से करवाया जाता है. गरुड़ पुराण में कोई 28 तरह के प्रमुख नरक बताए गए हैं जिन में पापियों को तरहतरह की यातनाएं दी जाती हैं. ऐसे ही एक नरक का नाम शूलप्रोत नरक है जहां दान न करने वालों या हैसियत से कम दान करने वालों को सजा का प्रावधान है. इन लोगों के शरीर को यमदूत नुकीली सूइयों से सालोंसाल तक सिलते रहते हैं जिस की तकलीफ के बारे में कल्पना करना ही जेब ढीली करवाने को पर्याप्त है.

दान न कर के कैसे लोग दरिद्र यानी गरीब हो जाते हैं, इस का भी खुलासा करते एक श्लोक में गरुड़ पुराण कहता है-

दानदोषेण भवेद् दरिद्र:

दरिद्रभावाच्च करोति पापम्।

पापप्रभावान्नरकं प्रयाति

पुनर्दरिद्र: पुनरेव पापी॥

अर्थात जो व्यक्ति दान नहीं करता (अदान) वह अगले जन्म में दरिद्र होता है. दरिद्रता के कारण वह पाप करता है और पाप के कारण नरक में जाता है. फिर बारबार यही होता है.

अब कौन भला आदमी गरीब और दरिद्र रहते परलोक में भी नरक भोगना चाहेगा, इसलिए वह हैसियत से बढ़ कर दान करता है. दान करने को सब से मुफीद जगह मंदिर हैं जिन में हर तरह के प्रगट व गुप्तदान स्वीकार किए जाते हैं. हजारदोहजार रुपए में नारकीय यातनाओं से बचने का आश्वासन भी घाटे का सौदा नहीं. मंदिर और दान से इतर गरुड़ पुराण के उक्त श्लोक के फलसफे पर गौर करें तो उस में सीधेसीधे गरीबों को पापी करार दिया गया है. यह ट्रिगनामेट्री एक ट्रैंगिल यह बनाती है कि दान न करने वाला अगले जन्म में गरीबी में पैदा होता है. यह गरीबी पाप यानी अपराध करवाती है और यही पाप नरक में ढकेलते हैं. जाहिर है सारे फसाद की जड़ गरीबी है. अब यह सम?ाने वाला कोई नहीं कि मेहनत, शिक्षा और प्रतिभा से गरीबी दूर होती है, दान से तो वह और बढ़ती है.

अपात्र भी कर रहे दान

मंदिरों में चढ़ावे की रकम अगर बढ़ रही है तो उस की एक वजह यह है कि अब वे लोग भी मंदिरों में दान कर रहे हैं जिन्हें धर्मग्रंथ शूद्र करार देता है. यानी, वे दलित, आदिवासी और पिछड़े जिन्होंने थोड़ाबहुत पैसा कमा लिया है, खुद को सवर्ण साबित करने के लिए दान करने लगे हैं. धर्मग्रंथों में जगहजगह शूद्रों को धकियाने और लतियाने के निर्देश तो हैं लेकिन उन से दानदक्षिणा न लेने का जिक्र कहीं नहीं मिलता. बात सही भी है कि पैसे की कोई न तो जाति होती, न ही जैंडर होता और न ही धर्म होता. ब्रैंडेड मंदिरों में अब कोई भी जा कर दानपेटी की भूख मिटा सकता है. इस अघोषित छूट से मंदिरों को फायदा यह हुआ कि दलित, पिछड़े और आदिवासी भी दान करने वहां जाने लगे. जो उन के लिए एक रोमांचक घटना से कम नहीं होता.

भोपाल के दलित समुदाय के सरकारी विभाग के एक इंजीनियर की मानें तो वे जब आज से लगभग 4 साल पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर गए तो अंदर घुसते यह सोचसोच कर डर रहे थे कि अगर किसी ने जाति पूछ ली तो क्या होगा. मंदिर में प्रवेश दिया भी जाएगा या नहीं. कहीं दुत्कार कर भगा न दिया जाए. इन्हीं शंकाओं और चिंता में डूबे वे कब धक्के खाते शंकर के सामने पहुंच गए, पता ही नहीं चला लेकिन जब पहुंच ही गए तो भावविह्वल हो गए और जेब से पांचपांच सौ के दस करारे नोट निकाल कर पुजारी के सामने रखे थाल में रख दिए.

पुजारी ने दस खरेखरे नोट देख कर प्रसन्न हो कर उन्हें खूब सा आशीर्वाद दिया, उन के माथे पर टीका लगा दिया और साथ में फूलमाला, प्रसाद वगैरह भी थमा दिए जो आमतौर पर पैसे वाले यजमानों को दिया जाता है और आमतौर पर जो सवर्ण ही होते हैं. तो इस तरह उस दिन से इंजीनियर साहब खुद को सवर्ण सम?ाने लगे. यह कुंठा है, हीनता है, ग्लानि है, आत्ममुग्धता है या एक गैरजरूरी मूर्खता है, यह तो वही जानें लेकिन अब वे दिल से नहीं बल्कि दिमाग से दान करते हैं. इधर ठेकेदारों से घूस लेते हैं और उस का चौथाई हिस्सा धर्म के ठेकेदारों को दे आते हैं.

इस तरह के पैसों से भी मंदिरों में चढ़ावा बढ़ रहा है जो धंधे के लिहाज से हर्ज की बात मकसूद शायर की इस पंक्ति ‘उस मय से दिल ही में जो खिंचती है…’ की तर्ज पर नहीं है. निष्कर्ष यह कि अगर आप के पास दान देने को तगड़ा पैसा है तो आप की जाति नजरअंदाज कर दी जाएगी लेकिन समाज में हैसियत सुधरने का ठेका नहीं लिया जाएगा. इस पैसे से तो आप अगले जन्म में अच्छी योनि में पैदा होने की बुकिंग फिक्स कर रहे हैं, जो कि किसी ने देखी ही नहीं. दान की बाबत कमाई का जरिया तो कोई कभी पूछता ही नहीं, इसलिए यह कहावत बनी कि दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, जो जैसे जितना दे उसे चुपचाप रख लिया जाता है.

महिलाएं हैं बड़ी दानी

शूद्रों की तरह सवर्ण महिलाओं की बाबत भी धर्मग्रंथों में तरहतरह के निर्देश हैं कि वे दासी हैं, अशुद्ध और अपवित्र हैं. और तो और, वे नरक का द्वार भी हैं लेकिन इस के बाद भी इन से दान न लेने की बात कहीं नहीं कही गई है. किसी भी मंदिर में देख लें या धार्मिक आयोजन में देख लें, पुरुषों से ज्यादा महिलाएं नजर आती हैं क्योंकि वे भी शूद्रों की तरह अपना उद्धार चाहती हैं, परलोक सुधारना चाहती हैं. दूसरे, उन के धार्मिक बने रहने से घर के पुरुषों को भी खुशी होती है कि चलो, इन्हें इसी बहाने अपनी हैसियत का एहसास होता रहेगा और ये हमारी गुलामी ढोने से इनकार नहीं करेंगी.

यह भी और बात है कि शिक्षा और जागरूकता के चलते महिलाएं, थोड़ी तादाद में ही सही, आर्थिक तौर पर आजाद हुई हैं लेकिन धार्मिक बेडि़यों से मुक्त हो गई हैं, ऐसा कहने की कोई वजह नहीं. दिलचस्प लेकिन चिंता की बात यह है कि जब महिलाएं ज्यादा कमाने लगती हैं तो दान भी ज्यादा करने लगती हैं. अशोका यूनिवर्सिटी के सैंटर फौर सोशल इम्पैक्ट एंड फिलैंथ्रोपी के नए आंकड़ों के मुताबिक, महिलाएं दान करने में पुरुषों से ज्यादा सक्रिय रहती हैं. इस रिपोर्ट के मुताबिक ही भारत में घरेलू दान की अनुमानित राशि 540 अरब रुपए से भी ज्यादा है.

दान करने में महिलाएं पुरुषों से उन्नीस नहीं हैं. वे कम पैसों वाले छोटेछोटे नियमित दान ज्यादा करती हैं और सालभर करती हैं. साल के 365 दिनों में से कम से कम 100 दिन उन्हें तरहतरह के, मसलन करवा चौथ, संतान सप्तमी, ग्यारस, नवमी, अष्टमी सहित उन के इष्ट के खास दिन के व्रतउपवास रखने पड़ते हैं और अधिकतर में दान का विधान है. अलावा इस के, महिलाओं की परवरिश बचपन से ही जरूरत से ज्यादा धार्मिक बंदिशों में होती है, इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा दान करती हैं.

दान क्यों

धार्मिक दान एकदम बेतुकी बात है जिस में पैसे की बरबादी की 100 फीसदी गारंटी रहती है. दान के पैसे से सिर्फ पंडेपुजारी पलते हैं जिन का समाज और देश के विकास में कोई योगदान नहीं होता. उलटे, ये देश को पिछड़ा बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते. ब्रैंडेड मंदिरों में पंडेपुजारियों की आमदनी लाखों रुपए महीना तक होती है. छोटे से छोटे मंदिर का पुजारी भी शान से गुजर करने लायक कमा लेता है. यह बहुत ही बारीकी से सोचने की बात है कि दान का पैसा भगवान के पास नहीं जाता क्योंकि वह कहीं है ही नहीं. दान के पैसे पर मौज वही पंडेपुजारी करते हैं जो पीढि़यों से लोगों को दान के लिए उकसाते रहे हैं और मेहनत की खाने से परहेज करते हैं. अब वक्त है कि हरकोई अपनी मेहनत से कमाए गए पैसों की कीमत समझे और उसे मंदिरों में दान करने जैसे अनुत्पादक कामों में न लगाए. Religious Donation Truth

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