Soldier Story: अफसर बनने के बाद मेरी दूसरी पोस्ंिटग फौरवर्ड एरिया की एक वर्कशौप में हुई. मैं कैप्टन बन चुका था. मु?ो पठानकोट ट्रांजिट कैंप में रिपोर्ट करनी थी. ट्रांजिट कैंप स्टेशन के बिलकुल सामने था. मैं ने कुली से सामान उठवाया और ट्रांजिट कैंप के औफिस के बरामदे में रख दिया. अफसर कमांडिंग के कमरे में एक लैफ्टिनैंट साहब बैठे हुए थे. मैं अंदर गया तो उस ने मु?ो उठ कर सैनिक सम्मान दिया और बैठने के लिए कहा. मैं ने अपना मूवमैंट और्डर दिया. उस ने अपने औफिस से 2 जवान बुलवाए और मेरा सामान एक कमरे में रखने के लिए कहा. मु?ा से कहा, ‘‘आप कमरे में जाएं. आज शाम तक पता चल जाएगा कि श्रीनगर की फ्लाइट है या नहीं. अगर हुई तो सुबह
5 बजे एयरपोर्ट जाना होगा. स्टेशन वैगन लेने आएगी. अगर नहीं हुई तो 2 दिन आप को यहीं रुकना होगा. जवानों और जूनियर अफसरों को श्रीनगर जाने के लिए डीलक्स बसें मिलती हैं. अगर सभी को एयरलिफ्ट की सुविधा होती तो पुलवामा में 40 जवान शहीद न होते लेकिन अब भी जवानों और जूनियर अफसरों को बसों से भेजा जाता है. सब हथियारबंद होते हैं. कुछ चीजें सेना के हाथ में नहीं होतीं. हालांकि, वे जवान भारतीय सेना के नहीं थे. वे थे अर्धसैनिक बल के जवान जो सेना को हर जगह असिस्ट करते थे.
मैं कमरे में आ गया. कमरा पुराना लेकिन शानदार था. हर सुविधा उपलब्ध थी. मैं ने अभी यूनिफौर्म उतार कर नाइट सूट पहना ही था कि एक जवान मेरे लिए चाय ले कर आया. सफर से आया था, चाय की जरूरत भी थी. उसी समय व्हिसल हुई. मैं ने जवान से पूछा ‘‘यह व्हिसल किस लिए हुई है?’’
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