Women Property Rights India: संविधान के आर्टिकल 14 और 15 कहते हैं कि औरत और मर्द बराबर हैं. संविधान की नजर में जैंडर बेस्ड कोई भेदभाव नहीं है. 2005 में हिंदू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम ने बेटियों को जन्म से ही पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हक दिया लेकिन बराबरी का यह हक सिर्फ कानून की किताबों तक सिमट कर रह गया.

दिल्ली की रहने वाली नेहा की शादी फरीदाबाद के अशोक से 2015 में हुई थी. अशोक बिजनैसमैन थे. शादी के बाद उन्होंने काफी प्रौपर्टी बनाई. 2022 में नेहा का तलाक हुआ. तलाक के समय नेहा को एहसास हुआ कि उस के पति अशोक की कुल प्रौपर्टी में से एक भी प्रौपर्टी नेहा के नाम नहीं थी. सारी प्रौपर्टी अशोक और उस के भाइयों के नाम पर खरीदी गई थी हालांकि नेहा को कोर्ट से एलिमनी के रूप में एक करोड़ की रकम मिली. नेहा इतने भर से संतुष्ट भी हो गई लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि औरतें प्रौपर्टी से वंचित क्यों रखी जाती हैं? इस मामले में कानून क्या कहता है और स्थिति क्या है?

दरअसल, 1956 का हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने से पहले पुरानी परंपराएं लागू थीं. मिताक्षरा व्यवस्था के तहत बेटियां पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं रखती थीं. परिवार की संपत्ति में सिर्फ बेटों का जन्मजात हक होता था. महिलाओं को सिर्फ सीमित अधिकार मिलते थे. औरतों के मामले में लिमिटेड स्टेट लागू था, इस के तहत औरतों को पति की संपत्ति पर रखरखाव का हक तो था लेकिन वह संपत्ति की मालकिन नहीं बन सकती थी.

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