US Tariff Policy: अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी औफ स्टेट यानी उपमंत्री ने भारत के एक मंच पर साफसाफ कहा है कि वे भारत के साथ व्यापार करेंगे पर चीन की तरह उसे एक अवसर नहीं सौंपेंगे कि भारत भी अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी बन कर खड़ा हो जाए. क्रिस्टोफर लैंडो का यह कहना असल में डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति का एक रहस्य खोलता है कि अमेरिका अब क्यों अपनी टैक्नोलौजी और मार्केट को ही सुरक्षित रखना चाहता है.
अमेरिकी अधिकारी का यह बयान बिलकुल सही है. सदियों से ही व्यापारी और देश जानकारी और रहस्यों को छिपा कर रखते आए हैं कि दूसरे उन से सीख न लें. अमेरिका अब भारतीय छात्रों पर भी रोकटोक लगा रहा है ताकि वे अमेरिका से कुछ सीखसाख कर भारत में बड़ा काम न करने लग जाएं.
वैसे, यह संकुचित अमेरिका के भी हित में नहीं होगा पर जब एक देश के दिमाग में बैठ जाए कि वह महान है और वही अकेला महान है तो कोई कुछ नहीं कर सकता. अमेरिका, यह साफ है, भारत को हर तरह चूसने का प्रयास करता रहेगा और अगर हम से व्यापार करेगा तो केवल अपनी शर्तों पर. वह अमेरिका अब मर गया है जो दुनिया में लोकतंत्र लाना चाहता था, जो सब का विकास चाहता था, जो सब जगह शांति चाहता था, जो दुख में मरहम लगाने को तैयार रहता था.
अमेरिका के चर्च और रिपब्लिकन पार्टी ने एक नए अमेरिका को पैदा कर दिया है जो बेहद स्वार्थी, बेहद दंभी और जिसे अपनी ताकत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा है. वेनेजुएला में अमेरिका ने धौंस जमा कर दिखा दिया है कि वह चाहे जो कर ले, कोई कुछ नहीं बोलेगा. नरेंद्र मोदी के विश्वगुरु बनने, ब्रिक्स बनाने में आगे बढ़ने, दुनिया को नेतागीरी सिखाने के प्रयास बेकार गए हैं. ईरान युद्ध से पहले नरेंद्र मोदी अमेरिकी डील को पूरा करने के लिए हर तरह की खुशामद करते नजर आए. भारत दुनिया की चाहे तीसरीचौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हो लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि वह अमेरिका के आगे किसी तरह खड़ा हो सकता है.
हमें तो वैसे भी मंदिरों, जातियों, हिंदूमुसलिम से फुरसत नहीं है. हमें गुलामी की आदत भी है. जैसे अमेरिका के काले आज भी अपने को हीन समझते हैं, पिछड़े हुए हैं वैसे ही भारत, जो कभी शकों, कभी हूणों का, कभी पर्शियनों, कभी ग्रीकों, कभी मुसलिमों, कभी अंगरेजों और यहां तक कि छोटे से नीदरलैंड तक का गुलाम रहा है, अमेरिका की गुलामी को ही अपनी जीत और स्वतंत्रता मानता रहेगा.
बदलता विश्व परिदृश्य
जहां एक तरफ यह संतोष है कि अमेरिकाइजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में वर्षों की अमेरिकी और इजराइली धौंस को बेहद धक्का लगा है और अब वे पश्चिमी एशिया के बादशाह नहीं रह गए वहीं दूसरी तरफ सिर पर एक खतरा मंडरा रहा है कि इन 2 अमीर देशों, जहां थोड़ीबहुत व्यक्तिगत स्वंत्रताएं हैं, लोग आसानी से आजा सकते हैं, कानून का राज है और खानेपहनने पर कोई नैतिक पुलिस परेशान नहीं करती, की जगह एक धार्मिक कट्टर नेता के इशारे पर चल रहे ईरान की धौंस कई गुना दिख सकती है.
जब भी यह युद्ध बंद होगा, अपने पीछे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यूनाइटेड अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, इराक के लिए ही नहीं, भारत के लिए भी एक काला बादल छोड़ जाएगा. अमेरिका और इजराइल से कुछ उम्मीदें की जाती थीं कि वहां खुले चुनाव होते हैं. अखबार, मीडिया हैं, खुली पढ़ाई है, औरतें आजाद हैं और वे दूसरों के हकों का सम्मान करेंगे. लेकिन ईरान से ऐसी उम्मीद नहीं है. अमेरिका और इजराइल ने ईरान के शिया मुसलिम शासकों को एक नई अनचाही ताकत प्लेट में रख कर दे दी है जिस के बूते वे खाड़ी के सभी देशों को कंट्रोल करेंगे और पैट्रोल व गैस के बेताज बादशाह बन सकते हैं.
ईरान ने साबित कर दिया है कि वह इतने हथियार बना सकता है, जमा कर सकता है और अपने देश को तहसनहस होते देख सकता है. साथ ही, अब उसे कोई देश न धमका सकता है, न नियमकानून मानने को कह सकता है. ईरान इस युद्ध के बाद शिया इसलाम का एक्सपोर्टर बन जाए तो बड़ी बात नहीं है. जिन भी इसलामी देशों में शियाओं की बड़ी संख्या है, उन के लिए ईरान एक स्वर्ग बन जाएगा और वे उस के बल पर न केवल दूसरे धर्म वालों को हड़काना शुरू कर देंगे, बल्कि सुन्नी मुसलिमों को अब किनारे करने की कोशिश भी करेंगे.
दुनियाभर के शिया मुसलिम सभी देशों के लिए नई आफत बन जाएंगे जिन से निबटना उतना ही मुश्किल होगा जितना तालिबानियों से निबटना रहा है. जैसे फारस के बादशाह ने वर्ष 1544 में हुमायूं को भारत पर आक्रमण कर के शेरशाह सूरी से लड़ने के लिए सेना कोहेनूर हीरे के बदले दी वैसे ही इसलाम में सुन्नी से शिया बनने की होड़ लग जाए, तो बड़ी बात नहीं. मौजूदा स्थिति यह है कि सुन्नी मुसलिम देशों का पैट्रोल का पैसा हाथी के दिखावे के दांतों के समान निकला जबकि ईरान का शेर के पंजों जैसा. यह आदमखोर शेर क्याक्या करेगा, वक्त ही बताएगा, फिलहाल तो यह डरावने भविष्य की दस्तक है.
चीन से पिछड़ता भारत
यह स्वाभाविक ही है कि भारत और चीन की तुलना बारबार की जाए क्योंकि 1947 के आसपास दोनों देश बेहद गरीब थे और दोनों में राजनीतिक परिवर्तन बराबर से हुए थे- भारत को अंगरेजों से आजादी मिली थी तो चीन को आपसी युद्ध और जापान के कब्जे से. भारत में कांग्रेस पार्टी ने जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सत्ता संभाली जबकि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी ने माओत्से तुंग के नेतृत्व में. कई दशकों तक दोनों देश गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बढ़ती आबादी से जूझते रहे. चीन दुनिया का नंबर वन आबादी वाला देश बना और भारत विभाजन के कारण नंबर टू.
वर्ष 1990 के बाद चीन ने छलांग लगानी शुरू की और आज वह भारत से कहीं आगे पहुंच गया है. चीन शायद आज यूरोप और अमेरिका से ज्यादा सुखी, संपन्न और सुरक्षित देश है. यूरोप और अमेरिका चीन से उधार माल ले कर मौजमस्ती कर रहे हैं और थोड़ा सा ही ऐसा उत्पादन कर रहे हैं जो रोजमर्रा की चीजों के लिए है. चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया, भारत बेचारा गुलाम, लेबर देने वाला देश बन रह गया है.
एक नया आंकड़ा बताता है कि 2025-26 में भारत ने 119 अरब डौलर का सामान चीन से मंगवाया पर उसे बेचा मात्र 19 अरब डौलर में. इस तरह आपसी व्यापार में भारत को 100 अरब डौलर की हानि हुई. भारत यह विदेशी मुद्रा चीन से उधार ले कर और बाहर देशों में काम पर रहे भारतीय मजदूरों के भारत भेजे गए पैसों से चुकता कर रहा है. भारत के सरकारी अर्थशास्त्री उसी तरह आंकड़े प्रस्तुत करते हैं जैसे पंडेपुजारी हरिद्वार में गंगा स्नान करने के लाभ गिनाते हैं, बेसिरपैर के, बनाए हुए, नितांत झूठे. भारत की दशा सुधर रही है लेकिन बेहद धीमी जैसे चींटी की चाल जबकि चीन छलांगें लगा रहा है. भारत का विकास केवल चुनावी मंचों पर दिखता है, चीन का विकास उस की बढ़ती शक्ति में दिख रहा है.
इस में चिंता की बात यह है कि भारत के नेता इस बात से एकदम बेखबर हैं कि देश की जनता का रहनसहन कितना सुधर रहा है, उन्हें मंदिरों के उद्घाटनों, रेलों को ?ांडियां दिखाने, तोड़फोड़ कर सत्ता में बने रहने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा.
भारत चीन से इलैक्ट्रौनिक आइटम्स, टैलीकौम इक्विपमैंट, इंडस्ट्रियल मशीनरी, कंप्यूटर्स, इलैक्ट्रिक मशीनरी खरीद रहा है. जो कुछ भी खरीद रहा है उस का आविष्कार चीन में भी नहीं हुआ था पर चीन ने उसे सुधार कर सस्ते में बनाना सीख लिया और हम ने केवल अपने मजदूरों को भारत से बाहर भेजना सीखा. हम ने जहां दलबदल करना सीखा है, चीन ने स्थिर प्रशासन देना सीखा है. हमारे यहां मंदिरों पर मंदिर बने हैं, चीन में कारखानों पर कारखाने बने. अफसोस यह है कि ये आंकड़े हमारी चर्चा से गायब हैं. हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बने रहने में खुश हैं. हम खुद को विश्वगुरु कहते नहीं अघाते जबकि दुनिया के देश जानते भी नहीं कि यह विश्वगुरु है क्या बला.
मंदिर उद्योग
सुप्रीम कोर्ट के 7 जज इस गहन समस्या पर विचार कर रहे हैं कि मंदिर ‘उद्योग’ हैं या नहीं. अगर मंदिरों को उद्योग माना जाएगा तो वहां के कर्मचारी इंडस्ट्रियल डिसप्यूट एक्ट के अंतर्गत लेबर कोर्टों में जा सकते हैं और अपने तबादले, प्रमोशन, वेतनवृद्धि, काम के घंटों, निकाले जाने पर मुकदमा कर सकते हैं.
एक पुराने मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों को ‘उद्योग’ मान लिया था पर अब मंदिर चाहते हैं कि मंदिरों के प्रबंधक ही सर्वोसर्वा रहें और वहां काम कर रहे आदमीऔरत सर्वेसर्वियों को भगवान मानें. बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय थी कि चढ़ावे और खर्च के बीच जो बचत होती है उस के उपयोग पर निर्भर करता है कि मंदिर उद्योग हैं या नहीं.
असल में मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे सब से बड़े उद्योग हैं जिन में झठों के बंडलों का उत्पादन होता है. इस ?ाठ को बेचने के लिए मंदिरों के पास मार्केटिंग की बड़ीबड़ी टीमें होती हैं. मंदिर, मसजिद, चर्च विशाल पूजा करने के कारखाने बनवाते हैं जिन का बड़े ढंग से रखरखाव होता है. उन में मैनेजरों, मालिकों और वर्कर्स के लिए खास सुविधाएं होती हैं.
धर्म के उद्योग को चलाना आसान नहीं होता क्योंकि झूठ और छलावे का प्रोडक्ट सदीदरसदी बेचते रहना कमाल की बात है. इतनी कुशलता से कोई उद्योग नहीं चला है जिस में खरीदार अपनी गाढ़ी कमाई से झूठ , आश्वासनों, कहानियों, चमत्कारों के वादों के प्रोडक्ट खरीदने के लिए दूरदूर से आते हैं, लाइनों में लगते हैं. वे पैसा ही नहीं, अपना शरीर और अपनी औरतों तक को इस उद्योग के लिए देते हैं.
इस उद्योग के प्रोडक्ट्स इतने प्रभावशाली होते हैं कि मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे से अदृश्य पैकेटों में बांध कर घरों में ले जाए जाते हैं और जगहजगह रखे जाते हैं. सरकारें किसी और उद्योग को संरक्षण दें या न दें, इस उद्योग को अवश्य देती हैं क्योंकि यह उद्योग और सरकार मिल कर जनता को बेवकूफ बनाते हैं. यह धार्मिक उद्योग ही है जो सेनाओं में जवान उपलब्ध कराता है और सरकार की टैक्स वसूली में भी सहयोगी होता है.
सुप्रीम कोर्ट सिर्फ छोटे से हिस्से पर फैसला देगा पर जो ईश्वर इस उद्योग में काम कर रहे लोगों के विवादों को हल नहीं कर सकता वह ग्राहकों की समस्याओं को कैसे हल करेगा? अगर इसे ‘उद्योग’ घोषित कर दिया गया तो झगड़े लेबर कोर्टों में भर जाएंगे. हां, ग्राहकों की कमी न होगी क्योंकि इस उद्योग की मार्केटिंग बहुत तेज है. US Tariff Policy





