Budget Travel Tips: विदेश यात्रा के दौरान सब से बड़ा झटका अकसर वहां की कीमतें देती हैं. मेन्यू पर 10 या 15 डौलर देख कर भारतीय पर्यटक तुरंत उसे रुपए में बदल लेते हैं और दाम बहुत महंगे लगने लगते हैं, लेकिन किसी भी देश की कीमतों को समझने का सही तरीका केवल मुद्रा बदलना नहीं, बल्कि वहां की आमदनी, जीवन स्तर और खर्च के अनुपात को साथसाथ देखना है.
पर्यटन इन दिनों विश्व स्तर पर बहुत सहज है. इस स्थिति में दूसरे देश में चीजों की कीमत समझने का सब से सही तरीका सिर्फ अपनी मुद्रा में कन्वर्ट करना नहीं, बल्कि वहां की आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में सोचना है. जिस तरह भारत में 80 से 100 रुपए में एक अच्छी चाट आम शहरी के लिए सामान्य मानी जाती है, उसी तरह अमेरिका में लगभग 10 डौलर की एक प्लेट चाट वहां के मध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए उतनी ही सामान्य बात है.
जब भारतीय पर्यटक किसी विदेशी रैस्तरां के मेन्यू पर 10 या 15 डौलर देखते हैं और तुरंत दिमाग में उसे 900 या 1,200 रुपए में बदल देते हैं तो स्वाभाविक रूप से कीमत बहुत अधिक लगती है लेकिन यह तुलना अधूरी है क्योंकि यह केवल मुद्रा के गणित को देखती है. उस समाज की आय और खर्च की वास्तविकता को ध्यान में रखे बिना सही मूल्यांकन संभव नहीं होगा.
केवल करंसी कन्वर्जन से नहीं समझी जा सकती कीमत
किसी भी देश में कौस्ट औफ लिविंग 2 चीजों से मिल कर बनती है, रोजमर्रा के खर्च और वहां की आमदनी. भारत में एक औसत व्यक्ति का मासिक व्यक्तिगत खर्च डौलर में बदलने पर भले कुछ सौ डौलर दिखे, पर इसी के साथ यह भी सच है कि औसत आय अपेक्षाकृत कम है, इसलिए 500 या 1,000 रुपए का अतिरिक्त खर्च सोचेसमझे बिना करना हर किसी के बस की बात नहीं होती.
दूसरी ओर, अमेरिका, यूके, यूएई, आस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में वही व्यक्तिगत खर्च डौलर या पाउंड में देखने पर भारत की तुलना में कई गुना अधिक नजर आता है, लेकिन उन की टैक्स के बाद की औसत सैलरी भी अकसर भारत के मुकाबले कई गुना अधिक होती है. इसीलिए जो चीज भारत के नजरिए से फुजूलखर्ची लग सकती है, वही उन देशों के निवासियों के लिए सिर्फ एक साधारण, रोजमर्रा का व्यय होती है.
बड़े शहरों में महंगाई का अलग गणित
भारत से सीधी तुलना करें तो यूएई, यूके, अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे लोकप्रिय देशों में जीवनयापन का औसत खर्च लगभग 3 से 6 गुना तक अधिक दिखाई देता है. किराया, ट्रांसपोर्ट, बाहर खाना, सेवाएं आदि सब की कीमतें भारत से ज्यादा दिखती हैं. विशेष तौर पर लंदन, दुबई, न्यूयौर्क, सिडनी या टोरंटो जैसे बड़े शहर इस दृष्टि से और भी महंगे पड़ते हैं. किंतु वही चित्र तब संतुलित दिखने लगता है जब यह देखा जाए कि इन देशों में औसत नैट सैलरी से किसी व्यक्ति का डेढ़ से
2 महीने तक का व्यक्तिगत खर्च निकल सकता है. यानी, वहां का निवासी यदि अपने शहर की स्टैंडर्ड नौकरी पर है तो उसे 10 डौलर की कौफी या 15 डौलर के लंच से उतना झटका नहीं लगता, जितना वह रकम सीधे भारत की अर्थव्यवस्था में डाल कर सोचने पर लगती है. इस अंतर को अनदेखा कर के केवल कन्वर्जन करने से हर कीमत अस्वाभाविक रूप से महंगी लगने लगती है.
यूएई का उदाहरण लें तो दुबई जैसे शहर में किराया, बिजली, पानी और रोजमर्रा के सामान की कीमतें भारत के औसत से कई गुना ऊपर हैं, लेकिन वहां बहुत से पेशों में टैक्स फ्री या कम टैक्स वाली उच्च आय मिलती है, जो इन खर्चों को संतुलित कर देती है. लंदन में सार्वजनिक परिवहन, किराया और बाहर खाना सब महंगे हैं, पर एक सामान्य प्रोफैशनल की आय ऐसी है कि इन खर्चों के बाद भी उस के पास बचत की पर्याप्त गुंजाइश रह जाती है. अमेरिका में भोजन, सेवाएं और स्वास्थ्य सुविधाएं भारत के मुकाबले बेहद महंगी मानी जाएंगी, फिर भी एक औसत कामकाजी व्यक्ति की सैलरी उन की भरपाई कर पाती है. कनाडा में मौसम कठोर है और कई चीजें आयात पर निर्भर हैं, इसलिए खर्च ऊंचे हैं, पर सामाजिक सुरक्षा और वेतन स्तर उन्हें वहां के लोगों के लिए व्यावहारिक बनाते हैं. आस्ट्रेलिया में खानेपीने और सेवा क्षेत्र की कीमतें भारत से कहीं ऊपर हैं, मगर न्यूनतम वेतन और औसत आय दोनों इन्हें वहां के निवासियों हेतु सामान्य बनाते हैं.
खानेपीने की बात करें तो भारत में एक साधारण औफिसगोअर का लंच 250, 300 रुपए में अच्छे से निपट सकता है, वहीं यूएई या कनाडा के किसी शहर में कोई साधारण कैजुअल लंच 10-15 डौलर तक का हो सकता है. भारतीय पर्यटक इसे तुरंत रुपए में बदल कर देखता है और मन ही मन सोचता है कि एक दोपहर के खाने पर ही इतना पैसा, लेकिन वहीं के स्थानीय निवासी की मासिक आय को ध्यान में रखें तो यह खर्च उस की आमदनी के अनुपात में उतना ही है, जितना भारत में किसी मौल, फूडकोर्ट या अच्छे ढाबे पर 250, 300 रुपए खर्च करना.
कौफी के साथ भी यही कहानी दोहराई जाती है. भारत में 100 रुपए की कौफी, विदेश में 4-5 डौलर में मिलती है. रुपए में बदल कर देखें तो यह 2-3 गुना महंगी लगती है, मगर स्थानीय आय के अनुपात में यह किसी भी औफिसगोअर के लिए उतनी ही साधारण छोटी सी ट्रीट है जितनी भारत में किसी चायनाश्ते पर 40-50 रुपए खर्च करना.
समझदारी से बजट बनाएं तो विदेश भी किफायती
पर्यटक के लिए सब से व्यावहारिक नजरिया यह है कि हर कीमत को अपनी घरेलू मुद्रा में बदलबदल कर चौंकने के बजाय दैनिक बजट के रूप में देखे. यदि भारत में कोई व्यक्ति दिनभर के खानेपीने पर लगभग 800-1,000 रुपए खर्च करता है तो अमेरिका या यूके जाते समय उसे यह देखना चाहिए कि वहां उसी तरह के सरल, लेकिन आरामदायक दिन के लिए कितना बजट उचित होगा, उदाहरण के लिए, 30-40 डौलर प्रतिदिन. इस तुलना में केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि स्थानीय आय और वहां का सामान्य जीवन स्तर भी शामिल होना चाहिए.
साथ ही, हर जगह खर्च कम रखने के व्यावहारिक तरीके मौजूद हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना, सुपरमार्केट से तैयार या अर्धतैयार भोजन खरीदना, ऐसे होस्टल या सर्विस्ड अपार्टमैंट चुनना जहां किचन की सुविधा हो और अत्यधिक पर्यटक केंद्रित महंगे इलाकों के बजाय थोड़ा अंदरूनी, स्थानीय महल्लों के कैफे, रैस्तरां आजमाना. इस तरह, अत्यधिक महंगे दिखने वाले देशों में भी यात्रा का कुल खर्च काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.
सब से दिलचस्प और उपयोगी मानसिक अभ्यास यह है कि जब भी किसी बोर्ड पर 10-15 डौलर या 8-12 पाउंड की कीमत देख कर झटका लगे तो अपनेआप से एक छोटा सा प्रश्न पूछा जाए, यदि मेरी तनख्वाह भी इस देश की औसत सैलरी जितनी होती तो क्या यह दाम उतना ही चुभता. बहुत बार इस का उत्तर नहीं होगा और वही क्षण होता है जब समझ में आता है कि दिक्कत वास्तविक कीमत से ज्यादा, हमारे तुलना करने की मानसिकता में है.
करंसी कन्वर्जन का यह जाल जितना आकर्षक दिखता है उतना ही भ्रामक भी है. उस से बाहर निकल कर जब कोई भारतीय यात्री यूएई, लंदन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया या कनाडा की कीमतों को उन की स्थानीय आमदनी व जीवन स्तर के संदर्भ में देखना शुरू कर देता है तो उस की यात्रा न केवल कम तनावपूर्ण होती है, बल्कि एक तरह से आर्थिक और सांस्कृतिक समझ को भी गहरा करती है. तब 10 डौलर की चाट केवल 950 रुपए की फुजूलखर्ची नहीं, बल्कि एक नए समाज के जीवन स्तर की छोटी सी झलक बन जाती है और यात्रा का अनुभव सचमुच ज्ञानवर्धक और रोचक हो उठता है. Budget Travel Tips





