Suspense Story: यह कालोनी दिल्ली की मिडिल क्लास वाली थी जिस में आरडब्लूए कुछ न कुछ कराती रहती है. आज कालोनी के अरुण कम्यूनिटी हौल में सुबह श्याम कसरत करने के लिए पहुंचे तो वहां का नजारा ही बदला हुआ था. बड़ी चहलपहल हो रही थी. पूरे हौल में बड़ेबड़े बैनर लग चुके थे. ‘जान है तो जहान है’, मैडिकल एसोसिएशन की पहल पर आप की सेवा में उपस्थित रहेंगे- कार्डियोलौजिस्ट, डर्मियोलौजिस्ट, एन्डोक्राइनोलौजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलौजिस्ट, न्यूरोलौजिस्ट, और्थोपेडिक सर्जन, यूरोलौजिस्ट के साथ गाइनीकोलौजिस्ट, पेडियाट्रिशन और साइकोलौजिस्ट व  पल्मोनोलौजिस्ट, औप्टोमेट्रिस्ट. श्याम यह देख कर हैरान थे. इतने डाक्टर्स का मेला.

घर आ कर जब श्याम ने यह बात रंजना को बताई तो वह उत्साह से भरी हुई बोल उठी, ‘‘मैं न कहती थी, लेकिन आप हैं कि मानने को तैयार नहीं, है न सुविधा की बात, इतने डाक्टर्स के नाम भी हम ने नहीं सुने और वे सभी आज एक जगह मिलेंगे.’’ 4 दिन पहले की बात थी कि रंजना ने औफिस में ही पति को फोन कर के कहा था, ‘कालोनी के व्हाट्सऐप पर एक मैसेज आया है,’ रंजना ने पति को जानकारी देते हुए कहा था.

‘क्या मैसेज है?’ श्याम ने कहा.

‘मैसेज है कि संडे को डाक्टर कुलकर्णी कालोनी में मैडिकल एसोसिएशन की ओर से एक कैंप लगा रहे हैं. सब से बड़ी बात, यह एकदम फ्री मैडिकल टैस्ट कैंप है,’ रंजना उत्साह से बोली.

‘तो लगने दो. डाक्टर्स का तो यह बिजनैस ही है.’

‘आप भी न, अरे, बिजनैस परपज से नहीं, सोशल वर्क की दृष्टि से कैंप लगा रहे हैं वे, ताकि कालोनी के हर व्यक्ति का फ्री मैडिकल चैकअप हो सके. लोगों में हैल्थ अवेयरनैस के लिए वे शहरभर में इस तरह के कैंप लगाते रहते हैं.’’

‘ठीक है, लगाने दो, तुम क्यों इतनी उतावली हो रही हो?’

‘इसलिए कि एक तो संडे को दोनों की छुट्टी है, दोनों घर पर ही रहेंगे, दूसरे यह कि कैंप फ्री है. अगर हम कहीं मैडिकल चैकअप के लिए जाते हैं तो 4 हजार रुपए तो मामूली बात है. तो क्यों न कल हम दोनों भी अपना मैडिकल चैकअप करवा लें.’

‘लेकिन हमें कोई प्रौब्लम नहीं तो क्यों जाएं चैकअप करवाने, जिन्हें कोई तकलीफ हो उन्हें चैकअप कराने दो. बिना वजह भीड़ बढ़ाने से क्या फायदा,’ श्याम ने बहुत ही सहज भाव से कहा.

‘वही तो, भूल गए न आप, पिछले माह अचानक से जो मेरे पेट में तेज दर्द उठा था,’ रंजना थोड़े गुस्से में बोली.

‘पता है, और यह भी कि उस का कारण कोई बीमारी नहीं थी. उस दिन किटी में फ्री का माल समझ कर पेट की क्षमता से अधिक छोलेभटूरे डकार लिए थे तुम ने, इसलिए गैस बन गई थी, जो उलटी होने के बाद ठीक भी हो गई थी.’

‘नहीं, वो बात नहीं, मैं ने आप से कहा नहीं कि मुझे अभी भी कभीकभी पेट में दर्द उठता है.’

‘तो वह गैस की प्रौब्लम है. थोड़ा पैदल टहला करो, सब ठीक हो जाएगा. अपने दिमाग में बेकार की साइकोलौजी मत बनाओ. सीधेसीधे कहो कि शौक है फ्री का फायदा उठाने का.’

‘अब जो भी कहो, मुझे चैकअप कराना है.’

‘तो चली जाओ, खड़ी रहो कतार में.’

‘उहूं, मैं अकेली नहीं जाऊंगी. प्लीज, आप मेरे लिए ही मेरे संग चले चलिए न,’ रंजना के अनुनयविनय पर श्याम पत्नी रंजना संग कैंप पर जाने को तैयार हो गए थे.

जैसे ही रंजना और श्याम वहां पहुंचे, कालोनी के एक घर में क्लिनिक चलाने वाले डाक्टर कुलकर्णी ने गर्मजोशी से उन का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘अरे श्यामजी, आप, सब कुशलमंगल तो है?’’

‘‘डाक्टर साहब, इधर तो प्रकृति की कृपा है, बस, बैटर हाफ में कुछ समस्या है,’’ मुसकराते हुए श्याम ने रंजना की ओर इशारा किया.

‘‘ओह, भाभीजी, क्या हुआ आप को? अच्छा किया आप यहां आ गईं. अपने पास पूरी टीम मौजूद है डाक्टर्स की. आइए, इधर आइए,’’ अपनी टेबल पर बैठते हुए डाक्टर कुलकर्णी ने उन्हें सामने रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘हां तो, अब बताइए क्या प्रौब्लम है?’’

श्याम ने रंजना को कुहनी मार कर इशारा किया अपनी समस्या बताने का.

‘‘वो क्या है न डाक्टर साहब, पिछले महीने पेट में बहुत तेज दर्द उठा था. फिर सिर में भी भारीपन होने लगा. कुछ देर बाद दोतीन उलटियां हुईं.’’ रंजना अभी कुछ और समस्या बताती कि तभी श्याम चुटकी लेते हुए बीच में बोल पड़े, ‘‘और यह भी कहो कि उलटियां होने के बाद पेट दर्द ठीक भी हो गया क्योंकि छोलेभटूरे खाने से गैस बन गई थी.’’

‘‘अब आप ही कह लीजिए सबकुछ, मैं कुछ नहीं कहती,’’ रंजना नाराजगी दिखाते हुए बोली.

‘‘अरे भाभीजी, नाराज न हों, आप तो भलीभांति जानती हैं न श्यामजी की आदत को, बातबात पर मजाक करना आदत है इन की. अच्छा बताइए इस समय क्या होगी आप की उम्र?’’

‘‘सर, 50 प्लस.’’

‘‘लगती तो आप 40 प्लस की हैं भाभीजी. खूब मेंटेन किया है अपने को आप ने.’’

‘‘हेंहें,’’ करते हुए रंजना अपने पर ही मोहित हो गई.

‘‘श्यामजी, देखिए समय बड़ा नाजुक चल रहा है. 50 प्लस वालों को कोई रिस्क लेना नहीं चाहिए. फिर पेट का मामला है और अपने पास डाक्टर भी मौजूद हैं. अभी दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. आप आइए मेरे साथ,’’ कहते हुए वे दोनों को ले कर गैस्ट्रोएंटेरोलौजिस्ट की टेबल की ओर बढ़ गए. रंजना और श्याम जैसे सम्मोहित से डाक्टर कुलकर्णी के पीछेपीछे चल पड़े.

‘‘डाक्टर अमित, ये दंपती श्यामजी और रंजना हैं, हमारे बड़े अच्छे नेबर हैं. भाभीजी को कुछ पेट संबंधी प्रौब्लम है, प्लीज जरा देखिएगा.’’ इस समय डाक्टर कुलकर्णी की वाणी में मानो शहद टपक रहा हो.

‘‘डोंट वरी मिस्टर कुलकर्णी, मैं अभी देख लेता हूं. जरा ये 3 पेशेंट और

देख लूं.’’

रंजना इतना वीआईपी ट्रीटमैंट पा कर फूली ही नहीं समा रही थी. कहां क्लिनिक में इतनी फीस देने के बाद भी घंटों इंतजार करते हुए बैठे रहो कि अब नंबर आएगा तब नंबर आएगा.

‘‘हम नाहक ही डाक्टर्स को कोसते हैं जी, देखिए कितने व्यावहारिक हैं ये लोग,’’ रंजना धीरे से पति के कानों में फुसफुसाते हुए बोली. श्याम जो हौल का मुआयना करते हुए हैरान थे, सोच रहे थे कि मैं बरसों से रोज सुबह यहां कसरत करने के लिए आता हूं मगर यहां कभी 25-30 से ऊपर संख्या नहीं दिखाई दी. आज चारों ओर ही लंबी कतार है. यह फ्री कैंप का असर है या वाकई इतने लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से उलझ रहे हैं?

रंजना की बातों से श्याम का ध्यान भंग हुआ, वह कुछ कहते, इस से पहले ही डाक्टर अमित ने आवाज लगाई, ‘‘मिसेस रंजना, प्लीज आइए.’’

रंजना ग्रीन परदे के पीछे रखे स्ट्रेचर पर लेट गई.

‘‘हां, तो बताइए कहां दर्द होता है, यहां?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘यहां?’’

‘‘नहींनहीं.’’

‘‘यहां?’’

‘‘हां, जी यहां.’’

‘‘ओके. क्या कुछ खाने के बाद होता है या हर समय बना रहता है?’’

‘‘जी, आजकल अकसर हलकाहलका दर्द बना ही रहता है.’’

‘‘आप की माहवारी नियमित है?’’

‘‘जी, पहले थी, अब तीनचार महीने में कभीकभार…’’ संकोच के कारण रंजना के शब्द लड़खड़ा रहे थे.

डाक्टर अमित समझ गए, ‘‘ओके, ओके, ठीक है आप आ जाइए बाहर,’’ कहते हुए डाक्टर अमित हैंडग्लव्स उतार कर डस्टबिन में डालते हुए बाहर अपनी चेयर पर आ बैठे. तब तक रंजना भी आ कर पति के बगल में बैठ गई. अपने नोटपैड पर कुछ प्रिस्क्रिप्शन लिखते हुए डा. अमित ने कहा, ‘‘श्यामजी, मुझे कुछ डाउट है कि कहीं रंजनाजी के गालब्लैडर में स्टोन न हो, बेहतर होगा आप एक अल्ट्रासाउंड करवा लीजिए, स्थिति क्लियर हो जाएगी.’’ डा. कुलकर्णी का हिप्नोटाइज रंजना पर तो पूरी तरह काम कर ही रहा था, अब श्याम भी डा. अमित की चपेट में आ गए.

‘‘ठीक है डाक्टर साहब, यह कालोनी से सटा हुआ जो सुजल अल्ट्रासाउंड सैंटर है वहां करवा लेता हूं, फिर आप के पास रिपोर्ट ले कर पहुंचता हूं.’’

‘‘सुजल अल्ट्रासाउंड, यह कौन सा सैंटर पैदा हो गया, भाई. कभी सुना नहीं यह नाम. नहीं श्यामजी, आप ऐसेवैसे सैंटर का रिस्क न लें, मेरे खयाल से ये जो हीरानंद हौस्पिटल है न.’’

‘‘हीरानंद, कभी सुना नहीं यह नाम, कहां है?’’ श्याम ने पूछा.

‘‘अरे, क्या बात करते हैं, यह नियरबाय सर्वोदय का अच्छा नया हौस्पिटल है. आप वहां करवा लीजिए. मैं लिख देता हूं, वे आप का काम जल्दी कर देंगे. फिर मैं शाम को लौटते समय वहीं आ कर रिपोर्ट भी चैक कर लूंगा,’’

डा. अमित ने कहा.

‘‘ठीक है, सर.’’

‘‘और हां, प्लीज लेट मत कीजिएगा, बीमारी बढ़ाने से कोई फायदा नहीं. मैं तो कहता हूं आप कल ही अल्ट्रासाउंड करवा लीजिए.’’

सचमुच दूसरे दिन श्याम और रंजना दोनों ने अपने दफ्तरों से छुट्टी ली और सुबह बिना खाएपिए रंजना को श्याम हीरानंद हौस्पिटल ले गए. उन्हें इंतजार था कि शाम को डाक्टर रिपोर्ट देख कर क्या कहते हैं.

शाम को रिपोर्ट चैक कर डा. अमित ने चेहरे पर गंभीरता लाते हुए कहा, ‘‘जिस का डर था वही हुआ.’’

‘‘क्या हुआ डाक्टर साहब,’’ घबराते हुए श्याम ने पूछा.

‘‘श्यामजी, इन के गालब्लैडर में स्टोन है, अच्छा किया समय पर चैकअप करवा लिया आप ने वरना बड़ी परेशानी होती.’’

‘‘अब क्या होगा डाक्टर?’’

‘‘चिंता की कोई बात नहीं श्यामजी. बस, एक छोटा सा औपरेशन है, घबराइए नहीं, स्टोन निकाल दिए जाएंगे. आप की इंश्योरेंस पौलिसी तो होगी न भाभीजी के नाम की?’’

‘‘जी सर, वह तो है.’’

‘‘कितने लाख की है?’’

‘‘जी, 10 लाख की है, सर.’’

‘‘तो आप जल्द ही इन्हें यहीं इसी हौस्पिटल में एडमिट करवा दीजिए, मैं किसी अच्छे सर्जन से बात कर लेता हूं.’’

‘‘मगर सर, हमारे बच्चे बाहर हैं, मुझे उन से एक बार बात करनी होगी.’’

‘‘अरे, श्यामजी, आप तो बेकार चिंता कर रहे हैं. इस में इतनी चिंता की कोई बात नहीं है. मामूली सा औपरेशन  है, सब ठीक हो जाएगा. बस, आप जो भी निर्णय लें, जल्दी ले लें. इनफैक्ट, मैं तो कहता हूं इसी हफ्ते करवा लीजिए वरना डाक्टर बाहर जाते रहते हैं, उन का समय मिलना मुश्किल होगा.’’

‘‘ठीक है डाक्टर. मैं घर जा कर बच्चों से बात कर बताता हूं.’’

‘‘जैसा भी हो, मुझे इन्फौर्म करें. एक दिन पहले एडमिट करवाना होगा ताकि सारे टैस्ट हो जाएं और दूसरे दिन सुबह औपरेशन हो जाए. तब तक मैं कुछ दवाएं लिख देता हूं, आप रैग्युलर

देते रहें.’’

श्याम ने घर जा कर जब दोनों बेटों से बात की तो छोटा बेटा रितेश बोला, ‘‘पापा, क्या ही अच्छा हो कि आप एक डाक्टर से और ओपिनियन ले लें.’’

‘‘ठीक है बेटा, पता करता हूं.’’

अपने जौब की व्यवस्था कह लीजिए या फिर रंजना भी ठीकठाक ही दिखाई दे रही थी, इसलिए श्याम ने इतनी तत्परता नहीं न दिखाई. रंजना दवाएं बराबर ले ही रही थी. एक सप्ताह होतेहोते डाक्टर अमित का ही फोन आया, ‘‘क्या सोचा है श्यामजी औपरेशन के बारे में, आप आए नहीं अभी तक?’’

‘‘जी, वो बच्चे अभी आने में असमर्थ हैं, उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही. वो आ जाएं तो विचार कर बताता हूं.’’

‘‘जैसा आप उचित समझें श्यामजी लेकिन मेरी राय में स्टोन का गालब्लैडर में अधिक समय तक रहना घातक होगा. आप जितनी जल्दी औपरेशन करा लें, पेशेंट के फेवर में होगा.’’

फिर अगले दिन सुबह कालोनी के सभाकक्ष में कसरत करने के लिए जाते हुए डाक्टर कुलकर्णी टकरा गए. ‘‘गुडमौर्निंग श्यामजी, कैसी हैं भाभीजी?’’

‘‘उन्हें डाक्टर अमित ने गालब्लैडर में स्टोन बताया है और औपरेशन की सलाह दी है.’’

‘‘तो टैंशन की क्या बात है, करवा लीजिए न औपरेशन. इट्स सो इजी,’’ और साथ में हिदायत भी दे डाली कि जब समय से पता चल ही गया है तो ज्यादा देर करना उचित नहीं श्यामजी.

शाम को बेटों से बात करते हुए श्याम ने कहा, ‘‘मैं समझ नहीं पा रहा हूं और किस डाक्टर से ओपिनियन लूं और इधर ये डाक्टर कह रहे हैं कि देर करना ठीक नहीं है.’’ तब बड़ा बेटा रोहन बोला, ‘‘आप चिंता न करें, पापा. मैं औनलाइन पता करता हूं.’’

रोहन ने औनलाइन चैक करने के बाद किसी डाक्टर मंसूर की प्रोफाइल का ग्रेड देख कर उन का नाम सजेस्ट किया. वे एंडोस्कोपी के एक्सपर्ट हैं. इधर एक सप्ताह की दवाएं समाप्त होते ही रंजना ने फिर पेटदर्द की शिकायत शुरू कर दी. सो, श्याम ने उन्हें ही दिखाना उचित समझा. पुरानी सारी रिपोर्ट डा. मंसूर के सामने रखीं जिन्हें एक नजर में ही डा. मंसूर ने परे कर दिया.

रंजना का चैकअप कर उन्होंने अपनी सलाह देते हुए कहा, ‘‘श्यामजी, मुझे लगता है स्थिति कुछ क्लियर नहीं है, आप ऐसा करें ‘ईआरसीपी’ (एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलेंजियोपैन्क्रिएटोग्राफी) करवा लें. कारण, अगर लगातार टेबलेट लेने के बाद भी पेटदर्द बना हुआ है तो मुझे शक है पैंक्रियाज का कैंसर न हो. मैं समझता हूं कि आप पैनक्रियाज और गालब्लैडर की बायोप्सी भी करा ही लें.’’

‘‘कैंसर नाम सुनते ही श्याम की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. डाक्टर मंसूर का नाम है शहर में, सोचा, वे झूठ क्यों बोलेंगे? उधर मित्रों ने भी मशवरा दिया कि भाई डाक्टर डाक्टर होते हैं, गलत राय थोड़ी न देंगे. सो, उन्होंने पैनक्रियाज और गालब्लैडर की बायोप्सी करवाई. रिपोर्ट नैगेटिव आई लेकिन बायोप्सी और एंडोस्कोपी के बाद जहां सेहत में सुधार महसूस होना था वहीं उलटे, रंजना की तबीयत और बिगड़ने लगी. उस का दर्द और बढ़ गया.

ऐसे में श्याम विवश हुए और फिर हीरानंद हौस्पिटल में डाक्टर अमित के पास पहुंचे, सोचा, शायद उन्होंने ठीक ही कहा था. शायद स्टोन ही है. डा. अमित के पास जा कर उन्होंने डा. मंसूर के यहां का सारा वाकेआ उन्हें कह सुनाया. सारी बात सुन डाक्टर अमित भड़क उठे. उन का व्यवहार ही बदल गया. आवाज की वह मिठास करेले सी कड़वाहट में बदल गई.

‘‘अफसोस, श्यामजी, आप ने भरोसा न कर पेशेंट का केस और क्रिटिकल कर दिया है. अब अगर केस बिगड़ता है तो जिम्मेदारी आप की है. मैं ने कहा था कि आप से कि गालब्लैडर में स्टोन का अधिक समय तक रहना घातक हो सकता है.’’

क्या कहते श्याम, अपनेआप में ग्लानि महसूस कर सिर झुकाए सुनते रहे. आखिर, गलती उन्हीं से हुई है, क्या किया जाए.

‘‘सर, जो हुआ उसे भूल जाइए प्लीज बताइए आगे क्या करना है?’’

‘‘करना क्या है श्यामजी, पेशेंट को इमीडिएट एडमिट कराइए और अब फिर से हमें उन के वे पूरे टैस्ट करने होंगे, तब बता पाएंगे औपरेशन की क्या स्थिति है.’’

रंजना को एडमिट कर दिया गया. श्याम ने घबरा कर बेटों को कौल कर दिया. वे भी अगली फ्लाइट पकड़ कर आ गए. इधर, रंजना का दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था. उसे मंथली ब्लीडिंग जो काफी कम मात्रा में होती थी, अब अचानक बढ़ गई.

‘‘श्यामजी, हमें स्पैशलिस्ट को बुलाना होगा और उन की विजिट का चार्ज देना होगा.’’

‘‘जो भी होगा, डाक्टर बुला लीजिए.’’

3 स्पैशलिस्ट को अस्पताल ने अरेंज किया, उन्होंने शंका जाहिर की, ‘‘शायद पेट में इंटरनल ब्लीडिंग की वजह से यह दर्द हो रहा है, उन्हें फौरन आईसीयू में भरती किया जाए.’’

रोहन ने डाक्टर अमित से पूछा, ‘‘सर, इतने टैस्ट के बाद भी अब तक असली बीमारी पकड़ में क्यों नहीं आ रही है, हर डाक्टर केवल शंका ही जाहिर कर रहा है. कोई कुछ क्यों नहीं कह रहा?’’

‘‘मिस्टर रोहन, देखिए हम डाक्टर हैं, रिपोर्ट जो कहेगी वही न हम बताएंगे. फिर औपरेशन डिले कर केस आप ने खुद क्रिटिकल किया है.’’

‘‘मां खतरे में हैं, डाक्टर के शिकंजे में हैं,’’ इसलिए रोहन चुप रह गया वरना बहुतकुछ कहना चाहता था कि डाक्टर, मेरी मां तो अच्छीभली थीं, आप को कुछ समझ कर आप की शरण में आई थीं किंतु आज उन की यह हालत हो गई.

आईसीयू में रंजना को आराम लगने के बजाय उस की स्थिति और बिगड़ने लगी. उसे बेहद घबराहट और बेचैनी हो रही थी. उस का बीपी बारबार गड़बड़ाने लगा. डाक्टर ने लिवर, हार्ट और किडनी के साथ कई ब्लड टैस्ट और लिख दिए. अब की रिपोर्ट में बताया कि किडनी इन्फैक्टेड है और इन्हें डायलिसिस पर डालना होगा. रंजना को डायलिसिस पर डाल दिया गया. उस की कमजोरी बढ़ती जा रही थी.

दवा के नाम पर हर आधे घंटे में नर्स आ कर उसे पता नहीं क्याक्या दवाएं दे कर जा रही थी और बिल ऐड होता जा रहा था. दवाओं का असर था या कुछ और, रंजना को उलटियां शुरू हो गईं. उलटियों से पेट में खिंचाव की वजह से दर्द भी बढ़ गया. स्थिति यह हुई कि पानी या इलैक्ट्रौल भी उसे सूट नहीं हो रहा था, पेट में जाते ही उल्टी हो जाती. कुछ न खाने से वीकनैस बढ़ गई. रंजना को दफ्तर से अब अनपेड लीव पर रहना पड़ रहा था क्योंकि सारी लीव खत्म हो चुकी थीं.

रंजना को हौस्पिटल में रहते हुए लगभग महीना हो गया था. अब तक इंश्योरैंस की पूरी पौलिसी भी खत्म हो चुकी थी. श्यामजी की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं. बच्चे आईटी कंपनी के जौब में नएनए लगे थे. यों भी इन कंपनियों में तो सदा ही छुट्टियों का टोटा रहता है. रिक्वैस्ट कर दोनों भाई बारीबारी से 6-8 दिन का वर्क फ्रौम होम ले कर आते. उन का फ्लाइट से आनेजाने का खर्च अलग बढ़ गया.

जैसेतैसे जीवन की गाड़ी लड़खड़ाती हुई चल रही थी. घर कामवालियों के भरोसे छोड़ दिया था. इधर रंजना की दिनचर्या थी हर 15 से 20 मिनट में एक लिक्विड दवा, हर 3 घंटे में एक ड्रिप, हर सप्ताह एक खून की बोतल. बस, ये ही उस के जीवन के आधार थे. वे भागतेभागते अपने औफिस जाते. दोनों का वेतन बंद हो जाए, यह अफोर्ड नहीं कर सकते थे. अब रंजना अकसर बेहोशी की हालत में रहती. पता नहीं ड्रिप में डली दवाओं का असर था या कुछ और लेकिन एक दिन रितेश के दोस्त प्रणय ने हालचाल लेने के लिए फोन लगाया, ‘‘क्या हुआ है आंटी को, रितेश?’’

‘‘वही तो पता नहीं चल रहा, प्रणय. अब तक डाक्टर जमानेभर के टैस्ट करवा चुके हैं. मगर बताते कुछ नहीं. ऐसा लग रहा है वे अपनी डाक्टरी का सारा एक्सपैरिमैंट मम्मी पर ही कर रहे हैं. कभी कुछ बीमारी का शक बता कर कुछ चैकअप करवाते हैं तो कभी कुछ.’’

‘‘तू ऐसा कर, आंटी की सारी रिपोर्ट मुझे भेज. मेरी दीदी मुंबई में अच्छी डाक्टर हैं. उन से पूछता हूं,’’ रितेश ने डाक्टर से रिपोर्ट देखने को मांगी तो डाक्टर ने अपनी नाराजगी दिखाई, ‘‘क्या मतलब है आप का, हम पर भरोसा नहीं तो क्यों लाए आप पेशेंट को यहां. इतना ही अविश्वास है तो ले जाइए अपने पेशेंट को.’’ डाक्टर तो जानता था कि पंछी पूरी तरह शिकंजे में फड़फड़ा तो सकता है मगर उड़ नहीं सकता. उस के पर जो कतर दिए हैं उस ने.

लेकिन फिर भी रितेश ने किसी तरह चुपचाप वार्डबौय की मदद से रिपोर्ट के फोटो मोबाइल में ले लिए और प्रणय को भेज दिए.

इधर, स्पैशलिस्ट आते रहे और अपना बिल बनाते रहे और रंजना को नईनई बीमारियां बताते रहे. अब की बार स्पैशलिस्ट को कहना पड़ा, पेशेंट का लिवर अफेक्टेड है, इसीलिए उन्हें कुछ हजम नहीं हो रहा है. उस ने अपना प्रिस्क्रिप्शन लिख दिया. एक पौलिथीन भर दवाइयां फिर नीचे के कैमिस्ट से आ गईं. समझ नहीं आ रहा था कि जिस पेशेंट को पानी और इलैक्ट्रौल नहीं मिल रहा है तो इतनी मैडिसिन कैसे झेल रही हैं? अगर नहीं तो ये सब कहां जा रही हैं? क्योंकि ये दवाएं परिवार वालों के सामने तो पेशेंट को कभी नहीं दीं.

आज रंजना को अस्पताल में आए 45 दिन हो गए. हर टैस्ट के अपने बिल, हर स्पैशलिस्ट के अपने बिल, रूम का किराया. तबीयत की बात करें तो दिनोंदिन डाउन ही होती जा रही थी. बिना खाएपिए कोई इंसान कब तक रह सकता है, कमजोरी तो बढ़नी ही है. कमजोरी के रहते रंजना को सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी.

डाक्टर ने फौरन रिपोर्ट हाथ में थमा दी, ‘‘इन का हार्ट 20 फीसदी काम कर रहा है, इन्हें पेसमेकर लगाना होगा.’’ अच्छे स्वास्थ्य की कामना ले कर अपने पैरों पर चल कर आई रंजना अब अस्पताल के बिस्तर पर जिंदा लाश बन चुकी थी. यहां तक कि वह अपने हाथ से एक छोटा सा प्याला उठा कर भी नहीं पी पा रही थी. सबकुछ नर्स के भरोसे था. लगा अस्पताल के नाम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है क्योंकि ये स्वास्थ्यकेंद्र नहीं, रुग्णालय हो गए हैं, जहां अच्छाभला इंसान भी आ कर रोगी हो जाता है.

श्याम भी बैठेबैठे सोच रहे थे, रंजना ठीकठाक आई थी अस्पताल, मामूली सा दर्द ले कर. डाक्टर के पास आ कर उसे कितनी बीमारियां निकल आईं. कैसे हुआ यह सब? कुछ समझ नहीं आ रहा. कल कालोनी में डाक्टर कुलकर्णी से उन का सामना हुआ लेकिन आज उन के लिए श्यामजी बैस्ट नेबर नहीं रहे थे. बस, एक पेशेंट की फैमिली के सदस्य थे. वे उखड़ेउखड़े अंदाज में बात कर आगे बढ़ गए. श्याम ने अभी कुछ समय पहले ही मकान बनवाया है, उस के बाद कुछ थोड़ीबहुत बची जमापूंजी जो थी वह भी धीरेधीरे निकल कर डाक्टर के हवाले कर दी. बच्चे भी अभीअभी जौब पर लगे हैं, छुट्टियों के रहते उन का कैरियर खतरे में आ रहा है. रंजना की हालत में तिल भर भी सुधार होता तो संतोष रहता. समझ नहीं आ रहा था क्या करें क्या न करें. वे मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थक गए थे.

आज तो सुबह से रंजना बहुत रो रही है, अंदर कोई भारी कष्ट हो रहा था शायद. बेटा दौड़ कर डाक्टर को बुला लाया. डाक्टर ने उस जिंदा लाश में भी बीमारी खोज निकाली और फौरन औपरेशन की सलाह दे डाली जिस का बड़ा सा इस्टीमेट काउंटर पर जमा करने की हिदायत भी. डाक्टर समझ जो गए थे कि अब मुरगी हलाल होने वाली है. आखिरी सोने का अंडा भी पा ही लें.

कैसे हो व्यवस्था?’’ श्याम ने बेटों की ओर देखा.

‘‘पापा, मम्मी के जो जेवर हैं वे मम्मी से बढ़ कर तो नहीं.’’

सो, लौकर से सारे जेवर निकाल कर उन्होंने जैसेतैसे कुछ पैसों की व्यवस्था की. कुछ करीबी रिश्तेदारों से उधार ले कर जैसेतैसे काउंटर पर जमा किए ताकि रंजना का औपरेशन हो सके. रंजना औपरेशन थिएटर में जा चुकी थी. श्याम उस दिन को कोस रहे थे जिस दिन कालोनी में वह फ्री कैंप लगा था, वे गए क्यों? गए क्या, अपनी अच्छीभली गृहस्थी को लुटा बैठे.

वहीं, बेटे सोच रहे थे कितना हंसमुख परिवार था हमारा, कितने खुश थे हम चारों, कितनी हंसमुख और सुंदर मां थी हमारी, कितने सपने देखे थे उन्होंने अपने बेटों के कैरियर को ले कर, विवाह और बच्चों को ले कर, यह क्या से क्या हो गया, जाने किस की नजर लग गई. औपरेशन थिएटर के बाहर श्याम और दोनों बेटे बड़ी बेसब्री से चहलकदमी कर रहे थे. इंतजार था डाक्टर के बाहर आने का.

लेकिन डाक्टर की जगह आई नर्स और हाथ में लंबाचौड़ा परचा पकड़ा कर बोली, ‘‘प्लीज, इमिडिएट.’’

बेटा दौड़ पड़ा, कहीं ऐसा न हो औपरेशन टेबल पर उन की मां दवाओं के अभाव में जीवन खो दे. नादान नहीं जानते थे, उन की मां तो कब की मर चुकी है अंदर. ये कफनचोर अब भी उन के हिस्से के कफन का पैसा भी उन से नोचने की फिराक में लगे हुए हैं. खैर, दवाओं का बड़ा सा पैकेट अंदर गया. शायद, उन्हें इसी अंतिम किस्त का इंतजार था.

तकरीबन 15 मिनट बाद ओ-टी का दरवाजा खुला. एक कुशल अभिनेता की तरह गरदन झुकाए 2 डाक्टर बाहर निकले, ‘‘आय एम सौरी श्यामजी, मिसेज रंजना इज नो मोर.’’

श्याम लुटे से डाक्टर को देखते रह गए.

‘‘पूरे जीवन की पूंजी हवन कर दी मैं ने डाक्टर. और आप कह रहे हैं शी इज नो मोर. जानते हैं मेरी पत्नी ने अपने इन बच्चों के लिए कितने सपने देखे थे? अभी तो उस के सपने पूरे होने का समय आया था और आप कह रहे हैं शी इज नो मोर.’’

डाक्टर पर जैसे उन के आंसुओं का कोई असर ही न हुआ और वे अपने लंचब्रेक पर चल दिए. खड़े रह गए उजड़े परिवार के ये

3 सदस्य. रितेश को ध्यान आया कि मां को एक नजर देख तो ले.

जैसे ही वे तीनों अंदर जाने को हुए, वार्डबौय ने उन्हें बाहर ही रोक दिया, ‘‘सर, आप अंदर नहीं जा सकते.’’

‘‘मगर क्यों, हम अपनी मां को देखना चाहते हैं.’’

‘‘जी, उन की डैड बौडी मौर्चुरी में जा चुकी है.’’

‘‘मौर्चुरी में, मगर क्यों? हम यहां बैठे हैं अपनी मां को ले घर ले जाने के लिए. ‘‘बताइए मौर्चुरी कहां है, हम अपनी मां को एक नजर देखना चाहते हैं. हम वहीं जा कर उन्हें देख लेंगे.‘‘ यह कहते हुए रितेश आगे बढ़ा तो 2 भारीभरकम बाउंसर उस के सामने आ कर खड़े हो गए.

‘‘कहा न, आप वहां नहीं जा सकते.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘क्योंकि अभी आप का पूरा बिल भुगतान नहीं हुआ है.’’

‘‘अरे, तो बिल ले कर हम भाग तो नहीं जाएंगे.’’

‘‘जी नहीं, आप पहले काउंटर पर जा कर अपना बिल पेमेंट कर दीजिए, फिर शौक से अपनी डैड बौडी घर ले जाइए.’’ तकदीर के मारे तीनों काउंटर पर पहुंचे जहां पर पौलिसी के 10 लाख के अलावा सारी दवाओं और औपरेशन के चार्ज, डाक्टर्स के राउंडचार्ज देने के बाद भी 5 लाख का बिल उन का इंतजार कर रहा था. कैसे व्यवस्था हो? अभी वे सोच रहे थे कि प्रणय का फोन आ गया, ‘‘हैलो रितेश, सौरी यार, दीदी अपने सैमिनार के चक्कर में आउट औफ इंडिया थीं, अब लौटी हैं.

दीदी ने सारी रिपोर्टें देखीं. उन का कहना है कि जो पहली रिपोर्ट थी अल्ट्रासाउंड की, उस में कहीं भी पेशेंट को गालब्लैडर में स्टोन है ही नहीं. और जो दर्द पेट के निचले हिस्से में था वह मंथली पीरियड जाने के समय अकसर 50 से ऊपर की महिलाओं को होता है जो एक सामान्य बात है लेकिन यह समझ नहीं आ रहा कि उन्हें बेमतलब हाई पावर मैडिसन क्यों दी जा रही हैं? दी पूछ रही हैं किस ने ट्रीटमैंट प्रिसक्राइब किया है? जानते हो इतना हाई डोज दे कर उन का लिवर इफैक्ट किया गया जिस के रहते वे कुछ खापी नहीं पा रही हैं. वह डोज फौरन बंद कर दो. बाकी सारी परेशानी उन की वीकनैस के कारण है. उन्हें कोई बीमारी नहीं है. उन का हार्ट और किडनी, सारी ब्लड रिपोर्ट एकदम नौर्मल हैं.

रोहन आजकल फर्जी डाक्टर्स का बड़ा ग्रुप इस तरह के स्कैम में लगा हुआ है जो पेशेंट को अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें झूठी रिपोर्ट दिखा कर बीमारी बता पैसा लूट रहे हैं. मुझे तो लगता है कि तुम ऐसे ही किसी मैडिकल स्कैम का शिकार हो गए हो. मेरी बात मानो तो जल्दी से जल्दी आंटी को वहां से बाहर निकाल लो. वैसे, अब कैसी हैं आंटी?’’

‘‘प्रणय, मां अब इस दुनिया से ही निकल चुकी है. उन्होंने मार डाला हमारी मां को, प्रणय. लोग झूठ कहते हैं कि डाक्टर धरती पर जीवनदाता का रूप होते हैं. जीवनदाता नहीं बल्कि ये हत्यारे हैं, हत्यारे.’’ Suspense Story

 

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