Foreign Languages Removed: सीबीएसई ने हाल ही में फ्रैंच और स्पैनिश जैसी विदेशी भाषाओं को सिलेबस से हटा कर संस्कृत जैसी भाषा को महत्त्व दिया है. सीबीएसई का यह निर्णय असल में शिक्षा के भगवाकरण की दिशा में बीजेपी का एक और कदम है. सीबीएसई ने अपने इस नए फैसले से लाखों पुरातनपंथी धोतीधारी संस्कृत को रटे हुए विशेष जाति के बेरोजगारों के लिए नौकरियों का प्रबंध कर दिया है.
सीबीएसई ने हाल ही में अपने सिलेबस में बड़ा बदलाव किया है. 9वीं-10वीं से स्पैनिश, जरमन, फ्रैंच जैसी विदेशी भाषाएं हटाने का फैसला लिया गया है. वहीं संस्कृत को तीसरी भाषा के तौर पर लगभग अनिवार्य कर दिया गया है यानी जो बच्चा कभी संस्कृत नहीं पढ़ा उसे अब जीरो से शुरू करना होगा. यह फैसला छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ है और बीजेपी सरकार की पुरातनपंथी सोच का सुबूत है. यह फैसला नौकरी का बाजार देखे बिना लिया गया है.
आज दुनिया ग्लोबल विलेज बन चुकी है. मल्टीनैशनल कंपनियां भारत आ रही हैं. 2024 में भारत में जरमन कंपनियों की संख्या 2,000 पार कर चुकी है. स्पैनिश बोलने वाले 50 करोड़ लोग दुनिया में हैं. ये 21 देशों की राजभाषा है.
नैसकौम की रिपोर्ट बताती है कि विदेशी भाषा जानने वाले ग्रेजुएट को 35 फीसदी ज्यादा सैलरी मिलती है. बीपीओ, टूरिज्म, एक्सपोर्टइंपोर्ट, दूतावास, अनुवाद जैसे सैक्टर में हर साल 1.2 लाख नई नौकरियां सिर्फ भाषा के दम पर निकलती हैं. सीबीएसई ने इन्हीं भाषाओं को हटा दिया यानी सरकार खुद अपने छात्रों के पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही है. एक तरफ ‘स्किल इंडिया’ का नारा और दूसरी तरफ बच्चों से वो स्किल छीन रही है जो सीधे रोजगार देती है.
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