Single Women Struggle: 37 साल की मसाबा गुप्ता फिल्म अभिनेत्री नीना गुप्ता और वेस्टइंडीज के पूर्व क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स की बेटी है. उस के मातापिता ने कभी शादी नहीं की और उस का पालनपोषण उस की मां नीना गुप्ता ने किया. मसाबा ने अपनी मां के साथ ही बड़े होना सीखा. मां का ही उस के जीवन पर पूरा प्रभाव पड़ा. 20 साल की अवस्था में अपने पिता विवियन रिचर्ड्स से भी मिली. अब दोनों के बीच एक मजबूत रिश्ता है. क्रिकेटर पिता की बेटी मसाबा बचपन में टैनिस खिलाड़ी बनना चाहती थी. कुछ वर्षों तक उस ने टैनिस खेला लेकिन 16 साल की उम्र में टैनिस खेलना छोड़ दिया.

मां के ऐक्टिंग से जुड़े डांस और म्यूजिक के प्रति उस का रुझान बढ़ा. इस के लिए वह लंदन भी गई. अपनी मां के अकेलेपन को देखते हुए मसाबा वापस मुंबई आ गई. मुंबई में मसाबा ने एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय से संबद्ध प्रेमलीला विट्ठलदास पौलिटैक्निक में पढ़ाई शुरू की. इस के बाद उस ने मुंबई में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया. उस दौरान उस ने अपनी पहली ड्रैस एग्जीबिशन लगाई. वहां से उसे 2014 में लैक्मे फैशन वीक में हिस्सा लेने का मौका मिला, जहां उस की ड्रैस चर्चा में आई.

मसाबा ने सोशल मीडिया का अच्छा उपयोग किया. उस को इंस्टाग्राम के माध्यम से फैशन शो करने वाली पहली भारतीय डिजाइनर के रूप जाना जाता है. वह कहती है कि उस की लगभग 60 प्रतिशत बिक्री व्हाट्सऐप के माध्यम से होती है. मसाबा ने मुसलिम महिलाओं को सामने रख कर हिजाबसाड़ी लौंच की थी. 2020 में ‘मसाबा मसाबा’ नाम से एक टीवी सीरियल बना जिस में मसाबा और उस की मां नीना गुप्ता ने खुद अभिनय किया था. उस में फैशन और फिल्म के साथ उन के जीवन की घटनाओं को दिखाया गया था.

मसाबा ने 2015 में फिल्म निर्माता मधु मंटेना से शादी की थी. यह शादी जल्दी ही टूट गई. 2018 में दोनों अलग हो गए. सितंबर 2019 में इन का तलाक हो गया. 27 जनवरी, 2023 को मसाबा ने सत्यदीप मिश्रा से दूसरी शादी की. जिन्होंने ‘मसाबा मसाबा’ में उन के पूर्व पति की भूमिका निभाई थी. 11 अक्तूबर, 2024 को मसाबा को बेटी हुई. मसाबा के पास बहुत सारे रास्ते थे, इस के बाद भी उस ने अपनी मां नीना गुप्ता के साथ रहना पसंद किया. अपने मातापिता की अकेली लड़कियों को उन का ध्यान रखना पड़ता है. यही वजह है कि कई बार उन को अच्छे रिश्ते नहीं मिल पाते. समाज यह सोचता है कि अगर सिंगल बेटी है तो उसे अपने मांबाप की देखभाल के लिए मायके में रहना पड़ सकता है. उस के पति को भी उस का साथ देना पड़ता है. उसे पत्नी के घर पर ‘घरजंवाई’ बन कर रहना पड़ता है.

समाज अभी इस को अच्छा नहीं समझता. इस वजह से लड़कियों के सामने कठिनाई आने लगी है. घरजंवाई को ले कर जो सामाजिक सोच है उस को बदलना पड़ेगा. आज पेरैंट्स की देखभाल के लिए लड़कियों की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. नैतिकता ही नहीं, कानून भी इस का पक्षधर है.

बेटी पर भी है मातापिता की जिम्मेदारी

वर्ष 2007 में मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान बने कानून मेंटिनैंस एंड वैलफेयर औफ पेरैंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट के अनुसार बच्चों पर मातापिता की देखभाल की जिम्मेदारी होती है. एक्ट में बेटा और बेटी को अलगअलग नहीं किया गया है. शादीशुदा और अविवाहित दोनों पर यह कानून लागू होता है. यदि लड़की अकेली है और कमाने वाली है तो उस पर भी मातापिता की जिम्मेदारी हो सकती है. सिर्फ अकेली होने से जिम्मेदारी में कोई फर्क नहीं पड़ता. दिल्ली हाईकोर्ट ही नहीं, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपने कई फैसलों में कहा है कि ‘बेटी भी बेटे की ही तरह से मातापिता के भरणपोषण के लिए जिम्मेदार है.’

द्य  इस में एक ही शर्त होती है कि लड़की कमाने वाली हो और मातापिता अपना पालनपोषण करने में सक्षम न हों.

द्य जब लड़कालड़की मातापिता का पालनपोषण नहीं करते तो उन को मासिक भरणपोषण के लिए कोर्ट में शिकायत करने का अधिकार होता है.

द्य कोर्ट को रकम तय करने का अधिकार है.

द्य लड़की अकेली है तो उसे अकेले यह देना पड़ेगा.

द्य दूसरे भाईबहन भी हैं तो पालनपोषण की रकम आनुपातिक रूप से बंट जाएगी.

द्य   पालनपोषण की रकम 10 हजार रुपए माह है. इस को बढ़ाने की बात चल रही है.

पिता की विरासत संभालने के लिए सपनों को छोड़ा

कानपुर की रहने वाली नेहा कशिश के पिता रंपत सिंह भदौरिया नौटंकी के मशहूर कलाकार थे. नौटंकी में वे जोकर का काम करते हुए ऐसे कमैंट करते थे कि कुछ दिनों में ही उन को लोगों ने रंपत हरामी का नाम दे दिया. दर्शकों के दिए इस नाम को रंपत सिंह भदौरिया ने दिल से स्वीकार किया. इस के बाद अपना नाम रंपत हरामी ही रख लिया. नेहा कशिश उन की बेटी थी. रंपत सिंह भदौरिया का कोई बेटा नहीं था. उन को लगता था कि उन के बाद नौटंकी की यह कला खत्म हो जाएगी. अकसर वे अपनी पत्नी रानी से इस बात की चर्चा करते थे और दुखी हो जाते थे.

यह बात उन की बेटी नेहा कशिश ने जब सुनी तो बोली, ‘पापा, मैं नौटंकी की कलाकार बनूंगी.’

रंपत हरामी ने अपनी बेटी को समझाते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा होना एक बात है और तुम्हारा नौटंकी की कलाकार होना दूसरी बात है. नौटंकी के कलाकारों को लोग अच्छी नजरों से नहीं देखते. लड़कियों के लिए तो यह बेहद शर्म की बात होती है.’

नेहा ने कहा, ‘पापा, जिस कला को आप पूजते हैं उस में मेरे आने में क्या दिक्कत है? मैं आप की कला को आगे ले कर जाना चाहती हूं.’

नेहा की जिद थी कि वह अपने पिता की कला को मरने नहीं देगी. रंपत हरामी को बेटी की चिंता थी. समाज का डर था. पिता और बेटी के बीच यह तनातनी कई माह चली. इस बीच कशिश की शादी हो गई. बिजली विभाग में संविदा पर उस की कंप्यूटर औपरेटर की जौब भी लग गई. सबकुछ सही से चल रहा था. अचानक एक दिन रंपत हरामी की तबीयत खराब हो गई. उस समय उन के मुंह से फिर यही निकला कि उन की कला को कौन संवारेगा?

नेहा कशिश के जीवन में यह निर्णय लेने का क्षण था. उस ने घर जा कर पूरी बात अपने पति को बताई और कहा कि वह अपने पिता की विरासत को संभालना चाहती है. किसी भी पति के लिए यह इजाजत देना आसान नहीं था. नेहा के पति ने बड़ा दिल दिखाते हुए उस को इजाजत दे दी. रंपत हरामी की तबीयत ठीक हो चुकी थी. वे ठीक हो कर अपने काम पर वापस आ गए. एक दिन कशिश ने कहा, ‘पापा, मैं आप की नौटंकी में कलाकार बनना चाहती हूं.’

रंपत हरामी पहले तो नहीं माने पर बेटी की जिद के आगे झुक गए.

पिता की आंखों के सामने जब बेटी नौटंकी के मंच पर उतरी तो उन की आंखों में आंसू थे. वे समझ नहीं पा रहे थे कि रोएं या खुशी मनाएं. कुछ महीनों में ही नेहा एक अच्छी कलाकार बन गई. तब उस ने अपनी संविदा वाली नौकरी छोड़ दी. पिता के साथ नौंटकी करने लगी. इसी बीच एक बार फिर रंपत हरामी की तबीयत खराब हुई और वे गुजर गए. अब नेहा कशिश ने अपने पिता की नौटंकी को पूरी तरह संभाल लिया है. इस काम में उस की मां सहयोग करती है. नौकरी कर घर संभालने का सपना छोड़ नेहा कशिश नौटंकी वाली लड़की बन कर पिता की विरासत को संभाल रही है.

पिता की जिम्मेदारियों के लिए खुशियां कुरबान

लखनऊ की रहने वाली श्रद्धा सक्सेना अपने मांबाप की अकेली संतान थी. उस के पिता सरकारी कर्मचारी थे. श्रद्धा के बचपन में ही मां की मौत हो गई थी. श्रद्धा की शादी उस समय हो गई थी जब वह इंजीनियरिंग इन फैशन टैक्नोलौजी का कोर्स कर रही थी. शादी के बाद उसे 2 बेटे हुए. इस के बाद पतिपत्नी में विवाद शुरू हो गया. विवाद की वजह, श्रद्धा के अनुसार, घरेलू हिंसा भी थी. श्रद्धा सक्सेना कहती है कि उस ने कुछ दिन तो सहन किया पर एक दिन जब पति ने छोटे बेटे को मारने का प्रयास किया तो वह सहन नहीं कर सकी. उस समय छोटा बेटा 6 माह का और बड़ा बेटा 2 साल का था.

श्रद्धा अपनी ससुराल से बस पकड़ कर सीधे लखनऊ अपने पिता के घर आ गई. पिता उस समय तक रिटायर हो चुके थे. श्रद्धा सक्सेना अपनी पढ़ाई के दौरान भी फैशन डिजाइनिंग करती थी. पिता के घर आ कर उस ने वही काम शुरू किया. बच्चे छोटे थे तो श्रद्धा और उस के पिता मिल कर उन को पाल रहे थे. समय बीतता गया. अब पिता बूढ़े हो चले थे. कई बार नातेरिश्तेदार चाहते थे कि श्रद्धा दूसरी शादी कर ले. श्रद्धा को लगा कि अब वह अपने बूढ़े पिता को अकेले नहीं छोड़ सकती. उस के 2 छोटे बेटे हैं. काफी सोचविचार करने के बाद श्रद्धा ने दूसरी शादी का फैसला छोड़ दिया.

एक दिन ऐसा आया कि श्रद्धा के पिता नहीं रहे. श्रद्धा के पिता अपना पैतृक घर छोड़ कर किराए पर मकान ले कर रहते थे. उन के बाद अब श्रद्धा के लिए अकेले किराए के मकान में रहना कठिन था. इस के बाद भी उस ने किराए का छोटा मकान लिया और अपने बच्चों के साथ रहने लगी. अब बच्चे बड़े हो गए हैं. श्रद्धा ड्रैस डिजाइनिंग के साथ मेकअप आर्टिस्ट का काम भी करती है. इस से उस को इतना मिल जाता कि वह अपना और अपने दोनों बच्चों का खर्च उठा सके.

धर्म ने नहीं विज्ञान ने बनाई राह आसान

लड़कियां अब पति, पिता और बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. जिम्मेदारियों से जिंदगी में उन के अपने सपने कहीं पीछे छूट गए. महिलाओं ने घर से बाहर निकलने को ही आजादी समझ लिया. विज्ञान ने उन की राह सरल कर दी पर समाज ने लड़कियों को जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया. किचन से ले कर वर्किंग स्पेस तक विज्ञान ने लड़कियों को सुविधा दी. साइकिल के बाद जब स्कूटर आया तब तक सड़कों पर लड़कियां वाहन चलाते कम दिखती थीं. जैसे ही 1990 के दशक में स्कूटी आई, सड़क पर लड़कियों की संख्या सब से अधिक दिखने लगी.

किचन में ऐसे होम एप्लायंसेस आ गए जिन से घरेलू काम में कम समय लगने लगा. अब लड़की के शादीशुदा जीवन की शुरुआत वाशिंग मशीन में कपड़े धुलने, किचन में बच्चे के लिए ब्रेकफास्ट तैयार करने, स्कूटी से बच्चे को स्कूल छोड़ने से होने लगी है. वहां से वापस आ कर किचन में खाना तैयार करना, पति को ब्रेकफास्ट देना, लंच पैक करना और फिर अपना लंच पैक कर के औफिस जाना हो गया है. जिन महिलाओं ने होममेड भी लगा रखी है वहां भी उन को काम करना ही पड़ता है.

भारत में हर 4 में से 1 स्कूटी खरीदार लड़की होती है जबकि स्कूटी प्रयोग करने वाली लड़कियों की बात करें तो 35 फीसदी स्कूटी का प्रयोग लड़कियां करती हैं. कई बार स्कूटी घर के किसी पुरुष के नाम होती है पर उस का प्रयोग लड़कियां करती हैं. स्कूटी लेने वाली महिलाओं में 64 फीसदी की उम्र 30 साल के करीब होती है. कालेज, कोचिंग और नौकरी करने वाली लड़कियां इस का प्रयोग करती हैं. लड़कियों की आजादी में स्कूटी का बड़ा योगदान है. स्कूटी हलकी होती है. इस में लड़कियों के बैग रखने की सुविधा होती है. इलैक्ट्रिक स्कूटी आने के बाद लड़कियों को और भी पंख लग गए हैं.

अकेली लड़की ले कानून की मदद

आज अकेली लड़कियों की कानून भी मदद करता है.

द्य  महिला इंडियन पीनल कोड की जगह बने भारत न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 74 से ले कर 79 तक के तहत मुकदमे दर्ज करा सकती है.

द्य  इस में महिला की इज्जत भंग करने की कोशिश, यौन उत्पीड़न, पीछा करना, अश्लील और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने पर मुकदमा कायम करने का अधिकार है.

द्य  महिलाओं को वीमेन हैल्पलाइन नंबर 1090 और 112 अपने मोबाइल फोन से डायल कर के मदद लेने का अधिकार है.

द्य  मकान मालिक के साथ किराए का कोई समझौता किया है तो पुलिस शिकायत के साथ सिविल केस भी कोर्ट में किया जा सकता है.

द्य  महिला को अपने पक्ष में सुबूत दे कर सच्चाई साबित करनी पड़ेगी.

हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली अधिवक्ता सुनीति सचान कहती हैं, ‘‘कानून ने महिलाओं को आजादी और सुरक्षा दी है. महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे अपने अधिकारों को जानें. जब तक वे अपने अधिकारों को जानेंगी नहीं, तब तक उन को डर लगता रहेगा. लड़कियों की बढ़ती परेशानियों और कमजोरियों की सब से बड़ी वजह यह है कि आज के दौर में वे पढ़ने से बचने लगी हैं. स्कूली किताबों से छुटकारा पाने के बाद अलग से कम से कम अपने अधिकार और स्वास्थ्य के बारे में पढ़ें. टैक्नोलौजी के इस दौर में उन को इस का ज्ञान भी होना चाहिए. तभी वे कानून और पुलिस की मदद अच्छी तरह ले सकेंगी.’’

कम उम्र में शादी का दबाव

लड़कियों पर कम उम्र में शादी का दबाव आज भी होता है. इस में हिंदूमुसलिम दोनों ही समुदायों की लड़कियां शामिल हैं. मुसलिमों में यह परेशानी अधिक है. वहां 14-15 साल की उम्र में ही शादी करने का दबाव पड़ने लगता है. 19 साल की तनजीम अख्तर लखनऊ के अलीगंज इलाके की रहने वाली है. उस की मां नगमा और पिता परवेज के बीच झगड़े चलते रहते थे. नगमा अपने पति का घर छोड़ कर अपने पिता के घर में रहने लगी थी. पिता के साथ मां की बीचबीच में सुलह होती रहती थी. तनजीम की 3 बहनें और एक भाई है.

तनजीम के मामा, नाना और मां उस की 15 साल की उम्र में ही शादी किसी बड़ी उम्र के लड़के से कराना चाहते थे. उन को लगता था कि शादी हो जाए तो उन की जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी. तनजीम बताती है, ‘‘जब मैं ने शादी करने से मना किया तो मेरे साथ घर में मारपिटाई हुई. मुझे बुराभला कहा जाने लगा. मेरी पढ़ाई छुड़वा दी गई. ऐसे समय में मुझे ‘रेड ब्रिगेड ट्रस्ट’ की सहायता मिली. मुझे वहां पर काम करने के बदले सहायता दी जाने लगी. मेरे घर वाले नहीं चाहते थे कि मैं वहां काम करूं. मुझ पर गलत काम करने का लांछन लगाया जाने लगा. मैं ने जब स्कूटी ली तो भी झगड़ा हुआ. मैं अब ‘रेड ब्रिगेड ट्रस्ट’ के साथ जुड़ कर अपनी जैसी लड़कियों की मदद करती हूं. उन को सैल्फ डिफैंस सिखाती हूं. घर वालों के विरोध के बाद भी अपनी पढ़ाई भी पूरी कर रही हूं.’’

अकेली लड़की की परेशानियां हजार

समाज में अकेली लड़कियों पर सामाजिक रूढि़वादिता का दबाव होता है. उन को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और उन पर शादी करने का दबाव बनाया जाता है. अकेली लड़की के लिए दूसरी सब से बड़ी परेशानी यह होती है कि उन को रहने के लिए किराए का घर मिलने में बहुत मुश्किल होती है. मकान मालिक अलग नजर से देखते हैं उन्हें. कई बार उन्हें पुरुषों के अनचाहे कमैंट का सामना करना पड़ता है.

अकेले रहने के कारण लड़कियां अकसर डिप्रैशन का शिकार हो जाती हैं. जीवन की हर जिम्मेदारी अकेले उठाने के कारण आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लड़कियों के ऊपर अधिक दबाव बन जाता है. लड़कियां इन रूढि़वादिता के बीच अपनी पहचान और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करती हैं. आजकल किसी भी लड़की के बारे में सब से अधिक जानकारी देने का काम सोशल मीडिया करता है. कई अकेली लड़कियां अपनी पहचान छिपाने के लिए जहां वैवाहिक जीवन के बारे में लिखना होता है वहां वे ‘रिलेशन में हैं’ लिख देती हैं. इस से कई बार उन का बचाव हो जाता है. लड़कियां अपने बचाव के तरीके भी निकाल रही हैं.

सिधौली से चल कर लखनऊ पढ़ने के लिए आने वाली 6 लड़कियां पहले अकेली आती थीं तो उन को लड़कों से दिक्कत होती थी. जब लड़कियों का आपस में संपर्क हो गया तो उन लोगों ने तय किया कि वे एक ही जगह से बस में चढ़ेंगी और साथ रहेंगी. लखनऊ से घर वापस लौटने पर कोई परेशान न करे, इस कारण वापसी भी वे साथ करती थीं.

सभी ने एक वाट्सऐप गु्रप बना लिया था. एकदूसरे की लोकेशन मिलती रहती थी. अब उन को अंधेरा होने, शराब की दुकान के पास से गुजरने में भी ड़र नहीं लगता है. वे अपने पर्स में सुरक्षा के उपाय, जैसे मिर्चपाउडर रख कर चलती हैं. इन सब ने कभी अपने परिवार को अपनी मुश्किलों के बारे में नहीं बताया क्योंकि डर इस बात का था कि कहीं उन का बाहर जाना ही बंद न करा दिया जाए. अफसोस की बात यह है कि जो धर्म मंदिरमसजिद की एक ईंट हटने पर भी सैकड़ों को जमा कर सकते हैं, अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए 5 जने भी नहीं ढूंढ़ सकते और उन्हीं लड़कियों को धर्मों के जंजाल में झोंक देते हैं.

महिला किराएदार पर मकान मालिक की नजर

लड़कियां घर के अंदर रहती हैं तो घरेलू हिंसा होती है और जब वे घर के बाहर निकलती हैं तो सामाजिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. लखनऊ के इंदिरा नगर की रहने वाली 40 साल की उम्र की देविका के पति राकेश की मृत्यु हो गई. उस के 20 और 18 साल की 2 बेटियां थीं. विधवा होने के बाद देविका के ससुराल वाले उस को प्रताडि़त करने लगे, कहते थे, बेटियों की पढ़ाई के लिए जमीन बेचने की जरूरत नहीं है.

देविका पढ़ाई की जरूरत को समझती थी. वह किसी भी कीमत पर बेटियों को पढ़ाना चाहती थी. इस के लिए उस ने पति के हिस्से वाली थोड़ी जमीन बेच दी थी. इस बात को ले कर हुए विवाद के बाद देविका ने घर छोड़ कर किराए का मकान ले लिया. मकान के एक हिस्से में मकान मालिक नरेश महाजन और उस की पत्नी रहते थे. दूसरे हिस्से में देविका और उस की 2 बेटियां रहती थीं. मकान मालिक जब भी आता, उन के हालचाल पूछता था. शुरुआत में यह देविका को सामान्य शिष्टाचार लगा पर धीरेधीरे मकान मालिक की हरकतें खुल कर सामने आने लगीं. मकान मालिक देविका ही नहीं, उस की बेटियों पर भी गंदी निगाह रख रहा था. पहले वह हंसीमजाक वाले मैसेज व्हाट्ऐप करता था. इस के बाद उस की बोली बदलने लगी.

एक दिन किराया देते समय खुल कर बोला, ‘आप बहुत सुंदर हो. मेरा दिल आप पर आ गया है. आप बिना किराए के भी रह सकती हैं.’

देविका ने उस समय उसे किराया दे कर चलता किया. अगले ही दिन उसे मकान छोड़ने का संदेश दे दिया. उस ने बहुत प्रयास किया कि देविका घर से न जाए पर देविका को लग गया था कि इस मकान में रहना खतरनाक हो सकता है. उसे अपने साथ अपनी बेटियों की भी चिंता थी. वह दूसरी कालोनी में रहने लगी. इस के बाद भी वह उसे परेशान कर रहा था. एक दिन देविका ने उस की पत्नी को सब बात बताई तब उस को राहत मिली.

हिंदू लड़कियों के कानूनी अधिकार

द्य  कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में बेटियों का पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार नहीं था.

द्य मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में इस अधिनियम में संशोधन किया था. इस के मुताबिक बेटियों को भी संयुक्त परिवार की संपत्ति में भी बेटों के बराबर ही अधिकार दिया गया.

द्य बेटियों के हक में यह एक मील के पत्थर जैसा कानून था जिस के बाद से बेटियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलने लगा.

द्य अब मातापिता की अपनी संपत्ति पर भी बिना वसीयत के बेटी का उतना ही हक है जितना बेटों का होता है. अगर बेटी अकेली है तो पिता की पूरी संपत्ति पर उस का अधिकार होता है.

द्य  वर्ष 2005 के बाद बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही बेटे के बराबर का अधिकार प्राप्त है, भले ही वह शादीशुदा हो या अविवाहित.

द्य  पैतृक संपत्ति पर पिता अपनी मरजी से वसीयत कर के किसी एक को नहीं दे सकते.

द्य इस में सभी बेटेबेटियों का बराबर हिस्सा होता है.

द्य  1956 के कानून के अनुसार बेटी भी बेटे की ही तरह से मातापिता की अपनी संपति में प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी है.

द्य  यह बात और है कि कानून बन जाने के बाद भी अभी भी समाज इस के लिए तैयार नहीं है.

नैतिकता और कानून 2 अलग चीजें है. अगर बेटियां अपना हिस्सा लेने को तैयार हो जाती हैं तो उन का हक कोई मार नहीं सकता. पिता की संपत्ति को भाई बिना बहन की सहमति के बेच नहीं सकता. यह बात और है कि हिंदूवादी लोग इस कानून को सही नहीं मानते क्योंकि वे लड़कियों को धर्म और उस से जुड़ी व्यवस्थाओं से ही देखते हैं. धर्म हमेशा ही महिलाओं के सामने कठिनाइयां खड़ी करता है. लड़की की ही तरह अकेली महिला में विधवा का नाम भी होता है. धर्म ने भले ही विधवा को समाज में सम्मानजनक तरह से रहने का अधिकार न दिया हो पर कानून ने विधवा को उस के अधिकार दिए हैं.

क्या हैं विधवा के कानूनी अधिकार

भारत में उत्तराधिकार का अधिकार व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत आता है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार हिंदू अविभाजित परिवार में बहू को विवाह की तिथि से ही परिवार के सदस्य का दर्जा मिल जाता है. वह सहखातेदार नहीं बन सकती. बहू को संपत्ति में अपने पति के हिस्से या तो पति द्वारा स्वेच्छा से हस्तांतरित या पति की मृत्यु के बाद प्राप्त अधिकार के माध्यम से परिवार की संपत्ति में हिस्सा मिलता है. बहू उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं जता सकती जो विशेष रूप से उस के ससुराल वालों की अपनी बनाई संपत्ति हो. बहू को केवल अपने पति के हिस्से पर ही अधिकार प्राप्त होगा. उसे ससुराल वालों की संपत्ति पर अधिकार केवल अपने पति के हिस्से के माध्यम से ही प्राप्त होता है.

विधवा की संपत्ति को ले कर दूसरा बड़ा सवाल यह है कि विधवा की संपत्ति में अधिकार मायके वालों का होगा या ससुराल वालों का? पहली बात तो यह कि विधवा संतान वाली हो या निसंतान, वह किसी को भी वसीयत कर के कुछ भी दे सकती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15(1)(बी) के तहत के तहत यदि किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति प्राथमिक रूप से उस के बच्चों और पति को विरासत में बराबरबराबर मिलती है सिर्फ पति को नहीं. यदि पति या बच्चे मौजूद नहीं हैं तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है. जिन मामलों में पति का कोई भी उत्तराधिकारी नहीं है, संपत्ति महिला के मातापिता या उन के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है. ऐसे मामले बहुत कम होते हैं.

इस में एक अपवाद है. जब संपत्ति किसी स्रोत जैसे विधवा के मातापिता, ससुराल वाले से विरासत में मिलती है और यदि महिला की मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के हो जाती है तो वह उस मूल परिवार को वापस मिल जाती है. अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी यानी क्लास 1 के उत्तराधिकारी सब से करीबी रिश्तेदार होते हैं जिन्हें बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति में सब से पहले और समान हिस्सा मिलता है. इस में मुख्य रूप से विधवा, पुत्र, पुत्री, माता और पूर्व मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे व पोतेपोतियां शामिल हैं. पुत्र, पुत्री में जैविक और गोद लिए हुए दोनों बच्चे शामिल होते हैं. प्रथम श्रेणी के सभी उत्तराधिकारी संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी पाते हैं.

यदि किसी व्यक्ति के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी मौजूद नहीं हैं तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. द्वितीय श्रेणी यानी क्लास 2 के उत्तराधिकारियों में वे रिश्तेदार होते हैं जो प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के न होने पर संपत्ति के हकदार होते हैं. इन में मुख्य रूप से पिता, भाईबहन, दादादादी, चाचाचाची, मामामामी और इन के बच्चे, भतीजेभतीजी, भांजेभांजी, भाई की विधवा, पिता के भाईबहन, माता के भाईबहन आदि शामिल होते हैं. एक श्रेणी के वारिसों के न होने पर ही अगली श्रेणी के वारिसों को संपत्ति मिलती है. यदि एक ही श्रेणी में एक से अधिक वारिस हों तो वे संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं.

अगर किसी मामले में पहली और दूसरी श्रेणी के उत्तराधिकारी न हों तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति मृतक के सगोत्रों को मिलती है. इन में पुरुषवंश के माध्यम से जुड़े रिश्तेदार जैसे चचेरे भाई वगैरह आते हैं. इन में यदि सगोत्र भी न हों तो सजातीयों को मिलती है, जो किसी भी वंश- पुरुष या महिला- से जुड़े होते हैं.

इन में मौसी, मामा, ममेरे भाईबहन शामिल होते हैं. अगर ये भी न हों तो संपत्ति राज्य के पास चली जाती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुरुष मृतक के लिए विरासत का क्रम प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, सगोत्र, सजातीय और राज्य सरकार का होता है.

भरणपोषण का मामला

दूसरी तरफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएस) की धारा 144 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 125) के तहत सासससुर अपनी विधवा बहू से भरणपोषण की मांग नहीं कर सकते. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह बहू की नैतिक जिम्मेदारी हो सकती है लेकिन इसे कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून में इस का स्पष्ट प्रावधान न हो. बुजुर्ग सासससुर भरणपोषण के लिए अपने बेटे या बेटी पर निर्भर रह सकते हैं, न कि बहू पर. अगर मातापिता वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण और कल्याण अधिनियम 2007 के तहत सहायता मांगते हैं तो मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सामान्य भरणपोषण में बहू को जिम्मेदार नहीं माना गया है. इस तरह से अकेली युवती की तमाम परेशानियों का निदान कानून, विज्ञान और जानकारियों में छिपा है. इस के अनुसार परेशानियां कम की जा सकती हैं.

अकेली महिलाओं की बढ़ती संख्या

समाज में अकेली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है. 2011 की जनगणना के अनुसार अकेली रहती लड़कियोंऔरतों की संख्या 7-8 करोड़ थी. इस में सब से बड़ी संख्या विधवाओं की है. कुल आबादी का 12-14 फीसदी अकेली औरतों का था. विधवा महिलाओं की संख्या 4.5 करोड़ है. अविवाहित की संख्या 2.5 करोड़ थी. तलाकशुदा की संख्या 60-80 लाख थी. अकेली महिलाओं की संख्या ग्रामीण इलाके में सब से ज्यादा पाई गई थी. उम्र बढ़ने के साथ विधवा महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. 2022-2025 में इन की संख्या बढ़ कर

7.2 करोड़ हो गई है. यह कुल महिला आबादी का 22-24 फीसदी है. 2030 तक इन की संख्या 45 फीसदी तक बढ़ कर करीब 15 करोड़ हो सकती है.

सामाजिक दबाव और तिरस्कार

अकेली या विधवा महिला को अकसर समाज अलग नजर से देखता है. मुसलिम समाज में, खासकर परंपरागत परिवेश में, विधवा होना केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान का भी बोझ बन जाता है. मुसलिम घरों में किसी महिला के पति की मृत्यु के बाद उसे ‘बदनसीब’ या ‘मनहूस’ जैसे शब्दों से पुकारा जाना आम बात है. इन शब्दों के जरिए उसे बारबार यह एहसास कराया जाता है कि वह परिवार पर बोझ है. ऐसे में वह अपने व्यवहार, आचरण और जीवनशैली को ले कर अतिरिक्त सजग हो जाती है. वह खुद को समर्पित बेटी के रूप में स्थापित करने की कोशिश करने लगती है, ताकि परिवार और समाज में उसे थोड़ा सा सम्मान मिल सके.

यह सम्मान सशर्त होता है- उस की चुप्पी, त्याग और सेवा के बदले में होता है. वह अपनी इच्छाओं, सपनों और व्यक्तिगत जीवन को पीछे छोड़ देती है. दूसरी शादी या स्वतंत्र जीवन की संभावना अकसर सामाजिक दबाव के कारण दब जाती है. कई जगहों पर उसे सामाजिक कार्यक्रमों से दूर रखा जाता है, जिस से उस का आत्मविश्वास टूटता है. संयुक्त परिवारों में ऐसी महिलाएं घर के पुरुषों द्वारा शारीरिक शोषण का भी शिकार बनती हैं, मगर आर्थिक रूप से उन पर आश्रित होने के कारण वे उन के खिलाफ आवाज नहीं उठा पातीं.

आर्थिक असुरक्षा

पति की मृत्यु के बाद या अकेले होने पर सब से बड़ी समस्या आर्थिक होती है. यदि महिला शिक्षित नहीं है या उस के पास नौकरी का अनुभव नहीं है तो वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाती है. एक महिला जो गृहिणी थी, अचानक पति के निधन के बाद बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और समाज की अपेक्षाओं के बीच फंस जाती है. कम पढ़ीलिखी होने की स्थिति में उसे घरेलू नौकर के रूप में काम करने के लिए निकलना पड़ता है, सिलाईकढ़ाई की दुकानों या फैक्टरियों में काम ढूंढ़ना पड़ता है या इसी तरह के अन्य काम कर के वह किसी तरह अपना और परिवार का भरणपोषण करती है.

अकेली या तलाकशुदा महिलाओं के सामने सब से बड़ी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की होती है. शिक्षा या कौशल की कमी और सामाजिक प्रतिबंधों के कारण उन के पास सीमित अवसर होते हैं. इस के बावजूद, वह अपने परिवार के लिए हर संभव प्रयास करती है. Single Women Struggle

 

 

 

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