Muslim Women Struggle: पुरानी दिल्ली में चितली कब्र की संकरी गलियों में से एक गली के आखिरी छोर पर वह आधी किवाड़ लगी अंधेरी व सीलनभरी सीढि़यों का रास्ता है जो पहली मंजिल पर रह रही रेशमा अंसारी तक ले जाता है. ऊपर 3 छोटेछोटे कमरे हैं, जिन में से एक में जमीन पर बिछी दरियों पर रेशमा के बूढ़े मांबाप लेटे रहते हैं. दोनों अपनी उम्र के 75वें वर्ष से आगे निकल चुके हैं. आंखों से कम दिखता है और अधिक वजन के कारण चलनेफिरने से लाचार हैं. उन का ज्यादा समय लेटे या बैठे ही गुजरता है.
दूसरे कमरे में सामान भरा हुआ है. पुराने बिछौने, राशन के डब्बे, रेशमा की भाभी के मायके से आया दहेज का सामान, जिन्हें खोल कर सजाने की उस घर में कभी जगह ही नहीं हुई और रेशमा व उस की बहन की चीजें दीवार में बनी अलमारियों में भरी पड़ी हैं. तीसरे कमरे में एक बड़ा पलंग है जो रेशमा के पिता ने उस को दहेज में दिया था और जिसे तीन तलाक ले कर वापस लौटी रेशमा को उस के ससुराल वालों ने वापस कर दिया था. घर के इस इकलौते पलंग पर रेशमा अपनी छोटी बहन के साथ सोती है.
रेशमा और उस की बहन रुकैया दोनों तीन तलाक ले कर पिछले 20 वर्षों से अपने मायके में रह रही हैं. इन का एक भाई भी है जो ऊपरी मंजिल पर अपनी पत्नी व 3 बच्चों के साथ रहता है. वह इलैक्ट्रिशियन है. उस की आमदनी से उस का अपना परिवार ही मुश्किल से गुजारा कर पाता है. ऐसे में 2 तलाकशुदा बहनों और 2 बूढ़े मांबाप का खर्चा उठाना उस के बस में नहीं है.
2006 में जब रेशमा का तलाक हुआ था, उस की उम्र कोई 20 साल की थी. मगर दोबारा उस ने निकाह नहीं किया या यों कहें कि मांबाप की इतनी हैसियत ही नहीं थी कि वे बेटी के दूसरे निकाह के लिए पैसा इकट्ठा कर पाते. तब सोचा गया था कि अगले दोचार सालों में जब छोटी बहन का निकाह हो जाएगा तो रेशमा के लिए भी कोई लड़का देखेंगे लेकिन छोटी बहन रुकैया का निकाह हुए साल भी नहीं बीता था कि वह भी तलाक का चाबुक खा कर मायके लौट आई.
मांबाप को गहरा सदमा लगा. उन की हालत और लाचारी देख कर दोनों ने दोबारा शादी करने की कभी ख्वाहिश भी जाहिर नहीं की. भाई ने भी मौका देख कर मांबाप की देखभाल का पूरा जिम्मा दोनों बहनों के कंधों पर डाल दिया और खुद घर के ऊपरी हिस्से में अपने बीवीबच्चों सहित शिफ्ट हो गया. आज 20 साल से रेशमा और रुकैया एक बुटीक में सिलाईकढ़ाई का काम कर के अपना व अपने मांबाप का पेट भर रही हैं. दोनों बूढ़ों की सांसें अपनी बेटियों के सहारे ही चल रही हैं. बहू को उन की देखभाल में कोई दिलचस्पी नहीं थी और न ही बेटा कभी कोई खर्चापानी दे पाता था.
बौलीवुड की हीरोइनें भी अकेलेपन की शिकार
बौलीवुड की ख्यात अदाकारा महजबीं बानो, जिन्हें दुनिया मीना कुमारी के नाम से जानती है, ने बचपन से फिल्मों में काम कर के अपने परिवार की आर्थिक मदद की. बल्कि यों कहें कि उस बच्ची ने अपने मांबाप को पाला. यह कोई छिपी बात नहीं है. उन का निजी जीवन उन की मौत तक बड़ा संघर्षपूर्ण रहा. महजबीं बानो ने 1952 में गुपचुप तरीके से मशहूर फिल्म निर्देशक और लेखक कमाल अमरोही से निकाह किया, जबकि कमाल अमरोही पहले से शादीशुदा थे. यह विवाह काफी विवादों में रहा.
मीना कुमारी का जीवन परदे पर जितना चमकदार दिखता था, असल में उतना ही दर्द और अकेलेपन से भरा हुआ था. शादी से पहले उन की कमाई उन के मातापिता के कब्जे में रहती थी और शादी के बाद पति ने उस कमाई पर अपना हक जमाए रखा. कमाल अमरोही का स्वभाव काफी सख्त और नियंत्रण रखने वाला था. मीना कुमारी अपने कैरियर में व्यस्त रहती थीं, दिनरात काम करती थीं मगर आर्थिक टकराव बढ़ा तो गलतफहमियां और दूरियां बढ़ती गईं और आखिरकार 1964 में उन का कमाल अमरोही से तलाक हो गया. तलाक के बाद मीना कुमारी का जीवन गहरे अकेलेपन में डूब गया. शराब की लत लग गई. जो धीरेधीरे गंभीर बीमारी में बदल गई. लिवर सिरोसिस के कारण मात्र 38 वर्ष की उम्र में मीना कुमारी का निधन हो गया.
ऐसा ही कुछ हाल परवीन बौबी का भी रहा. रंगीन परदे का यह चमकदार चेहरा अकेलेपन के अंधकार में डूबता चला गया. परवीन बौबी को प्रेम के नाम पर कई पुरुषों ने ठगा. वे आजीवन अविवाहित रहीं, परिवार से दूर अकेलेपन में जीवन बिताया, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रहीं और मौत के बाद कई दिन तक उन के अपार्टमैंट में उन की लाश को कीड़े नोचते रहे. दरअसल, उन का अकेलापन ही उन्हें खा गया.
लखनऊ में सायमा सिद्दीकी अपने 4 साल के बेटे के साथ मायके में मातापिता के पास रह रही है. उस की बाकी 3 बहनें अपनी अपनी ससुराल में हैं. कोई भाई नहीं है, लिहाजा जब सायमा का तलाक हुआ और वह अपने मायके वापस लौटी तो बाकी की बहनों को यह संतोष हुआ कि चलो, मांबाप की देखभाल के लिए कोई तो है. सायमा एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में टीचर है. बेटा भी उसी स्कूल में पढ़ता है. लिहाजा, उस की फीस आधी ही लगती है. सायमा की इनकम से उस के मांबाप का खर्च भी चलता है. अब चूंकि वह एक बेटे की तरह पूरे घर का खर्च उठा रही है, उस की दूसरी शादी के बारे में किसी को कोई खयाल नहीं आता है. हालांकि, अभी उस की उम्र महज 29 साल है.
अनेक तलाकशुदा या अधिक उम्र की कुंआरी मुसलिम महिलाएं अकेलेपन की त्रासदी झेलते हुए घर व बाहर के कामों में अपने को घुला रही हैं. तलाकशुदा महिला घर से बाहर निकल कर काम करने की शुरुआत सिर्फ इसलिए करती है ताकि वह मांबाप पर बोझ न बन जाए और समाज व परिवार के तानोंउलाहनों से बच जाए, मगर एक बार जब वह अपनी कमाई से परिवार का खर्च उठाने लगती है तो फिर पूरा परिवार उस पर ही आश्रित हो जाता है. वह उन के लिए सोने का अंडा देने वाली मुरगी बन जाती है.
फिर उस के निकाह का खयाल ही किसी के जेहन में नहीं आता. वह जीवनपर्यंत अकेलेपन का सामना करती है. घर व बाहर का दोहरा बोझ ढोती है. फिर भी गाहेबगाहे तानोंउलाहनों की शिकार होती ही रहती है. कहने को तो लड़कियों के लिए मायका एक सुरक्षित ठिकाना माना जाता है जहां बेटी को बिना शर्त स्वीकार करने की बात कही जाती है, लेकिन वास्तविकता इस से उलट है. जिन मातापिता ने कभी बेटी को सहारा दिया था, अब वे उम्र के उस पड़ाव पर होते हैं जहां उन्हें खुद सहारे की जरूरत होती है. ऐसे में तलाकशुदा महिला, जो खुद भावनात्मक और सामाजिक रूप से कमजोर स्थिति में है, अचानक पूरे परिवार की देखभाल का केंद्र बन जाती है. वह घर के कामों से ले कर मातापिता की सेवा तक हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेती है. आर्थिक रूप से भी कई बार उसे योगदान देना पड़ता है. वह छोटेमोटे काम कर के अपनी सीमित आय से यह जिम्मेदारी निभाती है.
भारतीय समाज में महिला की पहचान अकसर उस के रिश्तों से तय की जाती है, जैसे यह किस की बेटी, किस की पत्नी, किस की मां है. लेकिन जब एक मुसलिम महिला तलाक या वैधव्य के बाद इन परिभाषाओं से बाहर निकल जाती है तो उस के सामने केवल एक व्यक्तिगत संकट ही नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व का प्रश्न भी खड़ा हो जाता है. ऐसी स्थिति में जब वह अपने मायके लौटती है तो यह वापसी अकसर आश्रय से अधिक जबरदस्ती की थोपी गई जिम्मेदारी के तौर पर उसे एहसास करवाई जाती है, जिस को हलका करने के लिए वह घर के सारे काम अपने ऊपर ओढ़ लेती है. मांबाप की देखभाल, भाई के बच्चों की आया, भाभी के काम में सहयोग करने वाली मेड और एक मुफ्त की नौकरानी बन जाती है ताकि उस के सिर पर एक छत बनी रहे.
अकेली या विधवा मुसलिम महिलाओं का जीवन अकसर कई स्तरों पर चुनौतियों से भरा हुआ है. ये चुनौतियां सिर्फ आर्थिक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक, मानसिक, सांस्कृतिक और कानूनी पहलुओं से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं. एक समाज के रूप में हम भले ही प्रगति की बात करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी महिलाओं का संघर्ष बहुत कठिन और बहुआयामी है.
पुनर्विवाह की दुविधा
इसलाम विधवा या तलाकशुदा के पुनर्विवाह की अनुमति देता है, लेकिन समाज इसे सहज रूप से स्वीकार नहीं करता. यदि कोई महिला पुनर्विवाह करना चाहती है तो कई बार उसे आलोचना का सामना करना पड़ता है. अगर उस के बच्चे हैं तो कहा जाता है कि ‘बच्चों का क्या होगा’ या ‘लोग क्या कहेंगे’. दूसरी ओर, अगर वह शादी नहीं करती है तो जीवनभर अकेलेपन, असुरक्षा और आर्थिक तंगी से जूझती रहती है. अगर शादी न कर के वह नौकरी कर अपना भरणपोषण करना चाहे तो उस की कमाई पर घर के दूसरे सदस्यों की निगाहें गड़ी रहती हैं और न चाहते हुए भी उसे अपनी कमाई का हिस्साबांट करना पड़ता है.
बच्चों की परवरिश की चुनौती
अकेली महिला के लिए बच्चों की परवरिश करना एक बड़ा संघर्ष होता है. उसे मां और पिता दोनों की भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं. बच्चों की पढ़ाई, अनुशासन, भावनात्मक जरूरतें आदि सबकुछ अकेले संभालना मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाला होता है. अकेली महिला के बच्चे भी कई बार समाज और परिवार के तानों का शिकार होते हैं.
मानसिक और भावनात्मक तनाव
अकेलापन, असुरक्षा और भविष्य की चिंता महिलाओं को मानसिक रूप से कमजोर करती है. एक अकेली महिला रात में अकेले घर में रहते हुए हर छोटी आवाज से डर जाती है या उसे यह चिंता सताती है कि अगर वह बीमार पड़ गई तो उस की देखभाल कौन करेगा.
धार्मिक और सांस्कृतिक दबाव
धार्मिक शिक्षाओं का हवाला दे कर अकेली महिलाओं पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जैसे कि उन्हें घर से बाहर काम करने या स्वतंत्र निर्णय लेने से रोका जाता है. अकेली महिला, चाहे वह तलाकशुदा हो, विधवा हो या अविवाहित, को जीवन के कई स्तरों पर लगातार संघर्ष करना पड़ता है. समाज कभी उसे सहानुभूति तो कभी संदेह की नजरों से देखता है. अगर वह जवान है तो समाज हर एहसान के बदले उस के शरीर की मांग करता है. न कहे तो समाज उस के चरित्र पर सवाल उठाने लगता है.
ऐसी औरतों के सामने भावनात्मक अकेलापन एक बड़ा मसला है.
जीवन के कठिन क्षणों में सहारा देने वाला कोई साथी न होना महिला को, भीतर से तोड़ देता है. समाज में खुल कर अपने दर्द को साझा करना भी आसान नहीं होता क्योंकि अकसर उसे ‘कमजोरी’ समझ लिया जाता है. लिहाजा, अपने दर्द को खामोशी से पीते रहना ही इन का नसीब है.
समाज को समझना होगा कि तलाक या विधवा होना किसी महिला की पहचान का अंत नहीं है. बेटी का मायके लौटना या बेटी का अकेला रह जाने का यह मतलब नहीं है कि वह दूसरों के लिए काम करने वाली बाई बन कर रहेगी. ऐसी महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के अवसर बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने बहुत जरूरी हैं. वे एक सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें, इस के लिए उन के आगे त्याग की शर्त न रखी जाए. उन के अस्तित्व को बिना शर्त स्वीकार कर के ही हम उन्हें फिर से जीवन जीने का अवसर दे सकते हैं.
साइंस, तकनीक से लाइफस्टाइल नई लेकिन समाज का रवैया वही : पिछले 200 सालों में साइंस और तकनीक के कारण समाज में बहुत परिवर्तन आए हैं. कट्टर देशों और कट्टरपंथियों में भी पुरुष अब बहुत से मामलों में बराबरी का हक पा गए हैं और खूब आजाद हैं. महिलाओं के मामलों में समाज आज भी संकुचित है. अकेली औरतें, जिन में विधवा, तलाकशुदा, गैरशादीशुदा और विकलांग शामिल हैं, आज भी तिरस्कृत हैं. वे या तो पिता या सासससुर और अगर बच्चे हैं तो बेटेबहू व बेटीदामाद के इशारों पर चलने को मजबूर हैं.
बहुत से कानून 2014 से पहले बने पर अब बढ़ती धर्मव्यवस्था ने औरतों को फिर से धर्मकर्म में धकेल दिया है. तथाकथित शिक्षित लड़कियोंऔरतों ने अकेली शिक्षित, अर्धशिक्षित या अशिक्षित लड़कियोंऔरतों के लिए कुछ नहीं किया. जबकि, पुरुषों ने गुट बना कर खापों, मीडिया, जजों, वकीलों, उपन्यासों, प्रवचनों के सहारे औरतों को किसी पुरुष की बांह में रहने को मजबूर कर दिया है. आज सड़क पर खड़ी एक करोड़ रुपए की गाड़ी तो सुरक्षित है लेकिन सड़क पर चलती एक लड़की सुरक्षित नहीं है, अकेली रह रही लड़की या औरत सुरक्षित नहीं है.
संपत्ति और अधिकारों से वंचित होना
इसलाम में महिलाओं को विरासत का अधिकार दिया गया है, लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि अधिकांशतया उन्हें यह अधिकार मिलता नहीं है. परिवार या रिश्तेदार अकसर उन्हें उन का हिस्सा देने से बचते हैं. एक विधवा महिला को उस के पति की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए, लेकिन देवर या अन्य रिश्तेदार उसे यह कह कर रोक देते हैं कि ‘तुम्हारा गुजारा हम कर देंगे’, जबकि असल में उसे आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखा जाता है. उस का खर्चा चलाने का दावा कर के उसे घर की नौकरानी बना दिया जाता है. वह पूरे घर का काम करती है. खाना, बरतन, कपड़े सब उस की जिम्मेदारी बन जाती है. रमजान के दिनों में सुबह मुंहअंधेरे उठ कर सब के लिए सहरी तैयार करना उस का काम है. दिनभर खुद रोजा रख कर शाम की इफ्तार की पूरी तैयारी भी उसे ही करनी है.
मुसलिम कानून में बेटियों के अधिकार
मुसलिम पर्सनल ला (शरिया) के तहत मुसलिम लड़कियों को मातापिता की संपत्ति में निश्चित कानूनी हिस्सा पाने का अधिकार है, जो बेटों के हिस्से का आधा होता है. अगर केवल बेटियां हैं, बेटा नहीं तो उन्हें संपत्ति का 2/3 हिस्सा मिलता है. यह अधिकार जन्म से नहीं, बल्कि मातापिता की मृत्यु के बाद मिलता है. 1 बेटी को 1/2 (आधा) और 2 या अधिक बेटियां होने पर 2/3 (दोतिहाई) हिस्सा मिलता है. बेटी को मिलने वाली संपत्ति पर उस का पूर्ण मालिकाना हक होता है. वह इसे बेच सकती है, उपहार में दे सकती या वसीयत कर सकती है.
निकाह के समय पति से प्राप्त होने वाला मेहर भी महिला की निजी संपत्ति है, जिस पर उस का पूर्ण अधिकार होता है. मुसलिम कानून के अनुसार, मातापिता अपनी कुल संपत्ति के केवल एकतिहाई हिस्से की वसीयत कर सकते हैं. शेष दोतिहाई संपत्ति कानूनी वारिसों के बीच शरीयत के नियमों के अनुसार ही बांटी जाती है. बेटी के विवाहित होने से उस के पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी के अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता. Muslim Women Struggle





