Gen Z youth: दिल्ली के द्वारका इलाके में एक अमीर आदमी के 17 साल के बेटे ने अपनी तेज रफ्तार एसयूवी कार से 23 वर्षीय साहिल धनेश्रा को ऐसी जोरदार टक्कर मारी कि वह अपनी बाइक से उछल कर कई फुट ऊपर उछल गया और नीचे गिरते ही मौके पर उस की मौत हो गई. यह घटना 3 फरवरी, 2026 की है. साहिल बीबीए के अंतिम सैमेस्टर में था और उस की आंखों में विदेश में पढ़ाई करने का सपना था. अपनी मां का अकेला बेटा था वह. उस की मां की चीखें और रुदन कई दिनों तक सोशल मीडिया पर दिखाई दिए.

घटना के बाद उस नाबालिग लड़के को पुलिस ने अरैस्ट किया मगर 10वीं की परीक्षा के मद्देनजर कोर्ट ने उसे जमानत दे दी. उस पर केस चलेगा और सजा भी जरूर मिलेगी. इस नाबालिग के पिता इस बात का अफसोस कर रहे हैं कि बेटे की जिद्द पर उन्होंने उस के हाथ में नई एसयूवी गाड़ी दे दी.

आईफोन का भूत भी आज के युवाओं के सिर पर इस कदर सवार है कि उस के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं. नागपुर में एक 28 साल के लड़के ने मोबाइल फोन के लिए अपनी मां की हत्या कर दी. आरोपी का नाम रामनाथ बडवाइक है. मां व बेटे के बीच मोबाइल फोन को ले कर झगड़ा हुआ, जिस के बाद बेटे ने संत गजानन महाराज नगर स्थित अपने आवास पर अपनी मां कमला की रूमाल से गला घोंट कर हत्या कर दी. बाद में रामनाथ ने इसे प्राकृतिक मौत बता कर उस का अंतिम संस्कार करने की कोशिश की, लेकिन उस के छोटे भाई दीपक ने पुलिस के सामने उस की पोल खोल दी.

शिवांश शर्मा अपने 25 साल के बेटे रूपेंद्र की मांगों से त्रस्त हैं. 2 साल में 3 नौकरियां बदल चुके रूपेंद्र ने पहले तो बाप की भविष्य निधि का पैसा गुड़गांव में अपने लिए नया फ्लैट खरीदने में लगा दिया. उस के बाद मां पर दबाव बना कर उन की सोने की चूड़ियां बिकवा कर अपने लिए महंगा आईफोन खरीद लिया और अब वह उन्हें नई कार दिलाने के लिए परेशान कर रहा है क्योंकि उस की कंपनी में ज्यादातर कलीग अपनी महंगी गाड़ियों से औफिस आते हैं. रूपेंद्र गुड़गांव की जिस कंपनी में कार्यरत है वह बच्चों के लिए औनलाइन गेम और कार्टून कार्यक्रम बनाती है. इस से पहले वह 2 अन्य कंपनियों में काम कर चुका है. पिछली कंपनी में उस ने मात्र 3 महीने ही काम किया, मगर जब सैलरी में 5000 रुपए अधिक का औफर दूसरी कंपनी से मिला तो उस ने तुरंत वहां जौइन कर लिया.

शिवांश शर्मा कहते हैं- ”मैं 20 साल की उम्र में सरकारी पोस्ट औफिस में क्लर्क की नौकरी पर लगा था. 40 साल एक ही दफ्तर में नौकरी की. 3 बार प्रमोशन हुआ. सैलरी बढ़ती गई. काम का अनुभव हासिल हुआ. सैलरी से हर महीने प्रोविडैंट फंड कटता था. आज मुझे पैंशन मिलती है. एक ही दफ्तर में लंबे समय तक रहा तो कलीग्स से गहरे दोस्ताना संबंध बने. आज वही दुखतकलीफ और जरूरत के समय में हमारे साथ होते हैं, एक फोन पर दौड़े चले आते हैं, जबकि अधिकांश बार बेटा नहीं आ पाता है.”

शिवांश शर्मा को दुख इस बात का है कि काम का जो अनुभव उन्होंने पाया और जो आर्थिक मजबूती उन्होंने हासिल की, वह उन के परिवार के बच्चे नहीं कर पा रहे हैं. चाहे उन का अपना बेटा शिवांश हो या बहन और भाई के बच्चे. सब का एक जैसा हाल है. वे शिकायत करते हैं- ”धैर्य रख कर नौकरी करना इस जनेरशन के स्वभाव में ही नहीं है. जल्दी से जल्दी ज्यादा पैसा कमा लेने की चाह और उस पैसे को उलटीसीधी चीजों पर उड़ा देना, बस, यही कर रहे हैं वे. मेरी पूरी भविष्य निधि, जो हमारे बुढ़ापे में काम आनी थी, को मेरे बेटे ने गुड़गांव में फ्लैट खरीदने में लगा दी. यहां जबलपुर में हमारा अपना मकान है. यह तो अच्छा है कि मुझे पैंशन मिलती है तो दोवक्त खाना मिल रहा है, वरना बेटे ने तो बुढ़ापे में हमें भूखा मारने की पूरी तैयारी कर दी थी.

नई से नई कारों की चमक, ब्रैंडेड कपड़ों का आकर्षण, महंगे गैजेट्स की होड़ और क्रैडिट कार्ड की आसान उपलब्धता मिल कर एक ऐसी जीवनशैली गढ़ रहे हैं, जो बाहर से जितनी आकर्षक दिखती है, भीतर से उतनी ही अस्थिर और खोखली है. भविष्य की अनिश्चितताओं, जिम्मेदारियों और आर्थिक सुरक्षा जैसे विषय जेनजी की सोच में नहीं हैं. दिखावे और उपभोग की अंधी दौड़ में बचत की पारंपरिक सोच लगभग लुप्त हो चुकी है. पहले जहां परिवारों में ‘बुरे वक्त के लिए बचत’ एक संस्कार की तरह सिखाई जाती थी, वहीं आज ‘अभी जी लो’ का मंत्र अधिक प्रभावी हो गया है. नतीजा, युवा अपनी आय से अधिक खर्च कर रहे हैं.

अनुराधा नागर सिंगल मदर हैं. जब उन की बेटी श्वेता महज दो साल की थी, पति का देहांत हो गया. ससुराल वालों ने अनुराधा का साथ नहीं दिया तो वे बेटी को ले कर किराए के मकान में रहने लगीं. अनुराधा के पति कानपुर डैवलपमैंट अथौरिटी में कार्यरत थे. उन की जगह अनुराधा को नौकरी मिल गई. अनुराधा ने अपनी तनख्वाह से बचत कर हर साल पोस्ट औफिस से किसान विकास पत्र खरीदे और हर साल कुछ अमाउंट एफडी के तौर पर सेव करती रहीं. पिछले साल उन्होंने अपनी बेटी श्वेता की शादी बचत के उन्हीं पैसों से की है. अनुराधा भी मानती हैं कि जिस तरह पैसापैसा जोड़ कर उन की पीढ़ी के लोगों ने अपने बच्चों को पढ़ाया, अपना मकान बनाया, बच्चों की शादियां कीं, वैसी बचत कर पाना आज की जेनेरशन के बस की बात ही नहीं है.

क्रैडिट कार्ड और ‘बाय नाउ, पे लेटर’ जैसी सुविधाओं ने जेनजी के बेतहाशा खर्च की प्रवृत्ति को और भी बढ़ावा दिया है. क्रैडिट कार्ड के कारण खर्च करना आसान हो गया है, लेकिन चुकाना उतना ही कठिन है. लिहाजा, कई मामलों में तो आज के युवा अपने मातापिता की वर्षों की जमापूंजी को भी दांव पर लगा देते हैं. सोशल मीडिया पर दिखने वाली ‘परफैक्ट लाइफ’ ने युवाओं के भीतर एक अदृश्य प्रतिस्पर्धा पैदा कर दी है. हर कोई दूसरों से बेहतर दिखना चाहता है, चाहे वह असलियत में संभव हो या न. दिखावे की इस संस्कृति में संतोष, धैर्य और दीर्घकालिक सोच जैसी चीजें धीरेधीरे कमजोर पड़ती जा रही हैं. इस के पीछे गहरे सामाजिकआर्थिक बदलाव और बाजारवाद काम कर रहा है.

बाजार ने युवाओं की इच्छाओं को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है. विज्ञापन भावनाओं को लक्ष्य बनाते हैं. ब्रैंड ‘जरूरत को ‘ख्वाहिश’ में बदल देते हैं और फिर हर चीज को जरूरी बना दिया जाता है. इस उपभोक्तावादी संस्कृति में फंस कर युवा अपनी वास्तविक जरूरत और कृत्रिम चाहत के बीच फर्क नहीं कर पा रहे. कोरोना जैसी महामारी और उस के बाद युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक के अनुभवों ने भी भविष्य की अनिश्चितता को गहरा किया है. आज का नौजवान जल्दीजल्दी ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने और उड़ाने में विश्वास करने लगा है. वह कहता है- कल किस ने देखा है. आज जी लो जीभर के.

अधिकांश युवा तो शादी करने और परिवार की जिम्मेदारी उठाने की सोच से ही घबराते हैं. महानगरों में ऐसे लोगों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है, जो अकेले रहने या लिवइन में रहने को प्रैफर कर रहे हैं. चाहे लड़का हो या लड़की, शादी की इच्छा घटती जा रही है. हालांकि, सैक्स और रोमांस से इन्हें कोई परहेज नहीं है. इस के लिए इन्हें लग्जरी आइटम्स जैसे लेटेस्ट मौडल की कार, लेटेस्ट आईफोन, ब्रैंडेड कपड़े, महंगा लैपटौप, बढ़िया सनग्लासेस, परफ्यूम, बैग पर वे खूब पैसा फूंक रहे हैं. एक पार्टी में जो ड्रैस वे पहन कर गए उसे आगे की किसी पार्टी में वे नहीं पहनते. यानी, हर पार्टी के लिए अलग ड्रैस उन्हें चाहिए. खासतौर पर लड़कियों को, उस के साथ नया फुटवियर, नई ज्वैलरी और नया पर्स भी. ये सब बाजारवाद के कारण है. इसे ही कहते हैं दिखावा संस्कृति, जो युवाओं की जेब में पैसा टिकने नहीं दे रही.

सोशल मीडिया की दुनिया- इंस्टाग्राम, यूट्यूब और रील्स ने जीवन को एक प्रदर्शन बना दिया है. किस के पास कौन सा फ़ोन है, कौन सी कार है, कौन से ब्रैंड के कपड़े हैं, ये सब अब सिर्फ निजी पसंद नहीं, बल्कि ‘स्टेटस’ का हिस्सा भी बन गए हैं. युवाओं के सामने हर दिन एक ऐसी दुनिया पेश होती है जहां हर कोई परफैक्ट लाइफ’ जीता दिखता है. इस आभासी प्रतिस्पर्धा ने खर्च करने की प्रवृत्ति को बढ़ा दिया है.

क्रैडिट कार्ड और आसान ईएमआई योजनाओं ने खर्च करना बेहद आसान बना दिया है. पहले जहां कोई चीज खरीदने से पहले कई बार सोचना पड़ता था, आज ‘अभी लो, बाद में चुकाओ’ का विकल्प हर जगह मौजूद है. नतीजा यह है कि युवा आय से ज्यादा खर्च कर रहे हैं. इस से कर्ज का बोझ बढ़ता है. कई युवा बिना पूरी समझ के क्रैडिट का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो आगे चल कर आर्थिक संकट में बदल सकता है.  एक और चिंताजनक पहलू यह है कि कुछ युवा अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए मातापिता की बचत पर भी निर्भर हो रहे हैं. यह प्रवृत्ति दो कारणों से खतरनाक है. पहला- यह जेनजी की आत्मनिर्भरता को कमजोर करती है और दूसरा, यह बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा को खतरे में डालती है. परिवार की आर्थिक संरचना पर इस का दीर्घकालिक असर पड़ सकता है.

हालांकि, दोष सभी युवाओं को देना ठीक नहीं है. सभी युवा ऐसा नहीं कर रहे. उच्च शिक्षा पाने और अच्छी नौकरी करने की ख्वाहिशें भी युवाओं में काफी बलवती हैं. यही वजह है कि जहां भी पैसे का अच्छा औफर मिलता है, वे तुरंत स्विच कर जाते हैं. मगर बाजारवाद की संस्कृति में बहक जाने से उन का बैंकबैलेंस गड़बड़ाता है. इस के लिए जागरूकता होनी अब जरूरी है.

जेनजी वाले पूरी तरह गैरजिम्मेदार नहीं हैं. वे नई अर्थव्यवस्था के उत्पाद हैं. हां, उन की प्राथमिकताएं पिछली पीढ़ियों से अलग हैं और वे लाइफस्टाइल को संपत्ति यानी घर, जमीन से ज्यादा महत्त्व देते हैं. इस के अलावा, कई युवा निवेश, स्टार्टअप और डिजिटल कमाई के नए रास्तों को भी अपना रहे हैं. इन में वे अच्छा पैसा भी कमा रहे हैं. लेकिन उन को खर्च और बचत के बीच संतुलन बनाना सीखना होगा. उन को क्रैडिट का समझदारी से उपयोग करना और दिखावे के बजाय वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता देना सीखना होगा.

जेनजी का जीवनदर्शन निश्चित तौर पर पिछली 2 पीढ़ियों से अलग है. नौकरी की अनिश्चितता, तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था और महामारी जैसे अनुभवों ने भविष्य की अनिश्चितता को और गहरा किया है. ऐसे में युवाओं को लगता है कि भविष्य का भरोसा नहीं, इसलिए वर्तमान को पूरी तरह जी लेना बेहतर है. जरूरत इस बात की है कि युवा अपनी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जोड़ें क्योंकि वर्तमान को जीना जरूरी है, लेकिन भविष्य को सुरक्षित रखना भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है. Gen Z youth

 

 

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