Social Media Impact: औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा जारी की गई वर्ल्ड हैप्पीनेस 2026 की रिपोर्ट में भारत की स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है, जो पिछले साल की 118वीं रैंकिंग से 116 पर आ गया है.147 देशों की इस लिस्ट में फिनलैंड लगातार 9 साल से टौप पर बना हुआ है . इस रिपोर्ट की एक खास बात युवाओं और उनमें भी खासतौर से किशोरियों के मद्देनजर खुशहाली को इंटरनैट से कनैक्ट किया जाना है .
रिपोर्ट के मुताबिक जो लडकियां 5 घंटे या उस से ज्यादा इंटरनैट मीडिया का इस्तेमाल करती हैं वे कम संतुष्टि महसूस करती हैं यानी खुश नहीं रह पाती . जबकि जो युवा एक घंटे या उस से कम इंटरनैट मीडिया का इस्तेमाल करते हैं वे दूसरों के मुकाबले ज्यादा खुश रहते हैं . ऐसा सिर्फ इसलिए कि उन के दिमाग में वो कचरा नहीं भर पाता जो ज्यादा इस्तेमाल करने वाले युवाओं के दिमाग में भर जाता है . जाहिर है ये युवा इंटरनैट का वेजा इस्तेमाल ज्यादा करते हैं . जबकि इंटरनैट और सोशल मीडिया का पौजिटिव इस्तेमाल करने वाले युवाओं का फोकस अपनी पढ़ाई और कैरियर पर होता है .
*स्मार्ट फोन का दुष्प्रभाव*
भारत में लड़कियों में भी रील बनाने का चलन छूत की बीमारी की तरह फैल रहा है.नाचगानों से भरपूर ये रील भी अधिकतर बड़ी फूहड़, बेमतलब की और बेतुकी होती हैं. एक सर्व के अनुसार, 70 प्रतिशत युवा लड़कियां रील बनाने के लिए 2-3 घंटे का समय बिताती हैं, जबकि 40 प्रतिशत लड़कियां अपने भविष्य की योजनाओं को नजरअंदाज कर देती हैं.
*आंकड़े बताते हैं*
– 75 प्रतिशत युवा 5-6 घंटे स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं.
– 60 प्रतिशत युवा सोशल मीडिया पर अपना अधिकांश समय बिताते हैं.
– 50 प्रतिशत युवा अपने दोस्तों और परिवार के साथ कम समय बिताते हैं.
– 30 प्रतिशत युवा स्मार्ट फोन के कारण अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते.
*क्या है इस का इलाज*
इस का इलाज क्या है? यह बताने के लिए कोई लुकमान हकीम आगे नहीं आता. ऐसे में युवाओं और किशोरियों को खुद तय करना होगा कि वे तात्कालिक और आभासी खुशी के लिए जिंदगीभर की दुख और तकलीफें मोल न लें. जो अभी लगभग फ्री में मिल रहा है, उस की भारी कीमत उन्हें भविष्य बर्बाद कर चुकाना पड़ेगी. इसलिए युवाओं को अच्छा पढ़ना चाहिए, जो पत्रपत्रिकाओं से ही मुमकिन है. Social Media Impact





