Politics: पिछले कुछ सालों की तरह इस साल भी यूपीएससी की परीक्षा में कुछ ऐसे युवा सिलैक्ट हुए हैं जिन की कामयाबी को महज प्रेरणादायक कहानी करार देते एक दायरे में समेटने की कोशिश की जा रही है. इन के चयन पर मोटेमोटे अक्षरों में लिखा गया और न्यूज़ चैनल्स पर इन की कहानियां इन सुर्ख़ियों के साथ परोसी गईं कि किसान, चौकीदार और मजदूर परिवारों के बच्चे अभावों को मात दे कर अफसर बने.
जबकि यह दायरा बहुत बड़ा और अहम है. यह गरीबी और अभावों का दायरा है जिस के नीचे देश की कोई 80 फीसदी आबादी रहती है. गरीबी, धर्म के मुताबिक, भाग्य की देन है जिस का संबंध पूर्वजन्म में किए गए कर्मों, जो जाहिर है बुरे ही होते हैं, से है. अगलापिछला जन्म कुछ होता नहीं, इन युवाओं ने यह तो इसी जन्म में साबित कर दिया है कि मेहनत और ईमानदारी के साथसाथ शिक्षा से भाग्य न केवल बदला जा सकता है बल्कि बनाया भी जा सकता है. यूपीएससी के कड़े इम्तिहान में चुना जाना कोई हंसीखेल नहीं है जिस में आईएएस बन जाने का सपना लिए देशभर से औसतन 10 लाख उम्मीदवार हर साल शामिल होते हैं. लेकिन उन में से चुने महज 800 से 900 तक ही जाते हैं.
यही 800-900 स्टीलफ्रेम के ख़िताब से नवाजे जाते हैं जो देश की दशा और दिशा तय करते हैं. इस साल इस परीक्षा में 13.45 लाख उम्मीदवारों ने फौर्म भरे थे जिन में से चुने महज 958 गए. यानी, चुने जाने की दर .1 फीसदी से भी कम होती है.
पहले यह हक सिर्फ एलीट क्लास के युवाओं को हुआ करता था जो कमोबेश अब भी बरक़रार है लेकिन अब यह दबदबा टूटता सा नजर आ रहा है क्योंकि उस तबके के युवा भी आईएएस बनने लगे हैं जिन्हें यह ख्वाव देखने का भी हक नहीं था. सरकारी नौकरियों का आकर्षण कभी किसी सुबूत को मुहताज नहीं रहा और वह नौकरी अगर आईएस की हो तो बात सोने पे सुहागा वाली हो जाती है. इस में खासा पैसा और इज्जत है, स्थायित्व है, रसूख है, रुतबा है, अनापशनाप सहूलियतें हैं और बेशुमार अधिकार भी हैं.
ये रहे सुर्ख़ियों में
क्यों हर युवा का पहला सपना आईएएस बनने का होता है, इस का जवाब जानने से पहले इस साल सिलैक्ट हुए कुछ ऐसे युवाओं की जिंदगी पर नजर डालें जिन्होंने एलीट क्लास को चुनौती देने का रिवाज बरक़रार रखते यह मैसेज देने में भी कामयाबी हासिल कर ली है कि यह नौकरी अब किसी की बपौती नहीं रह गई है.
इस लिस्ट में शुमार नामों में एक अहम नाम राजस्थान के जोधपुर के भोपालगढ़ कसबे की अनीता देवड़ा का है जिस ने 644 बी रैंक हासिल की है. अनीता के पिता श्यामलाल देवड़ा पेशे से ऐसे किसान हैं जिन के गुजारे का जरिया थोड़ीमोड़ी जमीन के साथ मजदूरी भी होती है. उस की मां भी खेतिहर मजदूर हैं. अनीता की कामयाबी जिन कई मायनों में अहम है उन में से पहली यह है कि राजस्थान में लड़कियों को दसवींबारहवीं के बाद आगे पढ़ाने से परहेज किया जाता है. देहाती इलाकों में तो उन के जवान होते ही मांबाप शादी कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं.
यूपीएससी की पढ़ाई कठिन होने के साथसाथ महंगी भी है जिस में बिना कोचिंग के बिरले ही सफल हो पाते हैं. इस बात का एहसास खासतौर से अनीता की मां को था, इसलिए उन्होंने एकएक पैसा जोड़ कर बेटी को दिल्ली कोचिंग के लिए भेजा. बहुत कम आमदनी वाले देवड़ा दंपती के लिए यह खर्च उठा पाना जोखिमभरा और निहायत ही मुश्किल काम था. लेकिन उन्होंने इसे किया और अनीता ने भी उन्हें निराश नहीं किया जिस ने 12वीं में ब्लौक लैवल पर टौप किया था. गांव के सरकारी स्कूल से पढ़ाई करने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गई जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी से उस ने एमएससी की डिग्री ली.
अनीता की कामयाबी इस लिहाज से भी अहम है कि उस ने ओरल इंटरव्यू यानी पर्सनैलिटी टैस्ट में सब से ज्यादा नंबर 275 में से 220 हासिल किए जो लिखित में सब से ज्यादा नंबर और पहली रैंक हासिल करने वाले राजस्थान के ही रावतभाटा के डाक्टर अनुज भाटी से 16 नंबर ज्यादा हैं. अनीता के मुकाबले अनुज संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते हैं.
उत्तर प्रदेश के संभल के इंद्रमोहन डुडेजा चंदौसी के एस एम कालेज गेट के सामने छोटी सी चाय की दुकान चलाते हैं. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन की आमदनी और स्टेटस क्या होंगे. लेकिन अब उन के बेटे देव डुडेजा ने यूपीएससी के इम्तिहान में 327वीं रैंक हासिल कर एक झटके में सबकुछ बदल दिया है. अनीता की तरह देव ने भी दिल्ली जा कर पोस्ट ग्रेजुएशन किया और कोचिंग ली. हालांकि कामयाबी उसे भी तीसरी बार में मिली लेकिन उस ने इस मिथक को तोड़ दिया कि आईएएस बनने के लिए बहुत सी सहूलियतों, पैसों के ढेर और खासे स्थापित फैमिली बैकग्राउंड की जरूरत होती है.
इसी कड़ी में एक और उल्लेखनीय नाम उत्तर प्रदेश के ही शामली जिले के कांधला कसबे की आस्था जैन का है जिस ने इस बार 9वीं रैंक हासिल की है. आस्था इस से पहले 2024 में आईपीएस में सिलैक्ट हुई थी और हैदराबाद में ट्रेनिंग ले रही थी. इसी दौरान वह दोबारा यूपीएससी के इम्तिहान में शामिल हुई थी. आस्था के लिए भी इस से पहले सबकुछ आसान नहीं था लेकिन उस के हौसले बुलंद थे और दिलोदिमाग में कुछ कर गुजरने का जज्बा था. उस के पिता अजय जैन मामूली परचून की दुकान चलाते हैं.
आस्था ने 2019 के सीबीएसई के इंटरमीडिएट इम्तिहान में देशभर में चौथी रैंक हासिल की थी. इस के बाद उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अनीता और देव की तरह उस ने भी दिल्ली जा कर आगे की पढ़ाई की और कोचिंग ली. हालांकि इन दोनों के मुकाबले उस की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर थी लेकिन इतनी नहीं कि वह मनपसंद खा और पहन सके, अपने शौक पूरे कर सके और इफरात से स्टडी मैटीरियल खरीद सके क्योंकि उसे एहसास था कि परिवार में 3 भाईबहन और भी हैं और पिता की सीमित आय में जैसेतैसे गुजारा हो पाता है. इस का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस बार उस ने ईडब्ल्यूएस कोटे से परीक्षा दी थी जिसे ले कर विवाद भी उठ खड़े हुए.
उत्तर प्रदेश के आंबेडकर नगर जिले से इस बार 2 युवाओं ने यूपीएससी क्रैक किया है. लेकिन दोनों की हैसियत में हर स्तर पर फर्क है सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और शैक्षणिक भी. 86वीं रैंक हासिल करने वाले पुरु दुबे के पिता संजय दुबे प्रोफैसर हैं तो 316वीं रैंक वाले विपिन देव के पिता राजाराम यादव चौकीदार हैं. जाहिर है, विपिन ने अभावों से जूझते हुए कामयाबी हासिल की. इत्तफाक की बात यह है कि इन दोनों को ही चौथी बार में सफलता मिली जिस से समझ आता है कि अभाव और सुविधाएं दोनों में प्रतिस्पर्धा तो होती है फिर भले ही वह मेहनत की हो.
कभी ये भी रहे थे सुर्ख़ियों में
यह लिस्ट बहुत लंबी नहीं है तो अब एकदम छोटी भी नहीं रह गई है. इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस कोटे से इस बार 104 युवा सिलैक्ट हुए हैं. गरीब और अभावग्रस्त युवाओं की बड़े पैमाने पर चर्चा सब से पहले साल 2007 में हुई थी जब वाराणसी के गोविंद जायसवाल आईएएस बने थे. उन के पिता रिकशा चलाते थे और परिवार झोंपड़े में रहता था. स्ट्रीट लाइट में पढ़ाई कर आईएएस बनने वाले गोविंद ने 48वीं रैंक हासिल कर हरकिसी को चौंका दिया था.
लगभग यही कहानी मध्यप्रदेश के मुरैना के मनोज कुमार शर्मा की है जिन्होंने 2005 में यह इम्तिहान क्रैक किया था. उन के अभावों, संघर्षों और सफलता पर ‘12वीं फेल’ फिल्म भी बनी थी जो खासी चर्चाओं में रही थी. धीरेधीरे ऐसे आईएएस अफसरों की संख्या बढ़ने लगी जो एक तरह से मखमल में टाट के पैबंद के मानिंद थे.
2015 के बैच की टौपर टीना डाबी हों या 2010 के बैच के एम नागराजू या मणिपुर के एक गरीब किसान परिवार के आर्मस्ट्रांग पामे हों या फिर मुंबई के नाइट वाचमैन के बेटे सब्जी विक्रेता 2017 के बैच के अंसार शेख (जिन के नाम सब से कम उम्र में आईएस बन जाने का रिकौर्ड दर्ज है) हों या कि फिर केरल के तीरकमान बेचने वाले दिहाड़ी मजदूर 2016 के बैच के श्रीधन्या सुरेश हों- इन सभी और इन जैसे कईयों न अपना खुद का इतिहास तो गढ़ा लेकिन इतिहास बदल नहीं पाए और न ही ऐसा लग रहा कि आने वाले कल में तसवीर बहुत ज्यादा बदलेगी.
आईसीएस के थे जलवे
आईएएस यानी इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज का नाम पहले आईसीएस यानी इंडियन सिविल सर्विसेज हुआ करता था. जिसे ब्रिटिश हुकूमत ने 1858 में शुरू किया था. मकसद था प्रशासन चलाने के लिए काबिल अफसरों को चुनना. दिलचस्प बात यह है कि इस की परीक्षा इंगलैंड में आयोजित होती थी. सो, जाहिर है कि परीक्षा देने के लिए ऊंची जाति वाले अमीर, संभ्रांत और अभिजात्य घरानों के युवा ही जा पाते थे वरना तो उस दौर में खासे मिडिल क्लासियों को भी दूर शहर जाने के पहले पैसों का जुगाड़ करना पड़ता था.
नाम में जरूर इंडियन जुड़ा था वरना आईसीएस में सिलैक्ट होने वाले अधिकतर युवा अंगरेज ही होते थे जो ठसके से भारत आ कर ऊंचे पदों पर विराज कर ठाट से राजकाज चलाया करते थे. इसलिए इस का नाम ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने स्टील फ्रेम औफ ब्रिटिश राज रख दिया था. यह भारत में ब्यूरोक्रेट्स की औपचारिक शुरुआत थी. इस स्टील फ्रेम की जिम्मेदारी ब्रिटिश हुकूमत की हिफाजत करना थी जिस के एवज में इन्हें राजाओं सरीखी जिंदगी जीने का मौका मिलता था.
रवींद्र नाथ टैगोर के बड़े भाई सत्येंद्र नाथ टैगोर पहले भरतीय थे जिन्होंने 1863 में आईसीएस की परीक्षा पास की और वे बौम्बे प्रैसीडैंसी के अहम प्रशासनिक पदों पर रहे. उन के बाद जितने भी भारतीय आईसीएस हुए उन में भद्र बंगाली ज्यादा थे जो अमीर होने के साथसाथ ऊंची जाति के भी थे, मसलन सुरेंद्र नाथ बनर्जी, रमेश चंद्र दत्त, सत्येंद्र प्रसन्ना सिन्हा सहित नेता जी के ख़िताब से नवाज दिए गए सुभाष चंद्र बोस जिन्हें किस बिना पर `नेताजी’ और ‘फ्रीडम फाइटर’ कहा जाता है, समझ से परे है क्योंकि अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उन्होंने विदेशों में ऐशोआराम से गुजारा, देश के लिए कुछ नहीं कियाधरा.
आईसीएस के जलवों पर गौर करें तो आज के आईएएस उन के सामने कहीं नहीं ठहरते. उन्हें दर्जनों नौकरचाकर, कई एकड़ जमीन में फैला बंगला, घोडा और ड्राइवर सहित मोटर गाडी मिलती थी. उन के हुक्म कानून की तरह लागू होते थे. जिला कलैक्टर छोटामोटा राजा होता था जिस से आम लोग नहीं मिल सकते थे. ब्रिटिश क्लबों में दारूमुरगा पार्टियों के आदी होते जाते आईसीएस शिकार के भी शौक़ीन होते थे जिस पर कोई रोकटोक नहीं थी. सारे विभाग पुलिस, फारेस्ट, राजस्व और जुडिशियरी उन के अधीन होते थे. हर विभाग के अधिकारी उन का दरबार रिपोर्ट देने के बहाने आबाद करते थे. उन का एक अहम काम बेहद सख्ती और क्रूरता से टैक्स वसूली का होता था.
उन्हें सैलरी दी जाती थी, यह कहने के बजाय कहना यह ज्यादा बेहतर होगा कि इन पर पैसा लुटाया जाता था. चुने जाने के बाद आईसीएस, जिसे असिस्टैंट कलैक्टर की पोस्ट मिलती थी, को 700-800 रुपए महीना तनख्वाह मिलती थी जो आज के लगभग 10 लाख रुपए के बराबर होती है. प्रमोशन के साथसाथ यह पगार भी बढ़ती जाती थी. गवर्नर को 5 हजार रुपए मिलते थे जिन की कीमत आज 50 लाख रुपए के लगभग होती है.
कायम है प्रशासनिक वर्ण व्यवस्था
आजादी मिलते ही 1947 में आईसीएस का नाम बदल कर आईएएस कर दिया गया. इस से बहुत ज्यादा कुछ नहीं बदला सिवा इस के कि इस में देसी युवा सिलैक्ट होने लगे लेकिन वे भी संपन्न सवर्ण, मालदार और इज्जतदार घरानों के ही होते थे जिन्हें देसी या काले अंगरेज न कहने की कोई वजह नहीं. हैरानी की बात यह भी है कि उस वक्त देश में कोई एक हजार आईएएस अधिकारी थे जिन में से 500 के लगभग अंगरेज ही थे. मूलतया वे आईसीएस थे जिन में से ज्यादातर इंगलैंड लौट गए थे. बाकी जो देसी बचे वे उन्हीं की तर्ज पर ऐशोआराम की जिंदगी जीते सिस्टम का हिस्सा बन गए.
ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बनाई गई सरकारी नौकरियों की यह अघोषित वर्ण व्यवस्था आज तक कायम है जिस के तहत आईएएस और दूसरे प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी ब्राह्मण होते हैं. इन के पास पैसा, नाम और अधिकार सब से ज्यादा होते हैं. द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी क्षत्रिय होते हैं जो आईएएस अफसरों की गणेशपरिक्रमा करने को मजबूर होते हैं. तृतीय श्रेणी यानी वैश्य वर्ण में आतेआते अधिकारी की जगह कर्मचारी शब्द जुड़ जाता है. इन में क्लर्क, टीचर, पटवारी वगैरह इफरात से होते हैं. ये मोक्ष यानी अपने कल्याण के लिए ब्राह्मणों के आशीर्वाद के मुहताज होते हैं. फोर्थ क्लास यानी चतुर्थ यानी शूद्र श्रेणी में ड्राइवर, सफाईकर्मी, चपरासी वगैरह आते हैं जो बेचारे जिंदगीभर दफ्तर में झाड़ूपोंछा करते फाइलों को एक से दूसरी टेबल तक पहुंचाते रहते हैं. इन्हें उक्त तीनों वर्णों के साहब लोग लतियाते रहते हैं.
आईएएस कई मानों में ब्राह्मण से भी श्रेष्ठ होता है जिस के पास अधिकार तो अनापशनाप होते हैं लेकिन जवाबदेही कोई नहीं होती. एक हद तक ही वह नेताओं और मंत्रियों का मुहताज रहता है. लेकिन सीनियर यानी कमिश्नर और चीफ व प्रिंसिपल सैकेट्री हो जाने के बाद उस का ट्रांसफर भी बिना उस की सहमति से करना आसान नहीं होता.
अब तक ये देवताओं की श्रेणी में शुमार होने लगते हैं जो जानते हैं कि जनप्रतिनिधियों को तो एक मरतबा जनता चुनाव में धकिया सकती है. लेकिन संविधान के अनुच्छेद 308 से 311 इन्हें विशेष सुरक्षा देते हैं जिन के चलते इन का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता. पहले तो कुछ आईएएस, मसलन 1991 के बैच के अशोक खेमका, 2010 बैच की दुर्गाशक्ति नागपाल, 2012 बैच के कन्नन गोपीनाथन और 2002 बैच के संजीव चतुर्वेदी सरकार और नेताओं से उलझ भी पड़ते थे लेकिन मोदी राज में यह रिवाज ही खत्म हो गया है.
आजादी के बाद आईएएस स्टील फ्रेम औफ इंडिया कहे जाने लगे थे. इन में से कुछ ने वाकई तुक के काम किए जो आज तक याद किए जाते हैं. इन में एक उल्लेखनीय नाम 1955 के बैच के टी एन शेषन का है. मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर उन का नाम और काम किसी सुबूत का मुहताज नहीं जिन की सख्ती के चलते चुनावी आचार संहिता सही मानो में लागू हुई थी और फर्जी वोटिंग व बूथ कैप्चरिंग बंद होने के साथसाथ नेताओं की लुभावनी घोषनाओं पर रोक लगी थी.
गुजरे कल की इन बातों का आज से ताल्लुक यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की हैसियत से 1988 के बैच के आईएएस ज्ञानेश कुमार खुलेआम इतनी मनमानी पर उतारू हो आए हैं कि उन से त्रस्त विपक्ष उन के खिलाफ महाभियोग ला रहा है. इस मुहिम में लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसद शामिल हैं. एक दूसरे नाम से आज की पीढ़ी भी परिचित है, वह नाम मेट्रोमैन के ख़िताब से नवाजे गए ई श्रीधरन का है. 1960 के दशक के आईएएस पी एन हक्सर भी खासे चर्चित रहे थे जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सचिव रहते बैंकों के राष्ट्रीयकरण में अहम रोल निभाया था.
सिमटा रहा एससी/एसटी का रोल
संविधान के लागू होते ही बी आर आंबेडकर की मंशा के मुताबिक आईएएस में भी एससी/एसटी आरक्षण लागू हो गया था. लेकिन जागरूकता और शिक्षा की कमी के चलते आरक्षित कोटे से इनेगिने दलित ही आईएस बन पाते थे. हालात आज भी वही हैं कि आरक्षित कोटे से बेहद कम आईएस हैं.
सरकार द्वारा संसद में बीती 12 फरवरी को दी गई जानकारी के मुताबिक वर्तमान में देश में 5,577 आईएएस अधिकारी हैं जिन में से एससी के महज 2.42 फीसदी यानी 135 और एसटी के उस से भी कम केवल 1.2 फीसदी यानी 67 ही हैं. ओबीसी के भी महज 245 आईएस हैं जो 4.39 फीसदी होते हैं.
अब अगर कोटे के सभी पद भरे हों तो एससी के 1,030, एसटी के 516 और ओबीसी के 1,850 के लगभग आईएस अधिकारी होने चाहिए. लेकिन नहीं हैं, तो इस का फर्क क्या पड़ रहा है, यह सवाल 29 जुलाई, 2024 को विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने उठा कर देशभर में हलचल मचा दी थी.
बकौल राहुल गांधी, देश की आबादी का बड़ा हिस्सा लगभग 90 फीसदी इन्हीं वर्गों का है. सो, नीति निर्माण में उन की भागीदारी इतनी कम क्यों है कि केंद्रीय बजट बनाने वाली 20 शीर्ष अधिकारियों की टीम में एससी व एसटी का कोई अधिकारी ही नहीं था. ओबीसी वर्ग से भी नाममात्र को ही थे. इसी मुद्दे से देश में जातिगत जनगणना की बहस ने तूल पकड़ा था.
तो फिर ये क्या कर लेंगे
जब सबकुछ नरेंद्र मोदी और अमित शाह की पसंद के चंद सवर्ण आईएएस अधिकारियों के हाथ में ही है और एससी, एसटी व ओबीसी के रोल समेट कर सरकार ने रख दिया है तो लगता है कि देश वापस आईसीएस के दौर में आ गया है जहां यह स्टील फ्रेम सरकार के इशारों पर नाचता थी. यह सवाल साल 2026 में सिलैक्ट हुए गरीब तबके के युवाओं के मद्देनजर मौजूं है कि उन्हें भी यही करना पड़ेगा. वैसे भी, इन अधिकारियों की प्राथमिकता अपनी और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की स्वाभाविक रूप से होगी.
यह कोई एतराज की भी बात नहीं क्योंकि उन्होंने अभाव देखे और भुगते हैं. सो, उन का फोकस अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर कुदरती तौर पर ज्यादा रहेगा. अनीता देवड़ा, देव डुडेजा, आस्था जैन और विपिन देव यादव जैसे नए आईएएस के दिलों में मुमकिन है देश के लिए कुछ करने का जज्बा हो क्योंकि इन्होंने सही मानों में आम लोगों की समस्याओं को बहुत नजदीक से देखा है. जाहिर है, ये लोग उन समस्याओं से नजात पा गए हैं, अब इन के पास वह सब होगा जिस का सपना इन्होंने देखा था, मसलन बड़ा सरकारी बंगला, लालबत्ती वाली कार, नौकरचाकर, झुके हुए सिर और इन सब से अहम पैसा.
लेकिन ऐसा लगता नहीं कि ये नए आईएएस देश के मौजूदा माहौल से नावाकिफ होंगे कि उन्हें धर्मगुरुओं के इशारो पर नाच रही सरकार के इशारों पर ही नाचना है, हमारी हैसियत अब कहने भर की ही रह गई है. सो, खामख्वाह हीरो बनने की जरूरत नहीं, सिर झुका कर अपने हिस्से में आया राजयोग भोगने में ही बेहतरी है.






