Satirical Story In Hindi : हर साल की तरह इस साल भी बजट आया है, आश्वासनों की नई पैकिंग में पुरानी उम्मीदें सजा कर. फर्क बस इतना है कि आंकड़े मोटे होते जा रहे हैं और जनता की थाली पतली. मंच पर तालियां बजती हैं, स्क्रीन पर ग्राफ चढ़ते हैं और जमीन पर आदमी अपनी चादर नापता रह जाता है.

बजट में क्या है, इस की राय आजकल नेताओं से पूछी जा रही है. पक्ष वालों के तर्क हैं कि बजट संतुलित है, आम आदमी को ध्यान में रख कर बनाया गया है लेकिन विपक्ष को कभी भी सतारूढ़ दल का बजट भाया ही नहीं.

आजकल बजट में आम आदमी की रायशुमारी नहीं ली जा रही है. रायशुमारी ली जा रही है तो बजट बनाने वालों के चेलेचपाटों की जिन को बजट से कोई मतलब नहीं. उन को बजट हमेशा संतुलित लगता है. ऐसे चेलेचपाटे सावन में अंधे हुए होते हैं, इसीलिए इन को हमेशा हर तरफ हरियाली महसूस होती है. बजट में बात किस की हो रही है और मतलब किस को है, इन से क्या लेनादेना.

बजट की बात आती है तो आम आदमी और मध्यवर्ग वाले कान में रूई ठूंस लेता है. अंधरा के जैसन दिन वैसन रात. कल भी कमाना था, आज भी कमाना है. बिना कमाए कल भी सरकार खाने को नहीं देती थी, आज भी नहीं देगी.

न तो मध्यवर्ग को और न निम्नवर्ग को मतलब है, इस बजट से. कौन सा सस्ता होने पर लोग सोना खरीद कर रख ले रहे हैं. यहां तो दाल जुटती है तो भात नहीं. भात जुटता है तो सब्जी नहीं. पांव हमेशा से चादर से बाहर. कल भी जनता भीख मांगती थी, आज भी मांग रही है. 5 किलो अनाज वह कल भी पाती थी, आज भी पाती है.

बाकी, सरकार रील्स बनाने की ट्रेनिंग तो देगी ही. बड़े लोग तो रील्स पहले से बना ही रहे हैं. सरकार तो पहले से ही कह रही है, रील्स बना कर रोजगार पाइए.

टैक्स स्लैब, 6 लाख, 12 लाख, 20 लाख जैसे टैक्स और स्लैब्स बहुत भारीभरकम शब्द हैं. सब को समझ में नहीं आता है. टैक्स स्लैब समझ कर करना भी क्या है. जब न तो 10-20 लाख रुपए होंगे एकसाथ, न उन को पता है, न ही उन्होंने एकसाथ देखे हैं. न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी. यह बात मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग को समझ में नहीं आती है.

जिन स्टील फ्रेम वालों और खरबपतियों को समझ में आती है वे बंद एसी कमरों में जुगाली कर रहे हैं. उन को मतलब नहीं है. टीवी महंगा हुआ है या सस्ता, उन को मतलब नहीं है. सोना महंगा हुआ है या सस्ता, किलोदोकिलो भर कर रखा है लौकर में. ये एसी में बंद लोग हैं. उन को इस बात से मतलब नहीं है.

निम्नमध्यवर्ग और छोटा वर्ग तो चुनाव के समय या सत्यनारायण कथा का लंगर खाने को आतुर हैं या फिर लाइन में लगे हुए हैं 5 किलो अनाज के लिए. यह वर्ग तो किसी की शादीब्याह का कार्ड खोजता है जीमने के लिए. उन को बस खाने से मतलब है. उन का काम तो प्याज का दाम कम हुआ है या नहीं, यह जानना है. आटे का दाम कम हुआ है कि नहीं, यह जानना है. दाल का बजट हर सरकार में खराब रहा है.

भाईसाहब, इन लोगों के लिए बजट भारीभरकम शब्द है. दूध का दाम कम कर दीजिए, पनीर सस्ता कर दीजिए. सैंसेक्स-निफ्टी कितना ऊपरनीचे हुआ है, इस से किसी को क्या मतलब.

बजट के बाद होली आती है. काजू, बादाम, गिरी का भाव कम हुआ है कि नहीं, इन को यह जानना होता है. सब से खराब बात, रिफाइंड तेल कंपनियों द्वारा आम जनता का शोषण करने की है. वजन 750 एमएल और दाम एक लिटर का ले रही हैं 170-170 रुपए. अच्छा बेटा, होशियार बन रहे हो. 140 रुपए का कितना चाहिए, एक पैकेट रिफाइंड, 550 एमएल मिलेगा. क्या कहा, अव्वल तो एक लिटर मिलेगा ही नहीं और मिल भी गया तो एक लिटर 190 रुपए से कम में नहीं मिलेगा. पैनलटी इन पर होनी चाहिए. आईटीआर देर से भरने से आम आदमी को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह तो जानता भी नहीं है कि आईटीआर होता क्या है.

बाकी, शराब की शिकायत तो हमेशा से रही है. चूंकि होली का समय होने वाला है इसलिए सरकार को शराब पर ध्यान देना चाहिए. शराब के दाम और उस पर टैक्स में बेतहाशा कमी होनी चाहिए. शराबियों को लगता है कि सरकार उस की दुश्मन है. शराबी सरकार का सब से बड़ा दोस्त है. वही सब से ज्यादा टैक्स और अंडर टेबल पैसे स्टील फ्रेम और पौलिटिशियनों को देता है. वही सैकड़ों अपराध कर के ऊपरी कमाई कराता है. उस का खयाल न रखना अपनों से दगाबाजी होगी.

अरे नहीं भाई, बजट के महीनेभर तक चीजों के दाम, जैसे दूध, दही, पनीर, आटा, चावल, दाल, रिफाइंड पर सब की नजर रहती है. बजट में सब से सस्ता सिलैंडर होता है. फिर महीनेमहीने बढ़ता जाता है. अगले बजट तक दोचारसौ रुपए का इजाफा हो ही जाता है. फिर रामनवमी आ जाती है. झंडा खरीदना है. अप्रैल आ गया है. किताबकौपी, एडमिशन, रीएडमिशन.

क्या किताब बदल दी, अभी तो पिछले साल बदली थी. अच्छा, स्कूलड्रैस भी बदल गई. जूतामोजा और टाई भी नए लेने होंगे. अरे, डायरी तो हर साल खरीदनी पड़ती है. बैग भी फट गया है, अच्छा बैग भी लेना है. लंबाचौड़ा बजट. ले बजट, दे बजट. सरकार की प्रायोजित रामनवमी आ गई है. लो, अब रामनवमी का बजट बनाना है. सरकार खुद जम कर खर्च करती है.

हर बार बजट पहले साल से भी ज्यादा अच्छा नहीं, अस्त्रशस्त्र  की नुमाइश अच्छी होनी है. रामराज्य फिर आएगा, हर घर भगवा छाएगा. जो राम का नहीं वह किसी काम का नहीं. जो राम को लाए हैं हम उन को लाएंगे. सरकार को आम आदमी की गलियों की नहीं, रिलीजियस टूरिज्म की चिंता है सो वह जम कर सड़कें बनवा रही है.

गरमी आ गई. हाथपंखा का दाम इधर बहुत बढ़ गया है. गरमी लग रही है. कूलर लेना है. एसी खराब है. बिजली नहीं आ रही है. पावर कट ज्यादा हो रही है. अरे, बिजली बिल ज्यादा आ जाएगा एसी कम चलाओ. रात में छत पर सोना है. बिजली नहीं है आज. शाम को 2 घंटे एसी चला कर छोड़ देने से सारी रात रूम ठंडा रहता है. बारबार आनाजाना मत करो. गरमी ज्यादा है. एसी काम नहीं कर रहा है. बिजली का बजट कम कैसे हो. आप वाले अरविंद केजरीवाल को तो जेल में बंद कर दिया और फिर हरवा दिया. भई, बिजली टैक्स कम कर देते.

फिर जहां जून बीता, न्यूज चैनलों में नीचे लिखा आता है- आज से फलाना दूध 4 रुपए लिटर महंगा. अब साल के 6 महीने निकल चुके हैं. जुलाई आषाढ़ का महीना है. नमक लगा कर भुट्टा खाइए. लो, सब्जी में आग लग गई है. टमाटर 100 रुपए किलो. प्याज भी 80 रुपए किलो. तब तक सावन आ जाता है. यह ‘बोर्ड विवाद’ का महीना है. सब को बोर्ड लिखवाना है खानेपीने की दुकानों पर. आखिर, आस्था का महीना है. पवित्र महीना सावन. फूलों की वर्षा हो रही है कांवडि़यों पर. अब लोगों में भक्तिभाव का संचार है. लोग बजट की बात और महंगाई की बात भूल चुके हैं. अब्दुल और राम की पहचान जरूरी है. भादों में जन्माष्टमी की तैयारी चल रही है. जन्माष्टमी का बजट. दुकानें बरसात में खालीखाली रह रही हैं. आमदनी जीरो. दसदस दिनों तक बोहनी नहीं हो रही. बजट गड़बड़ा रहा है दुकानदारों का. एक ग्राहक नहीं. बोहनी नहीं हो रही. दुकानदार दुकान खोलता है और बंद करता है. 2 महीने तक दुकानदारी चौपट.

मुंबई में दहीहांडी कार्य्रक्रम चल रहा है. गोविंदाओं के चोटिल होने पर चर्चा चल रही है. जितीया आ गया है. खीरा सौ रुपए किलो बिक रहा है. सब्जी वाले का सिर ग्राहक ने किलो वाले बाट से फोड़ दिया है. गणेश उत्सव आ गया. गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ. लो, आ गया दशहरा.  रावण का वध होना है. कपड़े खरीदने हैं घर के सब लोगों के लिए. लो, फिर बजट बिगड़ गया है. लो, दीपावली आ गई. रंगाईपुताई का खर्चा. बजट बिगड़ गया है फिर से. मुंह का स्वाद भी बिगड़ जाता है. पटाखे जलाने हैं. पूजा का सामान. फिर जायका बिगड़ गया है मुंह का. लोगों को घर जाना है. छठ पूजा के लिए ट्रेन पकड़नी है. छठ का बजट अलग है. दऊरा लेना है, सूप लेना है, परसादी खरीदनी है. उस का बजट बनाना है.

लो, इस बार बारिश ज्यादा हुई है. सब्जियों के दाम आसमान पर हैं. फूलगोभी 120 रुपए किलो बिक रही है. लोग पावपाव किलो खरीद रहे हैं. आलूप्याज दहाई पर हैं. नया आलू महंगा है लेकिन सोने से सस्ता. अव्वल मटर दिखाई नहीं देती है. मिलती है तो 200 रुपए किलो. आदमी मटर क्यों खाएगा. मुरगा न खाएगा. 200 रुपए किलो. बरबाद ही होना है तो अच्छे से होना है. लीजिए फिर से 25 दिसंबर आ गया है. मनाइए क्रिसमस डे. लो, नया साल भी आ ही गया है. पूरे महीनेभर का वीकैंड है.

नईनई योजनाएं बनानी हैं. काम या योजनाओं पर अमल अगले साल से होगा. आज नया साल है. इरादे बनाने का दिन है. काम तो होता ही रहता है. जीवन पड़ा हुआ है काम करने के लिए. जो काम पैंडिंग पड़ा है वह तो जनवरी में नहीं होगा, भाईसाहब. अब फरवरी का इंतजार कीजिए. फरवरी में देखते हैं. सोचते हैं काम करने के बारे में. फिर से बजट आ गया है, बजट बिगाड़ने के लिए. अच्छा, सोने की बात. जनता तो सो रही है और सोना अपोजिशन और सरकार में बैठे लोग खरीद रहें हैं. बजट पर फिर बात होगी. तब तक झल बजाइए, रील्स बनाइए. संस्थान खुल गए हैं. डिबेट में फिर पूछ रहा है पत्रकार, बजट कैसा है इस बार का! Satirical Story In Hindi

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