Rental Housing Crisis : शहरों में किराएदारी एक अनिवार्य सामाजिक आवश्यकता बन चुकी है. रोजगार, पढ़ाई और छोटे व्यवसायों के लिए गांवों से शहरों की ओर जाने का सिलसिला जितनी तेजी से बढ़ा है, रहने की जगह ढूंढ़ना उतना ही कठिन होता गया है. प्रवासी मजदूर, कामकाजी युवकयुवतियां, छोटे परिवार और छात्र, इन सब की सब से पहली जरूरत एक कमरे या छोटे मकान की होती है परंतु यह जरूरत आज संघर्ष में बदल गई है.

बड़े शहरों में आज किराए के मकानों को सामान्यतया 4 प्रकारों में समझ जा सकता है.

पहली श्रेणी वे इलाके हैं जिन्हें सहज रूप से कैटेगरी ए कहा जा सकता है. ये वे महल्ले हैं जहां गाडि़यां खड़ी दिखती हैं, सड़कों पर साफसफाई रहती है और मकान नए, चौड़े व व्यवस्थित होते हैं. यहां किराया अधिक है. एक साधारण 2 कमरों का सैट 15-20 हजार रुपए तक में मिलता है. एक कमरे वाला अटैच्ड कमरा भी 6-7 हजार रुपए से कम में नहीं मिलता. यह सुविधा उन परिवारों या पेशेवर लोगों के लिए है जिन की आय स्थिर है.

इस के बाद आती है बी कैटेगरी, जो भारत के शहरों में सब से अधिक दिखाई देती है. ये इलाके व्यवस्थित होते हैं, मकान आमतौर पर पक्के और अधिसूचित होते हैं और आसपास की आबादी मध्यम आयवर्ग की होती है. यहां बाइकें अधिक दिखती हैं, छोटा बाजार पास ही होता है और लोग एकदूसरे को पहचानते भी हैं.

2 कमरों का सैट 7-12 हजार रुपए तक और एक कमरा 4-6 हजार रुपए तक में मिल जाता है. यही वह श्रेणी है जिस में सब से अधिक किराएदार सरकारी कर्मचारी, प्राइवेट नौकरी वाले, मजदूर और छोटे व्यापारी रहते हैं.

सी कैटेगरी के इलाके थोड़े तंग परंतु किफायती हैं. यहां एक कमरा, हवापानी की सामान्य सुविधा और साधारण निर्माण मिलता है. छात्र, अकेले नौकरी करने वाले लड़केलड़कियां और कम आय वाले लोग इन इलाकों को चुनते हैं, क्योंकि 2-3 हजार रुपए में एक कमरा मिल जाता है.

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किराए के मकान में रहते हुए आसपास के लोगों से बना कर रखने में समझदारी है. समस्या होने पर बातचीत से समाधान निकालें.

और सब से अंत में आती है डी कैटेगरी, जहां रहना अकसर मजबूरी होती है. ये वे जगहें हैं जहां गलियां बहुत संकरी होती हैं, ज्यादातर घर अनधिकृत होते हैं, बिजलीपानी की स्थिति अस्थिर रहती है और किराया भी उसी अनुसार कम होता है. कुछ सौ से 1,500-2,000 हजार रुपए में भी कमरा मिल जाता है पर सुविधाएं सीमित रहती हैं.

इन 4 श्रेणियों का यह पूरा ढांचा बताता है कि भारत में किराएदारी का बाजार कितना बड़ा और बहुस्तरीय है.

किराए का घर ढूंढ़ने का संघर्ष और डीलरों की भूमिका

शहर में कमरा ढूंढ़ना धीरेधीरे एक चुनौतीपूर्ण काम बन गया है. किराएदार के सामने पहली मुश्किल यह होती है कि कौन सा इलाका उस के बजट में आएगा और किस मकान मालिक की शर्तें वह पूरी कर सकेगा. कई बार डीलर कमरा दिखा देते हैं पर उसी कमरे को कोई अन्य किराएदार अधिक किराए पर ले जाए तो डीलर उसी समय किराया बढ़ा देता है. डीलर की फीस भी कम नहीं. अकसर एक महीने का किराया या उस का आधा, वह भी बिना रसीद के.

कई मकान मालिक किराया देने वालों को भी वर्गीकृत करते हैं, कई कहते हैं कि परिवार को देंगे, लड़कों को नहीं. कहीं लड़कियों को कमरा मिलना मुश्किल हो जाता है. कई जगह छात्रों को अविश्वास की दृष्टि से देखा जाता है. कई मकान मालिक कालोनी की मर्यादा का हवाला दे कर अस्वीकार कर देते हैं. इस सामाजिक वर्गीकरण ने किराएदार के सामने मानसिक बोझ और बढ़ा दिया है.

इस के बाद आती है पहचानपत्र और सत्यापन की प्रक्रिया. यह प्रक्रिया आवश्यक है पर कई मकान मालिक सारा बोझ किराएदार पर डाल देते हैं. कई युवकयुवतियां पढ़ाई या नौकरी में नए होते हैं, उन्हें सत्यापन के लिए बारबार थाने जाना भी भारी लगता है.

किराएदार की चिंता बिजली, पानी और मरम्मत

किराए पर रहने वाले लोगों की सब से गंभीर शिकायत बिजली के बिल को ले कर होती है. पंजाब, हरियाणा और अन्य राज्यों में जहां सरकार ने उपभोक्ताओं के लिए अलगअलग स्लैब तय किए हैं, अनेक मकान मालिक एक ही रेट 10 से 12 रुपए प्रति यूनिट बिना किसी हिसाबकिताब के वसूल लेते हैं. सबमीटर की रीडिंग में फेरबदल की शिकायतें भी आती रहती हैं.

पानी के मामले में भी कई जगह अतिरिक्त राशि ली जाती है. कुछ मकान मालिक मोटर चलाने का खर्च भी किराएदार से वसूलते हैं, जबकि सरकार की तरफ से जलापूर्ति पर अलगअलग सब्सिडी पहले से उपलब्ध होती है.

मरम्मत का मामला और भी पेचीदा है. सामान्यतया पाइपलाइन, टंकी, बिजली के खराब तार, टौयलेट की दिक्कतों की जिम्मेदारी मकान मालिक की होती है, लेकिन कई मालिक यह कहते हुए किनारा कर लेते हैं कि ‘जैसा कमरा देखा था, वैसा ही है, अब मरम्मत तुम्हारी जिम्मेदारी.’ मजबूरी में किराएदार खुद अपने पैसे से मरम्मत करवाता है.

कुल्लू की सीमा देवी का उदाहरण इस पूरे संकट को स्पष्ट कर देता है-

‘पाइपलाइन लीक हो गई पर मकान मालिक ने हाथ खड़े कर दिए. मरम्मत मुझे ही करवानी पड़ी.’

इस के साथ ही अचानक कमरे खाली करने का नोटिस किराएदार के लिए सब से बड़ा तनाव बन जाता है. मकान मालिक महीने के अंत से पहले भी अचानक कमरे की मांग कर लेते हैं. कई बार किराएदार नौकरी के तनाव में होता है, ऊपर से यह चिंता उसे और अस्थिर कर देती है.

पंजीकरण की स्थितिहर जगह अलग, व्यवस्था कहीं नहीं

किराएदारी की समस्या इसलिए भी बढ़ती है क्योंकि देश में कोई एकीकृत पंजीकरण व्यवस्था नहीं है.

पंजाब में पुलिस स्टेशन स्तर पर सत्यापन होता है पर यह सभी जिलों में अनिवार्य नहीं.

हिमाचल में सरकारी भवनों तक ही रिकौर्ड सीमित है, निजी किराएदारों का कोई केंद्रीय डेटा नहीं.

जम्मूकश्मीर में एक विस्तृत फौर्म मौजूद है पर वहां भी प्रक्रिया स्थानीय स्तर पर ही चलती है.

हरियाणा ने एक पोर्टल बनाया है, जो अपेक्षाकृत व्यवस्थित है, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में ऐसा तंत्र नहीं है.

इस असंगत व्यवस्था के कारण किराएदार और मकान मालिक दोनों ही अनिश्चितता में रहते हैं.

देश के अन्य राज्यों में भी हालात कुछ अलग नहीं

दिल्ली, मुंबई, पुणे, जयपुर, कोटा, लखनऊ, भोपाल हर जगह किराएदार बिजली, पानी और मरम्मत जैसी समस्याओं से जूझते हैं. महानगरों में तो बिना लिखित समझते के अतिरिक्त राशि वसूलना आम बात है.

मुंबई और पुणे जैसे शहरों में ‘रेंटिंग ब्लैक मार्केट’ एक अलग ही व्यवस्था बन चुका है, जहां दिखाया कुछ जाता है, लिया कुछ जाता है और लिखित समझता कहीं पीछे छूट जाता है. शिकायत करने पर महीनों तक मामला चलता रहता है, इसलिए गरीब और प्रवासी लोग शिकायत दर्ज ही नहीं करवा पाते.

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शहरों में प्रौपर्टी डीलर मकान दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इन का सकारात्मक पक्ष यह है कि ये जल्दी मकान ढूंढ़ने में मदद करते हैं और इलाके की जानकारी देते हैं.

मकान मालिक की अपनी कठिनाइयां भी कम नहीं

हर विवाद के 2 पहलू होते हैं. जैसा कि किराएदार परेशान होता है, वैसा ही मकान मालिक भी कई तरह की चुनौतियों का सामना करता है.

पिछले कुछ वर्षों में मकानों की निर्माण लागत बहुत बढ़ गई है सरिया, सीमेंट, ईंट, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन सब महंगे. किराया इस लागत के बराबर अब भी नहीं पहुंच पाया है. मकान मालिक के पास यदि 2 कमरे हैं और वह उन्हें किराए पर देता है तो उस से उस की लागत नहीं निकलती.

दूसरी चिंता किराया रुक जाने की होती है. कई मकान मालिक बताते हैं कि किराएदार महीनों किराया रोके रखते हैं और बाहर जाने से इनकार कर देते हैं. कोर्ट में मकान खाली कराने का मामला वर्षों तक चलता है. इस डर से कई लोग अपनी पूरी ऊपरी मंजिल किराए पर देने से बचते हैं.

इस के अलावा गलत गतिविधियों का खतरा भी रहता है. कुछ जगह देररात पार्टी, झगड़ा, शराबबाजी या अवैध गतिविधियों की शिकायतें भी आती हैं. इन सब का सीधा भार मकान मालिक पर आता है, क्योंकि पुलिस सब से पहले उसी से जवाब मांगती है.

क्या कहता है कानून?

मौडल टैनेंसी एक्ट 2021 में स्पष्ट प्रावधान हैं कि किराएदारी हमेशा लिखित समझते के साथ होनी चाहिए. सुरक्षा राशि सीमित हो, बिजलीपानी का वास्तविक बिल ही लिया जाए और विवादों के निबटारे के लिए समयबद्ध प्रक्रिया हो.

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कुछ फैसलों में मकान मालिक के अधिकारों की भी पुष्टि की है यदि किराएदार बिना अनुमति मकान का उपयोग बदल देता है तो मकान मालिक उसे बाहर कर सकता है.

समाज का रवैया और प्रवासी जीवन की असली तसवीर

कुछ घटनाएं किराएदारी के सामाजिक पहलू को भी सामने लाती हैं. होशियारपुर के न्यू दीप नगर में हुई एक घटना के बाद एक पूरी पंचायत ने फैसला किया कि वे अपने गांव में प्रवासियों को किराए पर कमरा नहीं देंगे. ऐसे निर्णय समाज को विभाजित करते हैं और उन लोगों के प्रति अविश्वास बढ़ाते हैं जो अपना घर छोड़ कर शहरों का सहारा लेते हैं.

समाधान की दिशा सरल, मानवीय और संतुलित व्यवस्था

भारत में किराएदारी को सुधारने के लिए कुछ कदम आवश्यक हैं :

एक ऐसी केंद्रीय प्रणाली जहां किराएदार और मकान मालिक दोनों का पंजीकरण हो सके.

ऐसा तंत्र जहां विवाद का समाधान महीनों नहीं, हफ्तों में हो.

बिजली और पानी के अलग मीटर अनिवार्य हों.

और सब से महत्त्वपूर्ण किराएदारों तथा मकान मालिकों दोनों को उन के अधिकार व जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से पता हों.

यदि किराएदारी व्यवस्था को बैलेंस कर के बनाया जाए तो ही किराए के लिए मकान बनेंगे और लोगों को आसानी से मकान मिल सकेंगे. सही व्यवस्था वह है जिस में लोग अपने काम की जगह के आसपास ही मकान आसानी से किराए पर ले सकें.

जब हर स्तर के होटल शहर के हर कोने में खुल सकते हैं तो किराए के मकान क्यों न मिलें. सरकारों की दखलंदाजी और अदालती देर ने मकान मालिक और किराएदार के संबंधों को लौटरी सा बना दिया है.

किराए के मकान में रहना एक व्यवस्था नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी है जो आज लाखों प्रवासी परिवारों की सच्चाई है. Rental Housing Crisis

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