The Choshu Five : चोशू 5 वे युवा थे जो 1863 में जापान से निकले और 1868 में लौटे. पुरानी व्यवस्था को गिराया और 1890 तक जापान को एक आधुनिक राष्ट्र में बदल दिया. आज के जापान के रेलवे, शिक्षा, तकनीक, नौसेना, उद्योग और लोकतंत्र के नायक यही 5 नौजवान थे. इन पांचों के बिना जापान भी 19वीं सदी में भारत या चीन की तरह यूरोप का गुलाम बन जाता. जापान ने तय किया कि या तो आधुनिक बनो या गुलाम बन जाओ. सिर्फ 30-40 साल में जापान ने नौसेना, उद्योग, शिक्षा, रेलवे, बैंकिंग सबकुछ पश्चिमी मौडल पर खड़ा कर लिया. यह दुनिया के इतिहास की सब से तेज मौडर्नाइजेशन की प्रक्रिया थी. आखिर, सिर्फ 3 दशकों में कैसे बदला जापान, आइए जानते हैं.

आज अमेरिका और यूरोप में भारतीयों की स्थिति बेहतर नहीं है. डोनाल्ड ट्रंप की नीयत और उन की नीतियां इमिग्रैंट्स के खिलाफ हैं. इस के चलते भारतीयों के लिए अमेरिका ख्वाब बनता जा रहा है. भारतीयों के लिए यूरोप में भी स्थिति पहले जैसी नहीं रह गई. दशकों से मिडिलईस्ट में चल रही अराजकता के कारण यूरोप पहले से ही शरणार्थी संकट से जूझ रहा है, ऐसे में यूरोप के कई देशों ने इमिग्रेशन पौलिसी में बदलाव किए हैं जिस से सब से ज्यादा नुकसान भारतीयों को हो रहा है लेकिन सवाल यह है कि भारतीयों की भारत से भागने की होड़ क्यों है? सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा कहने वाले लोग ही हिंदुस्तान से भागने को तत्पर क्यों नजर आ रहे हैं?

जापान के इतिहास की एक बेहद महत्त्वपूर्ण घटना है जिसे ‘चोशू फाइव’ के नाम से जाना जाता है. बात 1863 की है जब 5 जापानी नौजवान इतो हिरोबुमी, इनौए काओरू, यामाओ योजो, नोमुरा याकिची और एंडो किनसुके कोयले से लदे जहाज में छिप कर जापान से ब्रिटेन चले गए थे. उस दौर में इस तरह जापान से बाहर भागना किसी भी जापानी के लिए अपराध था. पकड़े जाते तो देशद्रोह के जुर्म में फांसी हो जाती. ये पांचों जापान के पहले ऐसे नौजवान थे जिन्होंने यूनिवर्सिटी कालेज, लंदन में दाखिला लिया और वहां से इंजीनियरिंग, राजनीति, अर्थशास्त्र, तकनीक और विज्ञान की शिक्षा हासिल की.

5 साल तक शिक्षा लेने के बाद ये पांचों नौजवान जापान लौटे और इन्होंने जापान को बदल दिया. इन्हीं पांचों नौजवानों की बदौलत जापान एक फिसड्डी फ्यूडल देश से एक महाशक्ति के रूप में उभरा. इतो हिरोबुमी बाद में जापान के पहले प्रधानमंत्री और संविधान निर्माता बने. इनौए काओरू विदेश मंत्री बने. यामाओ योजो इंजीनियरिंग में एक्सपर्ट थे, उन्होंने मौडर्न जापान के इंफ्रास्ट्रक्चर की नींव डाली और बाद में इंपीरियल कालेज औफ इंजीनियरिंग की स्थापना की. नोमुरा याकिची नौसेना प्रमुख बने. एंडो किनसुके ने चिकित्सा और विज्ञान के क्षेत्र में जापान को मौडर्न देशों की कतार में ला खड़ा कर दिया.

चोशू 5 के नाम से मशहूर ये वे 5 जापानी नौजवान थे जो अपनी जान जोखिम में डाल कर विदेश पहुंचे. वहां मजदूरी कर अपनी पढ़ाई का खर्च उठाया. महज 5 साल में ही इतनी नौलेज इकट्ठी कर ली कि जब लौटे तो इन्होंने जापान को बदल दिया. इन्हीं पांचों की वजह से आज का आधुनिक जापान बना है.

चोशू 5 ने कैसे बदला जापान?

उन्नीसवीं सदी वह दौर था जब एशिया के तमाम देशों पर यूरोप की सम्राज्यवादी ताकतों द्वारा कालोनी बनाए जाने का खतरा मंडरा रहा था. 1868 से पहले जापान में तोकुगावा शोगुनेट नाम के एक गुट के पास सत्ता थी जबकि सम्राट केवल नाममात्र का राजा था. 1853-54 में अमेरिकी कमोडोर मैथ्यू पेरी ने अपने ‘ब्लैक शिप्स’ के साथ जापान आ कर जबरन बिजनैस समझते किए.

अमेरिकी ताकतों का जापान में दाखिल होने और बिजनैस के नाम पर जमीनें हथियाने के पीछे तोकुगावा शोगुन के लोग जिम्मेदार थे. यह जापान के गुलाम होने की शुरुआत थी. इस से जापान के समुराई तोकूगावा शोगुन गुट के खिलाफ हो गए. जापान में ‘सम्राट का सम्मान करो, विदेशियों को भगाओ’ का नारा प्रसिद्ध हुआ. लेकिन एक दशक के बाद विद्रोही गुटों को समझ आया कि जापान से विदेशियों को भगाना संभव नहीं, बल्कि उन से सीखना जरूरी है.

चोशू 5 के पांचों नौजवानों के जापान में वापस लौटने के बाद 3 जनवरी, 1868 को शोगुनेट शासन का अंत कर दिया गया और सारी सत्ता सम्राट के पास वापस चली गई. टोक्यो को नई राजधानी बनाया गया. छोटी रियासतें खत्म कर सैंट्रल गवर्नमैंट बनाई गई. समुराई वर्ग को पैंशन दे कर नौकरी से हटा दिया गया.

सेना को सैंट्रलाइज्ड किया गया और पश्चिम देशों की तर्ज पर सेना में भरती व ट्रेनिंग की व्यवस्था की गई. 1872 में प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और सब के लिए अनिवार्य कर दिया गया. ‘समृद्ध देश, मजबूत सेना’ के नारे के साथ रेल, जहाज, कारखाने, बैंक और हौस्पिटल्स बनाए गए. 1889 में जरमनी की तर्ज पर मीजी संविधान लागू किया गया. कपड़े, खानपान, रहनसहन, कानून, तकनीक और व्यापार में पश्चिमी कल्चर को अपनाया गया. इन तमाम कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि जापान एक पिछड़े हुए सामंती देश से सिर्फ 30-40 वर्षों में एशिया की पहली महाशक्ति बन गया. 1894-95 में चीन को और 1904-05 में रूस को हरा कर जापान ने दुनिया को चौंका दिया.

मीजी पुनर्स्थापना वह क्रांति थी जिस ने जापान को मध्ययुग से मौडर्न युग में पहुंचाया और उसे विश्वशक्ति बनाया. जापान के वे पांचों युवा इस क्रांति के नायक बने जिन्होंने जापान से बाहर निकल कर देशद्रोह किया था. बिना इन 5 युवाओं के मीजी क्रांति इतनी तेजी से और इतने कम खूनखराबे से संभव न होती.

इन्हीं 5 नौजवानों ने ‘जापान को बचाने के लिए पहले उसे बदलना होगा’ का विचार दिया. इन पांचों ने देखा कि पश्चिमी देश कितने आगे हैं? लौट कर इन्होंने यह समझया कि अगर जापान पुरानी व्यवस्था में रहा तो गुलाम बना दिया जाएगा.

चोशू फाइव वे 5 युवा थे जो 1863 में जापान से निकले. 1868 में जापान लौटे और पुरानी व्यवस्था को गिराया और 1890 तक जापान को एक आधुनिक राष्ट्र में बदल दिया. आज के जापान के रेलवे, शिक्षा, तकनीक, नौसेना, उद्योग और लोकतंत्र के नायक यही 5 नौजवान  हैं. इन पांचों के बिना जापान भी भारत या चीन की तरह 19वीं सदी में यूरोपीय उपनिवेश बन जाता.

250 साल तक बंद देश रहने के बाद जापान ने तय किया कि या तो आधुनिक बनो या गुलाम बन जाओ. सिर्फ 30-40 साल में जापान ने नौसेना, उद्योग, शिक्षा, रेलवे, बैंकिंग सबकुछ पश्चिमी मौडल पर खड़ा कर लिया. यह दुनिया के इतिहास की सब से तेज मौडर्नाइजेशन की प्रक्रिया थी.

वर्ष 1900 तक ही जापान में साक्षरता दर 90 फीसदी से ऊपर पहुंच गई थी. उस समय भारत में शिक्षा दर 5 फीसदी भी नहीं थी. आज भी जापान की पीआईएसए रैंकिंग हमेशा टौप 5 में रहती है. जापान में इंजीनियरिंग और विज्ञान में पीएचडी करने वालों की संख्या प्रतिव्यक्ति सब से ज्यादा है.

जापान अकेला वह देश था जिस ने द्वितीय विश्वयुद्ध में अमेरिका से सीधी टक्कर ली. 1945 में हार के बाद अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिराए लेकिन जापान एक दशक में ही उठ खड़ा हुआ और उस ने दुश्मनी भुला कर अमेरिका को अपनी तरक्की में साझेदार बना लिया. अमेरिका ने जापान में जमीन सुधार किया, जमींदारी खत्म की और सब से बड़ी बात, जापान को सेना पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 1 फीसदी ही रखने दिया ताकि सारा पैसा अर्थव्यवस्था में लगे.

जापान की सरकार ने 1950-80 के दशक में स्टील, शिप, कार, इलैक्ट्रौनिक्स और रोबोटिक्स इंडस्ट्री को सब्सिडी, टैक्स छूट और प्रोटैक्शन देना शुरू किया जिस से इस क्षेत्र में जापान सब से आगे पहुंच गया. जापान को देख कर ही कोरिया और चीन ने भी यही मौडल कौपी किया. जापान ने 150 साल पहले फैसला किया कि ‘हम दुनिया में सब से अच्छे बनेंगे’ और फिर शिक्षा, अनुशासन, लंबी सोच, बिजनैस, सहयोग और सामाजिक एकता से इस ख्वाब को पूरा कर दिखाया.

जापान की यह क्रांति उन 5 नौजवानों की बदौलत है जो कोयले के जहाज में छिप कर लंदन गए थे. वर्ष 1868 में इन लोगों ने वापस लौट कर जापान को बदलने में अहम भूमिका निभाई. अब सवाल यह है कि भारत के नौजवान उस वक्त क्या कर रहे थे?

भारतीयों ने क्यों नहीं लांघी देशों की सीमा?

मनुस्मृति के अध्याय 3, श्लोक 158 में कहा गया है कि समुद्र यात्रा करने से व्यक्ति का धर्म भ्रष्ट होता है क्योंकि इस से पवित्रता और आचरण के नियम टूटने की आशंका रहती है और इस से व्यक्ति की जाति और धार्मिक शुद्धता प्रभावित होती है. यही कारण है कि 19वीं सदी तक भारत के ऊंची जाति के लोग विदेश यात्राओं से बचते थे.

दरअसल, सवर्णों को विदेश जाने की जरूरत भी नहीं थी. वर्णव्यवस्था के शिखर पर बैठे लोगों के पास संसाधनों की कमी नहीं थी. विलासिता का जीवन था, जमीनें थीं और जमीनों पर काम करने वाले सस्ते मजदूर थे. सत्ता में राजपूत हों, मुगल हों या अंगरेज हों, इन की विलासिता पर कोई आंच नहीं आती थी. समुद्र पार कर विदेशी धरती तक जाने का जोखिम कौन उठाता? जरूरत भी क्या थी? स्पैनिश लोगों ने अमेरिका की खोज यों ही नहीं की थी. उन्हें अवसरों की तलाश थी. कोलम्बस ने अमेरिका की खोज की क्योंकि उन्हें नई जगह खोजनी थी. वास्को डी गामा भारत घूमने नहीं निकले थे बल्कि उन की मजबूरी उन्हें यहां तक लाई थी.

जापान के 5 समुराई नौजवानों के पास देश को बदलने का विजन था लेकिन भारतीय संभ्रांत वर्ग के पास न तो ऐसा कोई विजन था, न कोई मजबूरी थी, न ही अवसरों की तलाश थी और न ही ज्ञान की लालसा थी. भारत के अपर कास्ट वाले यह भ्रम पाले बैठे थे कि सारा ज्ञान तो इन की पोथियों में पहले ही भरा हुआ है, फिर ज्ञान की तलाश में विदेश क्यों जाना?

यही कारण है कि पूरी 19वीं सदी में भारत से विदेश (ब्रिटेन, यूरोप और अमेरिका) जाने वाले भारतीयों की संख्या बहुत कम थी. उस समय समुद्र यात्रा को हिंदू धर्म में पाप माना जाता था और ऐसा पाप करने वालों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाना तय था. फिर भी कुछ दूरदर्शी और सुधारवादी लोगों ने यह जोखिम उठाया. इन सुधारवादी लोगों द्वारा की गईं विदेश यात्राएं भारतीय पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार और मौडर्न एजुकेशन के प्रसार में बेहद महत्त्वपूर्ण साबित हुईं.

1830 में राजा राममोहन राय मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के दूत के रूप में इंगलैंड गए. 1828 में सतीप्रथा पर रोक लगने के बाद ब्रिटिश संसद में इस के कानून को मजबूत करने के लिए लौबिंग की जरूरत थी. 19वीं सदी में वे पहले भारतीय थे जिन्होंने धर्मगुरुओं के विरोध के बावजूद पहली बार समुद्र यात्रा की.

1842 में द्वारकानाथ टैगोर ने इंगलैंड और फ्रांस की यात्राएं कीं. द्वारकानाथ टैगोर उस वक्त कोलकाता के सब से बड़े उद्योगपति थे. उन्होंने अपनी इस यात्रा से ब्रिटेन में भारतीय व्यापारियों की छवि सुधारने का प्रयास किया.

1883 में पंडित रमाबाई इंगलैंड और अमेरिका गईं. वे पहली भारतीय महिला थीं जिन्होंने विदेश यात्रा की और इंगलैंड में संस्कृत की प्राध्यापिका बनीं. उन्होंने अमेरिका में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ी और विधवाओं के उत्थान के लिए लोगों को जागरूक किया. पंडित रामाबाई ने ‘मुक्ति मिशन’ और ‘शारदा सदन’ की स्थापना की. 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका गए. शिकागो में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन था. उसी सम्मेलन में उन्हें बुलाया गया था.

20वीं सदी की शुरुआत में लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, डा. भीमराव अंबेडकर और दादाभाई नौरोजी जैसी महान शख्सियतों ने विदेश यात्राएं कीं और वापस लौटे तो उन्होंने भारत की आजादी और सामाजिक क्रांति की नींव डाली.

देश आजाद हुआ तो संविधान ने सब को बराबर कर दिया. अब ऊंचे लोग सिर्फ जमीनों से गुजारा नहीं कर सकते थे. जो जमींदार थे उन की जमीनें छिन गईं. अब काहिल लोगों को घरों से निकलना पड़ा, इलाकों को छोड़ना पड़ा और धर्म को ताक पर रख कर देशप्रदेश की सीमाओं को लांघना पड़ा. जिन के पूर्वज समुद्र लांघने को पाप कहते थे वे लोग अवसरों की तलाश में सात समंदर पार तक चले गए. ग्लोबलाइजेशन का दौर आया, तब तक तो एनआरआई की संख्या खासी हो चुकी थी.

1991 से 2025 के बीच भारत दुनिया का सब से ज्यादा प्रवासी भेजने वाला देश बन गया. 2024 तक 1.85 करोड़ से अधिक लोग विदेश चले गए. 2025 में यह गिनती और तेजी से बढ़ रही है. इन में अधिकतर वे लोग हैं जो भारत की सामाजिक व्यवस्था में कास्ट और क्लास में ऊपर हैं. 2026 में ऐसे तकरीबन 1.42 लाख लोग देश छोड़ने की तैयारी में हैं. देश छोड़ने का मतलब यह नहीं कि वे विदेश जा रहे  हैं बल्कि ये डेढ़ लाख वे लोग हैं जो भारत की नागरिकता को छोड़ रहे हैं.

भारत में पढ़ेलिखे लोगों में बेरोजगारी सब से ज्यादा है और जो लोग अच्छी जौब में हैं उन्हें उन की स्किल के हिसाब से भारत में सैलरी नहीं मिलती. इस के उलट अमेरिका, कनाडा और यूके में अच्छी सैलरी, स्टौक औप्शंस और बेहतर कैरियर ग्रोथ मिलते हैं. यही लालच भारतीयों को विदेशों की ओर खींच रहा है.

इस के अलावा अच्छी क्वालिटी की शिक्षा के लिए बड़ी तादाद में भारतीय छात्र विदेश जाते हैं. 2026 तक भारतीय छात्रों की संख्या 20 लाख तक पहुंचने की उम्मीद है जो अमेरिका, कनाडा और यूरोप में पढ़ाई के बाद वहीं बस जाते हैं. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा भी एक बड़ा कारक है जिस की वजह से लोग विदेशों की ओर रुख कर रहे हैं.

आम जनता से टैक्स लेने के मामले में भारत सब से ऊपर के देशों में गिना जाता है. रुपए का तेजी से गिरना और टैक्स पर कम रिटर्न अमीरों को विदेश जाने पर मजबूर कर रहा है. भ्रष्टाचार, प्रदूषण, खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, बाढ़, बिजली व पानी की कमी और ट्रैफिक जैसी समस्याएं भारत के शहरों को रहने लायक नहीं बनातीं. विदेशों में साफ हवा, बेहतरीन बुनियादी सुविधाएं और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी होती है. यही कारण है कि 2024 में 72,500 अमीरों ने भारत की नागरिकता छोड़ दी और 2025 में 3,500 अरबपति देश छोड़ कर चले गए.

डंकी रूट से गधा बनने को मजबूर भारतीय

अरबपतियों के लिए अमेरिका में जा कर बस जाना बेहद आसान है लेकिन आम भारतीयों के लिए यूरोप और अमेरिका पहुंचना किसी खौफनाक सपने से कम नहीं है. 18 सितंबर, 2025 को एक भारतीय नागरिक को यूके से हिरासत में लिया गया. यह आदमी अगस्त 2025 में छोटी नाव से इंग्लिश चैनल पार कर के यूके में घुसा था. फ्रांस अब इस व्यक्ति को भारत वापस भेजने की तैयारी कर रहा है. इंग्लिश चैनल से अवैध क्रौसिंग बढ़ रही हैं. यह रूट इतना खतरनाक है कि वर्ष 2025 में अक्तूबर तक 23 मौतें हुई हैं. इस के अलावा यूके में 2,715 भारतीय नागरिक इमिग्रेशन नियमों के उल्लंघन के कारण हिरासत में हैं. इस के बावजूद इन मामलों में पिछले साल के मुकाबले 108 फीसदी वृद्धि हुई है.

दिसंबर 2023 में फ्रांस ने मानव तस्करी के संदेह में दुबई से निकारागुआ जा रही एक फ्लाइट, जिस में 303 भारतीय सवार थे, को वाट्री एयरपोर्ट पर रोका. जांच के बाद 276 भारतीयों को भारत डिपोर्ट किया गया.

अमेरिका जाने का ख्वाब देखने वाले लोग किसी भी तरह से अमेरिका जाने को तैयार हो जाते हैं. अमेरिका पहुंचने के लिए अमीर लोगों के रास्ते सीधे हैं लेकिन आम भारतीयों के लिए अमेरिका का रास्ता बेहद कठिन है. वहीं, डंकी रूट के जरिए अमेरिका पहुंचने की हिम्मत करने वाले भारतीयों की तादाद भी कम नहीं है.

भारत से पहले सर्बिया, ब्राजील, इक्वाडोर, फिर मैक्सिको के रेगिस्तान को पार कर के अमेरिका की सीमा तय की जाती है. यह सफर हवाई जहाज, नाव, पैदल या जंगल-रेगिस्तान से होता है, जो महीनों चलता है. रास्ते में कई लोग मारे जाते हैं, कई गायब हो जाते हैं.

पंजाब, गुजरात, हरियाणा, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के युवा बेहतर जीवन की तलाश में इस जोखिमभरे रास्ते को चुनते हैं. विदेश भेजने वाले एजेंट्स ‘ड्रीम सेलर्स’ की तरह काम करते हैं. वे 20-50 लाख रुपए ले कर वादा करते हैं कि ‘15 दिनों में अमेरिका पहुंचा देंगे’. लेकिन ऐसा होता नहीं. अमेरिका भेजने के नाम पर एजेंट्स पैसा ठगते हैं और पैसे न देने पर हत्या तक कर देते हैं.

अगर 30-40 लाख रुपए खर्च करने के बाद डंकी रूट से अमेरिका पहुंच भी गए तो वहां से डिपोर्ट होने का खतरा हमेशा बना रहता है. 2025 में अमेरिका ने 104 भारतीयों को हथकड़ी लगा कर डिपोर्ट किया.

अकसर लोग सोचते हैं कि अमेरिका जा कर रिस्पैक्ट और सक्सैस मिलेगी लेकिन हकीकत में डिपोर्टेशन, जेल या मौत उन का इंतजार कर रही होती है. 2023 में सर्बिया ने भारतीयों के लिए वीजामुक्त यात्रा बंद कर दी क्योंकि हजारों भारतीय डंकी रूट से यूरोप में घुस रहे थे.

अपने बच्चों को अमेरिका या यूरोप भेजने के लिए कई परिवार जमीनजायदाद बेच कर या बैंकलोन ले कर पैसे जुटाते हैं लेकिन वे कभी अमेरिका, यूरोप पहुंच ही नहीं पाते, डिपोर्ट कर दिए जाते हैं. ऐसे में कई नौजवान आत्महत्या तक कर लेते हैं. 2025 में 54 ‘डंकियों’ को डिपोर्ट किया गया, जो इटली-लैटिन अमेरिका हो कर गए थे.

डंकी रूट से अमेरिका जाने वाले कई भारतीय मैक्सिको के रेगिस्तान में प्यास से मर जाते हैं, जंगलों में खो जाते हैं या गिरोहों द्वारा मार दिए जाते हैं. तमाम मुसीबतों को झेलते हुए अगर पहुंच भी गए तो डिपोर्ट कर दिए जाते हैं. 2017 में 30 भारतीय अमेरिका-मेक्सिको बौर्डर पर फंस गए जिन्हें बाद में डिपोर्ट कर दिया गया.

केंद्र सरकार ‘डंकी रूट मत लो’ जैसे पोस्टर और वर्कशौप के जरिए अपनी जिम्मेदारी तय करने का नाटक करती है लेकिन समाधान पर बात नहीं करती. असली समाधान रोजगार सृजन और स्किल ट्रेनिंग है. समस्या की असली जड़ बेरोजगारी है.

अमेरिका में काम करना अब मुश्किल

भारत सरकार बारबार यह दावा करती रही है कि उस की विदेश नीति मजबूत है और अमेरिका के साथ संबंध पहले से कहीं बेहतर हुए हैं लेकिन हकीकत इस के उलट है. अमेरिका में काम करने वाले भारतीय पेशेवरों के लिए अब मुश्किल की घड़ी आ चुकी है. राष्ट्रपति ट्रंप ने आदेश जारी किया है कि अब एच-1बी वीजा पर सालाना एक लाख अमेरिकी डौलर की भारी फीस देनी होगी.

यह रकम पहले की तुलना में कई गुना ज्यादा है और इस का सब से बड़ा असर भारतीय कामगारों पर पड़ेगा, क्योंकि एच-1बी वीजाधारकों में लगभग 71 फीसदी भारतीय होते हैं. ट्रंप के इस आदेश से साफ है कि सरकार विदेश नीति के मोरचे पर नाकाम रही है.

सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ जैसे नारे कागजों तक ही सीमित रहे. बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन नहीं हुआ और न ही रिसर्च व इनोवेशन को बढ़ावा देने वाला वातावरण बना. यही वजह है कि आज भी लाखों युवा देश छोड़ कर अमेरिका और यूरोप जाने का सपना देखते हैं और एच-1बी वीजा जैसी योजनाओं पर निर्भर रहते हैं. अब जब अमेरिका ने फीस बढ़ा कर सालाना एक लाख डौलर कर दी है तो इस का बोझ भी सब से ज्यादा इन्हीं भारतीयों पर पड़ेगा.

पडोसी देशों का भी यही हाल

यह घटना 21 सितंबर, 2025 की है. अफगानिस्तान का 13 साल का एक लड़का काबुल से दिल्ली तक एक खतरनाक सफर कर के पहुंच गया. दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एयरपोर्ट पर एक बच्चे को रनवे पर घूमते हुए पाया गया. जब बच्चे से पूछताछ की गई तो पता चला कि बच्चा प्लेन के रियर सैंट्रल लैंडिंग गियर कंपार्टमैंट में छिप कर काबुल से दिल्ली पहुंच गया. यह बच्चा ईरान जाना चाहता था. तालिबान शासन के बाद अफगानिस्तान के हालात बदतर हुए हैं जिस की वजह से कई लोग बेहतर जिंदगी की तलाश में पलायन करने को मजबूर हैं.

बड़ी तादाद में पाकिस्तानी पढ़ालिखा तबका यूरोप, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया और खाड़ी देश जाना चाहता है. पाकिस्तान में महंगाई और बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है. एक औसत इंजीनियर/डाक्टर/आईटी प्रोफैशनल को पाकिस्तान में 80 हजार से 2 लाख रुपए महीना मिलता है जबकि वही व्यक्ति विदेश में 5 से 10 गुना ज्यादा कमा सकता है.

विदेश में कमाई से परिवार को सपोर्ट करना, घर बनवाना, बहनभाइयों की शादियां करना आसान हो जाता है. आतंकवाद, टारगेट किलिंग, अपहरण फिरौती, स्ट्रीट क्राइम ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है. पाकिस्तान की माइनौरिटीज के हालात तो और भी बुरे  हैं. अहमदी, हिंदू, शिया और बलोच एक्टिविस्ट्स को हमेशा जान का खतरा बना रहता है, इसलिए वे मजबूरी में भागते हैं.

शिक्षा और हैल्थकेयर की खराब हालत है. अच्छी यूनिवर्सिटीज बहुत कम हैं, वहां रिश्वतखोरी भरी हुई है. अच्छे हौस्पिटल सिर्फ अमीरों के लिए हैं. गंभीर बीमारी होने पर लोग विदेश ही भागते हैं. पाकिस्तान में नौजवानों को भविष्य का कोई प्लान नहीं दिखता.

युवाओं को लगता है कि पाकिस्तान में मेहनत करो या न करो, सिस्टम आप को आगे नहीं बढ़ने देगा. नैपोटिज्म, करप्शन और कोटा सिस्टम हर जगह है.

यही सब कारण हैं जिन की वजह से पाकिस्तान का पढ़ालिखा, स्किल्ड और महत्त्वाकांक्षी तबका ‘ब्रेन ड्रेन’ कर रहा है क्योंकि उसे अब पाकिस्तान में कोई उम्मीद नहीं दिखती. यही हाल बंगलादेश का है. बंगलादेश में राजनीतिक उथलपुथल ने युवाओं का मोह भंग कर दिया है. बड़ी तादाद में बंगलादेश से लोग विदेशों में पलायन कर रहे हैं.

माइग्रेशन बुरी बात नहीं है लेकिन

माइग्रेशन बुरी चीज नहीं है. अवसरों की तलाश में हमेशा से लोग माइग्रेट करते आए हैं लेकिन राष्ट्रवाद के नाम पर वोट लेने वाली सरकारें राष्ट्र के भीतर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा मुहैया करवाने में फेल हैं, इसलिए भविष्य को सुरक्षित रखने की सोच रखने वाले लोग देश छोड़ कर भाग रहे हैं.

दुनिया की चौथी सब से बड़ी इकोनौमी का दंभ भरने वाले और डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले देश में आज भी 80 करोड़ लोग 5 किलो अनाज पर गुजारा कर रहे हैं. भुखमरी, क्राइम और भ्रष्टाचार में भी हम बहुत आगे हैं. अमेरिका में बसने वाले भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा अपर कास्ट का है जो अमेरिका में रह कर भी अपनी जातिवादी और सांप्रदायिक मानसिकता को छोड़ नहीं पाता. ये लोग अमेरिका में रह कर भी देश की सांप्रदायिक और फासीवादी ताकतों का खुल कर समर्थन करते हैं.

जापान के 5 लोग विदेश गए और वापस लौटे तो जापान को महाशक्ति बना दिया लेकिन यह भारत का दुर्भाग्य ही रहा कि यहां चोशू 5 जैसे नौजवान कभी पैदा ही नहीं हुए. विवेकानंद जैसे युवा विदेश गए तो उन्होंने धर्म का महिमागान तो किया लेकिन विदेश से देश की वास्तविक समस्याओं, सामाजिक विद्रूपों और जातिवाद को मिटाने का कोई उपाय ले कर नहीं आए.

19वीं सदी में देश में शिक्षा और न्याय के मामले में जो भी तरक्की की शुरुआत हुई वह गुलामी के दौर की सब से बड़ी उपलब्धि थी, जिस का श्रेय भारतीयों को नहीं, अंगरेजों को जाता है. भारत अपनी सामाजिक समस्याओं से जूझता रहा लेकिन यहां कभी कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई. सतीप्रथा और विधवा पुनर्विवाह की दिशा में जो भी समाज सुधार हुए उन में भी इंग्लिश शिक्षा हासिल करने वाले उन भारतीयों की अहम भूमिका रही जो विदेश यात्रा करने की हिम्मत कर पाए.

भारत के ‘चोशुओं’ ने क्या किया?

1840 के दशक से भारतीय छात्र ब्रिटेन जाने शुरू हुए. उन में लगभग सभी ऊंची जाति के युवा थे. चिकित्सा, कानून और बिजनैस की शिक्षा के लिए ब्रिटेन जाने वाले ये छात्र ज्यादातर बंगाल के नौजवान थे. उन में भी ज्यादातर वे थे जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था या जिन के पिता ईस्ट इंडिया कंपनी में ऊंचे पदों पर थे. 1840 के दशक में लंदन, एडिनबरा, औक्सफौर्ड और कैम्ब्रिज तक पहुंचने वाले कुल भारतीय छात्रों की संख्या 100-200 के आसपास थी और वर्ष 1900 तक यह संख्या 700 हो गई.

1840 के दशक में ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज में पढ़ने वाले कई छात्र जब वापस भारत लौटे तो वे ब्रिटिश सरकार में ऊंचे पदों पर तैनात हो कर एलीट बन गए. उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा, शासन और व्यापार से भरपूर फायदा उठाया. विदेशियों के साथ मिल कर उन्होंने काफी संपत्ति बनाई. विदेशी संस्कृति में रचबस कर उन्होंने ठाट का जीवन बिताया लेकिन देश में सोशल, पौलिटिकल और इकोनौमिकल बदलाव लाने के लिए इन लोगों ने कुछ नहीं किया.

उसी दौर में ईश्वर चंद विद्यासागर, ज्योतिबा फुले और राजा राममोहन राय जैसे कुछ समाज सुधारक ऐसे हुए जिन में से किसी ने भी ब्रिटिश यूनिवर्सिटी में पढ़ाई नहीं की, फिर भी भारत में सामाजिक क्रांति के नायक बन कर उभरे. ईश्वर चंद्र विद्यासागर की शिक्षा पूरी तरह भारत में ही हुई. राजा राममोहन राय ने गांव की पाठशाला में बंगाली सीखी, फिर पटना चले गए जहां उन्होंने मदरसे में फारसीअरबी पढ़ी और फिर बनारस में जा कर संस्कृत पढ़ी. वे 1829-1833 तक मुगल बादशाह अकबर शाह सानी के प्रतिनिधि के तौर पर इंगलैंड गए जहां उन की मृत्यु हो गई.

ज्योतिबा फुले ने पुणे के स्कौटिश मिशनरी स्कूल में 1841-1847 तक पढ़ाई की. वहां उन्होंने इंग्लिश की शिक्षा प्राप्त की और अपना पूरा जीवन जातिवाद को मिटाने, औरतों की शिक्षा और विधवा पुनर्विवाह के लिए समर्पित कर दिया. ये वे लोग थे जो ब्रिटेन की किसी यूनिवर्सिटी तक नहीं पहुंचे लेकिन भारत में साइंटिफिक टैंपरामैंट को बढ़ावा देने का मूवमैंट शुरू किया.

वे लोग, जो उसी दौर के शुरुआती ग्रेजुएट्स थे, जापान के चोशू 5 की तरह शिक्षा हासिल करने ब्रिटेन तक पहुंचे और पश्चिमी विचारों से प्रभावित भी हुए. उन्होंने वापस लौट कर देश की समस्यायों से जूझने का जोखिम नहीं उठाया बल्कि अपनी शिक्षा को ओहदा और संपत्ति बनाने का जरिया बना लिया. पश्चिम के सैक्युलरिज्म, विज्ञान और लोकतंत्र को भारत में लागू करने की मुहिम छेड़ने वाले शुरुआती लोगों में भारतीय ग्रेजुएट्स बिलकुल नहीं बल्कि अंगरेज ही थे. विलियम वेंटिक्स और मैकाले जैसे विदेशियों ने भारत में शिक्षा और बराबरी की बुनियाद रखी जिस से सामाजिक सुधार और एजुकेशन की दिशा में क्रांति की शुरुआत हुई.

सूरजो कुमार चक्रबर्ती वो पहले इंडियन थे जिन्होंने 1840 के दशक में लंदन के यूनिवर्सिटी कालेज से मैडिकल साइंस की पढ़ाई पूरी की. वे 1848 में ब्रिटिश यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट होने वाले पहले भारतीय डाक्टर बने. वापस लौट कर वे कलकत्ता मैडिकल कालेज में प्रोफैसर बने. सूरजो कुमार चक्रबर्ती पहले भारतीय थे जो इस पद पर पहुंचे.

प्रफुल्ल चंद्र रे ने 1880 में एडिनबरा यूनिवर्सिटी से कैमिस्ट्री की पढ़ाई पूरी की. वापस लौट कर उन्होंने बंगाल कैमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स वर्क्स की स्थापना की जो भारत का पहला मौडर्न कैमिस्ट्री बिजनैस बना.

कौर्नेलिया सोराबजी 1892 में औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने वाली पहली भारतीय महिला थीं और भारत की पहली महिला बैरिस्टर भी.

रोमेश चंद्र दत्त ने 1871 में लंदन के यूनिवर्सिटी कालेज से पढ़ाई की और भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) पास की. जब भारत लौटे तो उन्होंने एडमिनिस्ट्रेशन में बड़े बदलाव किए. रोमेश चंद्र दत्त ने भारत की इकोनौमिकल हिस्ट्री पर किताबें लिखीं. आगे चल कर वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने.

महात्मा गांधी ने 1888 से 1891 के दौरान लंदन के इनर टैंपल से कानून की पढ़ाई की. वापस लौट कर उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया. अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत दिए. रेव धुन्जीभोय नौरोजी पारसी समाज के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ईसाई धर्म अपनाया. धुन्जीभोय नौरोजी ने भारत में प्रोटेस्टैंट/क्रिश्चियन मिशनरी के रूप में काम किया.

दादाभाई नौरोजी प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, अर्थशास्त्री और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक थे. दादाभाई नौरोजी ने ‘ड्रेन थ्योरी’ दी और ब्रिटिश संसद में चुने गए पहले भारतीय बने. सत्येंद्रनाथ टैगोर नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे. सत्येंद्र नाथ टैगोर ने यूनिवर्सिटी कालेज, लंदन में पढ़ाई की और 1863 में आईसीएस एग्जाम में सफलता हासिल करने वाले पहले भारतीय बने. सत्येंद्र नाथ की इस कामयाबी के बाद अपर कास्ट भारतीयों में आईसीएस के प्रति ऐसा उत्साह पैदा हुआ कि कई नौजवान ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज में दाखिला लेने के लिए घर छोड़ कर ब्रिटेन भाग गए थे.

मोहन घोष कलकत्ता उच्च न्यायालय में बैरिस्टर बने; बदरुद्दीन तैयबजी कांग्रेस अध्यक्ष बने और मधुसूदन दत्त प्रसिद्ध साहित्यकार बने. 1860 के दशक तक ये भारतीय छात्र ब्रिटेन में अपने खर्चे पर पढ़ाई करते थे. पढ़ाई का खर्च इतना ज्यादा था कि कई स्टूडैंट्स को पढ़ाई बीच में छोड़ कर ही लौटना पड़ा और कइयों को कर्ज ले कर या घरबार बेच कर पढ़ाई पूरी करनी पड़ी. ऐसे गरीब स्टूडैंट्स के लिए 1868 में ब्रिटिश सरकार ने प्रतिवर्ष 200 पाउंड की स्कौलरशिप देनी शुरू की.

ब्रिटिश काल में ब्रिटेन की अलगअलग यूनिवर्सिटीज से निकले भारतीय स्टूडैंट्स सिस्टम का हिस्सा बने. ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज की बदौलत ही अफसर, डाक्टर, इंजीनियर और बैरिस्टर बने. 1890 तक तीसरी पीढ़ी विदेशी यूनिवर्सिटीज से पासआउट हो कर निकल चुकी थी. वर्ष 1900 आतेआते इन विदेशी यूनिवर्सिटीज से निकलने वाले ग्रेजुएट्स की संख्या 700 तक पहुंच चुकी थी लेकिन इन में चोशू वाला जनून, समझ और समर्पण की भावना नहीं थी. लंदन से पढ़ कर जापान लौटे सिर्फ 5 लोग तीन दशकों में ही जापान को बदल चुके थे लेकिन भारत से ब्रिटेन गए 500 लोगों ने क्या किया? जापान और भारत में आज भी मानसिकता का यह अंतर कायम है.

पुरानी सभ्यता को परे रख जापान का विकास

चोशू फाइव जापान से छिप कर इंगलैंड गए थे. उन्होंने वहां जापान, जो कभी मुसलिमों या गोरों का गुलाम नहीं बना था, का गुणगान नहीं किया. इतो हिरोबुमी (1841-1909) ने जापान में कैबिनेट सिस्टम लागू किया. इन्होंने शोगुन लड़ाकुओं के राज के खात्मे के बाद जापान के आधुनिकीकरण में जापान को नई शासन व्यवस्था दी. इतो हिरोबुमी वर्ष 1885 में जापान के पहले प्रधानमंत्री बने. फिर वे 4 बार प्राइम मिनिस्टर रहे.

यामागाता अरितोमो ने जापान की मिलिट्री का आधुनिकीकरण किया. जापान की सेना गोरों के हाथों में नहीं थी. उन्होंने सभी जापानी युवाओं को कुछ साल मिलिट्री सेवा में शामिल होने की योजना लागू की और विदेशी यूरोपीय हथियार जापान में बनवाना शुरू कराया. पुलिस व्यवस्था में सुधार भी किया.

किडो ताकायोशी ने सामंतवादी शोगुनों का राज खत्म किया और पश्चिमी देशों का कानून, वहां की शिक्षा और वहां सरकारी व्यवस्था को लागू किया.

इनोऊ मसारू को रेलवे का जनक माना जाता है. उन्होंने जापान में रेललाइनें बिछवा डालीं.

यामाओ योजी ने सड़कों के और सार्वजनिक निर्माण कराए.

इन में से किसी ने भी अपने देश जापान की पुरानी सभ्यता के गुणगान में समय बरबाद नहीं किया. उन की पोशाकें अकसर यूरोपीय स्टाइल की होती थीं. इन का उद्देश्य था देश को अमीर बनाओ, सेना को मजबूत करो न कि जापान की संस्कृति, पुजारियों, ग्रंथों की झठी वाहवाही करो. उन्होंने जापान को विश्वगुरु साबित करने की कोशिश नहीं की जबकि शोगुनों के जमाने में जापान अपनी कला व संस्कृति बचाने के चक्कर में रहा और 250 सालों तक विदेशी संपर्क नहीं होने दिया. The Choshu Five

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