Indira-Menaka Gandhi Case : अलग धर्मों में शादी से हुए बच्चों का धर्म क्या है ? जानिए इंदिरा गांधी और मेनका गांधी के मुकदमे से.
आजादी के बाद से ही किसी व्यक्ति का धर्म तय करने का अधिकार दरअसल अदालतों को मिले हुए हैं जिस पर धर्म के ठेकेदारों, पंडों, पादरियों और मौलवियों का तिलमिलाना स्वाभाविक बात है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था यह मानती है कि पति का धर्म ही पत्नी का धर्म होगा और संतान का धर्म वही होगा जो पिता का है लेकिन उत्तराधिकार और विशेष विवाह के कानून कुछ और कहते हैं.
एक मुहिम अब से कोई 20 साल पहले आकार लेना शुरू हो गई थी लेकिन अंजाम पर पहुंची थी 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अप्रत्याशित बहुमत से सत्ता में आई थी. तब सोशल मीडिया पर तरहतरह की पोस्ट इस आशय की वायरल होना रोज की बात थी कि राहुल गांधी का धर्म क्या है क्योंकि उन की मां सोनिया गांधी ईसाई हैं और पिता राजीव गांधी पारसी इस लिहाज से थे कि उन के पिता फिरोज गांधी पारसी थे.
कट्टर सवर्णों को यह कहते सुना जा सकता था कि पहले हमें मुगलों ने लूटा, फिर अंगरेजों ने लूटा और आजादी के बाद से नेहरूगांधी खानदान सनातन धर्म को भी नष्टभ्रष्ट कर रहा है क्योंकि वे हिंदू हैं ही नहीं.
कट्टर हिंदू धार्मिक भावनाओं को भड़का कर भाजपा ने सत्ता तो हासिल कर ली और अपने एजेंडे व हिंदुओं से किए वादे के तहत उस ने राम मंदिर बनवाया, जम्मूकश्मीर से धारा 370 को बदला, तीन तलाक वाले कानून को खत्म कर दिया और भी ऐसे काम बाद में उस ने किए हैं जैसे तीर्थयात्राएं बढ़वाना, दान का काम कराना, घाट बनवाना, मौब लिंचिंग पर पुलिस का चुप रहना वगैरह जो उन 8-10 करोड़ सवर्णों का दिल खुश कर देने वाले थे. इन्हीं लोगों ने एवज में नोटबंदी और जीएसटी की कड़वी खुराक हलक में उड़ेल ली थी. इस दौरान छिटपुट सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के धर्म के बारे में बासी पोस्टें आतीजाती रहती हैं जिन का मकसद नए सवर्ण वोटरों और पिछड़ों से ऊंचे वर्गों को बरगलाना रहता है.
दक्षिणपंथ एक नुकीला हथियार है जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कमला हैरिस के खिलाफ इस्तेमाल करते सत्ता हासिल की थी और इजराइल के बेंजामिन नेत्यानाहू एडोल्फ हिटलर से ज्यादा क्रूर व्यवहार फिलिस्तीनियों पर कर रहे हैं. उन का प्रहार रंग और नस्ल पर था. इस खेल या साजिश का नतीजा ही यह है कि अमेरिका की राजनीति या समाज का अलिफ बे न जानने वाला भी मानने लगा है कि दुनिया का सब से पुराना लोकतांत्रिक देश पतन और बदहाली के कगार पर है पर इजराइल अब इसलामी देशों सा खतरनाक बन चुका है.
राहुल गांधी के धर्म के प्रकरण के संबंध में एक रोचक बात यह है कि वरुण गांधी के धर्म को ले कर कभी हायहाय नहीं होती कि उन की मां सिख और पिता भी पारसी थे तो वे किस लिहाज से हिंदू हुए. यह पूरा ड्रामा दरअसल महाभारत से उधार लिया गया लगता है जिस में जो भी पांडवों के खेमे यानी कृष्ण की शरण में आ जाता था, वह पवित्र, धर्मयोद्धा और धर्मरक्षक वगैरह घोषित हो जाता था, बाकी सब ऋषि विदुर और वर्ण की तरह वर्णसंकर.
मेनका गांधी और वरुण गांधी के भाजपा की शरण लेने भर से ये दोनों राजनीतिक युयुत्सु (धृतराष्ट्र का 101वां बेटा जिस ने धर्म के लिए पांडवों का साथ दिया था) साबित हुए. अब अपने वंश से गद्दारी करने का या भाजपा के प्रति निभाई गई वफादारी का इनाम उन्हें मिल चुका है. सनातनियों ने अपनी बात इतनी बार दोहराई तो कईयों को राहुल गांधी अहिंदू नजर आने लगे. राहुल गांधी उस वक्त मात खा गए थे जब उन्होंने सार्वजनिक मंच से अपने हिंदू होने की बात कहनी शुरू की थी. 10 सितंबर, 2021 को एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था, ‘मेरा परिवार कश्मीरी पंडितों का है. जब भी मैं जम्मूकश्मीर आता हूं, मुझे घर जैसा लगता है.’
इस के पहले राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने 27 नवंबर, 2018 को पुष्कर के एक मंदिर में पूजापाठ किया था, तब एक पुरोहित ने दावा किया था कि राहुल गांधी का गोत्र दत्तात्रय है और वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं. एक दफा कथिततौर पर उन्होंने खुद को जनेऊधारी भी बताया था.
राहुल गांधी भूल गए थे कि जिन लोगों को वे खुद का हिंदू होना दिखाना चाहते हैं वे कट्टर मानसिकता वाले सवर्ण हिंदू हैं और उन का हल्ला, मुख्यधारा में होने के चलते, इतना ज्यादा मचता है कि वही सच लगने लगता है और बाकी 80-85 फीसदी लोगों, जिन में दलित, मुसलमान, आदिवासी और पिछड़े हैं, को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन का धर्म क्या है.
यही कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा है जिस ने इंदिरा गांधी को कभी पारसी की पत्नी या पारसी नहीं माना बल्कि एक उदारवादी नेत्री के तौर पर उन पर बारबार भरोसा किया. यही ट्रीटमैंट जनता ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया था. राहुल अगर बजाय धर्म और उस के प्रतीक चिह्नों के 14 अगस्त, 1984 को दिए गए अपने ही परिवार से ताल्लुक रखते सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते तो वह ज्यादा कारगर और असरदार साबित होता.
इंदिरा गांधी बनाम मेनका गांधी
कौन किस धर्म का है और किस बिना पर है, अव्वल तो यह बात ही बेमानी है लेकिन चर्चित भारतीय मुकदमों के नजरियों से देखें तो राहुल गांधी हिंदू ही हैं. एक दिलचस्प मुकदमे की दास्तां कुछ यों है-
साल 1980 में इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की मौत एक हवाई हादसे में हुई थी, तब मेनका गांधी प्रधानमंत्री आवास में इंदिरा गांधी के साथ ही रहती थीं लेकिन 2 साल में ही सास-बहू में सियासी खटपट शुरू हो कर इस मुकाम तक पहुंच गई थी कि इंदिरा गांधी ने 1982 में मेनका को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. तब मीडिया में यह चर्चा सुर्खियों में रही थी कि मेनका गांधी खुद को नेहरूगांधी परिवार के राजनीतिक वारिस के तौर पर देखने और मानने लगी थीं क्योंकि उस समय तक राजीव गांधी सिर्फ इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे और संतुष्ट लगते थे. इंदिरा गांधी ऐसा नहीं चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपने पायलट बेटे राजीव गांधी को अमेठी उपचुनाव से लड़वा कर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.
बाद में मेनका ने पति के नाम पर संजय विचार मंच का गठन किया था जो कुछ साल तो चर्चा में रहा लेकिन जल्द ही दम तोड़ गया था क्योंकि लोगों की सहानुभूति उन से खत्म होने लगी थी. इस लड़ाई में मेनका खुल कर अपनी सास व जेठ राजीव गांधी सहित कांग्रेस के खिलाफ भी आग उगलने लगी थीं. इस के लिए उन्हें जनसंघ, हिंदू महासभा, जनता पार्टी और हिंदूवादी संगठनों का साथ मिला.
बात यानी उत्तराधिकार की लड़ाई अदालत तक भी पहुंची. पति की मौत के बाद मेनका गांधी ने बेटे वरुण गांधी के नाम पर दिल्ली जिला न्यायालय में संपत्ति (तब लगभग एक करोड़) का प्रशासनिक पत्र यानी लैटर औफ एडमिनिस्ट्रेशन प्राप्त करने के लिए एक याचिका दाखिल की थी.
गौरतलब है कि संजय और मेनका ने साल 1974 में स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत शादी की थी. अपनी याचिका में मेनका गांधी ने दावा किया था कि संजय गांधी एक पारसी व्यक्ति थे, इस नाते उत्तराधिकार के लिए व्यक्तिगत कानून लागू होता है, हिंदू विरासत कानून 1956 नहीं. इसलिए इस मामले पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम यानी इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 लागू होना चाहिए जिस में पत्नी को पूरा हिस्सा मिलता है, मृतक की मां को हिस्सा नहीं मिलता.
यह मुकदमा मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी था. मेनका गांधी ने अपनी सास इंदिरा गांधी और अपने 4 साल के अवयस्क बेटे वरुण गांधी को प्रतिवादी बनाया था जिन का प्रतिनिधित्व यानी गार्जियनशिप स्वाभाविक तौर पर इंदिरा गांधी कर रही थीं.
इस मुकदमे के शुरू होते ही देश की राजनीति में हलचल मच गई थी क्योंकि विवाद संपत्ति के उत्तराधिकार के साथसाथ धार्मिक पहचान का भी था और देश के सब से बड़े राजनीतिक परिवार का था. तब इंदिरा गांधी सब से बड़ी सियासी हस्ती हुआ करती थीं जिन से कानूनी या गैरकानूनी किसी भी ढंग से उलझना जोखिमभरा काम था. यह सब और इस से भी ज्यादा बहुतकुछ जानतेसमझते हुए भी मेनका गांधी ने यह रिस्क लिया था लेकिन राजनीति के बाद कानूनन भी वे इंदिरा गांधी से मात खा गई थीं.
इंदिरा गांधी ने कहा था कि संजय गांधी हिंदू थे क्योंकि उन की मां यानी वे खुद भी हिंदू हैं. उन्होंने ये तर्क भी दिए थे कि संजय का कोई संस्कार पारसी रीतिरिवाज खासतौर से नवजोत नहीं हुआ है इसलिए मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होना चाहिए जिस के तहत मृतक के वारिसों में उस की पत्नी, बच्चे और उस की मां बराबर के हिस्सेदार होते हैं. सो, संजय गांधी की संपत्ति के 3 हिस्से इंदिरा, मेनका और वरुण के नाम होने चाहिए.
ट्रायल कोर्ट ने इंदिरा गांधी की दलीलों से इत्तफाक रखते हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम 1956 के तहत ही फैसला दिया कि संजय गांधी चूंकि हिंदू थे इसलिए उन की संपत्ति के 3 बराबर के हिस्से होंगे. इस फैसले के खिलाफ मेनका गांधी हाईकोर्ट गईं लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते यह भी कहा कि संजय गांधी के पारसी होने के कोई सुबूत पेश नहीं किए गए हैं.
1984 में मेनका ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया लेकिन वहां से भी उन के हाथ निराशा ही लगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले को यथावत रखा. कोर्ट ने साफ तौर पर अपने फैसले में कहा कि संजय हिंदू ही थे, इसलिए मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ही लागू होता है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रही हैं कि संजय गांधी ने नवजोत संस्कार करवा कर या अन्य किसी दूसरे तरीके से पारसी धर्म अपनाया था. ऐसे किसी प्रमाण के अभाव में उन्हें जन्म और पालनपोषण के आधार पर हिंदू ही माना जाना चाहिए.’’
अपनी बात रखते इंदिरा गांधी ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ही 15 मार्च, 1983 को एक हलफनामा पेश किया था जिस में उन्होंने कहा था, ‘‘मेरे पति श्री फिरोज गांधी का नवजोत संस्कार 1923 में वाडिया अगियारी बोम्बे में हुआ था. वे जन्म से पारसी थे लेकिन मेरे पुत्र संजय गांधी का कोई नवजोत संस्कार नहीं हुआ, उन का पालनपोषण हिंदू परंपराओं में हुआ और वे हिंदू ही थे. मैं स्वयं जन्म से हिंदू हूं और नेहरू परिवार की हिंदू परंपराओं का पालन करती हूं.’’
नवजोत एक पारसी धार्मिक संस्कार है जिस की अहमियत उतनी ही होती है जितनी हिंदू धर्म में उपनयन या जनेऊ संस्कार में और इसलाम में खतना की होती है. पारसी (जोरो आस्ट्रियन) धर्म में बच्चे का औपचारिक प्रवेश या धर्मांतरण संस्कार है जो पारसी होने या पारसी बनने की अनिवार्य शर्त है.
मुकदमे का महत्त्व
ट्रायल कोर्ट से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक ने माना कि इंदिरा गांधी भी हिंदू थीं और संजय गांधी भी हिंदू थे तो कईयों, खासतौर से हिंदूवादी संगठनों और दलों, के चेहरे उतर गए जो यह आस लगाए बैठे थे कि बस एक दफा अदालत इंदिरा गांधी और उन के परिवार को पारसी घोषित कर दे तो उन के धर्म पर सियासी रोटियां सेंकी जा सकें.
ऐसा नहीं हुआ तो यह मामला उन्होंने अपने हाथ में ले लिया और जबतब नेहरूगांधी परिवार को ईसाई, मुसलमान और पारसी धर्म को प्रचारित करने लगे. भारत में आदमी का नाम बाद में पूछा जाता है, धर्म और जाति पहले पूछे जाते हैं. इस के बाद उसी हिसाब से संबंधित से व्यवहार यानी डील की जाती है.
संविधान के बजाय मनु स्मृति को मानने वालों के लिए यह मुकदमा एक झटके और सदमे की तरह था क्योंकि यही लोग धर्मग्रंथों के हवाले से यह तय करते आ रहे थे कि हिंदू कौन और हिंदू कौन नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी तौर पर ऐसी दुकानें बंद कर दीं तो ये लोग बौखला उठे लेकिन कर कुछ न सके.
यह तबका या गिरोह बौखलाया तो तब भी था जब आजादी के बाद देश में धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू हुआ था और तब भी तिलमिलाया था जब हिंदूकोड बिल की ड्राफ्टिंग हो रही थी. इन लोगों ने सड़क से ले कर संसद तक में बवाल काटा था. यह सब विस्तार से सरिता के पिछले कई अंकों में पाठक शृंखलाबद्ध तरीके से पढ़ चुके हैं.
आम धारणा यह थी और अभी भी है कि अंतर्धार्मिक शादी, चाहे स्पैशल मैरिज एक्ट में हो, उस में पत्नी का धर्म खुद ही वही हो जाता है जो पति का होता है लेकिन मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी मुकदमे के फैसले ने इस मिथक को तोड़ा और यह मैसेज समाज में गया कि ऐसा होना कोई बाध्यता या अनिवार्यता नहीं.
इसी मुकदमे के नजरिए से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि-
इंदिरा गांधी जन्म से हिंदू थीं (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2 (1) (ए).
उन्होंने कभी पारसी धर्म को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया और उन का पालनपोषण हिंदू परंपराओं से हुआ था (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2 ( 1 ) ( बी).
इसी तरह स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 21ए के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि इस मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा क्योंकि दोनों क्रमश: सिख व हिंदू हैं. इस कानूनी ढांचे से ही इंदिरा गांधी के हिंदू होने की पुष्टि होती है जो संजय गांधी, राजीव गांधी और वरुण गांधी से ले कर राहुल गांधी तक बरकरार रहती है.
सुलझ कई उलझनें
यह मुकदमा राजनीति के साथसाथ समाज और कानूनी रूप से भी बहुत अहमियत वाला साबित हुआ जिस ने विशेष विवाह अधिनियम और उत्तराधिकार संबंधी कई भ्रम दूर किए. मसलन, यह कि यह जरूरी नहीं कि पति का धर्म ही पत्नी का भी धर्म हो और संतान का भी धर्म पिता का धर्म हो. अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते धार्मिक पहचान पर जोर दिया जिसे इसी मुकदमे से समझें तो स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह करने वाले दोनों पक्ष हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध हैं तो उन के उत्तराधिकार पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है.
संजय-मेनका दोनों स्पैशल मैरिज एक्ट की धारा 21ए के तहत हिंदू माने गए. अगर संजय पारसी साबित हो जाते तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मेनका पूरी संपत्ति की स्वामी हो जातीं.
बाद में इतना जरूर हुआ कि इंदिरा गांधी ने अपना 1/3 हिस्सा पोते वरुण गांधी को दे दिया. इस तरह नाबालिग वरुण को अपने पिता की जायदाद का 2/3 हिस्सा और 1/3 मेनका गांधी को मिला. कोर्ट और कानून के मुताबिक वरुण के नाम की संपत्ति को उन के बालिग होने के नाते कोई यानी मेनका गांधी बेच नहीं सकती थीं. इस के लिए उन्हें अदालत की इजाजत लेना पड़ती जो आमतौर पर ऐसे मामलों में आसानी से नहीं मिलती. इस के लिए कोई ठोस वजह होनी चाहिए.
अगर कोई एक पक्ष गैरहिंदू उत्तराधिकारी हो तो क्या होगा, यह सवाल किसी के भी जेहन में उठना स्वाभाविक बात है. इस सवाल का बेहद आसान और सटीक जवाब यह है कि तो फिर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू होगा जिस में समयसमय पर संशोधन सुधार के लिए होते रहे हैं.
इस अधिनयम की धारा (1 ) (सी) कहती है कि कोई भी व्यक्ति जिस का धर्म मुसलिम, ईसाई, पारसी या यहूदी साबित न हो तो हिंदू कानून उस पर लागू होगा. यह दरअसल एक डिफौल्ट प्रावधान है जो नास्तिकों और अज्ञेयवादियों पर भी लागू होता है बशर्ते उन का नाम हिंदू जैसा हो और उन का जन्म हिंदू परिवार में हुआ हो.
केरल हाईकोर्ट के एक फैसले के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति हिंदू होने से इनकार करता हो लेकिन कोई औपचारिक धर्मांतरण नहीं करता तो उसे हिंदू ही माना जाएगा. अभी तक कोई ऐसा कानून नहीं है जो किसी व्यक्ति को बिना किसी धर्म का मानने का मौका देता हो.
निश्चित रूप से नास्तिकों को कोर्ट से राहत नहीं मिलती. ऐसा इसलिए कि अधिकतर शादियां धार्मिक रीतिरिवाजों से होती हैं. शादी अगर स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत की जाए तो धार्मिक होने की झंझट और बाद की उलझनों से मुक्ति पाई जा सकती है. भारत में कई अंतर्धार्मिक शादियां स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत होती हैं.
चर्चित उदाहरण फिल्म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और क्रिकेटर मंसूर अली खां पटौदी का लें तो उन की शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के अंतर्गत हुई थी लेकिन दोनों का धर्म व्यक्तिगत तौर पर बरकरार रहा. उत्तराधिकार के मामले में उन के बेटे सैफ अली खान पर हिंदू कानून उसी सूरत में लागू होता जब यह साबित हो जाता कि उन की परवरिश हिंदू परंपराओं के तहत हुई.
कविता बनाम भारत संघ 1981 के मुकदमे में एक हिंदू महिला की मुसलिम पुरुष से शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत हुई थी. इस मामले में भी अदालत ने माना था कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करने वालों का धर्म परिवर्तित नहीं होता. यदि दोनों पक्ष हिंदू हैं तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है (धारा 21ए). इस मामले में महिला का हिंदू धर्म बरकरार रहा, इसलिए संपत्ति के मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हुआ. इस अधिनयम के 1976 के संशोधन के मुताबिक अगर दोनों पक्ष अलगअलग धर्मों के हैं तो उन पर इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 लागू होता है.
इस बात को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले आए हैं. जस्टिस चिनप्पा रेड्डी के मुताबिक स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने पर उत्तराधिकार पर्सनल ला से बाहर हो जाता है. हालिया 2024 के एक दिलचस्प मुकदमे सफिया बनाम भारत संघ में एक पूर्व मुसलिम महिला ने शरीयत से बाहर निकल कर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम अपनाने या लागू करने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुनवाई के लिए तो स्वीकार किया लेकिन मामला इस वजह के चलते लंबित है कि यह शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत नहीं हुई थी.
यह मामला दिलचस्प इसलिए भी है कि इस में याचिकाकर्ता सफिया केरल की रहने वाली हैं और एक मुसलिम संगठन ‘एक्स मुसलिम औफ केरल’ की महासचिव हैं. इसलाम में जन्मी सफिया अब कुछ व्यक्तिगत कारणों से नौन बिलीवर यानी नास्तिक हो गई हैं. बकौल सफिया, वे अब मुसलिम पर्सनल ला यानी शरिया कानून से बंधी नहीं रहना चाहतीं. वे चाहती हैं कि अब उन के मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू हो.
जाहिर है, यह मामला यूनिफौर्म सिविल कोड की बहस को मजबूत करता है जो सभी धर्मों पर समान कानून की वकालत करता है. मामला अभी लंबित है जिस में केंद्र सरकार और केरल सरकार भी शामिल हैं. लेकिन उदारवादी, नौन बिलीवर मुसलमान इस से सहमत हैं कि उन्हें और सभी मुसलमानों को शरिया कानून की घुटन से आजादी दिलाई जाए. अब देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट का फैसला क्या आता है.
सार यह कि धार्मिक घुटन से मुक्ति के लिए शादी स्पैशल मैरिज एक्ट से करने से बाद की झंझटों से बचा जा सकता है. इसलिए हर किसी को शादी इसी के तहत करनी चाहिए लेकिन धरमकरम के मारे लोग ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाएंगे, इस में शक है. इस में तलाक की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सरल है.
हिंदू मैरिज एक्ट की परस्पर सहमति से तलाक वाली धारा (13 बी) की तरह इस में भी धारा 28 है. तलाक के बाकी प्रावधान हिंदुओं जैसे ही हैं, मसलन व्यभिचार, संक्रामक यौन रोग, परित्याग यानी छोड़ देना, मानसिक विकार और अज्ञातवास वगैरह. इसलिए हर किसी को इस धर्मनिरपेक्ष और सहुलियतें देते इस अधिनियम के तहत शादी करना बेहतर साबित होगा. Indira-Menaka Gandhi Case :





