Hindi Poem: भीड़ के हज़ारों हाथ
और हज़ारों पाँव होते हैं।
वह चलती है सुरसा-सी,
मुँह फैलाए हुए।
उसके मुँह में समा जाते हैं—
बेतरतीब खाना,
रोज़गार,
मकान, कपड़े, दवाइयाँ
और न जाने क्या-क्या।
भीड़ चलती है
किसी राक्षस की तरह—
धम्म… धम्म…
भारी कदमों से
हिला देगी जैसे की
यह जमीन और आसमान।
उसके होने का एहसास
सबको है,तुम्हे भी।
लेकिन उसे संतुष्ट कर पाना
किसी के बस की बात नहीं।
वह खा जाती है विकास,
और पी जाती है समुद्र।
उसकी आवाज़ कर्कश है,
वह शोर मचाती है,
डंडे भी खाती है,
पर उसकी चमड़ी मोटी है—
वह फिर सब भूल जाती है।
उसके हज़ारों हाथ और पाँव
निरंतर ठेलते रहते हैं
हुक्मरानों को,
और कुचल भी देते हैं उन्हें,
जब वह
भूखी रह जाती है। Hindi Poem
लेखिका - संगीता सनत जैन
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