Hidden Pain Of Father : दीपक का दिल त्राहित्राहि कर रहा था, जिस पिता को वह अपनी नाकामयाबी, बेरोजगारी की वजह मान कर, उन की शक्ल तक नहीं देखना चाहता था वही पिता जाते हुए भी उसे बहुतकुछ दे गए थे.

सुबह के 8 बज चुके थे. बिस्तर पर लेटा दीपक अभी भी ऊहापोह में उलझा हुआ था कि वह उठ कर बाहर चला जाए या अभी थोड़ी देर और लेटा रहे और पिताजी के घर से चले जाने के बाद कमरे से बाहर निकले.

तकरीबन 6 महीने पहले अपना अट्ठाइसवां जन्मदिन मनाने वाला दीपक अभी तक पूरी तरह से बेरोजगार था और पिताजी के रिटायर होने में एक महीने से भी कम समय बचा था. 30 से ज्यादा सालों तक ईमानदारी से नौकरी करने के बाद इस महीने के आखिर में रिटायर होने वाले पिताजी यानी राजेंद्र बाबू के रिटायरमैंट के बाद की कुल जमापूंजी महज इतनी थी कि अगर राजेंद्र बाबू के रिटायरमैंट के बाद उन की या दीपक की कमाई का कोई साधन नहीं जुटता है तो जमापूंजी से महज तीनचार महीने ही घर का खर्च चल सकता था और घरखर्च की इसी चिंता की वजह से पितापुत्र यानी दीपक और राजेंद्र बाबू में आएदिन तकरार होती रहती थी.

पिता से आएदिन होने वाली तकरार की वजह से ही सुबह 6 बजे से उठे होने के बावजूद दीपक ने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा था और लेटा हुआ इसी उलझन में उलझ हुआ था कि वह उठ कर बाहर जाए या पिताजी के औफिस चले जाने का इंतजार करे.

ऐसा नहीं था कि दीपक ने नौकरी के लिए प्रयास नहीं किए थे. पिछले सातआठ सालों में उस ने प्राइवेट या सरकारी, बड़ी या छोटी, ऐसी कोई नौकरी नहीं छोड़ी थी जिस के लिए वह क्वालीफाई करता हो और जिस को पाने के लिए उस ने हाथपैर न मारे हों लेकिन कारण भले ही सब के जुदाजुदा क्यों न हों, नतीजा सब का एक ही था- नाकामयाबी.

प्राइवेट सैक्टर के जौब के लिए वह योग्य नहीं पाया जाता था क्योंकि न तो उस के पास कोई प्रोफैशनल डिग्री थी और न ही अनुभव. वहीं, बीसबाइस साल के प्रोफैशनली क्वालीफाई लोगों की लाइन लगी हो तो ऐसे में महज साधारण बीए पास, अट्ठाइस साल के अनुभवहीन बूढ़े को कौन नौकरी पर रखना चाहेगा?

और अगर बात करें सरकारी नौकरी की तो उसे पाना उस जैसे जनरल कैटेगरी के पढ़ाईलिखाई में साधारण इंसान के लिए हिमालय की चोटी को फतेह करना सरीखा है जिसे फतेह कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं.

दिनोंदिन कम होती सरकारी नौकरियों में जब कभी उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली गिनती की नौकरियों के लिए विज्ञापन निकलता है तो एक पोस्ट के लिए लाखों अभ्यर्थियों के बीच में पहले तो रिटन क्वालीफाई कर पाना ही अपनेआप में किसी चुनौती से कम नहीं और अगर किसी तरह इस चुनौती से पार पा भी लिया जाए तो साक्षात्कार में बाहर होना महज वक्त की बात होती है क्योंकि गिनती की जिन पोस्ट्स के लिए लाखों अभ्यर्थी घमासान मचाए हुए होते हैं अकसर उन में से ज्यादातर पर चयन तो किसी और प्रक्रिया से पहले ही हो चुका होता है.

‘कब तक बचेगा इस तकरार से?’ दीपक के मन ने उसे समझया, ‘ऐसा तो हो नहीं सकता कि तेरा पिताजी से सामना न हो. अभी नहीं तो शाम को, सामना हो कर रहेगा और जब भी सामना होगा, पिताजी सुनाने से बाज नहीं आएंगे और अभी तो ऐसा भी हो सकता है कि औफिस जाते हुए वे अपना मूड खराब न करने के चक्कर में कुछ न कहें लेकिन शाम को तो वे सुनाए बिना मानेंगे नहीं. इसलिए बेहतर होगा कि पिताजी का सामना अभी कर लिया जाए और शाम को उन के सोने के बाद ही घर में घुसा जाए. हो सकता है कि ऐसा करने से रोजरोज होने वाली तकरार से ही छुटकारा मिल जाए.’

दीपक को अपने मन का विचार जंचा और उस ने बिस्तर त्याग कर बेडरूम से बाहर हौल में कदम रखा. पिताजी हौल में बैठे नाश्ता कर रहे थे. वह अभी बेडरूम से निकल कर हौल में पहुंचा ही था कि राजेंद्र बाबू कह उठे, ‘‘दीपू की मां, महाराजाधिराज सो कर उठ गए हैं, उन के लिए चायनाश्ते का इंतजाम करो.’’

पिताजी के इस तंजभरे वाक्य ने दीपक को भिन्ना कर रख दिया था लेकिन किसी तरह से वह अपनेआप को काबू में रख कर हौल में रखे दीवान पर जा बैठा.

‘‘लीजिए महाराज, अखबार पढि़ए,’’ राजेंद्र बाबू ने उस की ओर अखबार बढ़ाते हुए एक और तंज कसा.

‘‘आप भी बस सुबहसुबह शुरू हो जाते है,’’ मां ने किचन से आते हुए पिताजी को टोका, ‘‘कम से कम यह तो सोच लेते कि बेचारा अभीअभी सो कर उठा है और फिर जवानजहान बच्चों से हर वक्त ऐसी जबानदराजी करना अच्छा नहीं होता.’’

‘‘लो, मैं ने महराजाधिराज की शान में ऐसी कौन सी गुस्ताखी कर दी जो तुम मुझे नसीहत दे रही हो.’’ लगता था कि आज राजेंद्र बाबू सोचे बैठे थे कि वे दीपक पर अपनी भड़ास निकाल कर ही औफिस जाएंगे, लिहाजा, मां के समझने के प्रयास को नजरअंदाज करते हुए उपरोक्त तंज कसने के साथ ही दीपक से सीधा मुखातिब होते हुए कह उठे, ‘‘वैसे महाराजाधिराज, आप को पता है न कि आज क्या तारीख है?’’

दीपक अच्छी तरह से समझ रहा था कि पिताजी के इस सवाल का जवाब देते ही उन का अगला वार क्या होगा लेकिन साथ ही वह यह भी समझ रहा था कि अगर उस ने उन के इस सवाल को इग्नोर कर भी दिया तो भी पिताजी बाज नहीं आएंगे बल्कि हो सकता है कि चिढ़ कर कुछ ज्यादा ही उलटासीधा न कह दें, इसलिए उस ने नजरें झका कर बड़े ही धीमे स्वर में जवाब दिया, ‘‘पांच.’’

‘‘तो फिर महाराज, आप को यह भी पता होगा कि आज से ठीक 25वें दिन आप के इस खादिम की सरकारी नौकरी खत्म हो जाएगी और उस के बाद से आप का यह खादिम आप की वैसी खिदमत नहीं कर पाएगा जैसी वह पिछले 28 सालों से करता चला आ रहा है.’’

राजेंद्र बाबू ने हाथ जोड़ कर बिलकुल इस अंदाज में कहा जैसे दीपक कोई राजामहाराजा हो और वे उस के कोई अदने से नौकर.

पिताजी की यह हरकत देख कर उस का मन किया कि क्यों न वह वापस अपने बेडरूम में चला जाए या फिर घर से बाहर निकल जाए लेकिन फिर यह सोच कर कि कहीं ऐसा करने से बात और न बिगड़ जाए, उस ने वापस बेडरूम में या घर से बाहर जाने के विचार को तिलांजलि देते हुए पिताजी की हरकतों के प्रति अपने मन में उमड़ते गुस्से को किसी तरह से काबू में रखते हुए कहा, ‘‘आखिर, आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘सिर्फ यह महाराजाधिराज, कि आप जल्द से जल्द कोई कामधंधा ढूंढ़ लें वरना अगले महीने के बाद से इस घर में चौकाचूल्हा जलाने में भी परेशानी होने लगेगी.’’

राजेंद्र बाबू ने यह बात भी कुछ ऐसे अंदाज में कही कि रोजरोज इसी मसले पर होती चिकचिक से पहले से ही भरे बैठे दीपक का अंतर्मन भीतर तक सुलग उठा और रोकने की लाख चेष्टाओं के बावजूद उस के मुंह से निकल ही गया, ‘‘अगर 30 साल से ज्यादा की नौकरी के बाद आप के रिटायर होने के कुछ दिनों के बाद ही घर में खाने के लाले पड़ने की नौबत आने वाली है तो मेरे खयाल से इस का मतलब है कि आप ने इतने साल नौकरी नहीं करी बल्कि झक मारी है.’’

दीपक की यह बात सीधे तीर की तरह चुभी राजेंद्र बाबू को.

‘‘बकवास बंद कर अपनी,’’ गरजते हुए तमक कर वे इतने तेज झटके से उठ खड़े हुए कि टेबल पर रखी नाश्ते की प्लेट एक झटके से दूर जा गिरी.

मां जो शुरूशुरू में तो पितापुत्र में होने वाली इस बहसबाजी में मध्यस्थ की भूमिका निभाती थी लेकिन फिर जब यह बहसबाजी रोजरोज का शगल होने लगी तो उस ने भी अपनी मध्यस्थ की भूमिका को केवल बात को हद से आगे न बढ़ने देने तक सीमित कर लिया था. राजेंद्र बाबू की गरजती आवाज और नाश्ते की प्लेट के फर्श से टकराने से उत्पन्न गूंज से समझ गई कि अब उस का मध्यस्थ की भूमिका निभाने का समय आ गया है.

लिहाजा, उस ने किचन से हौल में आते हुए राजेंद्र बाबू को शांत करने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘शांत हो जाओ दीपू के बापू, आप भी बच्चों की छोटीछोटी बातों का इतना बुरा मान जाते हो.’’

और फिर उन्होंने कुशल मध्यस्थ की भांति दीपक को झड़ते हुए कहा, ‘‘क्या जरूरत थी तुझे यह सब बोलने की? जब इतनी देर से चुप था तो क्या थोड़ी देर और चुप नहीं रह सकता था?’’

लेकिन दीपक की जबान से निकले तीर ने राजेंद्र बाबू के अंतर्मन को तो बेध ही दिया था.

लिहाजा, अपनी पत्नी की बात को अनसुना करते हुए वे गरजे, ‘‘सुन रही हो न दीपक की मां, कह रहा है कि हम ने 30 साल नौकरी नहीं बल्कि झक मारी है. अरे बच्चू, भले ही हम ने सारी जिंदगी झक मारी है लेकिन फिर भी हम ने तुम्हें पालपोस कर इस काबिल कर दिया कि तुम अपने पैरों पर खड़े हो सको लेकिन तुम ने अब तक क्या किया? 30 साल के होने को आए लेकिन अभी तक एक पैसे तक की औकात नहीं है तुम्हारी. इतना बड़ा होने के बावजूद मांबाप का सहारा बनना तो दूर, एकएक पैसे के लिए अभी तक मुहताज हो हमारे. हम से जबान लड़ाने से पहले जरा अपने गिरेहबान में तो झंक लेते? अपने साथ के लोगों को देखो, पूरीपूरी गृहस्थी का बोझ उठा रहे हैं और एक तुम हो जो अभी तक अपने मांबाप के टुकड़ों पर ही पल रहे हो.’’

मां, जिसे राजेंद्र बाबू की बात अच्छी नहीं लगी थी, समझ रही थी जब उसे यह बात बुरी लग रही है तो दीपक को कितनी ठेस पहुंची होगी, लिहाजा, उस ने तुरंत बात को संभालने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘अरे आप भी न, गुस्से में पता नहीं क्याक्या अनापशनाप बोलने लग जाते हो? न कोई किसी को पाल रहा है और न ही कोई किसी के टुकड़ों पर पल रहा है.’’

लेकिन कहते हैं न कि तलवार के घाव से ज्यादा गहरा घाव जबान का होता है और ऐसा ही कुछ दीपक के साथ हुआ.

राजेंद्र बाबू के शब्दों ने दीपक के दिलोदिमाग पर बेरोजगारी और नाकामयाबी से उत्पन्न निराशा, कुंठा, हताशा और बेचैनी को इस बुरी तरह से भड़का दिया कि वह दीपक की जबान से शब्दों के रूप में बह निकली और वह गुस्सेभरे स्वर में कह उठा, ‘‘मैं तो अपने गिरेहबान में हर वक्त झंकता हूं और इसलिए जानता हूं कि मैं बेरोजगार, निखट्टू और नाकाबिल इंसान हूं लेकिन काश कि आप भी एक बार अपने गिरेहबान में झंक लेते तो शायद आप समझ पाते कि मेरी आज की इस हालत के लिए कहीं न कहीं आप भी जिम्मेदार हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ दीपक को घूरते हुए पूछा राजेंद्र बाबू ने.

‘‘मतलब यह कि अगर आज मैं बेरोजगार हूं तो उस के लिए आप भी कम जिम्मेदार नहीं हैं,’’ न चाहते हुए भी दीपक के मुंह से शब्दों के रूप में उस के भीतर की फ्रस्ट्रेशन निकलती चली गई, ‘‘अगर आज मेरे पास कोई प्रोफैशनल डिग्री नहीं है तो इस की वजह यह नहीं है कि मैं उस डिग्री के काबिल नहीं था बल्कि उस की वजह यह है कि आप की इतनी सामर्थ्य ही नहीं थी कि आप मुझे कोई प्रोफैशनल कोर्स करा सकते.

‘‘आप भी जानते हो कि कम से कम 2 सरकारी नौकरियां तो मेरे हाथ से इस वजह से निकली हैं क्योंकि आप के पास अधिकारियों पर चढ़ाने के लिए 5 लाख रुपए नहीं थे और फिर जब मैं ने आप से कहा कि आप लाखदोलाख का इंतजाम कर दो, बाकी का इंतजाम मैं खुद कर के कोई छोटामोटा बिजनैस शुरू कर लेता हूं तो आप ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘अब आप खुद सोचो कि मेरी बेरोजगारी मेरी नाकाबिलीयत की वजह से है या आप की काबिलीयत की वजह से?’’

‘‘खबरदार जो एक और शब्द मुंह से निकला,’’ दीपक की बातों से तिलमिलाए राजेंद्र बाबू इतनी जोर से चीखे कि उन का पूरा वजूद ही कांप उठा था, ‘‘शर्म नहीं आती तेरे को जो अपनी नाकामयाबी का ठीकरा अपने बाप के सिर पर फोड़ रहा है. माना कि मेरी ईमानदारी की वजह से मेरी आर्थिक स्थिति कभी ऐसी नहीं रही कि मैं तुम्हारी हाईफाई जरूरतें पूरी कर पाता लेकिन फिर भी मैं ने तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल तो बनाया ही है न. तेरे अलावा भी मेरी कुछ और जिम्मेदारियां थीं, बेटी की शादी करनी थी वगैरह.

अगर मैं सबकुछ तुझ पर ही लुटा देता तो निभा लेता अपनी जिम्मेदारियां? मेरी काबिलीयत पर उंगली उठाने से पहले जरा यह तो सोच लेता कि मैं कितना भी नाकाबिल क्यों न रहा हूं लेकिन फिर भी अपनी जिम्मेदारियां तो पूरी की हैं मैं ने. लेकिन तुम्हारी काबिलीयत का आलम तो यह है कि मेरे रिटायर होने के बाद इस घर में दो वक्त का खाना भी पक सकेगा या नहीं, इस की भी कोई गारंटी नहीं है.’’

‘‘मेरी रोटी के लिए आप को परेशान होने की जरूरत नहीं है,’’ एक झटके से दीवान से खड़े होते हुए कहा दीपक ने, ‘‘मैं अभी इसी वक्त इस घर को छोड़ रहा हूं. अब मैं इस घर में तभी कदम रखूंगा जब कुछ नहीं तो कम से कम अपने बूते पर अपनी रोटी का जुगाड़ कर चुका होऊंगा.’’

अपनी बात खत्म करते ही वह मां की पुकार को अनसुना करता हुआ दनदनाता घर से बाहर निकल गया. दोपहर को एक बज रहा था. दीपक शहर से बाहर बने एक पार्क के एक विशाल पेड़ के नीचे अधलेटा सा सोचविचार में डूबा हुआ था. सुबह घर से निकलते वक्त उस के दिमाग में जो गुस्सा भरा हुआ था. वह इस समय तक तकरीबन शांत हो चुका था लेकिन पिताजी के प्रति उस के मन में जो कड़वाहट थी उस में कोई कमी नहीं हो रही थी और शायद यही वजह थी कि पिताजी के दोतीन बार कौल करने के बावजूद उस ने उन की कौल रिसीव नहीं की थी. लेकिन हां, मां से जरूर फोन कर के कह दिया था कि वह चिंता न करे.

तभी उस के फोन की घंटी फिर से बज उठी. पिताजी एक बार फिर से कौल कर रहे थे, लेकिन दीपक ने एक बार फिर कौल रिसीव करने के बजाय फोन की रिंग को ही साइलैंट कर दिया. पिताजी की इस कौल ने उस का ध्यान पिताजी की ओर घुमा दिया. जब एक बार उस ने राजेंद्र बाबू के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए उन के जीवन संघर्ष के बारे में सोचना शुरू किया तो उसे महसूस हुआ कि भले ही पिताजी का लहजा गलत रहा हो लेकिन जो कुछ भी वे कह रहे थे उस में कहीं न कहीं सच्चाई तो थी ही.

जिंदगीभर सरकारी महकमे में ईमानदारी से नौकरी कर के जूनियर क्लर्क से हैडक्लर्क तक का सफर तय करने वाले राजेंद्र बाबू की तनख्वाह कभी भी इतनी नहीं रही थी कि महीने के आखिर में खींचतान न करनी पड़ी हो. उसे याद आया कि बड़ी जरूरतें जैसे किसी रिश्तेदार के यहां शादी या कोई और फंक्शन इत्यादि होने पर पिताजी अकसर औफिस से उधार लेते और फिर उसे अपनी तनख्वाह में से कटाते रहते थे.

लिहाजा, पहले से कम तनख्वाह और कम हो जाती थी. परिवार की बेसिक जरूरतों को पूरा करने की मारामारी और आपाधापी में उलझे पिताजी को उस ने अपनी 28 साल की जिंदगी में शायद ही कभी खुश या हंसतेमुसकराते देखा था. जब जीवन की बेसिक जरूरतों के लिए ही हर महीने मारामारी होती हो तो बच्चों को महंगे प्रोफैशनल कोर्स कराने की बात कोई कैसे सोच सकता था?

उसे ध्यान आया कि 2 साल पहले उस की बहन की शादी के वक्त पिताजी ने अपनेआप को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. कोई ऐसा साधन नहीं था जहां से उन्होंने पैसा जुटाने की कोशिश न की हो.

अपने प्रौविडैंट फंड का जितना पैसा वे निकाल सकते थे, निकाल कर उन्होंने शादी में लगा दिया था. लिहाजा, आज रिटायरमैंट की कगार पर खड़े पिताजी लगभग खाली हाथ हैं और ऐसे में अपने एकलौते 28 साला बेरोजगार बेटे पर उन का झंझला जाना या उस पर अपनी

सारी फ्रस्ट्रेशन निकाल देना शायद अस्वाभाविक तो नहीं?

मोबाइल फोन की लगातार बजती घंटी ने दीपक को सोच के भंवर से बाहर निकाला.

इस बार कौल मां का था.

‘‘हां मां,’’ उस ने कौल अटैंड की.

‘‘बेटा, तू उन की कौल क्यों नहीं अटैंड कर रहा?’’ मां ने पूछा.

‘‘मां, आप बात को समझने की कोशिश करो,’’ उस ने मां को समझते हुए कहा, ‘‘मैं ने बड़ी मुश्किल से अपने दिमाग को शांत किया है और मैं नहीं चाहता कि एक बार फिर पिताजी से बहसबाजी हो और फिर मेरा दिमाग खराब हो.’’

‘‘मुझे तो समझ में नहीं आता कि आगे तुम लोगों की निभेगी कैसे?’’ मां को एक अलग ही चिंता थी, ‘‘अभी तुम लोगों के बीच में इतनी तल्खी है तो फिर आगे उम्र बढ़ने पर तो पता नहीं क्या ही होगा?’’

‘‘मां, क्या आप ने यही बात करने के लिए फोन किया था या फिर कोई और भी बात करनी थी?’’

दीपक की बात से मां तुरंत समझ गई कि वह उन की प्रवचनभरी बातें सुनने के मूड में नहीं है और कहीं वह फोन न काट दे, इसलिए उन्होंने तुरंत मुद्दे की बात पर आते हुए कहा, ‘‘फोन तो मैं ने बेटा इसलिए किया था कि अभी जब तू ने उन का फोन नहीं उठाया था तो उन्होंने मुझे फोन किया था. उन्होंने मिश्रा भाईसाहब से तुम्हारे लिए बात की है और भाईसाहब ने कहा है कि तुम अभी जा कर उन से मिल लो. वे देख लेंगे कि वे तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं.’’

मिश्रा भाईसाहब यानी नरेंद्र मिश्रा. वे थे तो राजेंद्र बाबू के बचपन के परम मित्र लेकिन दोनों की विचारधारा में जमीनआसमान सा अंतर था. जहां राजेंद्र बाबू सीधे, सच्चे, ईमानदार व्यक्ति थे वहीं मिश्राजी जुगाड़ू, चलते पुर्जे और ईमानदारी से दस फुट की दूरी बना कर चलने वाले व्यक्ति थे. इसे शायद दोनों के व्यक्तित्व के अंतर का ही नतीजा कहा जाएगा कि भले ही राजेंद्र बाबू और मिश्राजी दोनों ने तकरीबन साथसाथ ही अपने कैरियर की शुरुआत अलगअलग सरकारी महकमों में बतौर जूनियर क्लर्क की थी लेकिन 30 साल बाद आज जहां राजेंद्र बाबू जूनियर क्लर्क से हैडक्लर्क तक ही पहुंच पाए थे वहीं मिश्राजी अपने महकमे में वरिष्ठ अधिकारी थे.

‘‘मां तुम कह रही हो तो मैं जा कर मिश्रा अंकल से मिल लेता हूं लेकिन साथ ही आप पिताजी से कह दो कि वे मेरे लिए परेशान होना छोड़ दें.’’

‘‘कैसी बात कर रहा है, बेटा. आखिर, वे पिता हैं तुम्हारे. तुम्हारे लिए अगर वे परेशान नहीं होंगे तो और कौन होगा?’’ मां ने दोनों पक्षों में समझता कराने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘तुम उन की हर बात को नकारात्मक तरीके से मत लिया करो. वे जो भी कर रहे हैं तुम्हारे भले के लिए ही कर रहे हैं.’’

दीपक समझ गया कि अगर उस ने बात को यहीं खत्म नहीं किया तो मां का सलाहों का पिटारा फिर से खुल जाएगा, लिहाजा, उस ने तुरंत ही मां की बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘ठीक है मां, मैं सब समझ गया. मैं अभी जा कर मिश्रा अंकल से मिल लेता हूं और फिर आप को बताता हूं कि क्या रहा.’’ और फिर उस ने मां का जवाब सुने बिना फोन काट दिया.

मिश्राजी के औफिस से बाहर निकलते वक्त दीपक का दिमाग बुरी तरह से भन्नाया हुआ था. पिताजी राजेंद्र बाबू के प्रति उस का गुस्सा जो थोड़ा शांत हो चला था, एक बार फिर से अपने चरम पर पहुंच गया था.

मां से बात होने के बाद वह तुरंत ही मिश्राजी से मिलने उन के औफिस चला आया था.

महकमे के बड़े अधिकारी होने के नाते औफिस में मिश्राजी का अपना निजी केबिन था. दीपक जब उन से मिलने पहुंचा तो वे अपने बचपन के मित्र के पुत्र से बड़े ही प्रेमभाव से मिले. चायनाश्ते के दौरान उन दोनों के मध्य औपचारिक बातचीत होती रही और चायनाश्ते के बाद जब चपरासी उन की मेज साफ कर के केबिन से बाहर चल गया तो उन्होंने एकदम से मुद्दे की बात पर आते हुए बताया कि उन के महकमे में असिस्टैंट की एक पोस्ट खाली है जिस पर वे जुगाड़बाजी कर के उस को लगवा सकते हैं.

इस जुगाड़बाजी का कुल खर्चा वैसे तो 5 से 7 लाख रुपए बैठता है लेकिन अपने बचपन के दोस्त के पुत्र की खातिर अपने बड़े अधिकारियों की खुशामद कर के वे यह काम सस्ते

से सस्ते में करवाने की कोशिश करेंगे लेकिन फिर भी कम से कम 2 से 3 लाख रुपए तो लग ही जाएंगे.

‘‘देखो बेटा दीपक, राजेंद्र मेरा तब का दोस्त है जब हम दोनों निक्कर पहना करते थे,’’ उन्होंने अपनी जुगाड़बाजी के खर्चे को जस्टिफाई ठहराते हुए उस से कहा, ‘‘उस की ईमानदारी और सच्चाई पर किसी को कोई शक या शुबह नहीं है. यहां तक कि अधिकारी वर्ग भी उस की ईमानदारी और सच्चाई से बहुत प्रभावित हैं और इसीलिए उस का सम्मान भी करते हैं लेकिन सम्मान अपनी जगह है और काम और उस पर होने वाला खर्चा अपनी जगह. तुम इस बात को यों समझ कि यह राजेंद्र के सम्मान का ही नतीजा है कि जिस काम की कीमत पांचसात लाख रुपए या उस से कहीं ज्यादा है, 2 से 3 लाख रुपए में निबट जाएगा.’’

मिश्रा अंकल की बात सुनते ही दीपक समझ गया कि यह बेल भी मुंडेर नहीं चढ़ने वाली क्योंकि उस के पिताजी ने अगर पैसे दे कर ही उस को नौकरी दिलवानी होती तो पहली 2 नौकरियां ही क्यों हाथ से जातीं, लेकिन प्रत्यक्षतया उस ने इतना ही कहा, ‘जैसा आप उचित समझें, पापा से बात कर लें.’

मिश्राजी ने उसी समय अपने मोबाइल से राजेंद्र बाबू को कौल लगा दी और फोन को स्पीकर पर डाल दिया.

पैसे की बात सुनते ही राजेंद्र बाबू एकदम से भड़क गए. मिश्राजी ने उन्हें लाख समझने की कोशिश की लेकिन राजेंद्र बाबू टस से मस न हुए. बल्कि बातचीत में एक दौर तो ऐसा भी आया कि वे मिश्राजी को ही बुराभला कहने लग गए और जब मिश्राजी को यह लगा कि अगर उन्होंने अपने बचपन के मित्र को नहीं रोका तो वह निश्चित ही कोई ऐसी बात कह देगा जिस से बरसों की दोस्ती में दरार पड़ सकती है तो यह कहते हुए कि, ‘ठीक है, फिर सोचते हैं कि और क्या किया जा सकता है’ फोन डिस्कनैक्ट कर दिया.

फोन डिस्कनैक्ट होते ही दीपक झेंपता हुआ सा अपनी सीट से उठा और मिश्राजी से नजरें चुराता हुआ बोला, ‘‘ठीक है अंकल, मैं चलता हूं. कोई और व्यवस्था हो तो बताना.’’

‘‘ठीक है बेटे, तुम चिंता मत करना, मैं करता हूं कुछ.’’ मिश्राजी ने उसे सांत्वना देने के बाद गंभीर स्वर में नसीहत देते हुए कहा, ‘‘लेकिन एक बात कहना चाहूंगा कि राजेंद्र को अपनी सोच बदलनी चाहिए. बुरा मत मानना लेकिन आज कंपीटिशन के इस दौर में जब बड़े से बड़े धुरंधरों को सरकारी नौकरी मिलना आसान नहीं है तो बेटा, तुम खुद ही सोचो कि तुम कहां स्टैंड करते हो. हर गुजरते दिन के साथ तुम्हारे और नौकरी के बीच का फासला बढ़ेगा ही, कम नहीं होगा.’’

और मिश्राजी के बात खत्म करते ही दीपक उन के केबिन से बाहर निकल गया.

अपने भन्नाए हुए दिमाग को काबू में करने के लिए वह मिश्राजी के औफिस के पास लगी चाय की रेहड़ी पर चाय पीने लगा था. अभी उस ने चाय के एकदो सिप ही लिए थे कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी.

उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर देखा. स्क्रीन पर ‘पापा’ फ्लैश होता देख उस का सारा वजूद सुलग उठा. एकबारगी को उस ने सोचा कि क्यों न कौल को इग्नोर कर दे, लेकिन फिर पता नहीं जाने क्या सोच कर उस ने कौल रिसीव कर ली.

अभी राजेंद्र बाबू ने उधर से ‘हैलो’ ही कहा था कि दीपक के मुंह से शब्दों का सैलाब फूट पड़ा.

‘‘आप कुछ समझते भी हैं? क्या जरूरत थी आप को यह सब करने की?’’ भभकते स्वर में वह कहता चला गया, ‘‘जब आप की जेब में देने के लिए दो पैसे नहीं हैं तो फिर मुझे क्यों भेजते हो ऐसी जगहों पर बेइज्जती कराने को? आप नहीं समझ सकते कि मुझे कितनी इन्सल्ट महसूस हो रही थी जब आप अपने फालतू के आदर्शों के चक्कर में मिश्रा अंकल से बहस कर रहे थे.

‘‘आप कब समझेंगे इस बात को कि आप के आदर्श आप के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि दूसरा भी उन को उतना ही महत्त्वपूर्ण समझता हो. आप को नहीं समझ में आता कि आप की इन फालतू की बहसबाजियों के चक्कर में हमारे हर उस इंसान से, जो हमारे काम आ सकता है, संबंध खराब होते चले जा रहे हैं. भले ही आप को इन सब बातों की कोई परवा न हो लेकिन मुझे है. जानते हैं, चलते वक्त मिश्रा अंकल ने मुझ से क्या कहा?’’

सांस लेने के लिए रुका दीपक. इस दौरान फोन पर सन्नाटा पसरा रहा. एक गहरा सन्नाटा.

क्षणिक अंतराल के बाद दीपक ने फिर से मोरचा संभालते हुए कहा, ‘‘उन का कहना था कि राजेंद्र्र को समझने की जरूरत है कि उस की औलाद यानी कि मैं कोई इतना काबिल इंसान नहीं हूं जो मुझे बिना लिएदिए कोई सरकारी नौकरी मिल जाएगी और अगर राजेंद्र ने अपनेआप को नहीं बदला तो नौकरी मेरे लिए एक ख्वाब बन कर रह जाएगी. मैं जानता हूं कि मिश्रा अंकल ने जो कुछ कहा है उस से आप को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मुझे पड़ता है, इसलिए आप से गुजारिश है कि आप आज अभी से मेरे मामलों में दखल देना बंद कर दें. मुझे जो करना होगा, खुद कर लूंगा.

‘‘आप को मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. मेरे लिए अब आप कुछ मत करना और अगर कुछ करने का बहुत ही ज्यादा मन करे तो यह सोच कर अपने मन को मना लेना कि आप का कोई बेटा नहीं है. अगर कोई था भी तो वह कब का मरखप गया है. प्लीज, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो. नमस्ते.’’ अपनी भड़ास निकालने के बाद उस ने कौल डिस्कनैक्ट करने के साथ फोन को स्लीप मोड में डाल दिया.

पक्षी की बीट माथे पर गिरते ही दीपक की नींद एक झटके में खुल गई.

वह एक झटके में हड़बड़ा कर उठा. पहले तो कुछेक क्षण उसे समझ में ही नहीं आया कि वह कहां है और उस के साथ क्या हुआ है? उस ने अपने चारों ओर देखा तो फिर उस की समझ में आया कि वह उसी पार्क में उसी पेड़ के नीचे सोया पड़ा था जहां वह मिश्राजी से मिलने उन के औफिस में जाने से पहले लेटा हुआ था. उसे याद आया कि मिश्राजी के औफिस के बाहर चाय की रेहड़ी पर चाय पीते हुए फोन पर पापा से मन की भड़ास निकालने के बाद सीधा यहीं आ गया था और यहां पेड़ के नीचे लेट कर सोचतेसोचते कब उस की आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

उस ने जेब से रूमाल निकाल कर माथे पर गिरी बीट को साफ किया और एक बार फिर माहौल का मुआयना किया. सूरज कब का डूब चुका था और शाम अब रात की आगोश में समाती चली जा रही थी. उस ने समय देखने के लिए मोबाइल निकाला तो यह देख कर बुरी तरह से चौंक पड़ा कि उस के मोबाइल पर 30 मिस्ड कौल्स दर्ज थीं.

उसे याद आया कि पापा से बात करने के बाद उस ने मोबाइल को स्लीप मोड में डाल दिया था, इसलिए उसे इन कौल्स का पता ही नहीं चला.

उस ने हड़बड़ाते हुए फटाफट कौल्स की डिटेल चैक कीं तो पता चला कि इन 30 मिस्ड कौल्स में से कुछ उस की मां और बहन की हैं और बाकी उस के दोस्तों, पापा के औफिस कुलीग्स और दोस्तों की हैं.

न जाने क्यों उस का दिल अनजानी आशंकाओं से बुरी तरह से धड़कने लगा था.

धड़कते दिल और कांपते हाथों से उस ने अपने दोस्त को कौलबैक किया. जैसेजैसे फोन की घंटी बजती जा रही थी वैसेवैसे उस के दिल की धड़कनें और बेचैनी बढ़ती जा रही थीं.

और फिर जैसे ही दोस्त ने कौल रिसीव की तो उसे ऐसा लगा जैसे सबकुछ थम सा गया हो, यहां तक कि शायद उस के दिल की धड़कनें भी.

वह कुछ कह पाता, उस से पहले ही दोस्त का उद्विग्न और बदहवास सा स्वर उस के कानों में पड़ा, ‘‘कहां है तू? फोन क्यों नहीं उठा रहा?’’

दोस्त के स्वर ने उस के रहेसहे हौसले भी पस्त कर दिए और बड़ी मुश्किल से हकलातेहकलाते उस के मुंह से दो शब्द निकल सके, क्या हुआ?’’

और जवाब में दोस्त ने जो कुछ बताया उसे सुनते ही उस के मुंह से ‘क्या’ एक चीख के से स्वर में निकला और मोबाइल उस के हाथ से छूट कर गिर गया.

भले ही उस की आंखों में गीलापन उभरने लगा था लेकिन फिर भी उस को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो कुछ उस ने सुना है या दोस्त ने जो कुछ कहा है वह सच है कि उस के पालनकर्ता, उस के पापा राजेंद्र बाबू जिन्हें अब से कुछ देर पहले तक वह अपनी हर परेशानी का जिम्मेदार मानता था, इस दुनिया में अब नहीं रहे.

जमीन पर गिरे मोबाइल से अभी भी दोस्त की ‘हैलोहैलो’ की आवाज आ रही थी.

जिन के जीतेजी, जिन्हें वह अपनी हर परेशानी और समस्या का कारण समझता था, उन के जाने की खबर सुनते ही पता नहीं क्यों उसे ऐसा लगने लगा था जैसे किसी ने उस का सबकुछ छीन लिया हो और अपना सबकुछ लुटा चुकने के बाद वह एकदम असहाय सा हो चुका हो.

कांपते हाथों से उस ने मोबाइल उठाया और उस के रुंधे गले से केवल यही अल्फाज निकल सके, ‘‘आ रहा हूं.’’ और फिर वह फूटफूट कर रोने लगा.

जैसे ही दीपक का रिकशा गली में घुसा, उसे अपने मकान के सामने लगा तंबू और लोगों का जमघट नजर आने लगा.

दीपक ने रिकशा वहीं गली के छोर पर ही छोड़ दिया और पैदल ही अपने घर की ओर बढ़ चला.

दीपक को आता देख उस के परिचित और दोस्त उस की ओर लपके और उस के घर पहुंचने से पहले ही थाम लिया. एकाधदो को छोड़ कर जिन्होंने दबे स्वर में उस की अब तक अनुपस्थिति और उस के मोबाइल के कनैक्ट न हो पाने के बारे में सवाल किया था, बाकी सभी ने मौन रह कर बारीबारी से उस के कंधे, हाथ, बांहें इत्यादि थाम कर आंखों ही आंखों से अपनी संवेदना प्रकट की.

घर के बाहर पहुंच कर वह थमक कर खड़ा हो गया. घर के भीतर से निकल कर उस के कानों से टकराते मां और अन्य परिचित महिलाओं के करुणक्रंदन के स्वर ने उसे विचलित कर दिया था. उस की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह घर के भीतर प्रवेश कर सके, लेकिन भीतर तो जाना ही था.

अभी उस ने भीतर जाने के लिए पहला कदम उठाया ही था कि भीतर से निकलते हुए रहमान अंकल ने उसे थामते हुए उस के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मैं तेरा ही इंतजार कर रहा था. अच्छा हुआ जो तू मुझे यहीं मिल गया. भीतर चलने से पहले जरा मेरे साथ साइड में चल, मुझे तुझ से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

रहमान, राजेंद्र बाबू के औफिस में उन के सीनियर औफिसर थे.

दीपक को याद आया कि 30 मिस्ड कौल्स में से कम से कम 5 मिस्ड कौल्स तो अकेले रहमान अंकल की ही थीं.

एकबारगी को दीपक की समझ में नहीं आया कि वह क्या करें लेकिन फिर भी वह चेहरे पर असमंजस के भाव लिए रहमान अंकल के साथ एक साइड में चल पड़ा.

उन दोनों को इस तरह एकांत में एक साइड में जाता देख एकदो खास रिश्तेदारों और परिचितों ने पीछे आने की कोशिश की तो रहमान ने विनम्रता से उन्हें रोकते हुए कहा, ‘‘अगर आप लोग बुरा न मानें तो प्लीज, हम लोग 2 मिनट बात कर लें?’’

समझदार को इशारा काफी होता है, पीछे आने वाले लोग वहीं से वापस लौट गए.

एकांत में पहुंचते ही दीपक ने सब से पहले अपना वही प्रश्न रहमान से पूछ लिया जो उसे अभी तक परेशान कर रहा था, ‘‘आखिर हुआ क्या पापा को? अच्छेभले तो थे?’’

‘‘डाक्टर का कहना है कि सडन मैसिव हार्ट अटैक हुआ है.’’ रहमान अंकल ने जवाब दिया, ‘‘तीनसाढ़ेतीन बजे की बात है. मैं तो उस समय अपने केबिन में था. राजेंद्रजी के पड़ोसी का कहना है कि वे फोन पर किसी से बात कर रहे थे. उस का कहना है कि उसे यह तो नहीं पता कि राजेंद्रजी की फोन पर किस से और क्या बात हुई लेकिन उस ने यह जरूर नोट किया कि फोन पर बात खत्म होने के बाद वे बड़े परेशान से हो उठे थे, इतने परेशान कि बेचैनी में उठ कर टहलने लगे थे. उस ने पूछा भी कि क्या बात है लेकिन उन्होंने उसे टाल दिया और फिर टहलतेटहलते ही एकाएक धड़ाम से गिर पड़े. हम लोग फटाफट इन्हें ले कर अस्पताल भागे जहां डाक्टर ने इन्हें चैक करते ही ‘नो मोर’ कह दिया. उस के बाद हम ने तुम्हें फोन करने की कोशिश की तुम्हारा तो फोन ही नहीं लग रहा था. क्या हो गया था तुम्हारे फोन को और अब तक कहां थे तुम?’’

भला दीपक क्या जवाब देता रहमान को उन की बातों का. रहमान की बात सुनते ही उस का खुद का कलेजा मुंह को आ गया था. भले ही रहमान और राजेंद्र बाबू के अन्य सहकर्मी न जानते हों लेकिन दीपक से बेहतर कौन यह समझ सकता था कि वह फोन कौल जिस के बाद यह हादसा हुआ किस की थी. उसे लगने लगा कि जानेअनजाने ही सही लेकिन अपने पापा की मौत का जिम्मेदार वह खुद है. मन में यह खयाल आते ही कि अपने पापा की मौत का जिम्मेदार कहीं न कहीं वह खुद ही है, दीपक के मन में आत्मग्लानि का तूफान सा उमड़ने लगा और एक बार फिर से उस की आंखें भरने लगीं.

जब कुछ देर तक रहमान को अपने प्रश्नों का जवाब नहीं मिला तो वह समझ गया कि दीपक जवाब नहीं देना चाहता है, लिहाजा, उन्होंने ज्यादा कुरेदने के बजाय उस मुद्दे की बात पर आना ज्यादा बेहतर समझ जिस के लिए वे दीपक को यहां एकांत में लाए थे.

‘‘देखो बेटे, जो होना था वह हो चुका. जाने वाले वापस नहीं आया करते,’’ रहमान ने गंभीर स्वर में बात शुरू करते हुए कहा, ‘‘हो सकता है कि मेरी बात सुन कर तुम्हें बहुत बुरा लगे और हो सकता है कि तुम यह सोचने लगो कि कितने नीच इंसान हैं रहमान अंकल जो इस मौके पर जब मेरे बाप की मिट्टी मेरे घर पर पड़ी है, मुझ से ऐसी बातें कर रहे हैं.’’

आत्मग्लानि में सिर झकाए अपने खयालों में डूबे दीपक को रहमान अंकल की बात सुन कर एक झटका सा लगा. उस ने एक झटके से सिर उठा कर रहमान अंकल की ओर देखा.

‘‘मेरी बात का बुरा मत मानना, बेटे. लेकिन तुम्हारे बाप की मौत के मातम के पीछे तुम्हारी आने वाली जिंदगी की खुशियां छिपी हैं.’’ रहमान ने दीपक की आंखों में आंखें डाल कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राजेंद्रजी की मौत औन ड्यूटी हुई है और नियमों के मुताबिक उन की जगह पर तुम्हें अनुग्रह के आधार पर नौकरी मिल सकती है. मैं हैड औफिस से सारी बातें कर चुका हूं. तुम राजेंद्रजी का संस्कार और अन्य रिचुअल करने के बाद जितना जल्दी हो सके, औफिस में आ कर मुझ से मिलो, तब तक मैं सारी तैयारी कर के रखता हूं. अगर सबकुछ ठीक रहा तो हो सकता है कि राजेंद्रजी की तेरहवीं से पहले नियुक्तिपत्र तुम्हारे हाथ में होगा.’’

अपनी बात खत्म करने के बाद रहमान अंकल ने दीपक का कंधा थपथपाया और वापस चल दिए.

अपने से दूर जाते हुए रहमान अंकल की पीठ को देखते हुए दीपक के दिमाग में केवल एक ही प्रश्न कौंध रहा था कि वह अपने बाप की मौत का मातम मनाएं या अपने को नौकरी मिलने का जश्न?

मुफ्त के कंडोम में टैक्स, चीन ने ऐसा क्यों किया ?

चीन ने 30 साल बाद कंडोम और गर्भनिरोधक दवाओं पर वैल्यू एडेड टैक्स यानी वीएटी लगाने का फैसला किया है. दुनिया के दूसरे देश कंडोम को टैक्सफ्री रखते हैं जिस से एड्स जैसी गंभीर बीमारियों को रोका जा सके वहीं चीन ने कंडोम पर टैक्स लगा दिया है. इस के पीछे कारण यह है कि चीन अपने देश के घटते बर्थ रेट से परेशान है. चीन लगातार बूढ़ों का देश बनता जा रहा है. पहले चीन ने लोगों को कम बच्चे पैदा करने पर जोर दिया, अब युवा खुद ही बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे. चीन को लगता है कि इस समस्या की तह में कंडोम का सस्ता होना भी एक बड़ी भूमिका है, इसलिए उस ने कंडोम पर टैक्स लगा दिया.

चीन में सोशल मीडिया के प्लेटफौर्म्स पर बहस छिड़ी है कि इस से असुरक्षित सैक्स बढ़ेगा जिस से एचआईवी जैसी बीमारियां फैलेंगी. वहीं कुछ यूजर्स कहते हैं, ‘अगर कंडोम नहीं खरीद सकते तो बच्चा कैसे पालेंगे?’

जन्मदर बढ़ाने के लिए चीन कई नीतियां लागू कर चुका है. पेरैंट्स को कैश देने से ले कर चाइल्ड केयर और लंबी छुट्टियों की भी घोषणा की गई है. सरकार ने तो उन अबौर्शन को कम करने की गाइडलाइन भी जारी की जो डाक्टर की नजर में जरूरी नहीं है.

चीन की आबादी 3 वर्षों से लगातार सिकुड़ रही है. 2024 में केवल 9.54 मिलियन बच्चे पैदा हुए जो 2016 से आधे से भी कम हैं. इस से कामगारों की कमी हो रही है और बुजुर्ग आबादी का बोझ बढ़ रहा है. 1993 में, जब एक-बच्चा नीति सख्ती से लागू की गई थी तो कंडोम को टैक्स से छूट दी गई थी ताकि जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा मिले. अब, सरकार जन्मदर बढ़ाने के लिए हर कदम उठाने को तैयार है. टैक्स लगा कर कंडोम की कीमत बढ़ाना भी जन्मदर को सुधारने का एक तरीका है लेकिन महंगे कंडोम से जन्मदर नहीं बढ़ेगी क्योंकि चीन में 18 साल तक बच्चा पालने की लागत 76 हजार डौलर से ज्यादा है. चीन को इस पर ध्यान देने की जरूरत है. Hidden Pain Of Father :

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