Venezuela Crisis :

शांति का दावा, युद्ध की राह – वेनेजुएला में अमेरिकी दखल का सच

अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास इस सच्चाई का गवाह रहा है कि जहां भी अपार प्राकृतिक संसाधन हैं, वहां लोकतंत्र, मानवाधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा॔ जैसे शब्दों का जाल बिछा कर वह उन संसाधनों को अपने कब्जे में लेने के लिए सैन्य कार्रवाइयां करता रहा है. वेनेजुएला का मामला इसी परंपरा की अगली कड़ी है.

शांति के पहरेदार का मुखौटा उतर चुका है. नोबेल की हसरत में “युद्ध रोकने” का दम भरने वाले ट्रम्प अब वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उन के शयनकक्ष से घसीट कर न्यूयौर्क की जेल तक ले जाने वाली ताक़त का प्रदर्शन कर रहे हैं. यह कहानी लोकतंत्र की आड़ में तेल, ताक़त और तानाशाही मानसिकता के उस गुप्त गठजोड़ की है, जो पूरी वैश्विक व्यवस्था को थानेदार बनाम दुनिया की जंग में बदलने पर आमादा दिखता है.

दो महीने पहले तक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प बारम्बार यह राग अलाप रहे थे कि उन्होंने बहुत सारे देशों के बीच जारी युद्ध रुकवा दिए. भारत पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध को रुकवाने का दावा तो उन्होंने कोई पैंतीस-चालीस बार किया होगा, क्योंकि उन्हें शान्ति का नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने की प्रबल इच्छा थी, जब नोबेल पुरस्कार नहीं मिला तो खुद को शान्ति का अग्रदूत समझने वाले ट्रम्प वेनेजुएला जैसे छोटे से देश पर पिल पड़े, और वहां के राष्ट्रपति को उन के बैडरूम से घसीटते हुए न्यूयौर्क ले गए.

3 जनवरी, 2026 को अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई की और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उन की पत्नी को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर नशीले पदार्थों से जुड़े आतंकवादी साजिश, यानी नार्को-टेररिज्म में शामिल होने का आरोप लगाया गया और उन्हें न्यूयौर्क की जेल में कैद कर दिया गया.

इस सैन्य कार्रवाई के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का अहंकार अपनी चरम पर है. बेलगाम ट्रम्प अब अन्य देशों को डराने-धमकाने और भारत पर टैरिफ बढ़ाने की चेतावनी दे रहे हैं. यह हरकत ट्रम्प की तानाशाही मानसिकता को उजागर कर रही है.

डोनाल्ड ट्रम्प का व्यवहार उस थानेदार के जैसा है जो हाथ में रूल ले कर विश्व को अपने हिसाब से चलाने का मंसूबा लेकर निकला हो. ट्रम्प को ऐसा लग रहा है जैसे उन के कृत्यों से अमेरिका का दबदबा और साख बढ़ रही हो, मगर हकीकत यह है कि ट्रम्प दुनियाभर में अमेरिका की फजीहत करा रहे हैं. अमेरिका सिर्फ अपनी साख ही नहीं गंवा रहा है, बल्कि एक ऐसे गैर जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में उभर रहा है जो विश्व-व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दुनिया को अराजकता की ओर धकेल रहा है. खुद अमेरिकी नागरिक ट्रम्प के विरोध में सड़क पर उतर पड़े हैं.

दुनियाभर में जिस तरह का डर और अराजकता डोनाल्ड ट्रम्प फैला रहे हैं, उस के दुष्परिणाम अमेरिका के नागरिकों को भोगने होंगे. विश्व के अधिकांश देश ट्रम्प के व्यवहार के कारण अमेरिका से दूरी बना चुके हैं. यही वजह है कि अब अमेरिका उतना सशक्त नहीं रह गया है, जितना पहले था. ट्रम्प का मनमानापन दुनिया के दूसरे देशों को उनके खिलाफ एकजुट कर रहा है और यह स्थिति अमेरिका के लिए खतरनाक है.

Venezuela Crisis (2)
अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उन की पत्नी सिलिया फ्लोर्स को गिरफ्तार कर लिया. सेना के दम पर दुनिया के थानेदार बन रहे डोनाल्ड ट्रंप असल में अमेरिका को ही कमजोर कर रहे हैं.

ट्रम्प प्रशासन ने वेनेजुएला में लोकतंत्र बहाली को अपनी सैन्य कार्रवाई का औचित्य बताया है, लेकिन ट्रम्प की आक्रामक नीति, चाहे वह सैन्य दबाव हो, कड़े आर्थिक प्रतिबंध हों या सत्ता-परिवर्तन की खुली वकालत, अमेरिका के भीतर ही तीखी आलोचना का विषय बनी हुई है.

अमेरिका पर उठते सवाल

यह आलोचना केवल विपक्षी डेमोक्रेटिक खेमे तक सीमित नहीं है; रिपब्लिकन पार्टी के भीतर, नीति-विशेषज्ञों, मानवाधिकार संगठनों और आम नागरिकों के बीच भी इस नीति की नैतिकता, वैधानिकता और व्यावहारिकता पर गंभीर प्रश्न उठे हैं.

अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि किसी संप्रभु देश के राष्ट्रपति को बलपूर्वक गिरफ्तार कर तीसरे देश में कैद करना संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय न्याय की बुनियादी अवधारणाओं के खिलाफ है. लोकतंत्र की दुहाई देकर की गई यह कार्रवाई वस्तुतः लोकतांत्रिक मूल्यों को ही कमजोर करती है, क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा बमों और धमकियों से नहीं, बल्कि संवाद, संस्थागत सहयोग और अंतरराष्ट्रीय सहमति से होती है.

वेनेजुएला के मामले में भी यही हुआ. वर्षों से आर्थिक प्रतिबंधों और कूटनीतिक दबाव से जूझ रहे इस देश को सैन्य हस्तक्षेप के जरिए “सबक” सिखाने की कोशिश ने लैटिन अमेरिका में अमेरिका-विरोधी भावनाओं को और तेज कर दिया है. जिस क्षेत्र में कभी अमेरिकी प्रभाव निर्णायक माना जाता था, वहां अब अविश्वास और प्रतिरोध का माहौल बन रहा है.

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस तरह की कार्रवाइयां एक खतरनाक मिसाल कायम करती हैं. यदि शक्तिशाली देश अपने हितों के नाम पर किसी भी कमजोर देश की संप्रभुता रौंदने लगें, तो वैश्विक व्यवस्था का आधार ही ढह जाएगा. आज वेनेजुएला है, कल कोई और देश होगा. यह सिलसिला अंततः अंतरराष्ट्रीय अराजकता को जन्म देगा, जिसमें किसी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं रहेगी, यहां तक कि स्वयं अमेरिका की भी नहीं.

Venezuela Crisis (1)
डोनाल्ड ट्रंप की मनमानी के चलते कई देश उन के खिलाफ हो चुके हैं. निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद वेनेजुएला की जनता ने सड़कों पर उतर कर ट्रंप के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया.

ट्रम्प का यह रवैया भारत जैसे मित्र देशों के साथ संबंधों को भी प्रभावित कर रहा है. टैरिफ की धमकियां, एकतरफा फैसले और सार्वजनिक रूप से दबाव बनाने की राजनीति यह संकेत देती है कि ट्रम्प प्रशासन साझेदारी नहीं, अधीनता चाहता है. यही कारण है कि कई देश अब वैकल्पिक गठबंधनों और नई कूटनीतिक धुरियों की तलाश में जुट गए हैं.

इतिहास गवाह है कि महाशक्तियां केवल सैन्य ताकत या आर्थिक दबाव से नहीं टिकतीं. उन की असली शक्ति उन की नैतिक विश्वसनीयता, भरोसेमंद साझेदारियों और नियम-आधारित व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता से आती है. यदि अमेरिका इस रास्ते से भटक रहा है, तो उस का नुकसान केवल वैश्विक स्तर पर नहीं, बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी होगा, जहां सामाजिक विभाजन, असंतोष और विरोध और गहरे होंगे.

अंततः सवाल यह है कि क्या दुनिया को एक ऐसे “थानेदार” की जरूरत है जो रूल ले कर सब को डराता फिरे, या फिर एक ऐसे नेतृत्व की जो संवाद, सहयोग और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करे. डोनाल्ड ट्रम्प की वर्तमान नीतियां पहले विकल्प की ओर इशारा करती हैं. यदि समय रहते अमेरिका ने आत्ममंथन नहीं किया, तो यह अहंकार न केवल वेनेजुएला या किसी और देश के लिए, बल्कि स्वयं अमेरिका के भविष्य के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है.

अमेरिकी विदेश नीति का इतिहास इस सच्चाई का गवाह रहा है कि जहां भी अपार प्राकृतिक संसाधन हैं, वहां “लोकतंत्र”, “मानवाधिकार” और “राष्ट्रीय सुरक्षा” जैसे शब्द अक्सर सैन्य या राजनीतिक दखल के औजार बन जाते हैं. वेनेजुएला का मामला इसी परंपरा की अगली कड़ी है. दुनिया के सब से बड़े तेल भंडार वाले देश पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई उसकी नीयत पर शक पुख्ता करती है.

वेनेजुएला के पास दुनिया का सब से बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है. मुख्यतः ओरिनोको बेल्ट में स्थित भारी कच्चा तेल. यही संपदा उसे वैश्विक ऊर्जा राजनीति के केंद्र में लाती है. परंतु यही तेल देश की संप्रभुता पर बाहरी ताकतों की निगाह भी टिकाए रखता है. अमेरिका दशकों से वेनेजुएला के तेल का बड़ा उपभोक्ता रहा है और उस की रिफाइनरियां विशेष रूप से वेनेजुएला के भारी तेल के अनुरूप ढली रही हैं.

इस तेल के लालच के चलते ‘लोकतंत्र बहाली’ की आड़ में डोनाल्ड ट्रम्प लगातार वेनेजुएला की आर्थिक घेराबंदी में जुटे हैं. उन्होंने वेनेजुएला पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगाए. सरकारी तेल कंपनी को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार से काटना, बैंकिंग लेन-देन रोकना और तेल निर्यात पर शिकंजा कसना, ये सारे कदम सीधे तौर पर वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने वाले थे. ट्रम्प ने दावा किया कि ये प्रतिबंध “लोकतंत्र की बहाली” के लिए हैं, पर व्यवहार में इससे आम नागरिकों की जिंदगी बदतर हुई और सरकार पर तेल बेच कर सांस लेने के रास्ते बंद कर दिए गए.

तेल पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए ट्रम्प ने सत्ता परिवर्तन की राजनीति खेली. ट्रम्प प्रशासन ने वेनेजुएला की वैध सरकार को दरकिनार कर विपक्षी नेतृत्व को मान्यता दी. निकोलस मादुरो की सरकार को “अवैध” ठहराने का नैरेटिव उसी रणनीति का हिस्सा है, जिस के तहत सत्ता परिवर्तन के बाद तेल क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों की वापसी आसान हो सके. पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच लैटिन अमेरिका, विशेषकर वेनेजुएला, एक आकर्षक विकल्प है.

वेनेजुएला पर ट्रम्प काल का दबाव यह संकेत देता है कि तेल आज भी वैश्विक राजनीति का सब से शक्तिशाली प्रेरक तत्व है. लोकतंत्र और मानवाधिकार की भाषा तब खोखली लगती है, जब उस के पीछे संसाधनों की भूख साफ़ झलकती हो. ज़रूरत इस बात की है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय संसाधनों की राजनीति से ऊपर उठ कर संप्रभुता, संवाद और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे – वरना हर तेल-सम्पन्न देश अगला वेनेजुएला बन सकता है.

सब से ज्यादा तेल भंडार वाले देश की दुर्दशा

वेनेजुएला के पास सऊदी अरब से भी ज्यादा तेल है, लेकिन पिछले एक दशक में उस ने अपनी 80% जीडीपी गंवा दी. कभी दुनिया के सब से अमीर देशों में शामिल इस देश ने अपनी दौलत का ऐसा मिसमैनेजमेंट किया कि आज वहां के लोग देश छोड़ रहे हैं.

1950 के दशक में जब आधी दुनिया दूसरे विश्व युद्ध के नुकसान से उबर रही थी, तब वेनेजुएला की किस्मत जमीन के नीचे से निकलने वाले काले सोने यानी तेल ने बदल दी थी. 1952 में वेनेजुएला दुनिया का चौथा सब से अमीर देश था. राजधानी काराकस की सड़कों पर उस समय लग्जरी कारें दौड़ती थीं और पूरे देश में गगनचुंबी इमारतें खड़ी थीं. 1960 के दशक तक वेनेजुएला सिर्फ तेल बेचने वाला देश नहीं रहा बल्कि वेनेजुएला की ही पहल पर सऊदी अरब और ईरान जैसे देशों ने हाथ मिलाया और ‘ओपेक’ की नींव रखी.

उल्लेखनीय है कि ओपेक पेट्रोलियम निर्यातक देशों का एक संगठन है, जिस की स्थापना 1960 में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला ने की थी, और इस का मुख्यालय वियना, औस्ट्रिया में है, जिस का मुख्य उद्देश्य तेल की कीमतों को स्थिर करना और तेल की कुशल, आर्थिक और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना है, जिस से वैश्विक तेल बाजार पर प्रभाव पड़ता है. यह दुनिया के तेल उत्पादन और भंडारण का एक बड़ा हिस्सा नियंत्रित करता है और सदस्य देशों के पेट्रोलियम हितों की रक्षा करता है.

1970 के दशक में जब पूरी दुनिया में तेल संकट आया और कीमतें आसमान छूने लगीं थीं तब वेनेजुएला के घरों में डौलर की बारिश हो रही थी. उस दौर के किस्से आज भी मशहूर हैं. कहते हैं तब लोग वीकेंड पर शौपिंग करने के लिए सीधे मियामी उड़ कर जाते थे. वेनेजुएला दुनिया के सब से महंगे स्कौच व्हिस्की और शैंपेन के सब से बड़े खरीदार में से एक था. जनता को लगने लगा था कि अब मेहनत करने की जरूरत नहीं है क्योंकि उस वक्त वेनेजुएला में प्रति व्यक्ति आय स्पेन, ग्रीस और इजराइल जैसे विकसित देशों से भी कहीं ज्यादा थी.

1976 में सरकार ने तेल इंडस्ट्री का राष्ट्रीयकरण कर दिया और सरकारी कंपनी पेट्रोलियोस डी वेनेजुएला, एस.ए बनाई. यह दुनिया की सब से मुनाफे वाली तेल कंपनियों में से एक थी. वेनेजुएला ने अपनी पूरी ताकत सिर्फ तेल निकालने में लगा दी. उन्होंने खेती, फैक्ट्री और दूसरे बिजनेस पर ध्यान ही नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि सूई से ले कर खाने तक के लिए वे दूसरे देशों पर निर्भर हो गए और तेल के बदले सामान खरीदने लगे.

1999 के बाद सरकार ने देश के भविष्य के लिए निवेश करने के बजाय मुफ्त योजनाओं में पैसा उड़ा दिया. जब तक तेल महंगा था, तब तक सब ठीक रहा, लेकिन जैसे ही तेल की कीमतें गिरीं, सरकार के पास सैलरी देने तक के पैसे नहीं बचे. भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी ब्रेन ड्रेन सरकार ने सरकारी तेल कंपनी में काबिल इंजीनियरों को हटा कर राजनीतिक वफादारों को भर दिया. इस से तेल उत्पादन की तकनीक खराब हो गई और देश के 60 लाख से ज्यादा पढ़ेलिखे लोग (डाक्टर, इंजीनियर) देश छोड़ कर अन्य देशों की ओर पलायन कर गए.

2018 के आतेआते वेनेजुएला में महंगाई की रफ्तार 1,30,000% के पार हो गई. वहां के लोग एक दर्जन अंडे खरीदने के लिए भी नोटों से भरा झोला ले जाने को मजबूर हो गए. 1990 के दशक के आखिर तक जो देश रोजाना 35 लाख बैरल तेल निकालकर दुनिया पर राज करता था, वह आज 2026 की शुरुआत तक बमुश्किल 8 से 11 लाख बैरल पर सिमट गया है. सरकारी तेल कंपनी मेंटेनेंस के अभाव में कबाड़ हो चुकी हैं और गाड़ियां चलाने के लिए पेट्रोल तक विदेशों से मंगाया जा रहा है.

वेनेजुएला अपनी 80% जीडीपी गंवा चुका है. यानी, अगर 2012 में देश की अर्थव्यवस्था 100 रुपए की थी, तो आज वह सिर्फ 20 रुपए की बची है. इस बर्बादी का सब से डरावना चेहरा बन कर उभरी वहां की महंगाई, जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में ‘हाइपरइन्फ्लेशन’ कहते हैं. यह इतिहास में बिना किसी युद्ध के किसी देश की अर्थव्यवस्था का सब से बड़ा कोलैप्स है. पिछले एक दशक में इस देश ने वह सब खो दिया जो उस ने 70 सालों में कमाया था.

अमेरिका-विरोधी देशों में डर और चिंता

वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद दुनियाभर के अमेरिका-विरोधी देशों में डर और चिंता बढ़ गई है. अमेरिका ने जिस तरह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उन के बेडरूम में घुस कर गिरफ्तार किया और हथकड़ी डाल कर सीधे न्यूयौर्क ले गए, उस से वैश्विक राजनीति में हलचल तेज हो गई है. कई देशों के सत्ता प्रमुख आशंकित हैं कि कहीं अमेरिका उन के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई न करे. अमेरिका-विरोधी रुख रखने वाले कई देश अब सतर्क हो गए हैं. इन में से कुछ देशों के नेता अपनी सुरक्षा को ले कर रूस और चीन जैसे शक्तिशाली देशों से संपर्क बढ़ा रहे हैं, ताकि किसी संभावित अमेरिकी कार्रवाई से बचा जा सके.

खामेनेई पर दबाव

ईरान लंबे समय से अमेरिका का खुला विरोध कर रहा है. 1979 की इसलामिक क्रांति के बाद से ही वहां ‘डेथ टू अमेरिका’ जैसे नारे लग रहे हैं. हाल के दिनों में ईरान गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है, जिस से देशभर में बड़े प्रदर्शन हो रहे हैं. इन प्रदर्शनों में अब ‘डेथ टू डिक्टेटर’ के नारे भी सुनाई दे रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इन प्रदर्शनों का समर्थन किया है, जिसे ईरान ने बाहरी साजिश करार दिया है. सर्वोच्च नेता अली खामेनेई ने सख्ती दिखाते हुए आंदोलन को दबाने के आदेश तो दिए हैं, लेकिन उन का दिल इस आशंका से कांप रहा है कि कहीं उन का हाल भी मादुरो जैसा न हो. ख़ामेनेई के रूस जाने की तैयारी की खबरें भी सुनाई देने लगी हैं.

कोलंबिया भी निशाने पर

कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो, जो 2022 में सत्ता में आए और देश के पहले वामपंथी राष्ट्रपति हैं, वो भी अमेरिका के निशाने पर बताए जा रहे हैं. पेट्रो ने डोनाल्ड ट्रंप को युद्ध अपराधी कहा था और अमेरिकी सैनिकों से ट्रंप के आदेश न मानने की अपील की थी. माना जा रहा है कि अमेरिका फिलहाल कोलंबिया में कोई बड़ा कदम उठाने से पहले 2026 के अमेरिकी चुनावों का इंतजार करेगा.

किम जोंग उन की चेतावनी

वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई को ले कर सब से तीखी प्रतिक्रिया उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन की ओर से आई है. हालांकि उत्तर कोरिया तक सीधे पहुंचना अमेरिका के लिए आसान नहीं है, क्योंकि रास्ते में रूस और चीन की सीमाएं आती हैं. इस के अलावा किम के पास परमाणु हथियार होने की वजह से किसी भी अमेरिकी कदम का जवाब बेहद खतरनाक हो सकता है.

क्यूबा का अमेरिका के खिलाफ पुराना मोर्चा

क्यूबा अमेरिका-विरोधी देशों में सब से पुराना नाम है. राष्ट्रपति मिगुएल डियाज कैनल ने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई को राज्य प्रायोजित आतंकवाद कहा. क्यूबा की सड़कों पर बड़े प्रदर्शन हुए और अमेरिकी दूतावास के सामने हजारों लोग जुटे. क्यूबा अब रूस, चीन और ईरान के साथ अपने रिश्ते और मजबूत कर रहा है.

बेलारूस को रूस का आसरा

बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको 1994 से सत्ता में हैं और यूरोप के सब से लंबे समय तक शासन करने वाले नेता हैं. 2025 के चुनाव में उनकी जीत पर भी धांधली के आरोप लगे थे, ठीक वैसे ही जैसे मादुरो पर लगे हैं. लेकिन बेलारूस पर किसी भी हमले को रूस पर हमला माना जाएगा. इसी वजह से अमेरिका के सीधे कदम उठाने की संभावना यहां कम मानी जा रही है.

Venezuela Crisis

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...