सरिता विशेष

10 जनवरी, 2017 दिल्ली : राजधानी में फुटपाथ पर रहने वाली एक किशोरी से गैंगरेप करने के बाद उसे बेबस हालत में छोड़ने की घटना ने झकझोर कर रख दिया. किशोरी  साढ़े 7 माह की गर्भवती थी. रेप के बाद किशोरी ने अस्पताल में एक बच्चे को जन्म दिया. आरोपियों ने किशोरी के साथ फुटपाथ पर ही रेप किया और मरने के लिए उसे वहीं छोड़ दिया.

6 जनवरी, 2017 उत्तर प्रदेश : महिलाओं की सुरक्षा के मामले में हमेशा सवालों के घेरे में रहने वाले उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में 4 हैवानों ने पीडि़ता के साथ रेप की कोशिश की लेकिन जब पीडि़ता ने हिम्मत न हारते हुए अपनी आबरू बचाने के लिए उन का विरोध किया तो सनक में डूबे सिरफिरों ने पीडि़ता के कान काट दिए और फरार हो गए.

4 जनवरी, 2017 : नए साल की बदनुमा शुरुआत हुई  सोनीपत में जहां बर्बरता और कायरता का परिचय देते हुए समाज के वहशी दरिंदों, हत्यारों ने एक बुजुर्ग महिला के प्राइवेट पार्ट में टौयलेट क्लीनर की प्लास्टिक की बोतल डाल दी. लगातार ब्लीडिंग की वजह से उस बुजुर्ग महिला की मौत हो गई. पीडि़ता के शव का पोस्टमौर्टम करने वाले डाक्टरों का मानना है कि उन्होंने इस तरह का क्रूर और बर्बर कृत्य अपने जीवन में नहीं देखा. 80 वर्षीय वृद्धा के साथ निर्भया जैसी बर्बरता अपराधियों के बुलंद होते हौसलों का जीताजागता प्रमाण ही है.

4 जनवरी, 2017 : बेंगलुरु में समाज को शर्मसार करने वाला ऐसा वीडियो सामने आया जो किसी भी सभ्य समाज को स्वीकार नहीं होगा. घर से महज कुछ ही दूरी पर एक लड़की अकेली रात में घर की ओर बढ़ रही थी. तभी 2 लड़के स्कूटर से उस के पीछे से आते हैं और आगे जो कुछ भी होता है वह अत्यंत ही निंदनीय है. लड़की से छेड़खानी करने के बाद उसे सड़क पर बेबस हालत में छोड़ कर वे भाग जाते हैं. छेड़छाड़ के दौरान लड़की बचाव की पूरी कोशिश करती है लेकिन सफल नहीं हो पाती. इस घटना का एक अन्य शर्मनाक पहलू यह था कि छेड़छाड़ के दौरान प्रत्यक्षदर्शियों में से कोई भी लड़की की मदद के लिए आगे नहीं आया.

31 दिसंबर, 2016 : बेंगलुरु की भयावह रात जहां सड़कों पर नए साल का जश्न मनाने निकली कई महिलाओं के साथ मध्य बेंगलुरु के एमजी रोड, ब्रिगेड रोड और चर्च स्ट्रीट पर मनचलों ने महिलाओं से छेड़छाड़ की. मनचलों ने महिलाओं पर न केवल भद्दे कमैंट किए बल्कि उन के साथ शारीरिक छेड़छाड़ करने की भी कोशिश की. मदद की गुहार लगाने पर पुलिस ने ऐसी महिलाओं की मदद से परहेज किया. इन घटना की प्रत्यक्षदर्शी गवाह और बेंगलुरु मिरर की फोटोग्राफर अनंता सुब्रमण्यम ने इस घटना के बारे में ट्वीट कर के कहा था, ‘सड़कों पर ‘हैपी न्यू ईयर’ के शोर की जगह ‘हैल्प मी’ ने ले ली थी.’

23 दिसंबर, 2016 लखनऊ : नवाबों की नगरी लखनऊ जिसे तहजीब और नजाकत की नगरी भी कहा जाता है, वहां इस के मिजाज के उलट 23 दिसंबर की रात हैवानियत का खेल खेला गया. कुछ अज्ञात लोगों ने 7 साल की बच्ची के साथ रेप किया और उसे खून से लथपथ हालत में पुलिस थाने के बाहर छोड़ गए. वारदात साढ़े 3 बजे दिन को हुई जब लड़की पास की दुकान से सामान खरीदने गई थी. मासूम बच्ची पुलिस को थाने के पास झाडि़यों में मिली, उसे तुरंत अस्पताल में भरती कराया गया.

16 दिसंबर, 2012 निर्भया कांड के बाद एक मध्यवर्गीय मानसिकता के साथ ही सही मगर कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक लोग सड़कों पर उतरे थे और इंसाफ की मांग इसलिए की थी कि आज यह किसी और की बेटी के साथ ऐसा हुआ है तो कल हमारी बेटी के साथ भी हो सकता है. उस दौरान पीडि़ता के परिवार के साथ किया गया वादा अभी भी अधूरा है. तमाम कमेटियां बनाई गईं, कानून बने. बावजूद इस के, महिलाओं के खिलाफ दिनोंदिन बढ़ते अपराध निर्भया के बलिदान को मुंह चिढ़ा रहे हैं.

भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के मुताबिक, साल 2015 में भारत में बलात्कार के कुल 34 हजार 651 मामले दर्ज किए गए. बलात्कार पीडि़तों की आयु 6 से ले कर 60 साल तक की थी. इस के अलावा महिलाओं से जुड़े अपराधों की संख्या 3 लाख 27 हजार रही. देश में हर दिन औसतन 93 औरतें बलात्कारियों का शिकार बन रही हैं.

ये आंकड़े यह चीखचीख कर बता देते हैं कि भारत ही नहीं, दुनिया के किसी भी कोने में महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं. पिछले साल 6 अक्तूबर को बीए में पढ़ने वाली एक लड़की ने बिहार के वैशाली के थानाइंचार्ज रंजीत कुमार पर आरोप लगाया कि रंजीत उसे शादी का झांसा दे कर 2 सालों तक उस का यौनशोषण करता रहा. लड़की ने वैशाली थाना में यौनशोषण के लिए एफआईआर दर्ज करा दी है.

लड़की ने एफआईआर में लिखा है कि एक बार वह छेड़खानी की रिपोर्ट दर्ज कराने थाने गई थी. उस के बाद केस की जांच के बहाने रंजीत कुमार रोज उस के मोबाइल फोन पर कौल करने लगा और काफी देर तक बातें करता रहता. केस के सिलसिले में उसे कई दफे थाना बुलाया और कई दफे रंजीत उस के घर पर भी पहुंच गया. इसी दौरान दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और बात विवाह तक पहुंच गई. विवाह करने की बात कह कर रंजीत ने 2 सालों तक उस के शरीर से खिलवाड़ किया और बाद में मुकर गया.

आम इंसान तो दूर, पढ़ेलिखे और समझदार लोग भी यौनशोषण के शिकार हो जाते हैं. साल 2015 के जनवरी महीने में बिहार के भभुआ जिले की महिला डीएसपी, निर्मला कुमारी (2006 बैच की बिहार पुलिस सेवा की औफिसर) ने कैमूर के एसपी, पुष्कर आनंद (2009 बैच के आईपीएस औफिसर) पर उस से विवाह करने का झूठा भरोसा दे कर अंतरंग संबंध बनाने का आरोप लगा कर बिहार सरकार और पुलिस मुख्यालय में हड़कंप मचा दिया था. सूबे में किसी महिला पुलिस औफिसर के अपने ही सीनियर औफिसर पर यौनशोषण करने का आरोप मढ़ने का पहला वाकेआ सामने आया था. डीएसपी ने भभुआ के महिला थाने में दर्ज एफआईआर में एसपी पर यौनशोषण का आरोप लगाया और यह भी लिखा कि जब उस ने शादी से मुकरने का उस का विरोध किया तो एसपी ने कैरियर खराब करने की धमकी दे कर उस का मुंह बंद करने की पुरजोर कोशिश की.

निर्मला ने एसपी के पिता उमाकांत मेहता और माता के खिलाफ भी आईपीसी की धारा 376 (2)बी, 120 (बी) 354 (ए), 354 (डी) और 509 के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई थी.

निर्मला ने एफआईआर में कहा कि एसपी पुष्कर आनंद ने उस के जौइन करने के 2 दिनों के बाद से ही फेसबुक और व्हाट्सऐप के जरिए उस से दोस्ती और नजदीकी बढ़ानी शुरू कर दी थी. कुछ दिनों बाद एसपी ने उस से विवाह करने की इच्छा जाहिर की और उन्होंने अपने घर वालों को भी इस बारे में बताया. उस के बाद एसपी के घर वालों ने उस की जन्मकुंडली मांगी थी. दोनों के विवाह की बात आगे बढ़ने के बाद दोनों और नजदीक आए. विवाह की बात के आगे बढ़ने के बाद दोनों के बीच अंतरंग रिश्ते भी बने.

जन्मकुंडली देने के कुछ दिनों के बाद ही जब महिला पुलिस औफिसर के परिवार वालों ने एसपी के परिवार वालों से मिल कर विवाह की तारीख पक्की करने के बारे में बात की तो यह कह कर विवाह से इनकार कर दिया गया कि पुष्कर और निर्मला की जन्मकुंडली मिली ही नहीं. इस वजह से दोनों की शादी मुमकिन ही नहीं है.

एसपी ने सफाई दी थी निर्मला काम के सिलसिले में अकसर उन के चैंबर में आतीजाती थी. इसी बीच लगता है कि उसे किसी बात को ले कर गलतफहमी हो गई. कुछ समय के बाद इसी बीच निर्मला ने उन से शादी की बात की,

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पर उन्होंने इस की अनदेखी कर दिया. इस के बाद भी वह मौकेबेमौके शादी की इच्छा जाहिर करती रही. बाद में उस ने शादी के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया.

एसपी का दावा है कि निर्मला पहले भी कई मामलों में विवादित रह चुकी है. इस मामले पर भले ही पुलिस महकमे ने परदा डाल कर अपनी किरकिरी होने से बचा लिया लेकिन इस मामले ने इस बात का तो भंडाफोड़ कर ही दिया कि महिला कहीं भी सुरक्षित नहीं है, चाहे वह समाज और दुनिया को सुरक्षा देने का दावा करने वाला पुलिस महकमा ही क्यों न हो?

बदलाव की समीक्षा

मानव विकास संस्थान यानी आईएचडी द्वारा ‘मेकिंग सिटीज सेफ ऐंड इन्क्लूसिव: पर्सपैक्टिव फ्रौम साउथ एशिया’ विषय पर दिल्ली में आयोजित सैमिनार में दिल्ली व पटना जैसे शहरों में गरीबी, असमानता व हिंसा पर जम कर बहस चली. सैमिनार में प्रस्तुत रिसर्चपेपर के जरिए यह बताने की कोशिश की गई कि दिल्ली में 2012 में हुई रेप की घटना का कईर् सामाजिक संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था और उस के बाद फौजदारी कानून में कई संशोधन किए गए.

सवाल यह उठता है कि क्या महिलाओं की सुरक्षा के लिए चलाए गए अभियानों या सरकार की ओर से महिला सुरक्षा को ले कर उठाए गए कदमों से महिलाओं में अपने साथ हुई छेड़छाड़, बलात्कार की वारदातों की रिपोर्ट दर्ज कराने की हिम्मत आई है? क्या लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले अपराध की बढ़ोतरी से उन के परिजनों में खौफ का माहौल बना है? क्या इसी खौफ की वजह से कई जगहों पर लड़कियों को घर से बाहर निकलने पर पाबंदी लगा दी गई है?

एवौन इंडिया की प्रशिक्षण प्रमुख नीतू पाराशर कहती हैं कि यह बहुत ही गंभीर मामला है. वाकई में आज के समय में महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. औफिस से निकलते समय डर लगता है कि सहीसलामत घर पहुंच सकेंगे कि नहीं. वर्तमान माहौल और महिलाओं के प्रति लोगों के व्यवहार के कारण महिलाओं का घर से बाहर निकलना व सड़क पर चलना असुरक्षित हो गया है.

डर के साए में

आईएचडी के सर्वे के मुताबिक, पटना में 66.8 प्रतिशत लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 16.3 फीसदी लोगों का मानना है कि उन्हें कभीकभार सुरक्षा को ले कर डर होता है जबकि 16.5 फीसदी लोग खुद को पूरी तरह से असुरक्षित मानते हैं. दूसरी तरफ पटना के स्लम इलाके में रहने वाले लोगों में से 35.4 फीसदी ही खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. 33.3 फीसदी लोगों को कभीकभी सुरक्षा का डर सताता है और 31.2 फीसदी लोग हमेशा असुरक्षा के साए में जिंदगी गुजार रहे हैं.

पटना की सामाजिक कार्यकर्ता अनिता सिन्हा कहती हैं कि महिलाएं और लड़कियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. सरकार, कानून और सामाजिक संगठन भले ही महिलाओं की सुरक्षा को ले कर कितने भी दावे करें लेकिन महिलाओं को कदमकदम पर यौनउत्पीड़न, छेड़छाड़, छींटाकशी, गंदे इशारों आदि से सामना करना पड़ता है. करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों से महिलाओं को खतरा बना रहता है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट को देख कर हैरत और अफसोस होता है कि बलात्कार के कुल मामलों में 47.2 फीसदी में पीडि़त लड़की के परिचित ही शामिल थे. इन में पिता, चाचा, मामा, भाई, दादा जैसे नजदीकी रिश्तेदार और पड़ोसी जैसे लोग ही शामिल हैं. बलात्कार के कुल 1,127 मामलों में से 532 में कोई न कोई परिचित ही आरोपी था. इन में 4 ऐसे मामले थे जिन में दादा, पिता या भाई को आरोपी पाया गया, 36 ऐसे मामले थे जिन में परिवार का कोई नजदीकी सदस्य ही आरोपी था. इस के अलावा 44 रिश्तेदारों और 182 पड़ोसियों को आरोपी पाया गया है.

करीबी रिश्तेदारों और पड़ोसियों, नौकरों, ड्राइवरों आदि द्वारा बच्चियों के अंगों से छेड़छाड़ करने व उन के साथ जबरन सैक्स संबंध बनाने की वारदातें तेजी से बढ़ रही हैं. ऐसी वारदातों के बढ़ने की सब से बड़ी वजह पारिवारिक व सामाजिक लिहाजों, संस्कारों व मर्यादाओं का तेजी से टूटना है.

समाजसेवी किरण कुमारी कहती हैं कि पहले परिवार के करीबी रिश्तेदारों के बीच कुछ मर्यादा, सीमाएं और लिहाज होता था, जो आज की भागदौड़ की जिंदगी में खत्म होता जा रहा है. रिश्तेदारों और पड़ोसियों की गंदी नजरों का शिकार मासूम बच्चियां बन रही हैं. इस से बच्चियों को बचाने के लिए उन के गार्जियन को ही एहतियात बरतने की जरूरत है.

पटना में 35.4 फीसदी लोगों की राय है कि महिलाएं पहले की तुलना में ज्यादा सुरक्षित हुई हैं, जबकि 49.4 फीसदी लोगों को इस दिशा में कोई भी बदलाव या सुधार नजर नहीं आया. दिल्ली वालों का मानना है कि महिलाओं की सुरक्षा को ले कर दिल्ली महफूज नहीं है. 11 फीसदी लोग ही मानते हैं कि दिल्ली में महिलाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं.

रहना होगा सचेत

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील संजीव कुमार सिंह कहते हैं कि केंद्र सरकार ने महिला यौनउत्पीड़न सुरक्षा कानून-2010 तो बना दिया, पर उस के बाद भी महिलाओं का यौनशोषण कम नहीं हुआ है. इस कानून में किसी भी तरह के यौनउत्पीड़न को बलात्कार के बराबर माना गया है. कार्यस्थल पर किसी भी तरह के यौनउत्पीड़न यानी छेड़खानी, भद्दे इशारे, घूरना, टटोलना, गंदे जोक्स सुनाना, बारबार सामने आना, शारीरिक संबंध बनाने की पेशकश करना, शादी का झांसा दे कर सैक्स करना, अश्लील फिल्म दिखाना या कोई भी अशोभनीय शारीरिक, मौखिक या अमौखिक यौनाचार को इस कानून के दायरे में रखा गया है.

इस तरह की हरकतों पर केवल कानून के डंडे से रोक नहीं लगाई जा सकती है. महिलाओं को खुद सचेत रहने व किसी झांसे में फंसने से बचना होगा. अगर किसी महिला से उस का किसी तरह का कोई संबंधी विवाह से पहले सैक्स संबंध बनाने की बात करे तो महिला को उस से इनकार करना होगा. नौकरी देने, विवाह करने, कर्ज दिलाने, इम्तिहान में पास करा देने, फर्जी डिगरी दिला देने आदि के नाम पर महिलाएं यौनशोषण का शिकार होती रही हैं. ऐसे मामलों में उन्हें सचेत होना होगा.

यह सच है कि ज्यादातर लड़कियां और औरतें यौनशोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाती हैं. समाज में बदनामी होने के डर से वे चुप रह जाती हैं. कुछेक लड़कियां जब अपने अभिभावकों को इस बारे में बताती हैं तो वे भी इज्जत का हवाला दे कर चुप रहने की और अपने काम से मतलब रखने की सलाह दे कर मामले को रफादफा करने की कोशिश करते हैं. बलात्कार, छेड़छाड़ या किसी भी तरह के शारीरिक शोषण के खिलाफ पुलिस थाने में जब शिकायत ही दर्ज नहीं  कराई जाती है, तो गलत सोच वाले लोगों का हौसला बढ़ेगा ही.

पटना के पत्रकारनगर थाने के तहत आने वाले न्यू चित्रगुप्त महल्ले में एमबीए की 21 साल की छात्रा रोशनी ने पिछले साल 25 अक्तूबर को दोपहर में फांसी लगा कर अपनी जिंदगी खत्म कर ली. प्यार के चक्कर में फंस कर उस ने यौनशोषण, दगाबाजी और ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर मौत को गले लगा लिया.

सुसाइड नोट में रोशनी ने लिखा था कि जब वह इंटरमीडिएट में पढ़ती थी तब एक सहेली की शादी में शरीक होने उस के घर गई थी. वहीं सहेली के भाई हीरा से मुलाकात हुई. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई. 3 सालों के बाद उसे पता चला कि उस का आशिक धोखेबाज है. वह इंजीनियरिंग पास भी नहीं था. वह अपराधी, शराबी और बदमाश है एवं कई बार जेल की हवा खा चुका है. जब रोशनी ने हीरा से रिश्ता तोड़ने की कोशिश की तो वह इंटरनैट पर नग्न युवती के शरीर पर उस के चेहरे का फोटो लगाने और उस के प्रेमपत्रों को घर वालों को देने और अखबार में छपवाने की धमकी दे कर ब्लैकमेलिंग करने लगा. इतना ही नहीं, हीरा और उस के दोस्तों ने उस के साथ सामूहिक बलात्कार भी किया था.

अपनों से खतरा

10 साल की लड़की सोनी रोज की तरह तैयार हो कर स्कूल पहुंची. उस की क्लास के मौनीटर ने उस से कहा कि उस के हाथ के नाखून काफी बढ़े हुए हैं, इसलिए डायरैक्टर साहब ने उसे अपने चैंबर में बुलाया है. सोनी के साथ उस की एक सहेली भी डायरैक्टर के चैंबर में पहुंची. डायरैक्टर ने उस की सहेली को क्लास में भेज दिया और सोनी के साथ बलात्कार किया. स्कूल की छुट्टी होने पर सोनी को स्कूल की गाड़ी से उस के घर पहुंचा दिया गया. सोनी की मां को बताया गया कि स्कूल में ही सोनी बेहोश हो गई थी. जब सोनी को होश आया तो उस ने सारी बात बताई. उस के बाद सोनी के परिवार वाले और आसपास के लोग स्कूल पहुंच गए व जम कर तोड़फोड़ की.

पटना के पुराने इलाके पटनासिटी के पटना सिटी सैंट्रल स्कूल (दर्शन विहार) के डायरैक्टर पवन कुमार दर्शन की इस घिनौनी करतूत ने जहां स्कूलटीचर और स्टूडैंट के रिश्तों पर कालिख पोत दी है, वहीं मासूम बच्चियों की सुरक्षा पर एक बार फिर कई सवाल खड़े कर

दिए हैं. स्कूलटीचर, प्रिंसिपल, ड्राइवर, खलासी, नौकर, चापरासी, पड़ोसी समेत करीबी रिश्तेदारों की ओछी मानसिकता की शिकार मासूम बच्चियां हो रही हैं.

ऐसे मामलों का बढ़ना परिवार और समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है. अपनों और आसपड़ोस की खूंखार निगाहों की सौफ्ट टारगेट बनी हुई हैं मासूम बच्चियां.

पटना हाईकोर्ट के सीनियर वकील अशोक कुमार कहते हैं कि पहले लोग करीबी रिश्तेदारों व पड़ोसियों के पास अपनी बच्चियों को छोड़ कर बड़े ही आराम से किसी काम से बाहर चले जाते थे, आज ऐसा नहीं के बराबर हो रहा है. अपनों द्वारा ही भरोसा तोड़ने के बढ़ते मामलों की वजह से परिवार और पड़ोस के लोगों के पास बच्चियों को छोड़ने से लोग कतरानेघबराने लगे हैं.

परिवार और पड़ोस में बैठे लोगों की कुंठित मानसिकता और गंदी नजरों का आसान शिकार परिवार व पड़ोस की मासूम बच्चियां बन रही हैं. बच्चियों के जिस्म से खिलवाड़ कर उन के अपने ही लोग अपनी सैक्स की कुंठा को शांत करते हैं. पुलिस अफसर राकेश दूबे कहते हैं कि अपने आसपास खेलतेकूदते, स्कूल आतेजाते और छोटीमोटी चीज खरीदने महल्ले की दुकानों पर जाने वाले बच्चियों के साथ छेड़छाड़ करना उन के अपनों के लिए काफी आसान होता है. परिवार और पड़ोस के लोगों की आपराधिक सोच व साजिश का पता लगा पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. पता नहीं कब किस के अंदर का शैतान जाग उठे और मासूम बच्चियों को वह अपनी खतरनाक साजिश का निशाना बना डाले. ऐसे में हरेक मांबाप को अपने बच्चों पर खास ध्यान रखने की जरूरत है. मासूम बच्चियों की सुरक्षा को ले कर मांबाप को किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतनी चाहिए.

समाज की टूटती मर्यादाओं व घटिया सोच की वजह से ही बच्चियों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई है. अब इंसान अपने भाई, चाचा, मामा, दोस्तों समेत अपनों से लगने वाले पड़ोसियों पर भरोसा न करे, तो फिर किस पर करे? आज की हालत यह है कि लोगों की नीयत बदलते देर नहीं लगती. अपने ही अपनों के भरोसे का खून कर रहे हैं. यह रिश्तों और समाज के लिए बहुत ही खतरनाक बन चुका है.

झाड़फूंक के बहाने खिलवाड़

ओझा और तांत्रिकों की कारगुजारियों को अगर गौर से देखा जाए तो पता चल जाता है कि वे झाड़फूंक और टोटका के बहाने औरतों के जिस्मों को अपने हाथों से टटोलटटोल कर अपनी वासना की प्यास बुझा रहे हैं. कोई भी ओझा औरतों के घरवालों के सामने बड़ी ही चालाकी व बेशर्मी से बीमार औरत के कपड़ों के भीतर अपना हाथ घुसेड़ देता है और आंखें बंद कर मंत्र पढ़ने का ढोंग करता रहता है. औरत के घरवाले बाबा की अश्लील हरकतों को इलाज करने का तरीका समझ कर चुपचाप देखते रहते हैं और बाबा बेरोकटोक वासना का गंदा खेल खेलता रहता है. झाड़फूंक के नाम पर औरतों को चूमना व उन के जिस्मों को सहलाना बाबाओं का पुराना शगल है.

खुद की सैक्स की भूख को शांत करने के लिए ढोंगी और पाखंडी बाबा इस तरह का हथकंडा अपनाते हैं. आएदिन यह सुननेपढ़ने को मिलता है कि फलां जगह फलां बाबा ने इलाज के नाम पर औरतों को नशा दे कर बलात्कार किया या उस के अंगों से खिलवाड़ किया. इस के बाद भी औरतों और उन के परिजनों की आंखें नहीं खुल पा रही हैं क्योंकि बहुत सी औरतों को इस खिलवाड़ में प्राकृतिक आनंद भी आता है.

डायन के नाम पर जुल्म

डायन होने के आरोप में गरीब और बेसहारा औरतों, खासकर विधवाओं को तंग, तबाह और प्रताडि़त करने की वारदातें आज की मैडिकल साइंस, टैक्नोलौजी और तरक्की के दावों पर तगड़ा तमाचा की तरह हैं. आज भी देश के कई हिस्सों में औरतों को डायन करार दे कर उन के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जा रहा है. सरकार, प्रशासन, पुलिस और कानूनों को ठेंगा दिखा कर गांवों में उन्मादी लोग जिसे चाहते हैं, डायन करार दे कर अपना मतलब साधते रहते हैं. समूचे देश में हर साल डायन बता कर करीब 3 हजार औरतों को परेशान किया जाता है.

डायन के आरोप लगने के बाद गांव वालों की पिटाई के बीच जान बचा कर भाग निकलने वाली मालती उस वारदात के बाद चुप सी हो गई है. बहुत कुरेदने पर थोड़ा बोलती है. पटना से सटे दानापुर प्रखंड के रूपसपुर पीपलतल गांव की रहने वाली 56 साल की मालती और उस की 10 साल की बेटी सुनिंदा को 3 साल पहले डायन बता कर गांव वालों ने पिटाई शुरू की थी कि वह किसी तरह भाग निकली. उस का बेटा रंजन पटना के ए एन कालेज में बीए की पढ़ाई कर रहा है.

काफी कुरेदने पर मालती बताती है कि वह दोपहर में अपने पति के लिए खाना पहुंचाने के लिए सैलून जा रही थी, तभी उस के पड़ोसी सुनील और उस के परिवार वालों ने उसे डायन कह कर मारनापीटना शुरू कर दिया. पिटाई करने के साथ सुनील चिल्ला रहा था कि उस ने उस की बेटी को कालाजादू कर के मार दिया है. कुछ दिन पहले ही उस की बेटी की किसी बीमारी से मौत हो गई थी.

मालती कहती है, ‘‘मैं 20 साल से गांव में रह रही हूं. कभी किसी से झगड़ाफसाद नहीं हुआ. पति सुरेंद्र ठाकुर सैलून चला कर पविर को पाल रहे हैं. एक बेटा पौलिटैक्निक की पढ़ाईर् कर रहा है और दूसरा बीए में पढ़ रहा है. मेरे भी बालबच्चे हैं, किसी दूसरे के बच्चे को मारने के बारे में कभी सोचा भी नहीं. उस के बाद भी मुझ पर डायन होने और लड़की को मारने का आरोप लगाया गया.’’ इतना कह कर मालती सिसकने लगती है.

बिहार के कटिहार जिले के कुरसैला इलाके की रहने वाली राजकुमारी कुछ ऐसे ही दबंगों की सताई हुई है और गांव से भाग कर पटना जंक्शन के पास के महावीर मंदिर के गेट पर भीख मांग कर जिंदगी गुजार रही है. 65 साल की चंपा से जब गांव छोड़ने के बारे में पूछा गया तो उस की आंखें शून्य में कुछ घूरने लगती हैं, फिर आंखों से टपटप आंसू बहने लगते हैं. वह बताती है कि उस के पति की मौत 12 साल पहले हो गई. और उस के 2 बेटे हैं, दोनों पंजाब में मजदूरी करते हैं. पति की मौत के बाद वह गांव में अकेले रहने लगी थी. गांव में ही उस का छोटा सा पक्का घर था और 18 कट्ठा खेत थे. गांव के कुछ अपराधी स्वभाव के लोग उस से खेत बेचने के लिए कहते थे. उन की बात नहीं मानने पर वे लोग धमकाने लगे.

राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, असम, गुजरात और महाराष्ट्र के 50 से ज्यादा जिलों में औरतों को डायन बता कर उन पर अत्याचार किया जाता है. काला जादू, टोनही, टोटका जैसे अंधविश्वास से भरे आरोप लगा कर किसी औरत को डायन करार दे कर उसे मार दिया जाता है. डायनप्रथा की ओट में कई संगीन अपराधों को अंजाम दिया जाता है. इलाके के दबंग ओझा, तांत्रिक, बाबाओं के साथ मिल कर साजिश रचते हैं और किसी औरत को डायन करार दे देते हैं. विडंबना यह है कि अगर किसी औरत को डायन करार दे दिया गया तो उस के नातेरिश्तेदार भी सामाजिक दबाव से उस का साथ देना छोड़ देते हैं.

डायनप्रथा को रोकने के लिए कई कानून बने हुए हैं, पर इस के बाद भी औरतों को डायन करार दे कर उन्हें प्रताडि़त करने के मामलों में कमी नहीं आई है. कानून कहता है कि किसी औरत को डायन करार देना अपराध है और इस के लिए 3 महीने की जेल या 1 हजार रुपया जुर्माना हो सकता है. किसी औरत को डायन बता कर उसे जिस्मानी और दिमागी यातना देने वाले को 6 महीने की जेल और 2 हजार रुपया जुर्माना या दोनों सजा हो सकती हैं. किसी महिला को डायन करार दे कर उस के खिलाफ समाज के लोगों को भड़काने पर 3 महीने की कैद और 1 हजार रुपया जुर्माना के तौर पर वसूला जा सकता है. कानून यह भी कहता है कि डायन बता कर उस के साथ झाड़फूंक या टोटका करने वाले को 1 साल की जेल और 2 हजार रुपए के जुर्माने की सजा हो सकती है. सारे कानून फाइलों में बंद हैं और  डायन का आरोप लगा कर विधवाओं व गरीब औरतों की हत्या का खुलाखेल जारी है.

एसिड अटैक से जलते सपने

21 अक्तूबर, 2012 की उस काली रात ने चंचल और उस की बहन सोनम की जिंदगी में घुप अंधेरा भर दिया था. आधीरात को जब गांव में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ था तो चंचल को छत पर कुछ आवाजें सुनाई दीं. उस की नींद खुल गई. उस ने देखा कि 3 लड़के उस की छत पर खड़े हैं और मुसकरा रहे हैं. अंधेरे में जब तक उन्हें पहचानने की कोशिश करती तब तक उन्होंने तेजाब भरी बोतल उस के सिर पर उड़ेल दी. दर्द और तेज जलन से बिलबिलाती चंचल की आवाज सुन कर सोनम की नींद भी खुल गई. बदमाशों ने उस के ऊपर भी बोतल से भरा तेजाब उलट दिया. वह भागने लगी. चंचल दर्द से तड़प कर बेहोश हो चुकी थी. उस के बाद तीनों बदमाश छत से कूद कर भाग गए.

यह बताते हुए चंचल की आंखों में आंसू भर आते हैं और उस के साथ उस की बहन सोनम भी सिसकने लगती है. पटना शहर से 30 किलामीटर दूर मने प्रखंड छिनावां गांव की रहने वाली दोनों बहनों का कुसूर इतना ही था कि उन्होंने छेड़खानी करने वाले लफंगों को जम कर फटकार लगाई थी. कालेज आतीजाती लड़कियों के साथ छेड़खानी करने वाले बदमाशों के खिलाफ आवाज उठाना चंचल को इतना महंगा पड़ा कि उस पर तेजाब फेंका गया, जिस से उस का शरीर का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा जल गया. उसे मांस का चलताफिरता लोथड़ा बना कर रख दिया गया.

चंचल कहती है कि जब भी वह कंप्यूटर की कोचिंग के लिए घर से निकलती थी तो रास्ते में अनिल राय, राजकुमार और धनश्याम नाम के 3 लड़के उस के साथ छेड़खानी करते थे और अंटशंट बातें बोलते थे. शुरू में तो कई दिनों तक वह चुपचाप सब सहती रही और उन की अनदेखी करती रही. इस से उन बदमाशों के हौसले काफी ज्यादा बढ़ गए. बदमाश लोग उस का दुपट्टा तक खींचने लगे और गंदे इशारे करने लगे. सड़क पर ही उस के सामने खड़े हो जाते और साथ भाग चलने की बातें करते थे. मोटरसाइकिल से घरों के चक्कर लगाना, घर के खिड़कीदरवाजों के परदे फाड़ देना और खिड़कियों पर पत्थर मारना आएदिन की बात हो गई थी. एक दिन चंचल ने गुस्से में आ कर बदमाशों को फटकार लगा दी और खूब खरीखोटी सुनाई.

एसिड अटैक ने दोनों लड़कियों समेत उन के पूरे परिवार की जिंदगी की राह को बदल दिया है. समूची जिंदगी पुलिस, कोर्ट, अस्पताल में उलझ कर रह गईर् है. चंचल और उस की बहन सोनम के इलाज पर अब तक 8 लाख रुपए से ज्यादा की रकम खर्च हो चुकी है. अभिनेता जौन अब्राहम समेत कई एनजीओ की मदद से इलाज की रकम इकट्ठी की गई.

देश के हर हिस्से में आएदिन महिलाओं के साथ होने वाली, इंसानियत को तारतार करने वाली ये बर्बर घटनाएं सिर्फ खबर ही नहीं, बल्कि सभ्य समाज पर एक करारा तमाचा सरीखी हैं. दिल को दहला देने वाले राजधानी दिल्ली के निर्भया कांड को पूरे 4 साल हो गए हैं लेकिन इन बीते 4 सालों के दौरान बलात्कार के मामलों में कमी नहीं हुई है. हाल के दिनों में पूरे देश में महिलाओं

पर यौनहिंसा सहित विभिन्न तरह के अत्याचार के मामले काफी हद तक बढ़ गए हैं. महिलाओं, नाबालिग लड़कियों तथा छोटीछोटी बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है.

हर जगह यही कहानी

महिलाओं के साथ अपराध की घटनाएं किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं हैं. दिल्ली, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश सभी राज्यों में बलात्कार तथा छेड़छाड़ की बर्बर घटनाएं सिर चढ़ कर बोल रही हैं. घर हो या बाहर, महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं. हैरानी की बात है कि दरिंदे न महिला की उम्र देखते हैं न जगह. वह मासूम बच्ची हो या बुजुर्ग महिला, वे सभी को अपनी हवस का शिकार बना रहे हैं. ऐसे समाज को हम किस आधार पर सभ्य व सुसंस्कृत समाज कह सकते हैं.

एक तरफ जहां देश सामंती, रूढि़वादी मानसिकता की राह पर चल रहा है जहां लड़कियां पहले के मुकाबले ज्यादा पढ़लिख रही हैं, बड़ेबड़े मुकाम हासिल कर रही हैं, वहीं उन के खिलाफ अपराध भी उसी गति से बढ़ रहे हैं. पहले उन्हें घर की चारदीवारी में कैद कर के रखा जाता था. अब वे घर की चौखट लांघ कर अपने पंखों को उड़ान देने की कोशिश कर रही हैं तो समाज के वहशी दरिंदे उन के पंख कतरने को तैयार बैठे हैं. उन्हें वे अपने मनोरंजन का खिलौना समझ कर रौंद रहे हैं.

समाज की सामंती और रूढि़वादी ताकतें लड़कियों के अधिकारों व उन की आजादी पर हमले का कोई मौका नहीं छोड़ रहीं. कोईर् महिलाओं के मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक का आदेश देता है तो कोई कहता है उन्हें खुले कपड़े नहीं पहनने चाहिए. वहीं, कोई फरमान जारी करता है कि महिलाएं घर से बाहर अकेले न निकलें तो कोईर् कहता है कि देररात में बाहर न निकलें. कुल मिला कर सारे सामंती फरमान महिलाओं के लिए हैं. खाप पंचायत तो यहां तक कहती हैं कि रेप से बचने के लिए लड़कियों का वयस्क होने से पहले ही विवाह कर दिया जाए. ऐसा लगता है समाज महिलाओं की स्वतंत्रता को पचा नहीं पा रहा है. स्त्रियों के मसले पर आधुनिक और रूढि़वादी परंपराओं के बीच सीधा टकराव दिखता है.

मैट्रो में आत्मरक्षा के लिए महिलाएं रख सकेंगी चाकू

महिलाओं के साथ बढ़ते अपराधों को देखते हुए हाल ही में सीआईएसएफ ने एक अहम फैसला लिया है. सीआईएसएफ के  फैसले के अनुसार, अब महिलाएं अपनी  आत्मरक्षा के लिए अपने साथ 4 इंच तक का चाकू रख सकेंगी. सीआईएसएफ का यह फैसला दिल्ली में रहने वाली महिलाओं पर ही लागू होगा, खासकर उन महिलाओं पर जो मैट्रो में सफर करती है. एक सर्वे के मुताबिक, तकरीबन 30 लाख पैसेंजर रोजाना मैट्रो में सफर करते हैं. इस में एकतिहाई संख्या महिलाओं की होती है. महिलाओं की सुरक्षा को देखते हुए सीआईएसएफ ने मैट्रो में माचिस और लाइटर ले जाने पर पाबंदी को भी हटा दिया है.

हैरानी की बात है कि निर्भया कांड के बाद बढ़े सुरक्षा उपायों के बावजूद रेप के मामले घटने के बजाय बढ़ क्यों रहे हैं? गैरसरकारी संगठनों का कहना है कि देश की जटिल न्याय प्रणाली की वजह से लंबे खिंचते मामले और ज्यादातर मामलों में सुबूतों के अभाव में अभियुक्तों का बरी हो जाना इस की प्रमुख वजह है.

रेप के मामलों में अभियुक्तों को सजा मिलने का राष्ट्रीय औसत 28 फीसदी है लेकिन राजधानी दिल्ली में यह दर महज 17 फीसदी है. इस से अपराधियों के हौसले बुलंद रहते हैं. रेप के बहुत से मामलों की पुलिसिया जांच ठीक से नहीं होती जो पीडि़ताओं को न्याय नहीं मिल पाने की सब से बड़ी वजह होती है. जांच के दौरान हुई खामियों के चलते अभियुक्त अकसर अदालत से बेदाग छूट जाते हैं

लचर कानून व्यवस्था

पुलिस व कानून व्यवस्था पूरी तरह से पंगु हो गई है. अपराधों की रोकथाम व पीडि़ताओं को शारीरिक, मानसिक व आर्थिक सुरक्षा देने के बजाय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग महिलाओं को ही दोषी ठहरा देता है. यह समाज की मानसिक विकृति का परिचायक है. नारी अधिकारों को ले कर समाज में द्वंद्व चल रहा है. संसद में सिर्फ कानून बना कर हम नारी अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते. जब तक लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक कुछ नहीं हो सकता. महिलाओं को भी आजादी से जीने का हक है. पुरुषों की तरह उन्हें भी स्वतंत्र हो कर खुलेआम सड़कों पर घूमने का हक है. महिलाओं पर बढ़ रहे विभिन्न तरह के हमलों को रोकने के लिए सही व वैज्ञानिक सोच के साथ उचित कदम उठाते हुए समाज को इस के लिए जागरूक करना आवश्यक है.

विदेशों में भी सुरक्षित नहीं

भारत ही नहीं, दुनिया में कहीं भी औरत महफूज नहीं है. अमेरिका की जौर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के सर्वे के मुताबिक, 3 में से एक अमेरिकी महिला यौनशोषण या दुर्व्यवहार की शिकार बनती हैं. वहां करीब 19.3 फीसदी औरतें ऐसी हैं जिन्होंने कम से कम एक बार बलात्कार की पीड़ा को झेला है. इस के अलावा 43.9 फीसदी वैसी महिलाएं हैं जो अपनी जिंदगी में यौनहिंसा की शिकार होती हैं. अमेरिका में हर 107 सैकंड पर एक महिला यौनशोषण की शिकार बनती है.

बलात्कार अपराध की सूची में दक्षिण अफ्रीका सब से ऊपर है. वहां हर साल 5 लाख के करीब बलात्कार की घटनाएं होती हैं. वहीं इंगलैंड में हरेक साल 75 हजार महिलाएं बलात्कारियों का शिकार बनती हैं. वहां की राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट के अनुसार, इंगलैंड की 5 में से 1 महिला बलात्कार का दंश झेलती है.

पैनिक बटन

रेप के बढ़ते मामलों को ध्यान में रख कर केंद्र सरकार ने अब मोबाइल निर्माताओं को भारत में बिकने वाले मोबाइल फोनों में पैनिक बटन लगाने का निर्देश दिया है. कम कीमत वाले फोन में 5 या 9 का बटन और स्मार्टफोन में 3 बार पावर बटन दबा कर पैनिक बटन को सक्रिय किया जा सकता है. इस से पीडि़ता के परिजनों, मित्र या पुलिस को संकेत मिल जाएगा. सुरक्षा को और अचूक बनाने के 2018 से सभी मोबाइल सैट्स में जीपीएस होना भी अनिवार्य होगा ताकि दुर्घटना की जगह का पता लगाया जा सके. सरकार की दलील है कि मुसीबत की घड़ी में महिला के पास मदद की गुहार लगाने के लिए 1 या 2 सैकंड से ज्यादा समय नहीं होता. ऐसे में पैनिक बटन ही बेहतर विकल्प है.

साथ में ललिता गोयल