सरिता विशेष

कोई कहता है कि कुष्ठ रोग (लेप्रोसी) गलत काम करने की वजह से होता है. किसी की यह राय है कि यह बीमारी पिछले जन्मों के पापों का नतीजा है. कोई यह राग आलापता रहता है कि रिश्तेदारी में सेक्स करने से कुष्ठ की बीमारी हो जाती है. कोई यह ढिंढोरा पीट रहा है कि मां-बाप की सेवा नहीं करने वाला कुष्ठ का शिकार होता है. किसी की यह दलील है कि बच्ची का बलात्कार करने वालों को भगवान कुष्ठ की बीमारी देता है. कुष्ठ बीमारी को लेकर समाज में पोंगापंथियों ने जम कर भरम फैला रखा है. बाबाओं ने यह प्रचार कर रखा है कि गलत काम करने, गलत संबध बनाने, खून गंदा होने या सूखी मछली खाने से कुष्ठ रोग होता है. इसके नाम पर कई बाबानुमा ठग अपनी दुकान चला रहे हैं और आम लोगों की मेहनत की कमाई को लूट रहे हैं.

हकीकत में यह सारी बातें झूठ और अफवाह ही हैं. पटना के मशहूर डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि जिस किसी को कुष्ठ रोग हो जाता है, उस मरीज को ज्यादा देखभाल और सहानूभूति की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है. परिवार और समाज उससे नफरत करने लगता है और उसे ठुकरा कर दर-दर भटकने और तिल-तिल कर मरने के लिए छोड़ देता है. यह माइक्रो बैक्टिरियल लेप्री से फैलता है. इस बीमारी को सही तरीके से इलाज किया जाए जो पूरी तरह से ठीक हो जाता है. साल 1991 में आई एमडीटी दवा से यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो सकती है.

भारत में करीब 16 लाख से ज्यादा कुष्ठ रोगी हैं, इनमें से 24 फीसदी बिहार में हैं. सूबे में कुष्ठ रोगियों की 40 बस्तियां है, जिसमें कुष्ठ रोगी बद से बदतर जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं. बिहार में प्रति 10 हजार की आबादी पर 1.12 कुष्ठ रोगी हैं. बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में सबसे ज्यादा कुष्ठ के मरीज हैं. बिहार अनुसूचित एवं पिछड़ी जाति संघर्ष मोर्चा के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि गरीब और पिछड़ों के दर्द को सुनने और उसे दूर करने वाला कोई नहीं है. उनके नाम पर पटना से लेकर दिल्ली तक सत्ता की रोटियां सेंकी जाती रही हैं, पर उनके हालात में बदलाव आजादी के बाद से अब तक नहीं हो सका है. कुष्ठ के ज्यादातर रोगी भीख मांग कर अपनी जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हैं.

मिसाल के तौर पर पटना का एक कुष्ठ रोगी है बालेश्वर साव. कुष्ठ की बीमारी होने के बाद उसके परिवार वालों ने उसे घर से निकाल दिया है. गरीब होने की वजह से समय पर सही तरीके से इलाज नहीं हो सका. जिस्म के कई हिस्सों में गहरे जख्म हो गए हैं. हाथों और पैरों की कई उगंलियां गल चुकी है. पिछले 12 सालों से वह सरकारी मदद के इंतजार में है, पर आज तक केवल भरोसे के अलावा और कुछ नहीं मिल सका. कोई एनजीओ वाले कभी कभार खाने को कुछ अनाज और पहनने को कुछ कपड़े दे जाते हैं. इससे गुजारा नहीं चल पाता है. पटना की सड़कों पर वह लकड़ी की गाड़ी पर बैठ कर दिन भर घूमता है. ‘माता-बहिन करिए दान, बाबू भईया करिए दान’ की गुहार लगा-लगा कर भीख मांगता है तो दिन भर में 40-50 रुपया जमा हो जाता है.

बिहार के आरा रेलवे स्टेशन के पास अनाइठ इलाके में रहने वाले कुष्ठ रोगी शिवलाल यादव के झोपड़े के अंदर घुसने पर हर ओर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है. अंधेरे के बीच कुछ चमकती आंखों को देखकर अहसास होता है कि झोपड़े में कुछ और लोग रह रहे हैं. शिवलाल बताता है कि उसके साथ 3 और कुष्ठ रोगी रहते हैं. वह दिन भर भीख मांगते हैं और जिससे 50-60 रुपया मिल जाता है. कभी कभार जब तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है तो 100 रूपया कर्ज लेने पर 10 रूपया रोज के हिसाब से सूद चुकाना पड़ता है.

वह कहता है कि सुनते हैं कि कुष्ठ रोगियों और गरीब लाचारों के लिए सरकार ने बहुत सारी योजनाएं बनाई है, पर आज तक उसके पास एक पैसा भी नहीं पहुंच सका है. वह हंसते हुए कहता भी है कि सारा पैसा तो अफसरों और बाबूओं के पेट में चला जाता होगा, उनकी भूख से कुछ बचेगा तब न हम गरीबों तक पैसा आएगा. हंसते-हंसते हुए शिवलाल बड़ी ही मासूमियत से अफसरशाही के मुंह पर करारा तमाचा जड़ देता हैं और एक झटके में सरकारी योजनाओं की पोल-पट्टी भी खोल देता है.

कुष्ठ रोगी ललिता बेगम का यह दर्द है कि लालू और राबड़ी के राज में आश्रम के लोगों ने रहने के लिए थोड़ी से जमीन मुहैया करने के लिए आवेदन दिया गया था. पिछले 12-13 साल में करीब 50 बार से ज्यादा आवेदन दिया जा चुका है. मुखिया, बीडीओ, एसडीओ, डीएम, विधायक से लेकर मंत्री और मुख्यमंत्री को आवेदन दिया गया पर अभी तक कुछ भी नहीं हो सका है. हर कोई जमीन देने का भरोसा देकर चल देता है. गंदी झोपड़ी में रहने से और भी कई तरह की बीमारियां हो गई है. किसी को टीबी हो गया है तो किसी के आंत में अल्सर हो गया है. किसी का लीवर खराब हो चुका है, तो किसी की आंखों की रोशनी ही चली गई है. कुष्ठ रोग के साथ-साथ कई और बीमारियों की चंगुल में फंस चुके कुष्ठ रोगी परिवार, समाज और सरकार की बेरूखी झेल कर बदतर जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर हैं और उनकी फरियाद को सुनने वाला कोई नहीं है.

सोशल वर्कर आलोक कुमार बताते हैं कि बिहार सरकार की नजर तो इन कुष्ठ रोगियों पर नहीं पड़ सकी है पर जर्मनी के एनजीओ लिबेल औन लेप्रा की कोशिश से कुष्ठ रोगियों को थोड़ी ही सही पर मदद मिल रही है. कुष्ठ रोगियों का सही इलाज कराने का इंतजाम करने के साथ अगर उन्हें किसी काम में ट्रेंड कर दिया जाए तो वे भीख मांगने के बाजाए मेहनत कर 2 वक्त की रोटी कमा सकते हैं.

कुष्ठ रोगियों की बदतर हालत देखकर यही महसूस होता है कि वहां तक सरकारी योजनाओं और दावों-वादों का छटांक भर भी नहीं पहुंच सका है. गरीब कुष्ठ रोगियों को राहत और मदद देने की तमाम सरकारी योजनाओं और एनजीओ की डपोरशंखी कामकाज का छोटा सा लाभ भी उन्हें नहीं मिल पाता है. उनकी बदहाली को देख कर सहसा ही मुंह से निकल पड़ता है- ‘यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां, मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा होगा..’