वाकेआ 3 जून का मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के सागर शहर का है. इस दिन लोकायुक्त पुलिस ने एक पटवारी आनंद खत्री को एक किसान शिवम ठाकुर से साढ़े

3 हजार रुपए की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा था. शिवम बहुत दिनों से अपने दादा प्रहलाद ठाकुर की जमीन के सीमांकन के लिए तहसील और इस पटवारी के चक्कर काट रहा था पर पटवारी बगैर घूस लिए काम करने को तैयार नहीं हो रहा था.

पुश्तैनी जमीन के सीमांकन के अपने हक के लिए क्यों घूस दें, यह सोचते नौजवान किसान शिवम ने रैवेन्यू इंस्पैक्टर से शिकायत की तो रैवेन्यू इंस्पैक्टर ने पटवारी को हिदायत दी कि वह बगैर घूस लिए सीमांकन करे पर पटवारी को नहीं मानना था, सो वह नहीं माना.

घूस दे कर काम करवाने का सीधा तरीका अपनाने के बजाय शिवम ने इस की शिकायत लोकायुक्त पुलिस से भी कर दी जिस से घूसखोर पटवारी रंगेहाथों धरा गया. पटवारी अपनी इस जिद पर अड़ा था कि घूस का जो रेट सीमांकन के लिए चल रहा है, वह उसी के मान से घूस लेगा यानी 7 एकड़ जमीन के 7 हजार रुपए. इस पर हैरानपरेशान शिवम ने वही किया जो एक जागरूक किसान को करना चाहिए.

यह वह वक्त था जब पूरा सूबा खासतौर से मालवा और निमाड़ इलाके किसान आंदोलन और उस से उपजी हिंसा की आग में झुलस रहे थे. किसानों के इस गुस्से का किसी पटवारी तो दूर, आला अफसरों और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. मुट्ठीभर किसान हैं, 2-4 दिन हल्ला मचा कर वापस अपने खेतखलिहानों में चले जाएंगे, यह सोचते किसी के कानों पर जूं नहीं रेंग रही थी. कम ही लोगों को अंदाजा था कि जो परेशानी शिवम ठाकुर उठा रहा था वैसी दर्जनों परेशानियां न केवल सूबे के बल्कि देशभर के तमाम किसानों को रोजाना उठानी पड़ती हैं.

अरसे से किसानों के दिलोदिमाग में जमा हो रही इस तरह की परेशानियां जब भड़ास बन कर निकलीं तो पूरा मध्य प्रदेश हाहाकार कर उठा. हल चलाने वाला किसान सीधे आरपार की लड़ाई लड़ने को हिंसा पर उतारू हो आया तो एकाएक ही हालात इतने बेकाबू होते दिखे कि इसे आंदोलन के बजाय क्रांति कहना ज्यादा ठीक लगने लगा.

महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश

वह जून की पहली तारीख थी जब महाराष्ट्र के कुछ किसानों ने राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की. आंदोलनकारी किसानों ने धौंस यह दी थी कि सूबे में दूध, सब्जी व फल की सप्लाई ठप कर दी जाएगी. इन किसानों का एतराज कर्जमाफी में वादाखिलाफी और अपनी पैदावार के वाजिब दाम न मिलने का था.

महाराष्ट्र के सतारा, अहमदनगर और नासिक जिलों में हड़ताल का खासा असर रहा. वहां किसानों ने वाकई सड़कों पर आते दूध, फल और सब्जी वगैरा की सप्लाई नहीं होने दी. आम लोगों के लिए यह सिरदर्दी वाली बात थी क्योंकि एक दिन में ही इन रोजमर्राई चीजों के दाम आसमान छूने लगे थे.

इस से पहले 31 मई को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसान क्रांति जन आंदोलन कोर कमेटी के किसानों से मिल कर बातचीत की थी. किसान अपनी इस जिद पर अड़े रहे थे कि उन का कर्ज पूरी तरह माफ किया जाए. इस पर देवेंद्र फडणवीस ने एक पुरानी चाल, मांग को टरकाने की चली और किसानों से एक महीने की मोहलत मांगी.

किसानों को समझ आ गया कि आज भी राजनीति ही खेली जा रही है, इसलिए वे बातचीत अधूरी छोड़ आ गए और फिर देखते ही देखते आंदोलन महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश में दाखिल हो गया. शुरू में मालवा और निमाड़ इलाके आंदोलन की गिरफ्त में ज्यादा रहे जहां पटेल, पाटीदार किसानों की भरमार है.

यहां दिचलस्पी वाली बात यह है कि इन इलाकों में पटेलपाटीदारों के पढ़ेलिखे नौजवान ज्यादा खेतीकिसानी और उस से जुड़े दूसरे कारोबार कर रहे हैं. ये लोग खासे पैसे वाले हैं और खेती से हुई कमाई का इस्तेमाल अपने शौक पूरे करने में भी करते हैं.

किसानों ने इंदौर, उज्जैन, रतलाम, नीमच और मंदसौर जिलों में चक्काजाम किया और जरूरी चीजों की सप्लाई ठप कर दी. पूरे सूबे में दूध और सब्जियों के दाम एकाएक ही बढ़ गए. जिस का दबाव सरकार पर भी पड़ा.

अब तक किसी को अंदाजा नहीं था कि किसान क्या सोच रहे हैं और आगे क्या करेंगे, अपना विरोध जताने किसानों ने आगजनी, चक्काजाम और तोड़फोड़ की वारदातों को अंजाम दिया तो इसे सरकार और उस के अफसरों ने बेहद हलके में लिया. बस, बात यहीं से बिगड़ी. कुछ आलाअफसरों की धुनाई भी किसानों ने कर दी थी.

6 जून को मंदसौर में प्रदर्शन कर रहे किसानों को रोकने या काबू करने के लिए पुलिस ने सब से आसान और पुराना तरीका फायरिंग का अपनाया. इस दिन मंदसौर में पुलिस वालों और किसानों के बीच जम कर मारपीट हुई थी. गुस्साए पुलिस वालों ने हालात काबू करने आई सीआरपीएफ की टीम की मदद से गोलियां चलाईं तो 6 किसान मारे गए.

अन्नदाताओं के पुलिस फायरिंग में मरने के बाद मचे हल्ले से नेताओं और अफसरों को होश आया पर तब तक काफीकुछ ऐसा हो चुका था जो नहीं होना चाहिए था. तुरंत कर्फ्यू लग गया और इंटरनैट वगैरा मंदसौर, नीमच व रतलाम में बंद कर दिए गए.

बिगड़ी इमेज किसानपुत्र की

मंदसौर में पुलिस प्रशासन ने किसानों के साथ जो बदसलूकी की, वह सोशल मीडिया पर भी वायरल हुई कि किसानों से निबटने के लिए जो भी तरीका कारगर लगे, अपनाने में हिचको मत.

इधर जब कारवां गुजर गया तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सकते में आ गए कि यह क्या हो गया. मंदसौर हादसे ने उन की 13 साल पुरानी कुरसी के पाए हिला डाले. पहले तो झल्लाए शिवराज सिंह चौहान ने पानी पीपी कर कांग्रेस को कोसा, फिर कहा कि किसान तो हिंसक हो ही नहीं सकता, यह जरूर असामाजिक लोगों की करतूत है.

सोशल मीडिया पर शिवराज सिंह की जम कर खिंचाई हुई और मीडिया भी उन के राजकाज व कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाने लगा. पहली दफा लोगों को पता चला कि शिवराज सिंह किसानपुत्र नहीं, बल्कि शिक्षकपुत्र हैं और विदिशा के गांव बैस टीला पर उन की जो 12 एकड़ जमीन थी, वह 12 साल में बढ़ कर 1,200 एकड़ हो गई है.

इन झूठ और सचों से दूर कहा यह भी गया कि जिस किसान के दम पर राज्य सरकार ने केंद्र सरकार का लगातार 5 दफा कृषि कर्मण अवार्ड जीता, आज उसी पर गोलियां क्यों बरसाई जा रही हैं.

कांग्रेस ने भी मौका ताड़ते मंदसौर हादसे पर शिवराज सिंह को आड़े हाथ लिया कि वे किसानप्रेम का झूठा राग अलापते रहते हैं और विदिशा में अपने खेतों की फसल को सरकारी हैलीकौप्टर से देखने जाते हैं. वे तो एक रईस किसान हैं जो आम किसानों का दुखदर्द नहीं समझते.

शिवराज सिंह चौहान का यह सोचना बेहद हलका साबित हुआ कि ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ दो तो बात बन जाएगी. दूसरा गलत फैसला उन्होंने मृत हुए किसानों को एकएक करोड़ रुपए का मुआवजा देने का लिया. पहले मरे किसानों के घर वालों को 5-5 लाख रुपए देने का ऐलान किया गया था, फिर यह राशि 1-1 करोड़ रुपए कर दी गई. इस से साफ साबित हुआ कि वे हमदर्दी तक खरीदना चाह रहे हैं. कल तक जो किसान असामाजिक तत्त्व नजर आ रहे थे, उन्हें इतना भारीभरकम मुआवजा देना भी उन्हें कठघरे में खड़ा कर गया.

सरकार की नाकामी

इधर, प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी मंदसौर हादसे की रिपोर्ट मांगी तो सूबे का सियासी पारा प्री मानसून के बादल चीर कर बाहर आ गया. ये चर्चाएं भी चौराहों पर होने लगीं कि उन की विदाई की जा सकती है क्योंकि वे किसान आंदोलन से निबटने या उसे संभालने में नाकाम रहे हैं.

इन सब कयासों के बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बेहद ड्रामाई अंदाज में राजस्थान के रास्ते मध्य प्रदेश में मोटरसाइकिल के जरिए दाखिल हुए तो नजारा देखने काबिल था. राहुल गांधी सहित वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और कमलनाथ वगैरा भी गिरफ्तार कर लिए गए.

मंदसौर में राहुल गांधी ने शिवराज सिंह चौहान से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह कहते निशाना साधा कि वे रईस उद्योगपतियों का अरबों रुपयों का कर्ज माफ कर देते हैं पर किसानों को न तो बोनस देते, न ही कर्ज माफ करते. वे किसानों को तो गोलियां देते हैं.

मौका ताड़ते ही भाजपा का शिवराज विरोधी गुट भी अपनी ही पार्टी की छीछालेदर कराने से नहीं चूका. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का यह बयान सुर्खियों में रहा कि कांग्रेस तो आंदोलन में कहीं थी ही नहीं, यानी यह सरकार की नाकामी का नतीजा था.

जब पोलें खुलने लगीं और तरहतरह की बातें होने लगीं तो बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक पहुंची जिस ने शिवराज सिंह के कामकाज करने के तरीके पर बजाय कुछ बोलने के, दूसरे सूबों के हालात का जायजा लेना शुरू कर दिया कि किसान आंदोलन अब राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ सहित उत्तर प्रदेश तक में अपनी धमक दिखा रहा है. पहले इसे रोकने के जतन किए जाएं.

आरएसएस की चुप्पी जब टूटेगी तब टूटेगी पर यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई कि एक झटके में भाजपा और शिवराज सिंह की इमेज बिगड़ चुकी है. सूबे के लोगों का भरोसा उन पर से उठ रहा है. नर्मदा परिक्रमा यात्रा और पूजापाठ के एवज में उन्हें नर्मदा मैया ने बजाय वरदान के, श्राप दे दिया है. बारबार अपील करने पर भी किसानों का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो वे 10 जून को भोपाल के दशहरा मैदान पर उपवास पर बैठ गए.

गुस्साए किसानों ने जगहजगह अपनी पैदावार फेंकी और सरकार के खिलाफ विरोधप्रदर्शन किए. यह साफ हो चुका है कि इस किसान आंदोलन के पीछे कोई नेता, संगठन या सियासी दल नहीं है. यह दरअसल शोषण और भ्रष्टाचार से तंग आ चुके किसानों का गुस्सा है जिसे अब बातों और वादों के लौलीपौप से नहीं बहलाया जा सकता.

राहुल गांधी के मंदसौर आने का मकसद माहौल और किसानों के गुस्से को कांग्रेस के पाले में लाने की कोशिश थी जो वोटों में तबदील हुई या नहीं, इस के लिए विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा. पर इस हादसे से सूबे में वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को संजीवनी बूटी जरूर मिल गई है. अब भी अगर वह किसान आंदोलन को वोटों में तबदील नहीं कर पाती है तो फिर उस का बेड़ागर्क होना तय है.

आमलोग और जानकार माहिर भी इस नतीजे पर पहुंचने से खुद को रोक नहीं पाए कि किसान आंदोलन को भाजपा के कुछ असंतुष्टों ने हवा दी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिवराज सिंह चौहान से छुटकारा पाना चाहते हैं क्योंकि वे उन के लिए बड़ा खतरा हैं.

आंदोलन का सच

सियासी बातों का कोई सिरपैर नहीं होता जिस के हल्ले के चलते मुद्दे की बात दबती गई कि आखिर क्यों किसानों को इतना गुस्सा आया कि वे हिंसा, आगजनी और चक्काजाम पर उतारू हो आए थे. एक अहम बात यह भी आंकी गई कि भाजपा ने महज वोटों के लिए किसानों के दिलों में जरूरत से ज्यादा उम्मीदें जगा दी थीं जो पूरी नहीं हुईं तो किसान बौरा उठा.

किसान आंदोलन का एक बड़ा सच यह है कि महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश का ही नहीं, बल्कि देशभर का किसान बदहाल है. गांवों, कसबों और देहातों का माहौल तेजी से बदल रहा है. खेतीकिसानी की बागडोर पढ़ेलिखे जागरूक नौजवानों के हाथों में आ गई है जो इंटरनैट और कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं. इस जागरूक पीढ़ी को पुलिस के डंडे और गोलियों से दबाया नहीं जा सकता.

गांवों में ऊंची जाति वाले गिनेचुने लोग ही बचे हैं और बड़ी तादाद में गरीब, दलित, किसान भी गांवों से भाग कर रोजगार की तलाश में शहरों में बसते जा रहे हैं. ऐसे में गांवों की सत्ता पिछड़े तबके के किसानों के हाथों में आ गई है जिस के पास खासा पैसा है. वे अपनी बात कहने या मांगें मंगवाने में किसी संगठन या राजनीतिक पार्टी के मुहताज नहीं हैं. वे दोटूक बात करना चाहते हैं.

शोषण के शिकार किसान

इन किसानों ने देखा यह कि 4 महीने से भी ज्यादा चली नमामि देवी नर्मदा यात्रा के दौरान करोड़ों रुपए फूंकने वाले शिवराज सिंह चौहान जगहजगह पूजा, हवन और आरती करते रहे. जिन साधुसंतों ने कभी खेती नहीं की या पसीने की रोटी नहीं खाई, उन के पैर अन्नदाताओं से पकड़वाए गए. इस से उन्हें क्या मिला.

नीमच के एक युवा किसान जगदीश पाटीदार की मानें तो इस से शिवराज सिंह चौहान की इमेज बिगड़ी है. नमामि देवी नर्मदे यात्रा से किसानों का कोई फायदा नहीं हुआ है, न ही पूजापाठ से कभी होगा. फिर इस और ऐसे धार्मिक ड्रामेबाजों की जरूरत क्या है?

इस नौजवान किसान के मुताबिक, हो यह रहा था कि किसानों के भले का राग एहसान की तरह सरकारी विज्ञापनों के जरिए गाया जा रहा था. खुशहाल किसान अब सरकारी विज्ञापनों में ही बचा है जबकि हकीकत एकदम उलट है. किसान का हर स्तर पर शोषण हो रहा है और शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता सच को सरकारी पैसों के प्रचार के दम पर झुठलाने का दोगलापन करते रहे हैं. इसलिए किसान आंदोलन मध्य प्रदेश में ज्यादा हिंसक हुआ.

गुस्से के पीछे छिपा दर्द

किसान आंदोलन और हिंसा कोई नई बात नहीं है. जब भी पानी सिर से गुजरने लगता है तब किसानों के सामने सड़क पर आने के अलावा कोई और रास्ता रह भी नहीं जाता. पर इस बार उस का अंदाज और मिजाज कुछ हट कर था. इस पर बारीकी से गौर करें तो यह कुछकुछ हरियाणा के जाट और गुजरात के पाटीदार आंदोलनों से मिलताजुलता हुआ था. फर्क इतना भर था कि इस में जातिगत आरक्षण की मांग नहीं थी.

इस आंदोलन की एक अहम बात यह थी कि अपनी मंशा की भनक किसानों ने प्रशासन या सरकार को नहीं लगने दी. गुस्साए किसानों ने अपनी करोड़ों की पैदावार फेंक कर खुद का तो नुकसान किया ही, सरकारी और जनता की जायदाद को भी नहीं बख्शा. मंदसौर गोलीकांड के बाद इंदौर के नजदीक देवास में आंदोलनकारियों ने 4 लग्जरी बसें फूंकी और रेल की पटरियां भी उखाड़ीं.

मंदसौर गोलीकांड में मारे गए एक युवा किसान अभिषेक पाटीदार के घर सरकारी हमदर्दी जताने गए कलैक्टर स्वतंत्र कुमार जैन के साथ किसानों ने बदसलूकी करते उन के कपड़े फाड़ दिए. इस से साबित हो गया कि उन्हें हमदर्दी नहीं, इंसाफ चाहिए था. दूसरे कुछ अफसरों के साथ भी किसानों ने इसी तरह की बदसलूकियां की.

8 जून को शाजापुर के एसडीएम राजेश यादव के साथ वाहन रैली निकाल रहे पाटीदार समाज के नौजवानों ने खूब मारपीट की और उन का पैर तोड़ डाला. ये लोग समर्थन मूल्य पर प्याज नहीं बिकने देना चाह रहे थे.

ऐसा सिर्फ इसलिए कि किसान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह जुमला बारबार याद आ रहा था कि जल्द ही खेती को लाभ का धंधा बनाएंगे. आंदोलन के दौरान ही किसान इस बात पर भी झींकते नजर आए कि जब लागत ही नहीं निकल पाती तो खेती को सरकार लाभ का धंधा कैसे बनाएगी. यह बात कई मंचों से बारबार दोहराई गई थी.

दूसरी परेशानी किसानों की यह थी और है भी कि उसे वाकई पैदावार के वाजिब दाम नहीं मिलते. तमाम मंडियां व्यापारियों, दलालों और आढ़तियों के कब्जे में हैं, जहां कदमकदम पर कमीशन देना पड़ता है और इस के बाद भी भुगतान का भरोसा नहीं रहता.

कर्ज की मार

कर्जमाफी का झुनझुना केंद्र और राज्य सरकारें दोनों बराबरी से किसानों को देती रही हैं पर जब इस पर अमल करने की मांग उन्होंने उठाई तो देवेंद्र फडणवीस तो साफ मुकर गए और शिवराज सिंह चौहान खामोश रहे. हालांकि गोलीकांड में मारे गए किसानों का दाहसंस्कार हो जाने के बाद उन्होंने किसानों के हित में कुछ ऐलान किए पर किसानों ने न तो उन की बातों पर ध्यान दिया और न ही भरोसा किया.

इसी दौरान यह बात उजागर हुई कि सूबे के 35 लाख से भी ज्यादा किसानों पर 20 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बाकी है. इन में से 6 लाख किसान तो 5 वर्षों से ब्याज तक नहीं चुका पाए हैं. उन्हें दिवालिया घोषित किया जा चुका है.

खाली हाथ किसान

हिंसा के दौरान एक मशवरा यह भी चर्चा में आया कि राज्य सरकार हालात देखते पूरी तरह कर्जमाफी की घोषणा कर सकती है पर मजेदार बात रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का यह बयान रहा कि अगर पूरी तरह कर्ज माफ किया गया तो इस से महंगाई बढ़ेगी. गौरतलब है कि देशभर के किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा राशि का कर्ज है.

सालभर में देश के 12 हजार किसान खुदकुशी करते हैं, यह बात केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को एक सवाल के जवाब में बताई थी लेकिन हकीकत में यह तादाद कहीं ज्यादा है. किसान आत्महत्याओं को ले कर आएदिन सवालजवाब होते रहते हैं पर कोई सरकार किसानों की गरीबी या बदहाली दूर नहीं कर पाती.

इस पर भी दिक्कत यह है कि फसलों की पैदावार कम हो या ज्यादा, दोनों ही हालात में नुकसान किसान का ही होता है. उलट इस के, सरकार अपनी उपलब्धियों के आंकड़े इस तरह गिनाती है जैसे उस ने किसानों की जेब में खूब सारा पैसा ठूंस दिया हो. हकीकत यह है कि सरकारी मदद का बड़ा हिस्सा कमीशनबाज और मुलाजिम डकार जाते हैं.

इसे आसान तरीके से आंदोलन के दौरान सब्जी और फलों के बढ़े भावों से समझा जा सकता है. भोपाल की मंडी में किसानों को सब्जियों के वही दाम मिले जो पहले से मिल रहे थे. अगर कोई सब्जी मंडी में 20 रुपए किलो तुली तो उस के दाम आम लोगों को 40 के बजाय 80 रुपए किलो तक देना पड़े.

ये 40 रुपए दलालों, आढ़तियों और कमीशनखोरों की जेब में गए. किसान को कुछ नहीं मिला. यही हाल सालभर रहता है. ऐसे में किसान की भड़ास निकलना कुदरती बात है. यह और बात है कि वह गलत तरीके से निकली लेकिन गौर करने लायक बात यह भी है कि किसान अगर कैंडल मार्च जैसा शांतिभरा तरीका अपनाता तो क्या उस की बात सुनी जाती? शायद नहीं.

सरकारी महकमों से किसान का रोजरोज वास्ता पड़ता है. वहां भी कदमकदम पर घूसखोर बैठे हैं. थाने में रिपोर्ट लिखाने जाओ तो घूस, तहसील में पेशी पर जाओ तो घूस, अदालत में मुकदमे की तारीख लो तो घूस, सरकारी अस्पताल में इलाज कराने जाओ तो घूस, खेतीकिसानी महकमे से इमदाद या दूसरे मुफ्त के सामान लो तो भी घूस और पटवारी के पास नामांतरण व सीमांकन के लिए जाओ तो भी घूस देनी पड़ती है.  कदमकदम पर सागर के आनंद खत्री जैसे पटवारी बैठे हैं जो घूस लेते रंगेहाथों पकड़े जाएं तो भी उन का कुछ नहीं बिगड़ता. उलट इस के, शिवम ठाकुर जैसे किसान अगर वाजिब और जायज काम के लिए भी घूस न दें तो उन के तलवे घिस जाते हैं.

ऐसे में यह गुस्सा फट पड़ा तो बात कतई हैरानी की नहीं. देखना दिलचस्प होगा कि इस भड़ास का खात्मा कहां होगा और क्या यह दलाली, भ्रष्टाचार व कमीशनखोरी पर अंकुश लगा पाएगा.       वाकेआ 3 जून का मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के सागर शहर का है. इस दिन लोकायुक्त पुलिस ने एक पटवारी आनंद खत्री को एक किसान शिवम ठाकुर से साढ़े

3 हजार रुपए की घूस लेते रंगेहाथों पकड़ा था. शिवम बहुत दिनों से अपने दादा प्रहलाद ठाकुर की जमीन के सीमांकन के लिए तहसील और इस पटवारी के चक्कर काट रहा था पर पटवारी बगैर घूस लिए काम करने को तैयार नहीं हो रहा था.

पुश्तैनी जमीन के सीमांकन के अपने हक के लिए क्यों घूस दें, यह सोचते नौजवान किसान शिवम ने रैवेन्यू इंस्पैक्टर से शिकायत की तो रैवेन्यू इंस्पैक्टर ने पटवारी को हिदायत दी कि वह बगैर घूस लिए सीमांकन करे पर पटवारी को नहीं मानना था, सो वह नहीं माना.

घूस दे कर काम करवाने का सीधा तरीका अपनाने के बजाय शिवम ने इस की शिकायत लोकायुक्त पुलिस से भी कर दी जिस से घूसखोर पटवारी रंगेहाथों धरा गया. पटवारी अपनी इस जिद पर अड़ा था कि घूस का जो रेट सीमांकन के लिए चल रहा है, वह उसी के मान से घूस लेगा यानी 7 एकड़ जमीन के 7 हजार रुपए. इस पर हैरानपरेशान शिवम ने वही किया जो एक जागरूक किसान को करना चाहिए.

यह वह वक्त था जब पूरा सूबा खासतौर से मालवा और निमाड़ इलाके किसान आंदोलन और उस से उपजी हिंसा की आग में झुलस रहे थे. किसानों के इस गुस्से का किसी पटवारी तो दूर, आला अफसरों और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक पर कोई असर नहीं पड़ रहा था. मुट्ठीभर किसान हैं, 2-4 दिन हल्ला मचा कर वापस अपने खेतखलिहानों में चले जाएंगे, यह सोचते किसी के कानों पर जूं नहीं रेंग रही थी. कम ही लोगों को अंदाजा था कि जो परेशानी शिवम ठाकुर उठा रहा था वैसी दर्जनों परेशानियां न केवल सूबे के बल्कि देशभर के तमाम किसानों को रोजाना उठानी पड़ती हैं.

अरसे से किसानों के दिलोदिमाग में जमा हो रही इस तरह की परेशानियां जब भड़ास बन कर निकलीं तो पूरा मध्य प्रदेश हाहाकार कर उठा. हल चलाने वाला किसान सीधे आरपार की लड़ाई लड़ने को हिंसा पर उतारू हो आया तो एकाएक ही हालात इतने बेकाबू होते दिखे कि इसे आंदोलन के बजाय क्रांति कहना ज्यादा ठीक लगने लगा.

महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश

वह जून की पहली तारीख थी जब महाराष्ट्र के कुछ किसानों ने राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत की. आंदोलनकारी किसानों ने धौंस यह दी थी कि सूबे में दूध, सब्जी व फल की सप्लाई ठप कर दी जाएगी. इन किसानों का एतराज कर्जमाफी में वादाखिलाफी और अपनी पैदावार के वाजिब दाम न मिलने का था.

महाराष्ट्र के सतारा, अहमदनगर और नासिक जिलों में हड़ताल का खासा असर रहा. वहां किसानों ने वाकई सड़कों पर आते दूध, फल और सब्जी वगैरा की सप्लाई नहीं होने दी. आम लोगों के लिए यह सिरदर्दी वाली बात थी क्योंकि एक दिन में ही इन रोजमर्राई चीजों के दाम आसमान छूने लगे थे.

इस से पहले 31 मई को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसान क्रांति जन आंदोलन कोर कमेटी के किसानों से मिल कर बातचीत की थी. किसान अपनी इस जिद पर अड़े रहे थे कि उन का कर्ज पूरी तरह माफ किया जाए. इस पर देवेंद्र फडणवीस ने एक पुरानी चाल, मांग को टरकाने की चली और किसानों से एक महीने की मोहलत मांगी.

किसानों को समझ आ गया कि आज भी राजनीति ही खेली जा रही है, इसलिए वे बातचीत अधूरी छोड़ आ गए और फिर देखते ही देखते आंदोलन महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश में दाखिल हो गया. शुरू में मालवा और निमाड़ इलाके आंदोलन की गिरफ्त में ज्यादा रहे जहां पटेल, पाटीदार किसानों की भरमार है.

यहां दिचलस्पी वाली बात यह है कि इन इलाकों में पटेलपाटीदारों के पढ़ेलिखे नौजवान ज्यादा खेतीकिसानी और उस से जुड़े दूसरे कारोबार कर रहे हैं. ये लोग खासे पैसे वाले हैं और खेती से हुई कमाई का इस्तेमाल अपने शौक पूरे करने में भी करते हैं.

किसानों ने इंदौर, उज्जैन, रतलाम, नीमच और मंदसौर जिलों में चक्काजाम किया और जरूरी चीजों की सप्लाई ठप कर दी. पूरे सूबे में दूध और सब्जियों के दाम एकाएक ही बढ़ गए. जिस का दबाव सरकार पर भी पड़ा.

अब तक किसी को अंदाजा नहीं था कि किसान क्या सोच रहे हैं और आगे क्या करेंगे, अपना विरोध जताने किसानों ने आगजनी, चक्काजाम और तोड़फोड़ की वारदातों को अंजाम दिया तो इसे सरकार और उस के अफसरों ने बेहद हलके में लिया. बस, बात यहीं से बिगड़ी. कुछ आलाअफसरों की धुनाई भी किसानों ने कर दी थी.

6 जून को मंदसौर में प्रदर्शन कर रहे किसानों को रोकने या काबू करने के लिए पुलिस ने सब से आसान और पुराना तरीका फायरिंग का अपनाया. इस दिन मंदसौर में पुलिस वालों और किसानों के बीच जम कर मारपीट हुई थी. गुस्साए पुलिस वालों ने हालात काबू करने आई सीआरपीएफ की टीम की मदद से गोलियां चलाईं तो 6 किसान मारे गए.

अन्नदाताओं के पुलिस फायरिंग में मरने के बाद मचे हल्ले से नेताओं और अफसरों को होश आया पर तब तक काफीकुछ ऐसा हो चुका था जो नहीं होना चाहिए था. तुरंत कर्फ्यू लग गया और इंटरनैट वगैरा मंदसौर, नीमच व रतलाम में बंद कर दिए गए.

बिगड़ी इमेज किसानपुत्र की

मंदसौर में पुलिस प्रशासन ने किसानों के साथ जो बदसलूकी की, वह सोशल मीडिया पर भी वायरल हुई कि किसानों से निबटने के लिए जो भी तरीका कारगर लगे, अपनाने में हिचको मत.

इधर जब कारवां गुजर गया तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह सकते में आ गए कि यह क्या हो गया. मंदसौर हादसे ने उन की 13 साल पुरानी कुरसी के पाए हिला डाले. पहले तो झल्लाए शिवराज सिंह चौहान ने पानी पीपी कर कांग्रेस को कोसा, फिर कहा कि किसान तो हिंसक हो ही नहीं सकता, यह जरूर असामाजिक लोगों की करतूत है.

सोशल मीडिया पर शिवराज सिंह की जम कर खिंचाई हुई और मीडिया भी उन के राजकाज व कामकाज के तरीकों पर सवाल उठाने लगा. पहली दफा लोगों को पता चला कि शिवराज सिंह किसानपुत्र नहीं, बल्कि शिक्षकपुत्र हैं और विदिशा के गांव बैस टीला पर उन की जो 12 एकड़ जमीन थी, वह 12 साल में बढ़ कर 1,200 एकड़ हो गई है.

इन झूठ और सचों से दूर कहा यह भी गया कि जिस किसान के दम पर राज्य सरकार ने केंद्र सरकार का लगातार 5 दफा कृषि कर्मण अवार्ड जीता, आज उसी पर गोलियां क्यों बरसाई जा रही हैं.

कांग्रेस ने भी मौका ताड़ते मंदसौर हादसे पर शिवराज सिंह को आड़े हाथ लिया कि वे किसानप्रेम का झूठा राग अलापते रहते हैं और विदिशा में अपने खेतों की फसल को सरकारी हैलीकौप्टर से देखने जाते हैं. वे तो एक रईस किसान हैं जो आम किसानों का दुखदर्द नहीं समझते.

शिवराज सिंह चौहान का यह सोचना बेहद हलका साबित हुआ कि ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ दो तो बात बन जाएगी. दूसरा गलत फैसला उन्होंने मृत हुए किसानों को एकएक करोड़ रुपए का मुआवजा देने का लिया. पहले मरे किसानों के घर वालों को 5-5 लाख रुपए देने का ऐलान किया गया था, फिर यह राशि 1-1 करोड़ रुपए कर दी गई. इस से साफ साबित हुआ कि वे हमदर्दी तक खरीदना चाह रहे हैं. कल तक जो किसान असामाजिक तत्त्व नजर आ रहे थे, उन्हें इतना भारीभरकम मुआवजा देना भी उन्हें कठघरे में खड़ा कर गया.

सरकार की नाकामी

इधर, प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी मंदसौर हादसे की रिपोर्ट मांगी तो सूबे का सियासी पारा प्री मानसून के बादल चीर कर बाहर आ गया. ये चर्चाएं भी चौराहों पर होने लगीं कि उन की विदाई की जा सकती है क्योंकि वे किसान आंदोलन से निबटने या उसे संभालने में नाकाम रहे हैं.

इन सब कयासों के बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बेहद ड्रामाई अंदाज में राजस्थान के रास्ते मध्य प्रदेश में मोटरसाइकिल के जरिए दाखिल हुए तो नजारा देखने काबिल था. राहुल गांधी सहित वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह और कमलनाथ वगैरा भी गिरफ्तार कर लिए गए.

मंदसौर में राहुल गांधी ने शिवराज सिंह चौहान से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह कहते निशाना साधा कि वे रईस उद्योगपतियों का अरबों रुपयों का कर्ज माफ कर देते हैं पर किसानों को न तो बोनस देते, न ही कर्ज माफ करते. वे किसानों को तो गोलियां देते हैं.

मौका ताड़ते ही भाजपा का शिवराज विरोधी गुट भी अपनी ही पार्टी की छीछालेदर कराने से नहीं चूका. पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का यह बयान सुर्खियों में रहा कि कांग्रेस तो आंदोलन में कहीं थी ही नहीं, यानी यह सरकार की नाकामी का नतीजा था.

जब पोलें खुलने लगीं और तरहतरह की बातें होने लगीं तो बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक पहुंची जिस ने शिवराज सिंह के कामकाज करने के तरीके पर बजाय कुछ बोलने के, दूसरे सूबों के हालात का जायजा लेना शुरू कर दिया कि किसान आंदोलन अब राजस्थान, गुजरात और छत्तीसगढ़ सहित उत्तर प्रदेश तक में अपनी धमक दिखा रहा है. पहले इसे रोकने के जतन किए जाएं.

आरएसएस की चुप्पी जब टूटेगी तब टूटेगी पर यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं रह गई कि एक झटके में भाजपा और शिवराज सिंह की इमेज बिगड़ चुकी है. सूबे के लोगों का भरोसा उन पर से उठ रहा है. नर्मदा परिक्रमा यात्रा और पूजापाठ के एवज में उन्हें नर्मदा मैया ने बजाय वरदान के, श्राप दे दिया है. बारबार अपील करने पर भी किसानों का गुस्सा शांत नहीं हुआ तो वे 10 जून को भोपाल के दशहरा मैदान पर उपवास पर बैठ गए.

गुस्साए किसानों ने जगहजगह अपनी पैदावार फेंकी और सरकार के खिलाफ विरोधप्रदर्शन किए. यह साफ हो चुका है कि इस किसान आंदोलन के पीछे कोई नेता, संगठन या सियासी दल नहीं है. यह दरअसल शोषण और भ्रष्टाचार से तंग आ चुके किसानों का गुस्सा है जिसे अब बातों और वादों के लौलीपौप से नहीं बहलाया जा सकता.

राहुल गांधी के मंदसौर आने का मकसद माहौल और किसानों के गुस्से को कांग्रेस के पाले में लाने की कोशिश थी जो वोटों में तबदील हुई या नहीं, इस के लिए विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा. पर इस हादसे से सूबे में वजूद की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को संजीवनी बूटी जरूर मिल गई है. अब भी अगर वह किसान आंदोलन को वोटों में तबदील नहीं कर पाती है तो फिर उस का बेड़ागर्क होना तय है.

आमलोग और जानकार माहिर भी इस नतीजे पर पहुंचने से खुद को रोक नहीं पाए कि किसान आंदोलन को भाजपा के कुछ असंतुष्टों ने हवा दी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिवराज सिंह चौहान से छुटकारा पाना चाहते हैं क्योंकि वे उन के लिए बड़ा खतरा हैं.

आंदोलन का सच

सियासी बातों का कोई सिरपैर नहीं होता जिस के हल्ले के चलते मुद्दे की बात दबती गई कि आखिर क्यों किसानों को इतना गुस्सा आया कि वे हिंसा, आगजनी और चक्काजाम पर उतारू हो आए थे. एक अहम बात यह भी आंकी गई कि भाजपा ने महज वोटों के लिए किसानों के दिलों में जरूरत से ज्यादा उम्मीदें जगा दी थीं जो पूरी नहीं हुईं तो किसान बौरा उठा.

किसान आंदोलन का एक बड़ा सच यह है कि महाराष्ट्र या मध्य प्रदेश का ही नहीं, बल्कि देशभर का किसान बदहाल है. गांवों, कसबों और देहातों का माहौल तेजी से बदल रहा है. खेतीकिसानी की बागडोर पढ़ेलिखे जागरूक नौजवानों के हाथों में आ गई है जो इंटरनैट और कंप्यूटर इस्तेमाल करते हैं. इस जागरूक पीढ़ी को पुलिस के डंडे और गोलियों से दबाया नहीं जा सकता.

गांवों में ऊंची जाति वाले गिनेचुने लोग ही बचे हैं और बड़ी तादाद में गरीब, दलित, किसान भी गांवों से भाग कर रोजगार की तलाश में शहरों में बसते जा रहे हैं. ऐसे में गांवों की सत्ता पिछड़े तबके के किसानों के हाथों में आ गई है जिस के पास खासा पैसा है. वे अपनी बात कहने या मांगें मंगवाने में किसी संगठन या राजनीतिक पार्टी के मुहताज नहीं हैं. वे दोटूक बात करना चाहते हैं.

शोषण के शिकार किसान

इन किसानों ने देखा यह कि 4 महीने से भी ज्यादा चली नमामि देवी नर्मदा यात्रा के दौरान करोड़ों रुपए फूंकने वाले शिवराज सिंह चौहान जगहजगह पूजा, हवन और आरती करते रहे. जिन साधुसंतों ने कभी खेती नहीं की या पसीने की रोटी नहीं खाई, उन के पैर अन्नदाताओं से पकड़वाए गए. इस से उन्हें क्या मिला.

नीमच के एक युवा किसान जगदीश पाटीदार की मानें तो इस से शिवराज सिंह चौहान की इमेज बिगड़ी है. नमामि देवी नर्मदे यात्रा से किसानों का कोई फायदा नहीं हुआ है, न ही पूजापाठ से कभी होगा. फिर इस और ऐसे धार्मिक ड्रामेबाजों की जरूरत क्या है?

इस नौजवान किसान के मुताबिक, हो यह रहा था कि किसानों के भले का राग एहसान की तरह सरकारी विज्ञापनों के जरिए गाया जा रहा था. खुशहाल किसान अब सरकारी विज्ञापनों में ही बचा है जबकि हकीकत एकदम उलट है. किसान का हर स्तर पर शोषण हो रहा है और शिवराज सिंह चौहान जैसे नेता सच को सरकारी पैसों के प्रचार के दम पर झुठलाने का दोगलापन करते रहे हैं. इसलिए किसान आंदोलन मध्य प्रदेश में ज्यादा हिंसक हुआ.

गुस्से के पीछे छिपा दर्द

किसान आंदोलन और हिंसा कोई नई बात नहीं है. जब भी पानी सिर से गुजरने लगता है तब किसानों के सामने सड़क पर आने के अलावा कोई और रास्ता रह भी नहीं जाता. पर इस बार उस का अंदाज और मिजाज कुछ हट कर था. इस पर बारीकी से गौर करें तो यह कुछकुछ हरियाणा के जाट और गुजरात के पाटीदार आंदोलनों से मिलताजुलता हुआ था. फर्क इतना भर था कि इस में जातिगत आरक्षण की मांग नहीं थी.

इस आंदोलन की एक अहम बात यह थी कि अपनी मंशा की भनक किसानों ने प्रशासन या सरकार को नहीं लगने दी. गुस्साए किसानों ने अपनी करोड़ों की पैदावार फेंक कर खुद का तो नुकसान किया ही, सरकारी और जनता की जायदाद को भी नहीं बख्शा. मंदसौर गोलीकांड के बाद इंदौर के नजदीक देवास में आंदोलनकारियों ने 4 लग्जरी बसें फूंकी और रेल की पटरियां भी उखाड़ीं.

मंदसौर गोलीकांड में मारे गए एक युवा किसान अभिषेक पाटीदार के घर सरकारी हमदर्दी जताने गए कलैक्टर स्वतंत्र कुमार जैन के साथ किसानों ने बदसलूकी करते उन के कपड़े फाड़ दिए. इस से साबित हो गया कि उन्हें हमदर्दी नहीं, इंसाफ चाहिए था. दूसरे कुछ अफसरों के साथ भी किसानों ने इसी तरह की बदसलूकियां की.

8 जून को शाजापुर के एसडीएम राजेश यादव के साथ वाहन रैली निकाल रहे पाटीदार समाज के नौजवानों ने खूब मारपीट की और उन का पैर तोड़ डाला. ये लोग समर्थन मूल्य पर प्याज नहीं बिकने देना चाह रहे थे.

ऐसा सिर्फ इसलिए कि किसान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का यह जुमला बारबार याद आ रहा था कि जल्द ही खेती को लाभ का धंधा बनाएंगे. आंदोलन के दौरान ही किसान इस बात पर भी झींकते नजर आए कि जब लागत ही नहीं निकल पाती तो खेती को सरकार लाभ का धंधा कैसे बनाएगी. यह बात कई मंचों से बारबार दोहराई गई थी.

दूसरी परेशानी किसानों की यह थी और है भी कि उसे वाकई पैदावार के वाजिब दाम नहीं मिलते. तमाम मंडियां व्यापारियों, दलालों और आढ़तियों के कब्जे में हैं, जहां कदमकदम पर कमीशन देना पड़ता है और इस के बाद भी भुगतान का भरोसा नहीं रहता.

कर्ज की मार

कर्जमाफी का झुनझुना केंद्र और राज्य सरकारें दोनों बराबरी से किसानों को देती रही हैं पर जब इस पर अमल करने की मांग उन्होंने उठाई तो देवेंद्र फडणवीस तो साफ मुकर गए और शिवराज सिंह चौहान खामोश रहे. हालांकि गोलीकांड में मारे गए किसानों का दाहसंस्कार हो जाने के बाद उन्होंने किसानों के हित में कुछ ऐलान किए पर किसानों ने न तो उन की बातों पर ध्यान दिया और न ही भरोसा किया.

इसी दौरान यह बात उजागर हुई कि सूबे के 35 लाख से भी ज्यादा किसानों पर 20 हजार करोड़ रुपए का कर्ज बाकी है. इन में से 6 लाख किसान तो 5 वर्षों से ब्याज तक नहीं चुका पाए हैं. उन्हें दिवालिया घोषित किया जा चुका है.

खाली हाथ किसान

हिंसा के दौरान एक मशवरा यह भी चर्चा में आया कि राज्य सरकार हालात देखते पूरी तरह कर्जमाफी की घोषणा कर सकती है पर मजेदार बात रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का यह बयान रहा कि अगर पूरी तरह कर्ज माफ किया गया तो इस से महंगाई बढ़ेगी. गौरतलब है कि देशभर के किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा राशि का कर्ज है.

सालभर में देश के 12 हजार किसान खुदकुशी करते हैं, यह बात केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को एक सवाल के जवाब में बताई थी लेकिन हकीकत में यह तादाद कहीं ज्यादा है. किसान आत्महत्याओं को ले कर आएदिन सवालजवाब होते रहते हैं पर कोई सरकार किसानों की गरीबी या बदहाली दूर नहीं कर पाती.

इस पर भी दिक्कत यह है कि फसलों की पैदावार कम हो या ज्यादा, दोनों ही हालात में नुकसान किसान का ही होता है. उलट इस के, सरकार अपनी उपलब्धियों के आंकड़े इस तरह गिनाती है जैसे उस ने किसानों की जेब में खूब सारा पैसा ठूंस दिया हो. हकीकत यह है कि सरकारी मदद का बड़ा हिस्सा कमीशनबाज और मुलाजिम डकार जाते हैं.

इसे आसान तरीके से आंदोलन के दौरान सब्जी और फलों के बढ़े भावों से समझा जा सकता है. भोपाल की मंडी में किसानों को सब्जियों के वही दाम मिले जो पहले से मिल रहे थे. अगर कोई सब्जी मंडी में 20 रुपए किलो तुली तो उस के दाम आम लोगों को 40 के बजाय 80 रुपए किलो तक देना पड़े.

ये 40 रुपए दलालों, आढ़तियों और कमीशनखोरों की जेब में गए. किसान को कुछ नहीं मिला. यही हाल सालभर रहता है. ऐसे में किसान की भड़ास निकलना कुदरती बात है. यह और बात है कि वह गलत तरीके से निकली लेकिन गौर करने लायक बात यह भी है कि किसान अगर कैंडल मार्च जैसा शांतिभरा तरीका अपनाता तो क्या उस की बात सुनी जाती? शायद नहीं.

सरकारी महकमों से किसान का रोजरोज वास्ता पड़ता है. वहां भी कदमकदम पर घूसखोर बैठे हैं. थाने में रिपोर्ट लिखाने जाओ तो घूस, तहसील में पेशी पर जाओ तो घूस, अदालत में मुकदमे की तारीख लो तो घूस, सरकारी अस्पताल में इलाज कराने जाओ तो घूस, खेतीकिसानी महकमे से इमदाद या दूसरे मुफ्त के सामान लो तो भी घूस और पटवारी के पास नामांतरण व सीमांकन के लिए जाओ तो भी घूस देनी पड़ती है.  कदमकदम पर सागर के आनंद खत्री जैसे पटवारी बैठे हैं जो घूस लेते रंगेहाथों पकड़े जाएं तो भी उन का कुछ नहीं बिगड़ता. उलट इस के, शिवम ठाकुर जैसे किसान अगर वाजिब और जायज काम के लिए भी घूस न दें तो उन के तलवे घिस जाते हैं.

ऐसे में यह गुस्सा फट पड़ा तो बात कतई हैरानी की नहीं. देखना दिलचस्प होगा कि इस भड़ास का खात्मा कहां होगा और क्या यह दलाली, भ्रष्टाचार व कमीशनखोरी पर अंकुश लगा पाएगा.