यह सभ्य समाज का दुख या सहानुभूति नहीं बल्कि एक रोमांच है जिस पर मीडिया ने सहानुभूति दिखाकर, असलियत पर संवेदनाओं की चादर ढकते हुए जमकर कारोबार किया. एक तस्वीर वायरल हुई जिसमें दाना मांझी नाम का एक आदिवासी (निवासी कालाहांडी, राज्य ओडिशा) अपनी पत्नी अमंग देई की लाश भवानीपटना अस्पताल से कंधे पर लादकर कोई 12 किलोमीटर पैदल चला. अमंग टीबी की मरीज थी जिसे इलाज के लिए वह 60 किलोमीटर दूर अपने गाँव मेलघरा रामपुर से हफ्ते भर पहले लाया था.

23 अगस्त की रात को उसकी मौत हो गई तो दाना ने अस्पताल प्रबंधन से पत्नी की लाश गांव तक ले जाने के लिए एम्बुलेंस की मांग की लेकिन पैसे न चुका पाने के कारण उसे एम्बुलेंस मुहैया नहीं कराई गई. फौरी तौर पर उसे यही रास्ता बेहतर लगा कि जीवन संगिनी के शव को खुद कंधे पर ढो कर ले जाए. इस कलयुगी सत्यवान पर 12 किलोमीटर चलने के बाद किसी को रहम आया और उसे मदद मिली. इस सफर में उसकी 12 साल के बेटी भी साथ थी.

दाना मांझी की कहानी यहाँ खत्म नहीं होती बल्कि यहाँ से शुरू होती है. कंधे पर पत्नी की लाश ढ़ोते उसका फोटो वायरल हुआ तो सभ्य अभिजात्य और बुद्धिजीवी समुदाय की सहानुभूति इस तरह फट पड़ी की भुखमरी के लिए कुख्यात कालाहांडी का यह गुमनाम आदिवासी को रातों रात हीरो बना दिया गया.

बनाने वालों की असल मंशा मनुवाद और वर्णवाद पर किसी का ध्यान न जाए इस बात की थी इसलिए खासतौर से सोशल मीडिया पर उसकी पत्नी भक्ति और प्रेम के गीत गाये जाने लगे जिनमें रचनाकारों ने बताया कि दाना जैसे पति ऐसे छोटे मोटे हादसों की परवाह नहीं करते और जमाने को चुनोती देते सात जन्मों का यह रिश्ता इतनी शिद्दत से निभाते हैं कि उन पर फख्र करने दिल मचल उठता है.

एक ऐसी ही कविता की शुरुआत थी

संगिनी

तो क्या हुआ जो चार कांधे न मिले मैं अकेला ही बहुत हूँ चल सकूँ लेकर तुझे मोक्ष के उस द्वार…

ऐसी कवितायें बड़ी मार्मिक होती हैं जो क्रूरता ढ़कने के काम आती हैं. दाना ने कितनी बार बीमार पत्नी को यूं ही कंधे पर ढोकर भागा दौड़ी की होगी और रोज कितने दाना अपने मां, बाप पत्नी और परिजनो को यूं ही ढोते होंगे इससे किसी ने सरोकार नहीं रखा कुछ ने जरूर सरकार को कोसकर अपना फर्ज पूरा कर लिया.

बिहार, ओडिशा, छ्तीस्गढ़ पश्चिम बंगाल सहित दक्षिणी और पूर्वी राज्यों मे ऐसे नजारे आम हैं जिनमें से कोई उजागर हो जाए तो सभ्य शिक्षित समाज को अपने मुख्य धारा होने पर दाग लगता महसूस होने लगता है. लिहाजा वे घबराकर कवितायें लिखने लगते हैं घड़ियाली आँसू बहाने लगते हैं पर आदिवासियों की बदहाली के बाबत कुछ न कह पते न कर पाते.

करोड़ों आदिवासी जानवरों से बदतर जिंदगी जी रहे हैं और रसूखदारों के खेतों में बैलों की तरह जुते हल चला रहे हैं. इस सच को दाना के बहाने भी किसी ने नहीं देखा फिर उस ऐतिहासिक सच की तो बात करना ही बेमानी है जो तथ्यों से यह साबित करता है कि ये आदिवासी ही देश के मूल निवासी हैं जिन्हे आर्यों ने आकर अपना गुलाम बनाया, उनकी औरतों का बलात्कार किया और धर्म ग्रंथ रचते उन्हें शूद्र और सेवक करार दे दिया.

यही आर्य अब दाना की पत्नी भक्ति की आरतियाँ उतार रहे हैं जिससे कोई बड़ी बगावत ना हो आदिवासियों का शिक्षित और जागरूक होता वर्ग मान ले की समाज उनसे हमदर्दी रखता है और कवितायें लिखने की हद तक रखता है, बाकी तो सभी पहले से जानते हैं कि नीची जाति में पैदा होना, आर्यों की सेवा करना और अमंग की तरह यूं मर जाना सब पिछले जन्मों के कर्मों का फल है इसके बाद भी दाना महान है क्योकि उसमें वाकई संवेदनाएं हैं वह सुविधाभोगी नहीं है. उसके कंधों में वाकई पत्नी की लाश को अकेले उठाने का दम है. वह सभ्य समाज की तरह चार लोगों का मोहताज नहीं है.

शोषण को अपनी किस्मत मान बैठे ऐसे महान आदिवासियों से नक्सलियों और हल्ला मचाने बाले दूसरे संगठनो को भी सबक लेना चाहिए कि जिंदगी यूं भी गुजारी जा सकती है तो वे भी मिसाल बने तो इधर संवेदनाओं के कारोबारी हौसलाफजाई के लिए तैयार बैठे हैं.