सरिता विशेष

सवाल
मेरा रंग सांवला है जिस कारण मुझे कहीं जानेआने में शर्म महसूस होती है. मुझे रंग साफ करने का कोई तरीका बताएं?

जवाब
अपने मन से इस हीनभावना को निकाल दें कि आप का रंग काला है. अपने अंदर कौन्फिडैंस लाएं. कुदरती सांवलेपन को पूरी तरह से तो नहीं हटाया जा सकता, हां कुछ ट्रीटमैंट्स व घरेलू उपायों द्वारा स्किन कलर को कुछ लाइट जरूर किया जा सकता है. आप किसी अच्छे कौस्मैटिक क्लिनिक में जा कर स्किन लाइटनिंग ट्रीटमैंट ले सकती हैं. इस के अलावा घरेलू उपाय के तौर पर उबटन लगा सकती हैं. इस के लिए चावल का मोटा पिसा आटा, चने की दाल का आटा और मुलतानी मिट्टी समान मात्रा में लें. अब इस में चुटकी भर हलदी और कच्चे पपीते का गूदा मिला कर चेहरे व अन्य भागों की मालिश कीजिए. कच्चे पपीते में पैपेन नामक ऐंजाइम पाया जाता है, जो रंग साफ करता है. 1 महीने तक रोजाना 1 गिलास औरेंज जूस पीएं. इस से भी काफी हद तक रंगत निखरती है.

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सोच को निखारें रंग को नहीं

गोरी हैं कलाइयाँ, ’ गोरे गोरे  मुखड़े पे काला काला चश्मा ‘आजा पिया तोहे प्यार दूं गोरी बैयाँ तोपे वार दूँ चिट्टियाँ कलाइयाँ वे ,ये काली काली आँखें ये गोर गोरे गाल …… गोरेपन का  जादू कुछ इस कदर हम सब पर छाया  हुआ है कि फ़िल्में भी इससे अछूती नहीं रह पायीं. फिल्म-दर-फिल्म, पत्रिका-दर-पत्रिका, विज्ञापन-दर-विज्ञापन, होर्डिंग-दर-होर्डिंग गोरेपन का प्रचार हो रहा है . शादी के विज्ञापनों में भी “फ़ेयर एंड ब्यूटीफुल” यानी “साफ़ और सुन्दर” एक कसौटी बन चुकी है. खूबसूरती के साथ गोरेपन की चाहत मानो जीवन के हर कदम पर  अनिवार्यता  या कहें ओबसेशन बन चुका है. गोरे रंग के  इस ओबसेशन  के खिलाफ  बोलीवूड फिल्म अभिनेत्री नंदिता दास ने  एक अभियान भी शुरू किया था ‘स्टे अनफेयर,स्टे ब्यूटीफुल’ यानी सांवली बनी रहो, खूबसूरत बनी रहो.

अब घाना जैसे छोटे से देश ने गोरेपन के ऑब्सेशन के खिलाफ एक  ऐसा कदम उठाया है, जो अभी तक भारत नहीं कर पाया है. इंडिया और दूसरे एशियन देशों के बाद अफ्रिका में भी लोग गोरेपन को लेकर काफी क्रेज़ी हैं, जहां औरतें गोरी होने के लिए केमिकल्स का सहारा ले रही हैं. एक रीसर्च के मुताबिक 75 प्रतिशत नाइजीरियन औरतें, 27 प्रतिशत सेनेगलीज़ औरतें और 33 प्रतिशत साउथ ऐफ्रिकन औरतें नियमित तौर पर स्किन-लाइटनिंग प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करती हैं. (वहीं इडिया में बिकने वाले कॉस्मेटिक प्रोडक्ट्स में से आधी फेयरनेस क्रीम्स हैं.)

कई शोधों से पता चला है कि फेयरनेस क्रीम्स स्किन में डिसकलरेशन लाता है और इसे स्किन कैंसर से भी जोड़कर भी देखा गया है, जिसके चलते फ़ूड एंड ड्रग्स अथोरिटी  ने इनकी बिक्री पर रोक लगा दी. इस बैन के पीछे का कारण सिर्फ हेल्थ पर पड़ता  बुरा असर नहीं है बल्कि गोरेपन को लेकर लोगों के दिमाग में बैठा फितूर भी  है जो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से काफी खतरनाक है.नंदिता दास की ही तरह  घाना  की ऐक्ट्रेस अमा के अबेब्रेसे ने  भी गोरेपन को प्रमोट करते हुए ऐड्स देखने के बाद ‘लव यूअर नेचुरल स्किन टोन’ नाम से एक कैंपेन भी शुरू किया था.

38 साल पहले 1978 में हिंदुस्तान यूनिलीवर महिलाओं की त्वचा को गोरा और उजला करने के लिए फ़ेयर ऐंड लवली लेकर आया था और कोलकाता के इमामी ग्रुप ने फ़ेयर ऐण्ड हैंडसम के नाम से पुरूषों को गोरा करने का बीड़ा उठा रखा है. अनुमान लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 तक भारत का मध्यमवर्ग 10 गुना बढ़कर 58 करोड़ 30 लाख हो जाएगा.यह उद्योग काफी समय से देश में टिका हुआ है समय के साथ टारगेट ग्रुप बदल गया. हिंदुस्तान यूनिलिवर की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया है कि दक्षिण भारत के तमिलनाडु, केरल,कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के पुरुष गोरा करने वाली क्रीम के बड़े ख़रीदार है. त्वचा रोग विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य तौर पर गोरा दिखाने वाले उत्पाद नुकसानदायक नहीं होते लेकिन जो शरीर में मेलानिन के पिगमेंट कम करते हैं वह नुकसान पहुंचा सकते हैं .

सुंदरता की परिभाषा हर समाज में अलग अलग होती है. जहाँ भारत में गोरे रंग का मापदंड माना जाता है वहीँ  यूरोप और यूएस में स्किन का कलर ब्राउन होना काफी अच्छा माना जाता है. अपनी त्वचा का रंग गहरा करने के लिए लोग तरह-तरह के जतन करते रहते हैं. लेकिन वे इसके लिए प्राकृतिक  तरीकों के बजाय दूसरे तरीकों का इस्तेमाल अधिक करते हैं. इसकी वजह एक है कि यूरोपीय देशों में सिर्फ 3 या 4 महीने ही सूरज निकलता है इसलिए लोगों को धूप बहुत कम मिलती है. लोग टैनिंग करना इसलिए भी पसंद करते हैं कि इसे फिटनेस, खूबसूरती का प्रतीक माना जाता है. इसमें शरीर पर कृत्रिम तरीके से विशेष रोशनी डाली जाती है. इससे शरीर का रंग ब्राउन होने लगता हैं. यूरोप और यूएस में तो  बडे पैमाने पर इसके लिए  सैलून भी  खुले हैं.

आज भी भारत में अच्छी नौकरी, कामयाब ज़िंदगी और सर्वगुणसम्पन्न पति पाने के लिए गोरापन ज़रूरी है.त्वचा के रंग का भारत में बहुत गंभीर असर होता है. आज भी भाई बहनों में, दोस्तों में अगर कोई सांवला है तो उसे हिकारत की निगाह से देखा जाता है उसके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है .   यह  सोच बहुत ही घातक और खतरनाक है. क्योंकि यह सोच एक इंसान के आत्मविश्वास को तोड़ देती है .गोरा दिखने के  दीवाने  भारतीय समाज की इस सोच को बदलना ज़रूरी है यह सोच तभी बदलेगी जब लोग यह समझ सकेंगे कि सुंदरता का त्वचा के रंग से कोई लेना देना नहीं है..

 

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