सरिता विशेष

5 हजार साल से अधिक के इतिहास में 2007 में शायद पहली बार देश के किसी हिस्से में दलितों की अगुआई में बहुमत से सरकार बनी थी. दलित और उस से जुड़े लोग इसे बदलाव की नई बयार के रूप में देख रहे थे. इस के पहले तक दलित ऊंची जातियों के नीचे काम करता था. उस को सत्ता तो दूर, बराबर में बैठने और खाने व पीने का भी अधिकार नहीं था. न वह ऊंची जातियों की तरह खुशियां मना सकता था और न ही दुखों को जाहिर कर सकता था.

जब देश आजाद हुआ तब यह लगा कि शायद दलितों को बराबरी का हक मिल जाएगा. लोकतंत्र के नाम पर दलितों को ऊंची जातियों के पीछे चलने का ही हक मिला था. आजादी के कुछ समय पहले से ही दलित समाज के हित के लिए बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने एक नई राजनीतिक ताकत को जुटाने का प्रयास शुरू किया था.

चुनावी बदलाव के बाद लोगों को यकीन हो चला था कि बहुमत की सरकार बनाने के बाद मायावती दलितों की भलाई के काम करेंगी. लेकिन यह भ्रम जल्दी ही टूट गया. नतीजतन, मायावती से लोगों का ऐसा मोहभंग हुआ कि बसपा अपने सब से बुरे दौर में वापस चली गई.

2007 में बहुमत की सरकार बनाने का लाभ मायावती दलितों की भलाई में नहीं लगा सकीं. न वे दलितों के हालात बदल सकीं, न ही दलित समाज को सही राह दिखाने में सफल रहीं. यही वजह थी कि 5 साल सरकार चलाने के बाद मायावती को चुनावदर चुनाव हार का सामना करना पड़ा.

अपनी स्थापना के बाद से बसपा आज सब से खराब हालत में है. सोचने वाली बात यह है कि मायावती इस हालत से निबटने में खुद को बेसहारा पा रही हैं. वे विरोधी दल के रूप में संघर्ष करती नजर नहीं आ रही हैं. मायावती को अभी भी यह लग रहा है कि दूसरों से नाराज हो कर लोग उन की छत्रछाया में अपनेआप आ जाएंगे. यह सच है कि मायावती देश के बड़े दलित और कमजोर वर्ग के उत्थान का जरिया बन सकती थीं. इतिहास ने उन को जो मौका दिया था, उस में वे चूक गईं.

सत्ता न बन सकी बदलाव का जरिया

दलित समाज में अंधविश्वास, जातिबिरादरी, अशिक्षा और छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए कई सामाजिक संगठनों ने काम शुरू किया. बामसेफ और डीएस-4 ने भी कांशीराम की अगुआई में नई मुहिम शुरू कर दी थी. वे मानते थे कि सत्ता में भागीदारी कर के ही समाज को बदला जा सकता है.

अपनी राह को मजबूत करने के लिए कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया. बामसेफ और डीएस-4 की ताकत के बल पर यह पार्टी बहुत ही जल्द दलितों के बीच अपनी पैठ बनाने में सफल रही. 1991 में बसपा ने पहली बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में हिस्सा लिया और अपने 12 विधायकों को जीत दिलाने में सफलता हासिल की. सालदरसाल उस की ताकत भी बढ़ने लगी थी. 1993 में 67, 1996 में 68, 2002 में 98 विधायक बनाने में बसपा सफल रही थी.

1990 के दशक में प्रदेश में जातीय और धार्मिक आधार पर वोटों का धुव्रीकरण शुरू हुआ. इस की वजह से पहली  बार अयोध्या विवाद को सीढ़ी बना कर भारतीय जनता पार्टी सत्ता तक पहुंची थी. कांग्रेस के साथ रहने वाली बाकी ऊंची जातियां भाजपा के साथ आ खड़ी हुई थीं. केंद्र में उस समय के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन लागू कर के पिछड़ों की चेतना को जगा दिया था.

बसपा के संस्थापक कांशीराम को उस समय यह लगा कि अगर ऊंची जातियों को सत्ता से बाहर करना है तो दलित और पिछड़ों का गठजोड़ बनाना पड़ेगा. इसी के चलते बसपा और सपा का 1993 में गठजोड़ हुआ था. यह स्वाभाविक गठजोड़ था जो सदियों से वंचित शूद्रों यानी पिछड़ों और अछूतों यानी दलितों के बीच था. यह गठजोड़ एक अभूतपूर्व उत्पादक वर्ग पैदा कर सकता था और कम से कम उत्तर प्रदेश को नई चेतना व अर्थव्यवस्था दे सकता था पर यह चालबाजी व मूर्खता के कारण औंधेमुंह गिर गया. बसपा ने इस तरह के गठजोड़ कर के सत्ता पर तो कब्जा कर लिया पर सत्ता के जरिए व्यवस्था बदलने का उस का सपना पूरा नहीं हो सका. बाद में भी सत्ता को हासिल करने के लिए जो भी समझौते पार्टी ने किए वे उस के लिए घातक साबित हुए. बसपा के लिए गठजोड़ के साथ सत्ता हासिल करना दोधारी तलवार बन गई.

फिर न बन सका दलित-पिछड़ा गठजोड़

बसपा के सहयोग से समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने. कांशीराम की भावनाओं को मुलायम समझ नहीं पाए और यह कोशिश करने लगे कि बसपा को तोड़ दिया जाए. दूसरी तरफ भाजपा बसपा को अपनी ओर मिलाने के लिए बेताब थी. नतीजा यह हुआ कि सपा और बसपा

का गठजोड़ टूट गया. दलित और पिछड़ों की अगुआई करने वाली बसपा और सपा के बीच दूरियां इतनी बढ़ गईं कि दोबारा ये दल आपस में कभी मिल ही नहीं पाए.

सत्ता पर कब्जा करने के लिए बसपा ने पिछड़ों का साथ छोड़ कर अगड़ों का सहारा लिया. अगड़ों और पिछड़ों का यह गठबंधन बसपा को रास आया और बसपा नेता मायावती 3 बार मुख्यमंत्री बनीं. मायावती मुख्यमंत्री तो बन गईं पर बसपा में ऊंची जातियों का प्रवेश हुआ तो उन का जनाधार धीरेधीरे खिसकने लगा. मायावती के लिए दलित-अगड़ा गठजोड़ ‘केर बेर के संग’ साबित हुआ.

सरिता विशेष

कांशीराम के बाद मायावती जब बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं तो उन्होंने ऊंची जातियों की अगुआई करने वाली भाजपा के अगड़ी जातियों के वोटबैंक ब्राह्मण, बनिया और ठाकुरों को पार्टी से जोड़ने का काम किया. इस का सब से बड़ा असर यह दिखा कि मायावती की अगुआई में बसपा पहली बार प्रदेश की नंबर-1 पार्टी बन गई. इस समय यह लगा कि बसपा नेता मायावती ने बड़ी चतुराई से प्रदेश के राजनीतिक हालात को अपनी ओर मोड़ने में सफलता हासिल कर ली.

मायावती अपनी सफलता को बहुत दिनों तक बरकरार नहीं रख पाईं. दलित व पिछड़ा गठजोड़ एक बार टूटा तो फिर नहीं बन सका. अगर दलित-पिछड़ा गठजोड़ कायम रहता तो बसपा और सपा दोनों की आज जैसी हालत न होती. मायावती की व्यक्तिगत तानाशाही सोच इस राह में सब से बड़ा रोड़ा है तो वहीं समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव परिवार के साथ उन की दूरी दलित-पिछड़ा गठजोड़ की राह में सब से बड़ा रोड़ा है. अपनी राजनीतिक अदूरदर्शिता के चलते मुलायम परिवार के बिखरने का लाभ उठाने में भी मायावती चूक गईं.

सोशल इंजीनियरिंग से बिगड़ी बात

बसपा को पता था कि वह सत्ता पर तब तक कब्जा नहीं कर सकती जब तक दूसरी जातियां उस के साथ न आ जाएं. इसलिए उस ने दलित और अगड़ी जातियों के गठजोड़ का नया फार्मूला बनाया. इस का सब से बड़ा आधार यह था कि अगर बसपा को 24 फीसदी दलितों का वोट मिल जाए और 8 फीसदी दूसरी जिताऊ जातियों का वोट मिल जाए तो 32 फीसदी वोट उस का हो जाएगा और फिर वह सरकार बनाने में सफल हो जाएगी.

14वीं विधानसभा के चुनाव में बसपा ने ब्राह्मणों को 86, ठाकुरों को 67 और बनियों को 31 टिकट दे कर अपना फार्मूला पेश किया. इस का परिणाम यह रहा कि देश में पहली बार दलितों को सत्ता में कब्जा करने का पूरा अधिकार मिल गया. 2007 में बसपा का यह प्रयोग उस को बहुमत की सरकार बनाने में मददगार जरूर साबित हुआ पर यह बसपा की जड़ों को हिला गया.

कांशीराम अपनी बातों में ब्राह्मणवादी व्यवस्था को नीबू का रस कहते थे. दलितों को समझाते हुए वे कहते थे, ‘जिस तरह से नीबू का थोड़ा सा रस पूरे दूध को फाड़ देता है उस तरह  ब्राह्मणवादी व्यवस्था समाज को जाति और धर्म के रूप में अलगअलग कर देती है. छुआछूत की सब से बड़ी वजह यही व्यवस्था होती है.’ जब तक मायावती सरकार में रहीं तब तक उन को भी इस बात का एहसास नहीं हुआ कि सोशल इंजीनियरिंग के रूप में जिन अगड़ी जातियों, खासकर ब्राह्मणों, को बसपा से जोड़ लिया है, वे बसपा को बांटने में लगी हैं. वे इस बात से खुश थीं कि कई ब्राह्मण नेता उन के पैर छू रहे थे. वे खुद को दलितों की देवी मान बैठीं. उन को लगा कि उन का मान और सम्मान पूरे देश के दलितों के लिए जरूरी हो गया है. मायावती की यह सोच उन को जमीन से दूर करती गई.

बसपा को मजबूत करने के लिए मायावती ने सोचा कि दूसरे दलित संगठनों और राजनीतिक दलों को कमजोर कर दिया जाए तो बसपा कभी कमजोर नहीं होगी. दलित बसपा को छोड़ कर कहीं और नहीं जा सकता. मायावती यह भूल गईं कि सोशल इंजीनियरिंग के प्रभाव में दलित भी आ चुका है. उसे यह भी लगने लगा कि ऊंची जातियों की तरह से समाज में रहने के लिए उसे ऊंची जातियों सा व्यवहार करना चाहिए. इस में सब से बड़ा खतरा पूजापाठ से होने लगा.

मायावती ने दलित महापुरुषों के साथ कई पार्कों में अपनी खुद की मूर्तियां लगवा दीं. ऐसे में दलित खुद उसी मूर्तिपूजा की व्यवस्था में फंस गया जिस से निकालने के लिए डाक्टर अंबेडकर और कांशीराम ने पूरे समाज को जागरूक किया था. दलितों का मूर्तिपूजा और कर्मकांड की तरफ दोबारा आकर्षित होना बसपा पर भारी पड़ा.

समाज को जोड़ने में असफल

मायावती की छवि कमजोरों की मददगार की बनी. ‘चढ़ गुंडों की छाती पर, वोट लगा दो हाथी पर’ का नारा बताता है कि बाहुबलियों को ले कर बसपा नेता मायावती का क्या रुख था. बसपा की नेता मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी अलग छवि बनाई थी. एक कुशल प्रशासक के रूप में उन की आज भी तारीफ होती है.

मायावती के राज में बड़े से बड़ा बाहुबली भी घबरा जाता था. राजा भैया के अलावा दूसरे नेता मुख्तार अंसारी, अखिलेश सिंह, अतीक अहमद भी मायाराज में खुश नहीं थे. अपनी इस छवि को वे आगे कायम रखने में सफल नहीं हुईं. जब मायावती ने मुख्तार अंसारी की तारीफ शुरू की, उन की छवि को नुकसान पहुंचने लगा. कांशीराम ने जब मायावती को बसपा की विरासत सौंपी थी तो उन का सपना था कि वे पूरे वंचित समाज को एकजुट कर आगे बढ़ें. मायावती ने शुरुआती दौर में यह काम किया भी. बाद में उन की तानाशाही शैली से दलित समाज बिखरने लगा.

मायावती का जन्म 15 जनवरी, 1956 को गाजियाबाद जिले के छोटे से बादलपुर गांव, जो अब गौतमबुद्ध नगर जिले में है, में प्रभुदयाल और रामरती के घर में हुआ था. मायावती के 9 भाईबहन हैं. मायावती ने मेरठ विश्वविद्यालय से बीएड और दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की डिगरी हासिल की. दिल्ली के प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने की नौकरी भी की. उस समय मायावती दिल्ली के इंद्रपुरी इलाके में छोटे से घर में रहती थीं.

1984 में मायावती की मुलाकात कांशीराम से हुई. इस के बाद बहुजन समाज पार्टी बनी तो मायावती उस की शुरुआती सदस्य बनीं. मायावती ने अपने बचपन में भेदभाव और छुआछूत को करीब से देखा था. ऐसे में उन का पूरा प्रयास था कि वे इस वर्ग के उत्थान की दिशा में काम करेंगी. कांशीराम ने मायावती को समाज के लिए काम करने और राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए तैयार किया.

1984 में ही मायावती ने पहली बार कैराना लोकसभा से निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उन को 44 हजार वोट ही मिले. वे चुनाव हार गईं. 1989 में मायावती ने बिजनौर क्षेत्र से पहली बार चुनाव जीता. 1998 और 1999 में अकबरपुर से लोकसभा, 1994 में राज्यसभा, 1996 और 2002 में वे विधायक भी बनीं. 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. 1997 और 2002 में भी मायावती मुख्यमंत्री बनीं. सितंबर 2007 में मायावती बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं. मायावती चौथी बार मुख्यमंत्री बनने वाली देश की पहली महिला नेता बनीं.

मायावती के पहले वाले 3 कार्यकालों में जनता ने देखा है कि प्रदेश में कानून व्यवस्था का राज रहा. नौकरशाही पर लगाम लगाने में वे सब से आगे रहीं. हथियार ले कर सड़कों पर घूमने वालों की तादाद घट गई थी. मायावती कुशल प्रशासक तो बनीं पर उन में तानाशाही सोच का भी जन्म हो गया. सत्ता हासिल करने के लिए मायावती ने दलित-अगड़ा गठजोड़ तैयार कर के सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला तो तैयार कर लिया पर दलित समाज को एकजुट रखने में वे असफल रहीं. बसपा में दलितों के साथ अति पिछड़ी जातियां भी थीं, जो समाज में दलित जैसी हालत में ही थीं. मायावती इन को अपने साथ ले कर चलने में सफल नहीं हुईं. इन जातियों के नेता धीरेधीरे बसपा से अलग होने लगे. नेताओं के साथ उन से जुड़े लोग भी बसपा से दूर होने लगे. मायावती इन बातों को समझने को तैयार नहीं थीं.

हार से नहीं लिया सबक

2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने प्रधानमंत्री बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था. उस के पीछे की सोच थी कि जिस तरह से विधानसभा चुनाव में बसपा के पक्ष में वोट पड़े हैं, अगर वोटिंग का यही ट्रैंड रहा तो बसपा को लोकसभा की 35 से 40 सीटें उत्तर प्रदेश से मिल जाएंगी. असल में विधानसभा चुनावों के 2 वर्षों के अंदर ही बसपा से लोगों का मोहभंग हो चुका था. मायावती और उन के रणनीतिकार यह समझने को तैयार नहीं थे.

2009 के लोकसभा चुनावों का परिणाम बसपा की आशा के अनुकूल नहीं रहा. इस के बाद भी बसपा ने इस खतरे की घंटी को सुनने में चूक की. वह यह मानने को तैयार नहीं थी कि दलित वोट पार्टी से खिसकता जा रहा है. इस का परिणाम यह हुआ कि 2012 के विधानसभा चुनाव में उसे उस से बड़ी हार का सामना करना पड़ा. अपने तानाशाही रुख को छोड़ने को मायावती अब भी तैयार नहीं हैं. विरोधी पार्टी के रूप में जिस तरह से बसपा को संघर्ष करना चाहिए वह इस के लिए तैयार नहीं है.

विधानसभा चुनाव में सपा ने बसपा को चारोंखाने चित कर दिया. बसपा तब भी यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थी कि उस का बेस वोट खिसक चुका है. परिणाम यह हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट पर विजय हासिल नहीं हुई. बसपा को इस बात का गुमान था कि लोकसभा चुनाव में भले ही बसपा को वोट नहीं मिले हों, पर विधानसभा चुनाव में बसपा की सरकार बनेगी. समाजवादी पार्टी में बिखराव का लाभ उठाने में भी मायावती असफल रहीं. जिस के कारण लोकसभा की ही तरह विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को बुरी हार का सामना करना पड़ा. जिस का प्रभाव यह रहा कि बसपा के पास मायावती की राज्यसभा सीट बचाने लायक विधायक नहीं बन सके. 1993 के बाद पहली बार मायावती किसी सदन की नेता नहीं बन पाईं. जिस बसपा को 2007 में प्रचंड बहुमत मिला वह 10 वर्षों के अंदर प्रदेश में सब से नीचे के पायदान पर पहुंच गई. इस में मायावती की रणनीति का सब से बड़ा दोष रहा है.

जरूरी है दलित-पिछड़ा गठजोड़

दलित और पिछड़ों की अगुआई करने वाली बसपा और सपा दोनों ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर पहुंच गई हैं. दोनों के अपनेअपने बेस वोट पार्टियों से छिटक चुके हैं. भाजपा ने अपने नवहिंदुत्व के सहारे दलित और पिछड़ों को मूर्तिपूजा व धार्मिक कर्मकांडों से जोड़ने में सफलता हासिल कर ली है. भाजपा ने गाय, गंगा और अयोध्या जैसे मुद्दों को उठा कर हिंदुत्व की नई बहस छेड़ कर दलितपिछड़ों को खुद से जोड़ने में सफलता पा ली है.

अब चुनाव का मुद्दा जाति से हट कर धर्म पर टिक गया है. धर्म के नाम पर दलितपिछड़ा वर्ग सपाबसपा से दूर भाजपा के पक्ष में खड़ा हो जाता है. सपा व बसपा दोनों को इस बात का भ्रम था कि ज्यादा से ज्यादा मुसलिमों को टिकट दे कर वे मुसलिम वोट को अपने पक्ष में कर सकती हैं. सपा व बसपा के इस कदम से इन पार्टियों के विरोध में हिंदू वोट एकजुट हो गया. पहले हिंदुत्व के नाम पर अगड़ी जातियां ही भाजपा के पक्ष में खड़ी होती थीं, अब दलित और पिछड़ी जातियां भी भाजपा के पक्ष में खड़ी हो गई हैं.

दलित और पिछड़ों के बीच धार्मिक महत्त्व का बढ़ना खतरे की घंटी है. सपा व बसपा दोनों के बड़े नेता इस बात को समझने को तैयार नहीं हैं. उन में विचारक तो हैं ही नहीं. जो विचारक हैं भी, उन्हें ये नेता बुद्धिजीवी मान कर अछूत मानते हैं और चार हाथ दूर रखते हैं. उन्होंने अपने को चाटुकारों से घेर रखा है जो जाति विशेष का खयाल रखते हैं, जनता में समरसता आने में विश्वास नहीं रखते. इसलिए वे खुद हिंदुत्व को अपना कर भाजपा की कार्बन कौपी बनने की तैयारी में हैं. सपा व बसपा के मुख्य नेताओं को लगता है कि धार्मिक कर्मकांड से वे भाजपा को उस की ही भाषा में मात दे सकते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि धार्मिक कर्मकांड की राह पर चल रहे वे ‘माया मिला न राम’ वाली हालत में पहुंच जाएंगे. अयोध्या में राम की मूर्ति लगवाने के विवाद पर जब सपा नेता अखिलेश यादव से सवाल किया गया तो वे बोले, ‘जब हम सत्ता में आएंगे तब इस से बड़ी मूर्ति लगवा देंगे.’ असल वे उस शर्म को भूल गए जिस ने शंबूक के वेद पढ़ने पर आपत्ति की थी.

अखिलेश जिस तरह से समाजवादी विचारधारा से दूर हो गए हैं, उसी तरह मायावती बहुजन की विचारधारा को दरकिनार कर चुकी हैं. विचारधारा छोड़ चुके ये दल केवल राजनेता बन कर रह गए हैं. जिस का लाभ लेते हुए भाजपा ने अपने नवहिंदुत्व का प्रचार किया. नतीजतन, दलित और पिछड़े दोनों ही मूर्तिपूजा के समर्थक बन कर हिंदुत्व की विचारधारा पर चल पड़े. उन्हें मनुवाद से होने वाले नुकसान की समझ नहीं है. वे अगड़ा बनने के लिए उन की ही तरह से पूजापाठ में लग गए हैं. उन्हें इस बात का आभास नहीं कि पूजापाठ से सामाजिक समरसता नहीं आएगी, पूजापाठ में लग कर भी दलित समाज मुख्यधारा का अंग नहीं बन सकेगा. जबकि भाजपा इस का लाभ उठा कर अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करती रहेगी.

मायावती की कमियां

–       कुरसी से हटने के बाद उत्तर प्रदेश से दूरी बना लेती हैं. उन का संघर्ष केवल प्रैस कौन्फ्रैंस तक सीमित रह जाता है. बसपा और उस के कार्यकर्ता बगैर सेनापति के संघर्ष करने में असफल.

–       बसपा का कार्यालय अपने लोगों का मददगार नहीं बनता. किले की तरह बना पार्टी कार्यालय अपनों को संरक्षण देने में असफल.

–       मायावती के तानाशाही रुख से दलितों की छोटीछोटी कई जातियां और उन के नेता पार्टी से दूर होते गए. बसपा ने नया वोटबैंक नहीं बनाया.

–       मायावती दलितों में कर्मकांड और धार्मिक कुरीतियों के सच को उजागर करने में असफल. जिस मूर्तिपूजा का बसपा विरोध करती थी, मायावती ने उस का समर्थन किया.

–       अंबेडकर और कांशीराम के कर्मकांडविरोधी विचारों को फैलाने में बसपा असफल. इसी के चलते दलित कर्मकांड और उस के जाल में उलझ गए.

–       तानाशाही व्यवहार को छोड़ने में मायावती असफल. जनता, नेताओं और दूसरे लोगों से सीधे संपर्क नहीं करतीं.

किस को धमकी दे रही हैं मायावती

भाजपा नहीं सुधरी तो मायावती बौद्ध धर्म अपना लेंगी. खुद मायावती ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में एक सभा में यह बात कही. उन का कहना है कि भाजपा दलितों, अति पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों के प्रति अपनी सोच नहीं बदलती तो वे हिंदू धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म अपना लेंगी. मायावती ने यह बात बसपा के एक कार्यकर्ता सम्मेलन में कही. पूर्वांचल के आजमगढ़ में आयोजित सम्मेलन में आजमगढ़, वाराणसी और गोरखपुर के कार्यकर्ता हिस्सा ले रहे थे. मायावती की इस धमकी को फूलपुर लोकसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव से जोड़ कर देखा जा रहा है.

मायावती की रणनीति यह है कि किसी भी तरह से वे चुनावी लड़ाई में सब से प्रबल दावेदार बनी रहें.

मायावती ने बौद्ध धर्म अपनाने की धमकी दे कर नए सवालों को जन्म दे दिया है. लोगों को यह समझ नहीं आ रहा कि डाक्टर भीमराव अंबेडकर की नीतियों पर चलने के बाद अब तक मायावती ने बौद्ध धर्म स्वीकार क्यों नहीं किया? क्या अब तक दलितों के साथ कोई भेदभाव नहीं हो रहा था?

हिंदू धर्म में बढ़े भेदभाव, धार्मिक कर्मकांड और ऐसी ही तमाम कुरीतियों का विरोध करते हुए डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म अपना लिया था. इस का प्रभाव भी पड़ा. कम से कम दलित बिरादरी में नई सोच का जन्म हुआ था. दलित वर्ग के लोग खुद तो जागरूक हो ही रहे थे, अपने साथियों को भी जागरूक कर रहे थे. जब दलित आंदोलन को ले कर कांशीराम आगे बढ़े तब तक वे बौद्ध धर्म अपना नहीं पाए थे.

मायावती ने दलित आंदोलन से एकजुट बिरादरी का लाभ ले कर उत्तर प्रदेश में अपनी एक ताकत बनाई. 4 बार वे प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. वे दलित चेतना की बात को भूल गईं. राजनीतिक ताकत के लिए दलितब्राह्मण गठजोड़ कर लिया. ऐसे में कभी भी यह नहीं लगा कि सामाजिक रूप से कहीं दलित और ब्राह्मण एकसाथ खड़े हों.

दलित के साथ तब भी समाज में वही भेदभाव था जो आज है. मायावती को दलित बिरादरी के लिए सामाजिक रूप से जो करना था वह वे नहीं कर पाईं. जिस से दलित को लगा कि क्यों न वह धर्म की शरण में जा कर ही अपना उद्धार कर ले. भाजपा ने इस बात का लाभ उठाया. दलितों के कुछ वर्गों को भाजपा ने अपने साथ मिला लिया. अब ये लोग अगड़ों की तरह पूजा करते हैं. ये लोग मंदिरों में जा कर पूजापाठ करना चाहते हैं. इन को लगता है कि अगड़ी जातियों की बराबरी के लिए जरूरी है कि वे भी उस तरह के ही काम करें. यह वर्ग इसी सोच में फंस, मायावती से दूर हट गया. भाजपा ने इस वर्ग को नवहिंदुत्व का पाठ पढ़ा दिया.

मायावती की असल परेशानी यह है कि दलित नवहिंदुत्व की विचारधारा में शामिल हो कर भाजपा से क्यों जुड़ रहे हैं? अगर यह बात मायावती ने कुछ समय पहले स्वीकार की होती और अपने में सुधार किया होता तो बसपा इतना पीछे नहीं जाती. अब मायावती के बौद्ध धर्म अपनाने से भाजपा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला. दलित समाज भी इस को ले कर बहुत गंभीर नहीं है.

मायावती को अगर दलितों को अपने से जोड़ना है तो वे उन को यह समझाना शुरू करें कि क्या उन के लिए अच्छा है और क्या बुरा? दलित अब पहले की तरह मायावती की बातों पर आंख मूंद कर भरोसा करने को तैयार नहीं है. मायावती की दलितों के बीच जो छवि 2007 में थी, अब वह वैसी नहीं रह गई है. मायावती को अगर अपनी खोई जमीन हासिल करनी है तो खोई छवि भी वापस लानी होगी, तभी बसपा का भला होगा. बौद्ध धर्म के शिगूफे से कुछ हासिल नहीं होगा. दलितों की बड़ी बिरादरी बौद्ध धर्म और उस की खूबियों से अब परिचित भी नहीं रह गई है.