सरिता विशेष

समाजवादी पार्टी के अंदर मचे घमासान से उत्तर प्रदेश में दूसरे राजनीतिक दलों की बांछें खिल गई हैं. अपने पार्टी के नेताओं के पलायन से परेशान बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती सब से अधिक खुश हैं. राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में सपा व बसपा के मध्य मुख्य टक्कर मानी जाती है. अब तक मुख्यमंत्री के रूप में लोग मायावती के मुकाबले अखिलेश यादव को बेहतर मान रहे थे. अखिलेश यादव नाम लेने की जगह मायावती को बूआजी कह कर संबोधित करते थे. जो मायावती को पसंद नहीं आता था. अब सपा में चल रहे घमासान से मायावती को राहत है.

सर्वे के अनुसार, सपा अब तीसरे पायदान पर चली गई है. भाजपा के साथ संभावित टक्कर से बसपा को थोड़ा सुकून है. उसे लग रहा है कि भाजपा का गांवों में ज्यादा असर नहीं है, ऐसे में उसे लाभ होगा. सपा में मची रार से भाजपा में भी खुशी की लहर है. अखिलेश यादव भाजपा को चालाकों की पार्टी कहते थे. वे बारबार दावा करते थे कि भाजपा अगर उन से मुकाबला करना चाहती है तो अपने मुख्यमंत्री का चेहरा सामने लाए. भाजपा अखिलेश के इस दांव के सामने खुद को विवश पा रही थी. सपा में रार से भाजपा अब फीलगुड मूड में है. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य कहते हैं, ‘‘भाजपा को सरकार बनाने से कोई रोक नहीं सकता. विपक्ष एकजुट होगा तो भी भाजपा सरकार बना लेगी.’’ हां, सपा में रार से कांग्रेस को परेशानी है. वह सपा के खिलाफ खड़ी नहीं होना चाहती. सपा में अखिलेश गुट को कांग्रेस नेता राहुल गांधी का समर्थन बताया जा रहा है. ऐसे में कांग्रेस सपा का साथ देने को तैयार है. सपा में शिवपाल यादव गुट लोकदल और जनता दल यूनाइटेड के साथ गठबंधन कर बिहार की तर्ज पर बड़ा गठबंधन बनाने की तैयारी में हैं. ये मुलायम को नेता बना कर विधानसभा और लोकसभा दोनों चुनाव लड़ सकते हैं. प्रधानमंत्री के नाम पर अखिलेश यादव भी मुलायम सिंह का विरोध नहीं कर पाएंगे.

सपा में घमासान का प्रभाव पार्टी के अंदर काफी पड़ रहा है. पार्टी के ज्यादातर नेता व कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे कि वे किस का साथ दें, किस के  विरोध में रहें. विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण तक यह लड़ाई और गहरी हो सकती है.

यह बात अपनी जगह सच है कि अखिलेश के प्रति जनता में सहानुभूति की लहर है. उत्तर प्रदेश के लोग यह सोच रहे हैं कि अखिलेश बेहतर शासन दे सकते थे, मुलायम और पार्टी के दूसरे बड़े नेताओं ने उन को सही तरह से काम करने नहीं दिया. जिस तरह से अखिलेश ने विरोध किया उस से उन की दब्बूपने वाली छवि बदली है. आने वाले विधानसभा चुनाव में अखिलेश का कद बढ़ रहा है. अपने इस कदम से वे उत्तर प्रदेश में मजबूत नेता की छवि बनाने में सफल तो हुए हैं लेकिन यह भी सच है कि सपा के प्रति लोगों का रुझान कमजोर हुआ है. ऐसे में बिना पार्टी की जीत के अखिलेश कैसे सफल होंगे, यह देखने वाली बात होगी.

अखिलेश का भविष्य आने वाले दिनों में उन के फैसलों पर निर्भर करेगा. फिलहाल सपा के घमासान से उन को लाभ होता दिख रहा है. वे अपनी छवि बनाने में तो सफल हैं पर संगठन की नजर से वे कमजोर हैं. अखिलेश की एक नकारात्मक छवि भी जनता के बीच है कि वे अपने खास लोगों का ही साथ देते हैं. इसी वजह से वे संगठन में दूसरे लोगों को जोड़ने में सफल नहीं हो पा रहे हैं.

घरेलू विवाद से पार्टी पर असर

समाजवादी पार्टी का जनाधार उत्तर प्रदेश के बाहर नहीं है. इस के बाद भी सपा में छिडे़ घरेलू विवाद पर पूरे देश की नजर लगी है. सपा में परिवार और पार्टी दोनों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है. जिस से यह साफ है कि परिवार में छिडे़ विवाद का असर पार्टी पर पडे़गा.

सपा में आरपार की इस लड़ाई में जीत किसी की भी हो पर हार समाजवादी पार्टी की होगी. जिस का असर केवल उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की राजनीति पर भी पड़ेगा.

पिछले 2 दशकों से भी लंबे समय से सपा देश में सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ मजबूती से खड़ी नजर आती रही. उत्तर प्रदेश देश का सब से ज्यादा जनसंख्या वाला प्रदेश है और सपा प्रदेश की सब से बड़ी जनाधार वाली पार्टी है. ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति में सपा के असर को नकारा नहीं जा सकता. जिस समय देश में कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया हो उस समय सपा की जिम्मेदारी और उपयोगिता और भी जरूरी हो जाती है.

सपा का बिखराव सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करेगा. और यह राजनीति के लिए सुखद संदेश नहीं है. एक पक्षीय राजनीति कभी भी किसी भी देश और समाज के हित में नहीं रही है. इसी लिए राजनीति के प्रमुख जानकार मजबूत विपक्ष को देश के विकास का अहम हिस्सा मानते हैं. समाजवादी पार्टी की तरह महाराष्ट्र में शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, दक्षिण में एम करुणानिधि की पार्टी, आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी और जम्मू में नैशनल कौन्फ्रैंस में भी बिखराव हुए हैं. ये पार्टियां छोटी थीं. इन का असर क्षेत्रीय स्तर पर था. जिस की वजह से इन का प्रभाव देश की राजनीति पर कम महसूस किया गया. सपा बड़े प्रदेश की बड़ी पार्टी है. इस का बिखराव देश की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित करेगा.

सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव को इस बात का अंदेशा था कि एक दिन पार्टी में बिखराव के हालात आ सकते हैं. इस कारण ही मुलायम ने हमेशा अपने

बेटे अखिलेश को अपना राजनीतिक उत्तराधिकार सौंपने का काम किया. 1999 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने संभल और कन्नौज दोनों ही सीटों से चुनाव लड़ा. एक सीट खाली कर उपचुनाव का समय आया तो मुलायम ने कन्नौज सीट अपने इंजीनियर बेटे अखिलेश के लिए छोड़ दी. जहां से अखिलेश यादव पहली बार संसद में पहुंचे.

इस घटना से तय हो गया था कि आने वाले दिनों में अखिलेश ही मुलायम के राजनीतिक उत्तराधिकारी होंगे. अखिलेश उस समय राजनीति में सक्रिय नहीं थे. वे पर्यावरण इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर के विदेश से लौटे थे. अखिलेश के मुकाबले मुलायम के

भाई शिवपाल राजनीति में थे पर उन को मुलायम ने अपना उत्तराधिकार नहीं दिया.

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अखिलेश की डिंपल से शादी होने के बाद मुलायम अपनी बहू को भी राजनीति में लाए और वह संसद सदस्य बनी. मुलायम अपने बेटे और बहू को ही राजनीति में नहीं लाए बल्कि पूरे परिवार को एकएक कर लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधान परिषद और जिला पंचायत तक में प्रभावी पदों पर ले आए. आज देश का सब से बड़ा मुलायम परिवार है जिस के एकसाथ इतने सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं. भाई शिवपाल को मुलायम अपना सब से प्रिय मानते हैं. इस के बाद भी वे असल उत्तराधिकारी नहीं बन सके. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के संगठन में शिवपाल का प्रभावी असर है. जब 2012 में विधानसभा के चुनाव में सपा ने पूरे बहुमत से सरकार बनाई तो मुलायम ने एक बार फिर बेटे अखिलेश को मुख्यमंत्री बना कर अपने उत्तराधिकार पर मजबूत मुहर लगा दी.

घर में ही गुटबाजी

मुलायम को लग रहा था कि जिस तरह से परिवार के लोगों ने उन का सहयोग दिया उस तरह से ही वे सभी अखिलेश का भी साथ देंगे. यादव परिवार मुलायम के उत्तराधिकारी के रूप में अखिलेश यादव को स्वीकार कर चुका था. परिवार में कोई बड़ा मतभेद नहीं था. अखिलेश के उत्तराधिकार से सब से बड़ी चुनौती मुलायम की दूसरी पत्नी साधना के गुट से मिलने लगी. साधना के बेटे प्रतीक को राजनीति में लाने की योजना बनी. इस के लिए पार्टीके कुछ नेताओं ने लामबंदी भी शुरू की पर मुलायम ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. पार्टी स्तर पर यह मसला भले ही टल गया पर परिवार में यह बात बनी रही. ऐसे में मुलायम ने प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव को लखनऊ की कैंट विधानसभा सीट से 2017 में विधानसभा चुनाव लड़ने का टिकट दे दिया.

अब सपा में अंदरखाने नेताओं के 2 गुट उभरने लगे. अपर्णा यादव के चुनाव प्रचार का काम तेजी से आगे बढ़ने लगा. अपर्णा की मदद का दिखावा कर कई नेताओं, ब्यूरोक्रेटस और बिजनैसमेन मुलायम के करीब आने लगे. मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक ने अपने बिजनैस में खुद को व्यस्त करना शुरू कर दिया. वे पत्नी अपर्णा के हर कदम पर उस का साथ देने लगे. घर में 2 गुटों का लाभ लेने के लिए अवसरवादी नेताओं ने मुलायम परिवार के बीच की खाई को चौड़ा करना शुरू कर दिया. ऐसे में घोषिततौर पर अखिलेश को घर के अंदर से चुनौती मिलने की शुरुआत हो गई. अखिलेश के संबंध साधना और उन के परिवार से मधुर नहीं रहे. अखिलेश पिता मुलायम की हर बात को मानते हुए सरकार चला रहे थे. जैसेजैसे 2017 का विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है, मुलायम परिवार में खेमेबंदी तेज होती जा रही है.

अखिलेश का पलटवार

अब तक अखिलेश भी यह समझ चुके कि उन के खिलाफ राजनीतिक साजिश रची जा रही है. अखिलेश को चाचा शिवपाल से भी खतरा महसूस होने लगा. असल में अखिलेश ने एकसाथ 2 मोरचों पर मुकाबला करना शुरू कर दिया. परिवार के अंदर चल रही खींचतान तब सामने आई जब कैबिनैट मंत्री गायत्री प्रजापति को अखिलेश ने अपने मंत्रिमंडल से बाहर किया और चाचा शिवपाल के कुछ विभागों में कटौती की.  अखिलेश के पलटवार से हालात बिगड़ गए. परिवार के अंदर चल रहा विवाद सड़कों पर आ गया. एक खेमे ने दूसरे खेमे को आईना दिखाना शुरू कर दिया. अखिलेश के पलटवार पर केवल चाचा शिवपाल ही नाराज नहीं हुए, पिता मुलायम भी असहज महसूस करने लगे. बदले में मुलायम ने अखिलेश को समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया.

यह कदम अखिलेश को पसंद नहीं आया और वे बगावत पर उतर आए. अब तक उन को यादव परिवार के प्रमुख सदस्य और सपा महासचिव प्रोफैसर रामगोपाल यादव का साथ मिल चुका था. रामगोपाल यादव को सपा में थिंकटैंक माना जाता है. वे अखिलेश को यह समझाने में सफल रहे कि इस सारे फसाद की जड़ में अमर सिंह का हाथ है. यादव परिवार पूरे मसले में मुलायम की दूसरी पत्नी साधना को सामने लाने से बच रहा था. ऐसे में रामगोपाल और अखिलेश ने अमर सिंह पर तीर चलाने शुरू कर दिए. यह बताया गया कि अमर सिंह से मिल कर शिवपाल सपा में बगावत को हवा दे रहे हैं. यहां से खुलेतौर पर परिवार के अंदर ही एकदूसरे पर हमले शुरू हो गए. यहां यह बता दें कि प्रोफैसर रामगोपाल यादव को पार्टी की मौजूदा जंग का निशाना होना पड़ा है, उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया है.

देखने में भले ही मुलायम सिंह यादव छोटे कद के हों पर शारीरिक और बौद्धिक ताकत में वे विरोधियों पर हमेशा भारी पड़ते रहे हैं. हमेशा धोतीकुरता, सदरी और पैरों में चमडे़ के जूते पहनने वाले मुलायम का राजनीतिक सफर 50 साल से ऊपर का है. उन की समाजवादी पार्टी अब 25 साल पूरे कर रही है. प्रदेश में ही नहीं, पूरे देश में उन की पार्टी से अधिक प्रभावशाली उन का अपना व्यक्तित्व है. यह बात सच है कि सपा में पार्टी और परिवार में कोई फर्क नहीं है. इस के बाद भी उम्र के इस पड़ाव पर मुलायम के लिए इन चुनौतियों से निबटना सरल नहीं है. राजनीति में जो लोग मुलायम को लंबे समय से देखते रहे हैं उन को यकीन है कि पहलवान से नेता बने मुलायम परिवार और पार्टी को बचाने के लिए कोई भी ‘चरखा दांव’ चल सकते हैं. जिस का पता विरोधियों के चित्त होने पर ही चलेगा.    

1990 के दशक में जब देश में मंडल कमीशन लागू हुआ तो मुलायम सिंह यादव पिछड़े वर्ग के प्रमुख नेता के रूप में उभरे. इस के साथ ही साथ, वे भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में खडे़ हुए. भाजपा ने अयोध्या में राममंदिर बनाने को ले कर आंदोलन शुरू किया तो मुलायम सिंह यादव ने सब से पहले उस का विरोध किया. इस के चलते कट्टरवादी ताकतों ने मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक की उपाधि दे दी. इस के बाद भी मुलायम डरे नहीं और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खडे़ नजर आए.

मुलायम सिंह यादव ने 1991 में समाजवादी पार्टी की स्थापना की. 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार बर्खास्त हो गई. इस के बाद हुए विधानसभा चुनाव में मुलायम ने बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम के साथ गठजोड़ कर के सरकार बनाई. सांप्रदायिक ताकतों का विरोध करते हुए जनता ने उस समय नारा दिया ‘मिले मुलायमकांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्रीराम’

मुलायम और कांशीराम का दलितपिछड़ा गठजोड़ लंबे समय तक आगे नहीं चल पाया. यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा किए बिना ही गिर गई. जिस के बाद बसपाभाजपा के गठजोड़ से मायावती मुख्यमंत्री बनीं.

दलित चिंतक रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘मनुवादी ताकतें नहीं चाहती थीं कि प्रदेश में दलितपिछड़ा गठजोड़ बने. इस के लिए बसपा नेता मायावती की महत्त्वाकांक्षा को जगाया गया और यह गठजोड़ टूट गया.’’

मनुवादियों की साजिश से सपा-बसपा गठजोड़ ऐसा टूटा कि इस के एक होने की संभावना ही खत्म हो गई. 20 साल के बाद अब जब समाजवादी पार्टी बिखराव की राह पर है तो एक बार फिर से आरोप भाजपा पर है कि वह सपा को तोड़ना चाहती है.