मोदी का शुद्धियज्ञ, अनुयायियों की अंधभक्ति

मोदी के नोटबंदी वाले शुद्धियज्ञ में भ्रष्टाचारी, बेईमान, कालेधन के मालिक भी साफसाफ बच निकले. फिर भी अंधभक्त व अनुयायी हैं कि समझने को तैयार नहीं.

जगदीश पंवार | January 31, 2017

दीवाली के तुरंत बाद हमारा देश ऐतिहासिक शुद्धियज्ञ का गवाह बना है. सवा सौ करोड़ देशवासियों के धैर्य और संकल्पशक्ति से चला यह शुद्धियज्ञ आने वाले अनेक वर्षों तक देश की दिशा निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाएगा. हमारे राष्ट्र जीवन और समाज जीवन में भ्रष्टाचार, कालाधन, जाली नोटों के जाल ने ईमानदार को भी घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था. उस का मन स्वीकार नहीं करता था, पर उसे परिस्थितियों को सहन करना पड़ता था, स्वीकार करना पड़ता था. दीवाली के बाद की घटनाओं से सिद्ध हो चुका है कि करोड़ों देशवासी ऐसी घुटन से मुक्ति के अवसर की तलाश कर रहे थे.  

जब देश के कोटिकोटि नागरिक अपने ही भीतर घर कर गई बीमारियों के खिलाफ, विकृतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में उतरते हैं तो वह घटना हर किसी को नए सिरे से सोचने को पे्ररित करती है. दीवाली के बाद देशवासी लगातार दृढ़संकल्प के साथ, अप्रतिम धैर्य के साथ, त्याग की पराकाष्ठा करते हुए, कष्ट झेलते हुए, बुराइयों को पराजित करने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. जब हम कहते हैं कि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’, तो इस बात को देशवासियों ने जी कर दिखाया है. कभी लगता था कि सामाजिक जीवन की बुराइयां, विकृतियां जानेअनजाने में, इच्छाअनिच्छा से हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई हैं लेकिन 8 नवंबर, 2016 की घटना हमें पुनर्विचार के लिए मजबूर करती है.’’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 50 दिन के यज्ञ के बाद 31 दिसंबर, 2016 की शाम प्रजा के नाम जब यह संदेश दिया तो 5 हजार साल पहले पांडु कुल के अंतिम सम्राट राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ की कथा ताजा हो गई. जनमेजय ने पृथ्वी से सांपों के अस्तित्व को मिटाने के लिए सर्पमेध यज्ञ किया था.

पौराणिक कथा के अनुसार, परीक्षित, पांडु के एकमात्र वंशज थे. उन को किसी ऋषि ने श्राप दिया था कि वे सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त होंगे. ऐसा ही हुआ. सर्पराज तक्षक की वजह से मर गए. परीक्षित की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर की राजगद्दी पर उन के पुत्र जनमेजय विराजमान हुए. जनमेजय पिता की मौत से बहुत आहत हुए और उन्होंने सारे सर्प वंश का समूल नाश करने का संकल्प लिया. इसी उद्देश्य से उन्होंने सर्पयज्ञ के आयोजन का निश्चय किया. यह यज्ञ इतना भयंकर था कि विश्व के सारे सर्पों का महाविनाश होने लगा.

राजा ने जैसे ही महायज्ञ का आरंभ किया तो आह्वान करने पर विभिन्न प्रकार के सर्प और नागों की प्रजातियां एकएक कर अग्निकुंड में समाहित होने लगीं. यज्ञ के धुंए से लोगों की आंखें लाल हो गईं. कालेकाले कपड़े पहने ऋषिगण  जोरजोर से मंत्रोच्चार कर रहे थे. उस समय सारे सर्पों का हृदय डर से कांपने लगा. एकदूसरे से लिपटते, चीखतेचिल्लाते सर्प हवनकुंड में आआ कर  गिरने लगे. उन के जलने की दुर्गंध चारों ओर फैल गई. उन के शोरशराबे व चीख से सारा आकाश गूंज उठा.

यह समाचार तक्षक ने भी सुना. वह भयभीत हो कर देवराज इंद्र की शरण में चला गया. इंद्र उस की रक्षा करने के लिए आगे आना चाहते थे पर यज्ञ इतना विशाल था कि वे तक्षक की कोई मदद नहीं कर पाए.

सर्पयज्ञ में एकएक कर सारे सर्प भस्म होने लगे. जो बेचारे भस्म हो रहे थे उन्हें मालूम ही नहीं था कि आखिर उन का कुसूर क्या है.

वहीं, तक्षक को बचाने के लिए राजा जनमेजय से यज्ञ को समाप्त कराने के लिए जाल बुना गया. इस के लिए वासुकि नाम का नाग आगे आया. वह अस्तीक ऋषि के आश्रम  में गया. वहां जा कर उस ने विनती की कि वे किसी तरह इस यज्ञ को समाप्त करा दें. फिर अस्तीक ऋषि राजा के पास पहुंचे. राजा से कहा गया कि जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ, पर इस का मतलब यह नहीं कि किसी एक प्रजाति के जीवों की पूरी सृष्टि ही खत्म कर दी जाए. राजा जनमेजय को लगा कि ऋषि ठीक कह रहे हैं और इस तरह यज्ञ समाप्त कर दिया गया पर इस के बाद राजा राजपाट छोड़ कर जंगल में जा कर संन्यासी हो गए.

आम लोगों की बढ़ी परेशानी

इधर, 8 नवंबर को मोदी ने कालाधन बाहर निकालने के लिए ज्यों ही शुद्धियज्ञ की घोषणा की, जनमेजय के सर्पयज्ञ की भांति कालाधन बैंकों में आ कर जमा होने लगा. कालाधन रखने वालों में खलबली मची या नहीं, आम लोगों में जरूर परेशानी बढ़ गई. वे बैंकों में अपना पैसा जमा कराने व निकालने के लिए लाइनों में लग गए.

50 दिन रोज नए सरकारी नियमों के मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुए. अखंड शुद्धिकरण महायज्ञ में आम जनता की आहुतियों से सरकारी तिजोरियां दानदक्षिणा से भर गईं.

जनमेजय की दुश्मनी नागराजा से थी पर बेकुसूर सांप भी यज्ञ की अग्नि में आ कर जलने लगे. मोदी के निशाने पर भ्रष्टाचारी, कालाधन रखने वाले रहे होंगे पर इस यज्ञ में निर्दोषों की आहुतियां चढ़ने लगीं.

मोदी ने कुछ अलग हट कर नहीं किया. ऐसे काम तो हिंदू राजा करते आए हैं. वे स्मृतियों, पुराणों में लिखी व्यवस्था से चलते थे जो पक्षपातपूर्ण, अन्याय और गैरबराबरी पर आधारित थी. शूद्र को संपत्ति के स्वामित्व से वंचित किया गया है. इस व्यवस्था में राजा को किसी का भी धन जबरन छीनने का अधिकार सुरक्षित था. शूद्र को धनसंपत्ति रखने का हक ही नहीं था. वैश्य का धन भी वह यज्ञ को संपन्न कराने के लिए जबरदस्ती छीन सकता था. धर्मग्रंथों में राजा को मनुष्यों में श्रेष्ठ बताया गया है. उस के वचन ईश्वर के आदेश माने गए हैं. गं्रथों में लिखी बातें भी ईश्वरीय वाणी बताई गई हैं, फिर राजा और प्रजा भला अलग हट कर कैसे चल सकते हैं.

मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है कि शूद्र संपत्ति नहीं रख सकता. अगर उस के  पास कुछ है, यानी वह कोई उत्पाद तैयार करता है तो ब्राह्मण को अधिकार है कि वह उसे छीन ले.

विस्रब्धं ब्राह्मण: शूद्राद् द्रव्योपादानमाचरेत्,

न हि तस्यास्ति किंचित्स्वं भर्तृहार्य धनोहि स:.

मनुस्मृति, 8-417

अर्थात, ब्राह्मण शूद्र से द्रव्य ले ले क्योंकि शूद्र का अपना कुछ नहीं होता. ये जिस के अधीन रहते हैं या जिस की सेवा करते हैं, धन का मालिक वही होता है.

भार्यापुत्रश्च दासश्च त्रय एव अधना.

मनुस्मृति, 8-416

यानी पत्नी, पुत्र और शूद्र ये तीनों  संपत्ति के योग्य नहीं हैं.

न स्वामिना निसृष्टोपि शूद्रो दास्याद्विमुच्यते.

आश्चर्यजनक यह है कि दासत्व से मालिक मुक्त भी कर दे तो भी शूद्र को दासता करनी ही होगी.

यह जो जयजयकार हो रही है, यह दासता का स्वाभाविक गुण है.

मनु ने लिखा है,

निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तपोहति.

यानी दासता उस का स्वाभाविक धर्म है, उस से उसे कौन अलग कर सकता है.

इस तथाकथित शुद्धिकरण से कितना नफानुकसान हुआ, कभी सटीक आकलन नहीं हो पाएगा पर इतना तय है कालेधन के खिलाफ मोदी के इस ब्रह्मास्त्र से जमीनी स्तर पर लाखों गरीब, मध्यवर्ग के लोग प्रभावित हुए हैं. सरकार अभी तक यह आंकड़े नहीं बता पाई है कि नोटबंदी के बाद लोगों द्वारा जमा कराए गए 14.86 लाख करोड़ रुपए में से कितना कालाधन है. कितना शुद्ध हुआ? असली कालेधन के कुबेर तो सुरक्षा के लिए तक्षक की तरह  बैंकों में बैठे भ्रष्ट इंद्र की शरण में चले गए जहां उन्हें अभयमुक्ति मिल गई. बेईमानी में इंद्र का कोई सानी नहीं था, इसीलिए तक्षक इंद्र के पास गया.

राजाओं ने यज्ञ हमेशा अपने लिए किए हैं, जनता के कल्याण के लिए नहीं. पुत्रेष्ठि यज्ञ से ले कर अश्वमेध यज्ञ तक राजा की निजी इच्छापूर्ति के लिए हुए. राजा इस तरह के फैसले कभी जनता से पूछ कर नहीं लेते. उन के निर्णय निरंकुश, गैरलोकतांत्रिक होते हैं. जनमेजय ने भी सर्पमुक्त पृथ्वी का निर्णय तक्षक से निजी दुश्मनी के चलते लिया था. जनता के भले के लिए नहीं. युद्ध राजाओं द्वारा आपसी लूट और साम्राज्य बढ़ाने के मकसद से होते रहे हैं.

अब कैशलैस यज्ञ चल रहा है. यज्ञ का विरोध तो कोई कर ही नहीं सकता. यह तो देवयज्ञ था और देवयज्ञ नहीं करने वाले चोर, पापी हो जाते हैं, इसीलिए लाइनों में लगे लोग परेशानी के बावजूद मोदी के इस यज्ञ को अश्वमेध यज्ञ से कम नहीं मान रहे थे हालांकि मोदी के इस महान यज्ञकर्म में विघ्न डालने वाले, विध्वंस करने वाले बीच में आए कुछ बेईमान बैंक कर्मचारियों के कारनामों को देवइच्छा ही समझा गया.

शुद्धिकरण के नाम पर जनता से लूटे गए इस धन में से कुछ गरीबों में बांटने का ऐलान और हर गर्भवती महिला को बच्चा जन्मने के बाद 6 हजार रुपए का सौभाग्यवती, 100 पुत्रों की मां होने जैसा आशीर्वाद मोदी को वापस सत्ता दिलाने वाला सिद्ध होगा या फिर सर्पयज्ञ के बाद जनमेजय की तरह संन्यास  ले कर जंगल की ओर चल देने जैसा. इस देश में राजा के अंधभक्त अनुयायी अपने शासक के प्रति धर्म द्वारा थोपी गईर् सोच से अलग हट कर चलना सीख पाएंगे, इस में संदेह है.        

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सरकारों की मनमानी

70 साल के लोकतांत्रिक शासन और उस से पहले अंगरेज शासन में भी आधेअधूरे वोट से चुने गए प्रतिनिधियों के सीमित शासन के आदी होने के बावजूद इस नोटबंदी पर देश कुछ न कर पाया.

January 10, 2017

नरेंद्र मोदी की नोटबंदी ने यह साफ कर दिया है कि हमारा लोकतांत्रिक अधिकार वास्तव में कितना कमजोर है. 70 साल के लोकतांत्रिक शासन और उस से पहले अंगरेज शासन में भी आधेअधूरे वोट से चुने गए प्रतिनिधियों के सीमित शासन के आदी होने के बावजूद इस नोटबंदी पर देश कुछ न कर पाया. संसद में विरोधी पक्ष अपनी बात न कह पाया, लोग सड़कों पर लाइनों में लगे रहे, पर गुस्सा न जाहिर कर पाए.

भारत की तरह विश्व के अन्य देशों में भी लोकतंत्र से बनी सरकारें अकसर मनमानी करती रहती हैं. अमेरिका ने देश को पहले वियतनाम लड़ाई में भी बिना जनता की राय के झोंक दिया था, फिर इराक व अफगानिस्तान के युद्धों में. दक्षिण कोरिया में राष्ट्रपति पार्क ग्वेन हे को हटाने की मांग की जा रही है, पर कोई सुन नहीं रहा. अमेरिका में ही अश्वेतों, लेटिनों और दूसरे इम्मीग्रैंटों का रहना खतरे में पहुंच गया है. इंगलैंड ने बहुमत से यूरोपीय यूनियन से निकलने का फैसला किया है, पर जनमत संग्रह लोकतांत्रिक है या नहीं, इस की बहस चालू है.

लोकतंत्र का अर्थ केवल 2-3 साल बाद एक मतदान केंद्र में वोट डालना भर नहीं है. लोकतंत्र का अर्थ है कि जनता को उस के सभी मौलिक व मानवीय अधिकार मिलें और वह अपने नीति निर्धारकों को चुनने में स्वतंत्र हो, पर ज्यादातर लोकतंत्रों में एक तरह की राजशाही, मोनार्की खड़ी हो गई है, जिस में नौकरशाही, बड़ी कार्पोरेशनें और राजनीतिक दल शामिल हैं, जिन का संचालन वे लोग करते हैं, जो उत्पादन में नहीं लगे, दूसरों के उत्पादन को लूटते हैं.

सफलता आज यह नहीं है कि आप ने कितना जनता को सुख दिया, सफलता यह है कि आप ने जनता से कितना लूटा, चाहे उस से ज्यादा कमवा कर लूटा या भूखा मार कर लूटा. भारत में नोटबंदी भूखा मार कर लूटने का उदाहरण है, जिस में सत्तारूढ़ राजनीतिक दल, बड़ी कंपनियों के मालिक, बैंकर, नौकरशाही, हिंदू धर्म व्यवस्था के पैरोकार और अंधभक्त शामिल हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप को लाने वालों में कट्टरपंथी चर्च, बड़ी कार्पोरेशनें, समर्थ गोरे, बंदूकें रखने के हिमायती शामिल हैं.

ये सब आम जनता के लोकतांत्रिक मानवीय मौलिक अधिकारों के बदले जनता से कहते हैं कि जैसा है वैसा स्वीकार करो. भारत और अमेरिका में लाखों लोग जेलों में बिना गुनाह साबित हुए गिरफ्तार हैं, पर चुनावों की प्रक्रिया को लोकतंत्र कह कर ढोल पीटा जाता है. यह अधूरा लोकतंत्र है. यह षड्यंत्र है. यह जनता को दिया जाने वाला झुनझुना बन कर रह गया है. जनता अगर बेहाल, निरीह है, तो इसीलिए कि उसे कैदियों की तरह रखा जा रहा है और सूखी रोटी के साथ यहांवहां एक चम्मच हलवा वोट देने के हक के नाम पर दे दिया जाता है. वोट दे कर वह सरकार चलाने वाले चेहरे बदल सकती है, पर सरकार नहीं, शासन प्रक्रिया नहीं, कानून व्यवस्था नहीं, कुशासन नहीं. लोकतंत्र उस के लिए उस स्वर्ग की तरह है, जिस के सपने हर धर्म दिखाता है, पर कभी किसी को मिलता नहीं है. 

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