बहिन मायावती वैसे तो हमेशा ही तिलमिलाइ सी दिखती हैं पर अब पानी सर से गुजरता जा रहा है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गाँव जोगियापुर जिला वाराणसी राज्य उत्तर प्रदेश के एक दलित परिवार के घर जाकर खाना खा लिया है. तय है खाना खाने के बाद वे वोट भी मांगेगे. बिहार की हार से भगवा खेमे में बड़ा तनाव था कि दलितों ने वोट क्यों नहीं दिये.  उज्जैन का कुम्भ आते आते जो मंथन भज भज मंडली ने किया, उससे एक कलश जबाब की शक्ल में यह निकला कि राम से तुमने कुछ सीखा नहीं, उसने शबरी के झूठे बेर खाये थे, तुम लोग खाना खाओ, तब कहीं जाकर यूपी के ख्वाब देखना.

अब जिसे देखो वो दलितों के घर खाना खाने दौड़ रहा है, मानो  मुफ्त का लंगर चल रहा हो या अमृत बंट रहा हो. मायावती को भरोसा नहीं हो रहा कि उनकी आँखों के सामने उनकी ही आंखो के काजल पर मनुवादी डाका डाल रहे हैं और वे कुछ नहीं कर पा रहीं, इसलिए उन्हें शुबहा हुआ कि जरूर दाल में कुछ काला है. लिहाजा अपने सेवकों को उन्होने यह कहते एक मिशन पर लगा दिया है कि जरूर वो रसोइया जिसने अमित शाह का खाना बनाया, ऊंची जाति वाला रहा होगा, उसे ढूंढ कर लाओ और मेरे सामने पेश करो. अगर खाना वाकई दलित गृहणी ने नहीं, किसी किराए के रसोइये ने बनाया होगा तो जरूर अमित शाह को घेरा जा सकता है.

बहिन जी की दुकान खतरे में है. वर्ण व्यवस्था के निर्माताओं के मानद वंशज ही उसे ध्वस्त कर रहे हैं, तो अब वे क्या खाकर वोट मांगेंगी. राहुल गांधी भी यही करते थे, लेकिन चूंकि कांग्रेसी थे इसलिए बड़ा खतरा साबित नहीं हुये उन्हे दलितों ने खाना तो बड़े प्रेम से खिलाया पर सत्ता की मलाई से दूर रखा, जिसकी असल  वजह भाजपाई ही बता रहे हैं कि नेहरू गांधी परिवार को तो खूब खिला दिया, मायावती को भी खिलाया पर क्या इससे तुम्हारी दशा सुधरी, मुलायम अखिलेश के राज में अब पिछड़े तुम पर जूते चटका रहे हैं, इसलिए अब हमे खाने दो, चूंकि इस दुर्दशा के असली जिम्मेदार या गुनहगार हम ही हैं, इसलिए इसे दूर करने का मंत्र भी हमारे पास ही है. हम पिछड़ों को धकियाकर तुम्हें साथ ले लेंगे. इससे हालांकि कुछ ब्राह्मण नाराज होंगे, पर तुम उनकी चिंता या लिहाज मत करना, क्योंकि हम उन्हे कुछ ऊंची कुर्सियां देकर खामोश करा देंगे.

हम पुराने पापों के प्रायश्चित के अधिकारी हैं हम संविधान से आरक्षण तो हटा सकते हैं पर धर्म ग्रन्थों से शूद्र शब्द हटा पाने का अधिकार या हिम्मत कुछ भी समझ लो हममे नहीं है. दलित अब धर्म संकट में है कि लो दीनदायल खुद द्वार पर भिक्षा पात्र लिए पहली बार आये हैं और हम हरि के जन उन्हे खाली हाथ टरका दें, तो क्या हमें पाप नहीं लगेगा?  हमारे घर खाना खाकर हमारा उद्धार करने वाले हम से एक वोट ही तो मांग रहे हैं, जो निहायत ही क्षुद्र चीज है. किसी को भी दे दें, हमारा क्या बनना बिगड़ना है, हम तो जैसे थे वैसे ही रहेंगे. इसी धर्मसंकट से बहिन जी दुखी हैं कि विकास की कर लेते, मंदिर की कर लेते, पर ये राम दूत तो भेड़ की खाल में आ गए. अब इन का क्या किया जाए, इसलिए उस रसोइये को सवर्ण साबित किया जाए, जो सारे ड्रामे की जड़ है.