जाति का रोग

जाति पूछना राष्ट्रीय रोग है तो बगैर पूछे अपनी जाति बताना महारोग है. अभिनेता अनुपम खेर की जाति ज्यादा लोग नहीं जानते थे.

सरिता विशेष

जाति पूछना राष्ट्रीय रोग है तो बगैर पूछे अपनी जाति बताना महारोग है. अभिनेता अनुपम खेर की जाति ज्यादा लोग नहीं जानते थे पर जैसे ही उन्होंने बीते दिनों यह कहा कि जिस दिन जम्मूकश्मीर से धारा 370 हट जाएगी उस दिन कश्मीर समस्या सुलझ जाएगी. इस बयान से कई लोगों को पता चला कि अनुपम एक प्रतिभाशाली अभिनेता ही नहीं, बल्कि कश्मीरी पंडित भी हैं जो कश्मीरी पंडितों की अलग टाउनशिप की हिमायत करते हैं. कश्मीर समस्या का इतना संक्षिप्त हल हर वह शख्स भी तुरंत बता देता है जो नहीं जानता कि दरअसल यह समस्या है क्या. इस वर्ग ने तो 370 को ही समस्या मान लिया है जो किसी न किसी रूप में पूरे देश में लागू है. अब उम्मीद की जानी चाहिए कि नरेंद्र मोदी इस बाबत पहल करेंगे क्योंकि सहिष्णुता के मुद्दे पर अनुपम खेर ने वक्त रहते उन की मदद की थी.

Private: जाति के भीतर जाति का जहर

जाति का सवाल उठा कर बिहार के मुख्यमंत्री पद पर मचे घमासान ने यह साफ कर दिया है कि अभी जाति दफन नहीं हुई है.

March 20, 2015
सरिता विशेष

जाति का सवाल उठा कर बिहार के मुख्यमंत्री पद पर मचे घमासान ने यह साफ कर दिया है कि अभी जाति दफन नहीं हुई है. उलटे उस के कीकर के कटीले पेड़ बड़े होने लगे हैं. हालत तो यह है कि ये पेड़ दुनियाभर में हैं जहां भी भारतीय मूल के लोगों ने पनाह पाई है. यूरोप, अमेरिका, जापान, थाईलैंड, पश्चिमी एशिया सब जगह जाति की गठरी लोगों के साथ जा रही है. ऊंची जातियों के लोगों ने हर देश में खासी सफलता पाई है. यह अफसोस की बात है कि जिन देशों में बराबरी के मौके हैं, वहां भी निचली कही जाने वाली जातियों के भारतीय घटिया कामों तक ही सीमित रह गए. उन की सोच इतनी कुंठा भरी है और शराब, निकम्मापन और सदियों की गुलामी का जहर इस तरह से बसा है कि अमेरिका वालों की तरह वे भी भारत, चीन, जापान से गए अमीर ऊंचे घरों के लोगों से बराबरी का मुकाबला नहीं कर पा रहे. इंगलैंड के एक छोटे शहर में दलित घर से आए एक जने ने अपना पब यानी रेस्त्रां खोल लिया. ऊंची जातियों के भारतीय मूल के लोगों ने उसे ‘चमार पब’ कहकह कर बदनाम कर दिया और उसे दूसरे इलाके में जाना पड़ा, जहां भारतीय मूल के लोग कम थे. इंगलैंड के ही एक दूसरे शहर में एक दलित मूल के भारतीय को नगरनिकायों के चुनावों में अपना चुनाव इलाका बदलना पड़ा, क्योंकि उस के अपने इलाके में भारतीय मूल के लोग ज्यादा थे, जो जाति देख कर वोट डालते थे.

उम्मीद थी कि पढ़ाई, पैसा और पावर से जाति का सवाल धूमिल पड़ने लगेगा, पर भारतीय मूल के लोग भारत से 100-150 साल बाहर रहने के बावजूद अपनी जाति नहीं भूलते और दोस्ती और शादी दोनों में इस का पूरा खयाल रखते हैं. वजह यह है कि भारत में दलितों व दूसरी पिछड़ी जातियों ने लग कर इस जातिवाद के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं किया. वे जाति की वजह से भेदभाव की शिकायत करते हैं, अपनी गरीबी का रोना रोते हैं, आरक्षण मांगते हैं, पर जाति का बिल्ला छोड़ने या तोड़ने को तैयार नहीं हैं.

इस की एक वजह यह है कि दलित व पिछड़ी जातियों में कई उपजातियां हैं और उन में से हर जाति अपने से नीची जाति से वैसा ही बरताव करती है, जैसा उस से उस के ऊपर वाली करती है. यानी हर जाति जहां ऊपर वालों के लिए नफरत का निशाना है, वहीं हर जाति के पास किसी से नफरत करने का हक है और उसी के गुमान में वह जाति का प्रपंच बनाए रखती है, ताकि कुछ पर रोब गांठ सके. जाति का कहर न केवल हर जने को अपमानित करता है, यह उस की तरक्की के रास्ते में कहर है.