अपनी नर्मदा सेवा यात्रा की ब्रांडिंग के लिए नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी को बुलाने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने योग गुरु कम कारोबारी ज्यादा बाबा रामदेव को भी बुला भेजा. भोपाल में इन दोनों की मुलाकात ठीक वैसी ही थी जैसी द्वापर और त्रेता युग में राजाओं और राजर्षियों की हुआ करती थी. दोनों एक दूसरे के प्रति बड़ा सम्मान और आत्मीयता दिखाते थे. ऋषि के आने का मतलब होता था कि आश्रमों में अन्न वगैरह खत्म हो चला है या फिर दुश्मन की गतिविधियों से वह राजन को अवगत कराना चाहता है, राजा इसलिए भी प्रसन्न होता था कि जाते जाते गुरुवर एकाध अश्वमेघ या जनकल्याण के लिए किसी यज्ञ की तात्कालिक आवश्यकता पर जोर देकर प्रजा को एक झुनझुना थमा जाते थे जिससे प्रजा का ध्यान अपनी समस्याओं और राजा की ज्यादतियों से हटकर हवन कुंड से उठते धुए में लग जाता था और वह अच्छे दिनों के सपने देखने लगती थी.

इस मुलाकात यानि डील के माने मुंह लगे दरबारियों के अलावा किसी को समझ नहीं आते थे कि बाबा जी हफ्ता वसूली के साथ साथ जनता को भी चूना लगाकर चलते बने हैं. इधर लोकतंत्र के चलते राजा-बाबा की मुलाकातों के मायने काफी कुछ बदले हैं जिन्हें अधिकतर बुद्धिजीवी समझने लगे हैं. बहरहाल बाबा रामदेव और शिवराज सिंह कुंभ के मेले में बिछड़े भाइयों की तरह गले मिले और एक दूसरे को टटोल कर ही उन्हें समझ आ गया कि किसे क्या चाहिए.

बाबा ने कहा कि अब उन्हें राजनीति से कोई लेना देना नहीं तो मौजूद पत्रकार चकरा उठे कि यह कौन सा नया आसन है. पर जल्द ही सबको समझ आ गया कि बाबा का मोह अब भाजपा और नरेंद्र मोदी से भंग हो चला है. जिन्हें प्रधानमंत्री बनवाने पर उतारू हो आए रामदेव ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था और हरिद्वार न जाने की कसम भी खा ली थी पर जनता ने उन्हें लुटने से बचा लिया था. इधर जब रामदेव अपने सजातियों लालू और मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आए तब उन्हें पता चला कि इस मिथ्या संसार मे जाति ही सब कुछ है.

इसलिए मोदी मोह उन्होंने त्याग दिया और भोपाल में कहा कि अगले बचे-कुचे 2 सालों में मोदी जरूर कोई चमत्कार करेंगे यानि, अभी तक वादों और उम्मीद के मुताबिक कुछ नहीं हुआ है. बाबा ने बड़ी सावधानी से यह बात कह डाली. 2 हजार रुपए के बड़े नोट पर भी उन्होंने एतराज जताया कि इससे आर्थिक अपराध बढ़ेंगे तो समझने बाले समझ गए कि पतंजलि के उनके आउट लेट्स पर जाने बाले अधिकतर ग्राहक चार पांच सौ रुपए का सामान खरीदते हैं और फुटकर नहीं मिलता तो प्रधानमंत्री की तरह ही स्वदेशी का मोह त्याग भी देते हैं. इसलिए 2 हजार का नोट बंद होना चाहिए. पतंजलि के ही शीतल पेय बिकें इसके लिए जरूरी है कि पेप्सी और कोक जैसे कोल्ड ड्रिंक्स पर रोक लगे, यह मांग भी उन्होंने उठा डाली. इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहु राष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे की कलई खोली. बाबा ने जोश में यह तक कह दिया कि कंपनियां सभी राजनैतिक दलों को चंदा देती हैं, इसलिए कोई पार्टी स्वदेशी को बढ़ावा नहीं देना चाहती यानि भाजपा भी चंदा खाऊ पार्टियों में से एक है.

बकौल बाबा रामदेव वे हर उस पार्टी का समर्थन करेंगे जो देशभक्त है. फिर वह कांग्रेस ही क्यों न हो. ऐसी कई अप्रत्याशित बातें उन्होने भोपाल में कहीं तो इसका यह मतलब नहीं कि वे गड़बड़ा गए हैं बल्कि यह है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर वे भाजपा की जीत में शक ही जता रहे हैं. बख्शा तो उन्होंने शिवराज सिंह को भी नहीं, मुख्यमंत्री जी के लिए यह कहा कि मोदी की तरह वे भी निराश नहीं करेंगे. हद तो उस वक्त हो गई जब रामदेव ने नर्मदा यात्रा को धार्मिक कह डाला इस बात या आरोप से अब तक शिवराज सिंह ने खुद को बचाए रखा था. एक कारोबारी की यह मजबूरी हो जाती है कि वह सब से अच्छे संबंध बनाकर चले इसलिए अब रामदेव किसी की सीधे बुराई नहीं करते.