सरिता विशेष

भारतीय व्यंजन की कायल पूरी दुनिया है. जितना मशहूर घर का खाना है उतने ही मशहूर यहां मिलने वाले स्ट्रीट फूड भी हैं. स्ट्रीट फूड यानी सड़क किनारे मिलने वाले समोसे, चाटपकोड़े, भेलपूरी, चाऊमीन, मोमोज, जलेबी, कचौड़ी, गोलगप्पे, टिक्की, बर्गर, इडली, डोसा, छोलेभठूरे, छोलेकुलचे और न जाने क्याक्या. स्ट्रीट फूड देख कर हम ललचाते इसलिए भी हैं क्योंकि रेस्टोरैंट और होटल या ढाबे के मुकाबले यह न सिर्फ सस्ता होता है बल्कि यह स्वादिष्ठ भी होता है. हम सभी इसे चाव से खाते हैं. सस्ते व स्वाद के चलते खा तो लेते हैं पर उस के बाद जब पेट में जलन, मरोड़, उल्टियां व दस्त शुरू होते हैं तब पता लगता है कि स्ट्रीट फूड सेहत पर कितना भारी पड़ता है.

कुछ दिन पहले दिल्ली में एक इंस्टिट्यूट ने गोलगप्पे, मोमोज, चाट, समोसे व बर्गर की जांच की तो पता चला इन में मल के अंश हैं. इन में ई कोलाई बैक्टीरिया बहुतायत में हैं जिन से इन्फैक्शन होता है. ई कोलाई मिलने का मतलब है कि इन्हें बनाने में साफ पानी का इस्तेमाल नहीं होता है और न ही इन्हें हाइजीनिक कंडीशन में तैयार किया जाता है. सैंट्रल पौल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के मुताबिक, फूड आइटम में कौलीफौर्म बैक्टीरिया का मोस्ट प्रोबेबल नंबर यानी एमपीएन 50 या उस से कम होना चाहिए जबकि जो आइटम्स चैक किए गए उन में इन की संख्या 2,400 से अधिक पाई गई. अब आप को इसी से अंदाजा लग गया होगा कि यह कितना खतरनाक होता है.

स्ट्रीट फूड लगातार खाने से उल्टी, डायरिया, पेटदर्द, बुखार, भूख में कमी, टाइफायड, फूड पौइजनिंग या फिर पेट में जलन आदि हो सकती है. स्ट्रीट फूड खाते समय हमें सिर्फ खाना दिखाई देता है, यह नहीं दिखाई देता कि फूड तैयार करने वाला कौन सा मसाला इस्तेमाल करता है, बरतन साफ है या नहीं, पानी साफ है या गंदा. वह जहां खड़ा है वहां आसपास गंदगी का ढेर है या नहीं. पर यदि आप थोड़ा सा धैर्य और जीभ पर कंट्रोल कर लें व इन बातों पर ध्यान रखें तो न सिर्फ बीमारियों से बच सकते हैं बल्कि आप के बच्चे भी इस से बच सकते हैं क्योंकि बच्चों पर स्ट्रीट फूड का असर जल्दी होता है. डाक्टरों की मानें तो लगातार स्ट्रीट फूड खाना बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर बना देता है और ऐसे भोजन से बच्चे सुस्त हो जाते हैं. बच्चों को मोटापा व कम उम्र में डायबिटीज जैसी बीमारियां घेर लेती हैं.

हालांकि फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स ऐक्ट 2006 के मुताबिक, कोई भी व्यक्ति जो गंदा या अनहाइजीनिक खाना बेचता है या लोगों को परोसता है उस पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान है या फिर बेचने वालों को जेल भी जाना पड़ सकता है पर यह कानून सिर्फ कागजों में ही है. देश के हर गलीमहल्ले में गोलगप्पे, चाऊमीन, बर्गर, जलेबी, समोसा आदि बेचे जाते हैं. इन के विक्रेताओं पर कभी कोई ठोस कार्यवाही नहीं होती.  दिल्ली के जानेमाने गैस्ट्रोलौजिस्ट डा. एम पी शर्मा ने बताया कि स्ट्रीट फूड खाने से पेट में इन्फैक्शन होता है. जिन बरतनों का इस्तेमाल किया जाता है वे ठीक से धोए नहीं जाते. अच्छी तरह से बरतन साफ नहीं किए जाते, तीसरा, जो खाना बनाया जाता है उस में जो तेल इस्तेमाल होता है उसे बारबार उबालते रहते हैं, उसी तेल में खाना बनाया जाता है. उस तेल की क्वालिटी खराब हो जाती है. उस से बीमारी होती है, चौथा कारण यह है कि इस में जो मिर्चमसाले इस्तेमाल किए जाते हैं वे ठीक नहीं होते जिस से पेट में दर्द, अल्सर, पेट में जलन आदि होती है. डायरिया के साथसाथ कुछ लोगों को मियादी बुखार हो सकता है. कालरा, वायरल और हेपेटाइटिस हो जाता है जिसे हम जौंडिस कहते हैं.

यह इन्फैक्टेड पानी या खाने से होता है. अगर किसी ने यह ठान ही लिया है कि हमें तो यह स्ट्रीट फूड खाना ही खाना है, ऐसी स्थिति में यह कोशिश होनी चाहिए कि खाना ठंडा न हो. खाने को अच्छी तरह बौयल करवाएं. इस से जो बैक्टीरिया होते हैं वे मर जाते हैं. लेकिन वायरस नहीं मरता. स्टील गिलास या मैटल के गिलास साफ नहीं हो पाते, इसलिए हमेशा पानी डिसपोजल गिलास में ही पिएं. प्लेट्स भी डिसपोजल हों. स्टील या मैटल के प्लेट्स साफ नहीं होने की वजह से उन में बैक्टीरिया रह जाते हैं. अकसर स्ट्रीट फूड बेचने वाले एक तसले में पानी भर कर उस में बरतन को डुबो कर साफ करते रहते हैं और एक गंदे से कपड़े से पोंछ कर उस में फूड परोस देते हैं, ऐसे में सही सफाई नहीं होती. यदि कोई व्यक्ति पहले से ही इन्फैक्टेड है और उस ने उसी प्लेट में खाया, फिर गंदे पानी से उसी प्लेट को धो कर आप को उसी में खाना दे दिया गया तो आप भी इन्फैक्टेड हो सकते हैं.

स्ट्रीट फूड खाना ही है तो सावधानी जरूर बरतें. थोड़ा अधिक पैसा खर्च कर अच्छी और साफसुथरी जगह से ही खाएं. बेचने वालों को भी कहें कि खाना ढक कर रखो. खुले में मक्खियां खाने में बैठती हैं जो बीमारी पैदा करती हैं. स्ट्रीट फूड बनाने वालों की भी यह जिम्मेदारी होनी चाहिए. उन्हें भी एजुकेशन देने की जरूरत है. ये सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि यह आप की भी जिम्मेदारी है.