प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संपन्न या सक्षम लोगों से रसोई गैस पर मिलने वाली सब्सिडी को छोड़ने के आग्रह के मद्देनजर मार्च तक करीब 3 लाख उपभोक्ता सब्सिडी छोड़ चुके हैं जिस से राजकोष को 100 करोड़ रुपए से अधिक का फायदा हुआ है. मोदी की यह अपील लोगों को पसंद आ रही है. उन के खास मित्र और उद्योगपति रतन टाटा ने अपने कर्मचारियों से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया है. उन्होंने देशविदेश में काम कर रहे टाटा समूह के करीब 6 लाख कर्मचारियों से यह अपील की है. कंपनी के देश में ही 4 लाख से अधिक कर्मचारी हैं. टाटा समूह का नमक से ले कर सौफ्टवेयर तक का कारोबार है. टाटा की यह अपील यदि कर्मचारी मान लेते हैं तो इस से देश के राजस्व में बड़ा इजाफा होगा. रतन टाटा का कहना है कि टाटा समूह ने राष्ट्र के उत्थान में हमेशा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और आज जब देश आर्थिक शक्ति बनने की राह पर है तो समूह को इस में फिर अपना योगदान देना चाहिए.

यह भावुक अपील टाटा समूह के कर्मचारी आसानी से मान भी जाएंगे लेकिन सवाल यह है कि हमारा सरकारी भ्रष्ट तंत्र इस अपील का मान रखेगा? तेल और गैस कंपनियों के आलीशान जीवनयापन करने वाले कर्मचारी इस अपील से कुछ सबक लेंगे? सरकारी तेल कंपनियों के कार्यालय और उन के कर्मचारियों को जो सुविधा मिल रही है, रतन टाटा की अपील का पैसा तो उन कर्मचारियों की सुखसुविधा पर आने वाले खर्च के लिए भी कम पड़ेगा. तेल कंपनियों की समाज में वर्गभेद करने वाली नीति पर पहले अंकुश लगे. महंगाई के कारण सरकारी कर्मचारी पहले ही मोटी तनख्वाह ले कर अब फिर वेतन आयोग के गठन की मांग कर रहे हैं. सरकारी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य सब्सिडी नियम लागू क्यों नहीं किया जाता है? सरकार भी रतन टाटा से सबक ले.