सरकार हर साल स्वास्थ्य बजट बढ़ाती है और लोग स्वस्थ रहें, इस के लिए नीतियां बना कर आमजन को अच्छी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने का दावा करती है. महानगरों से ले कर गांवों तक अस्पताल खोल कर लोगों को स्वास्थ्य सेवा तत्परता से देने का प्रचार किया जा रहा है जबकि हकीकत में ये सब नाममात्र की घोषणाएं हैं. गांव को तो छोड़ो, कसबों तक में सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. वहां सिरदर्द, बुखार और सामान्य मरहमपट्टी के अतिरिक्त कोई व्यवस्था नहीं है. स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सरकार की इसी उदासीनता के चलते लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर हो रहे हैं. ‘मरता क्या न करता’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए गरीब भी निजी अस्पतालों में लुटने को बाध्य हैं. सरकारी अस्पतालों में जहां सुविधा है वहां शल्य चिकित्सा के लिए मरीजों की लंबी कतारें हैं और 8-10 माह बाद लोगों का नंबर आ रहा है. उस के ठीक विपरीत, निजी अस्पताल में एक सप्ताह में ही सर्जरी हो जाती है. लोग मजबूरन निजी अस्पतालों की तरफ भाग रहे हैं, इस से देश में गरीबी का आंकड़ा बढ़ रहा है. गरीब अपने मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में 5 से 6 गुणा अधिक कीमत पर निजी अस्पताल में करा रहे हैं.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के 2014 के सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 70 प्रतिशत लोग निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. एनएसएसओ ने 3.3 लाख लोगों पर कराए सर्वेक्षण के आधार पर कहा है कि शहरी क्षेत्रों में 79 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 72 प्रतिशत लोग इलाज के लिए निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं. लोगों के इस रुख को देखते हुए पिछले 10 साल में निजी अस्पतालों, चैरिटेबल संस्थाओं और क्लीनिकों की संख्या में 4 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च बहुत अधिक है. पिछले वर्ष सरकारी अस्पतालों में इलाज पर औसत खर्च 6,120 रुपए और निजी अस्पतालों में 25,850 रुपए दर्शाया गया है. एक दशक पहले यह अंतर लगभग दोगुना था. इसी तरह से कैंसर जैसी घातक बीमारी पर सरकारी अस्पतालों में औसत खर्च 24,526 रुपए और निजी अस्पतालों में78 हजार रुपए से अधिक बताया गया है. चर्म रोग जैसी बीमारियों में तो निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च 10 गुना से अधिक है.