सरिता विशेष

चुनाव आते ही सरकारें आम आदमी के हित में लुभावनी नीतियों को लागू करने का खूब प्रयास करती हैं. ऐसे वक्त में खाद्य सुरक्षा. महिला सुरक्षा तथा सामाजिक सुरक्षा जैसे नारों के साथ लोकलुभावन योजनाओं पर जोर दिया जाता है. यह अलग बात है कि हजारों लोग खाद्य सुरक्षा योजना के बावजूद खाली पेट रात काट रहे हैं और स्वास्थ्य सुरक्षा योजना होने पर भी चिकित्सा के अभाव में दम तोड़ रहे हैं. इसी तरह से कभी रोटी, कपड़ा और मकान सब का अधिकार जैसे लुभावने नारे भी चले थे. इन सब के बावजूद हालात नहीं बदले.

दूरदराज की बात छोडि़ए, दिल्ली में ही असंख्य लोग कड़ाके की ठंड में पटरियों पर सो रहे हैं और हजारों जिंदगियां रैनबसेरों में रोटी के लिए तरस रही हैं.

निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को पैंशन योजना 1995 के तहत पैंशन दी जाती है लेकिन जिस रूप में इस पैंशन का भुगतान किया जा रहा है वह एक तरह से आम आदमी का अपमान है. कई लोगों को 300-400 रुपए मासिक पैंशन इस योजना के तहत मिल रही है जबकि दूसरी पैंशन योजनाओं का लाभ इस से अधिक है.

इधर, सरकार ने लोकसभा चुनाव को देखते हुए न्यूनतम पैंशन की रकम को 1 हजार रुपए करने की योजना पर काम शुरू किया है. सरकार का दावा है कि इस से करोड़ों लोगों को फायदा होगा लेकिन असली सवाल है कि इस राशि में पैंशनधारक को कितना लाभ पहुंचाने की क्षमता है. यह आम आदमी का उसी तरह से मजाक है जैसे योजना आयोग ने कुछ समय पहले न्यूनतम आय गांव में 28 रुपए और शहरों में 32 रुपए प्रति दिन तय की थी.

सत्ताधारी पार्टी को कई दिग्गजों ने सरकार की चापलूसी में इस पर कसीदे भी पढ़े थे. कमाल यह है कि इसे सरकार की उपलब्धि बता कर कसीदे पढ़ने वाले लोग अरबों का भ्रष्टाचार करने के आरोप में जेल में हैं. जरूरत इस बात की है कि न्यूनतम पैंशन की राशि को एक सम्मानित  स्तर दिया जाना चाहिए. इच्छाशक्ति हो तो सरकार इस के लिए रास्ते निकाल सकती है.