वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने चालू वित्त वर्ष के लिए बजट पेश करते हुए इस वर्ष फरवरी में महिलाओं के लिए अलग राष्ट्रीय बैंक बनाने की घोषणा कर के अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का लोहा मनवाने का प्रयास किया तो तत्काल समीक्षक उन से कुछकुछ सहमत नजर आ रहे थे. सब को लगा कि यह नया अंदाज है, हालांकि सभी इसे चुनावी बजट मान कर महिला मतदाताओं को लुभाने के प्रयास के रूप में देख रहे थे. वित्तमंत्री की भी अप्रत्यक्ष रूप से यही कोशिश थी. यह नया विचार था, इसलिए उन का विरोध कम ही हुआ. इस बैंक की स्थापना के लिए 1 हजार करोड़ रुपए की पूंजी की व्यवस्था की गई जिसे बहुत कम बताया जा रहा था. बैंक को इसी साल यानी चुनाव की घोषणा किए जाने से पहले स्थापित करने का प्रस्ताव है.

उधर यह प्रक्रिया सरकार ने तेज कर दी. कुछ निजी कंपनियां भी बहती गंगा में हाथ धोने का प्रयास करती हुई बैंक लाइसैंस पाने की कतार में खड़ी हो गई हैं. वित्तमंत्री ने कहा था कि बैंक महिलाओं के लिए होगा और उस में काम करने वालों में भी महिलाओं की फौज रहेगी. यह एक तरह का कुछ ऐसा ही सुझाव था कि कोई कहे कि महिला विकास विभाग में महिलाएं ही काम करेंगी, विकलांग विभाग में विकलांग ही होंगे और बाल विकास विभाग का दायित्व बच्चे संभालेंगे क्योंकि वे अपनी समस्याओं को ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं.

चिदंबरम की बात को सरकार ने अव्यावहारिक बता दिया है. इस प्रक्रिया में लगे अधिकारियों ने कह दिया है कि बैंक में सभी कर्मचारी महिलाएं होंगी और ग्राहक भी महिलाएं होंगी, यह अव्यावहारिक स्थिति है. प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों की बात तार्किक है. निर्णय लिया गया है कि बैंक सब के लिए होगा. कम से कम उस में सभी महिला कर्मचारी तो नहीं रखी जा सकती हैं. अधिकारी बैंक में योग्य  पुरुष उम्मीदवारों की भरती पर सहमत हैं और उन की बात मानने के लिए चिदंबरम को बाध्य होना पड़ सकता है.

उम्मीद है कि समाज को बांटने वाली, वोट की राजनीति के तहत की गई यह घोषणा क्रियान्वित नहीं होगी.