सरिता विशेष

शेयर बाजार में धूम, सूचकांक का नया रिकौर्ड

शेयर बाजार नई ऊंचाई पर पहुंच गया है. बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के इतिहास में सूचकांक 5 नवंबर को पहली बार 28 हजार अंक को पार कर गया. नैशनल स्टौक ऐक्सचेंज यानी निफ्टी भी सारे रिकौर्ड तोड़ कर ऊंचाई पर पहुंच गया. बाजार में एक साल से लगातार तेजी का माहौल बना हुआ है. नई सरकार के केंद्र में गठन के बाद से बाजार लंबी छलांग लगा रहा है और नित नई ऊंचाई हासिल कर रहा है. विदेशी संस्थागत निवेशकों में उत्साह का माहौल है.

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की उत्साहवर्द्धक नीतियों के कारण निवेशकों में उत्साह है. इस की वजहें सरकार द्वारा वित्तीय घाटे को कम करने के लिए उपाय करने, तेल के दाम घटाने, विदेशी अर्थव्यवस्था में सुधार तथा आर्थिक स्तर पर सरकार द्वारा सुधार के लिए उठाए जा रहे कदम हैं. तेल की कीमतें 4 साल के निचले स्तर पर पहुंच गई हैं जिन का फायदा देशी तेल कंपनियों को हो रहा है. बाजार में तेजी किस स्तर पर है, इस का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि सितंबर के अंत तक 6 माह की अवधि में सूचकांक 19 फीसदी बढ़ा है जबकि निफ्टी 20 फीसदी चढ़ा है. इक्विटी बाजार में भी इस की वजह से उत्साह है. नवंबर के पहले सप्ताह में बाजार में भारी उत्साह रहा है और सरकार की सकारात्मक नीतियों के कारण यह उत्साह लगातार बना रह सकता है.

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बंजर भूमि उगलेगी तेल

सरकार की बंजर भूमि को लहलहाने की योजना है. इस महत्त्वाकांक्षी योजना के तहत देश के विभिन्न हिस्सों में बेकार पड़ी हजारों हैक्टेअर भूमि पर रतनजोत, करंज, साल, पाम व अन्य ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जो हमारी बायो डीजल और खाद्य तेल उत्पादन की जरूरत को पूरा करने में मदद कर सकेंगे. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री नितिन गडकरी के अनुसार, सरकार इस नीति पर गंभीरता और तेजी से काम कर रही है. इस के लिए बाकायदा कैबिनेट नोट भी तैयार कर लिया गया है.

रतनजोत का इस्तेमाल बायो डीजल के लिए किया जाएगा. बायो डीजल का मिश्रण डीजल के साथ किया जा सकता है. इस का मतलब यह हुआ कि बायो डीजल का उत्पादन बढ़ेगा तो डीजल के आयात पर हमारी निर्भरता घट जाएगी. इस से कच्चे तेल का आयात कम करना पड़ेगा और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत का बढ़ना हमारी अर्थव्यवस्था को ज्यादा प्रभावित नहीं कर सकेगा. इसी तरह से पाम औयल के उत्पादन के लिए समुद्रतटों पर खाली पड़ी जमीन का इस्तेमाल किया जाएगा. समुद्रतटों की आबोहवा पाम की खेती के लिए अत्यधिक उपयुक्त है. इस के सफल इस्तेमाल से हर साल करीब 80 हजार करोड़ रुपए के खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी और देश में विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ेगा.

सरकार की यह महत्त्वाकांक्षी योजना कब शुरू होगी, इस पर फिलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता है लेकिन बंजर भूमि का इस्तेमाल कर के अपने सारे संसाधनों का प्रयोग देश की प्रगति में करने की योजना का स्वागत किया जाना चाहिए और इस काम में सभी को सहयोग भी करना चाहिए. इस से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे. लेकिन इस योजना पर दबंगों की अथवा भूमाफियाओं की तूती नहीं बोले, इस के लिए प्रशासन को योजना के आरंभ में ही सख्त कदम उठाने होंगे.

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डाकखानों में फिर बढ़ेगी चहलपहल

बदलते दौर की संचार व्यवस्था ने परंपरागत संचार व्यवस्था यानी डाक विभाग को सफेद हाथी बना दिया है. डाकखानों का विशाल नैटवर्क देश के हर गांव को जोड़ने वाली कड़ी रही है लेकिन चिट्ठी की व्यवस्था लगभग खत्म होने से डाकखाने पर लटकी पत्रपेटी अब बेकार सी हो गई हैं. हर दिन 2 बार खुलने वाली ये पत्रपेटियां अब माह में 1-2 बार ही खुलती होंगी. डाकखानों में काम भी नहीं रह गया है लेकिन सरकार ने डाकखानों को बचत का अच्छा तंत्र मान लिया है और इस वजह से वहां चहलपहल रहती है. डाकखाने की बचत योजनाओं को भी सरल बना दिया गया है और वहां बैंकों की तरह कामकाज होने लगा है डाकखानों को आएदिन नई जिम्मेदारी भी दी जा रही है. उन का आधुनिकीकरण किया जा रहा है. डाकघर के खाताधारकों को अब देशभर में कहीं भी किसी डाकघर से पैसा निकालने की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है. इस के लिए डाकघरों को आपस में जोड़ा जा रहा है.

पहले चरण में देश के प्रमुख डाकघरों को जोड़ा जा रहा है और दूसरे चरण में सभी डाकघरों को परस्पर जोड़ दिया जाएगा. सभी डाकघर आपस में जुड़ जाएंगे तो फिर डाकघर अपने ग्राहकों की सुविधा के लिए एटीएम व्यवस्था भी लागू कर देगा. बचत का यह तरीका बैंकों का अच्छा विकल्प बन सकेगा और बेकार पड़े गांव के डाकघरों में ग्रामीण भी आसानी से डाक विभाग के विशाल नैटवर्क का फिर से लाभ उठा सकेंगे. दरअसल, बैंक अभी हर गांव में नहीं पहुंचे हैं जबकि डाकघर हर गांव से बहुत पहले जुड़ गया था, इसलिए इस का इस्तेमाल ग्रामीणों के लिए आसान है और इस तरह सूने पड़े डाकखानों में चहलपहल बढ़ जाएगी.

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क्या पहुंच पाएगी घरघर बिजली?

बिजली मंत्री पीयूष गोयल का दावा है कि 2019 तक देश का हर घर रोशन हो जाएगा. वे यह भी कहते हैं कि बिजली उत्पादन में पश्चिमी जगत द्वारा रिजैक्ट यानी छोड़ी गई तकनीक का इस्तेमाल भी नहीं किया जाएगा. यह बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है लेकिन वास्तविकता क्या है, यह सब को पता है. वे स्वयं कहते हैं कि परमाणु ऊर्जा की हमारी वर्तमान क्षमता 5780 मेगावाट है जिसे 2023-24 तक तीनगुना किया जाएगा. मतलब कि परमाणु ऊर्जा केंद्र और अधिक बनेंगे और परमाणु ऊर्जा ही हमारी बिजली की आवश्यकता को पूरा करने का महत्त्वपूर्ण जरिया होगी. परमाणु ऊर्जा पश्चिमी तकनीक है और पश्चिम के कई देश इसे छोड़ चुके हैं. फ्रांस ने तो इस तकनीक से नाता तोड़ने की नीति बना ली है. जापान इस से पहले ही अलग हो चुका है. जरमनी भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है. माहौल इस तकनीक के खिलाफ है. मानव स्वास्थ्य के लिहाज से यह खतरनाक तकनीक है लेकिन भारत इस तकनीक को तब अपना रहा है जब पश्चिमी जगत इसे छोड़ने की नीति तैयार कर चुका है. हमारे करीब 20 परमाणु ऊर्जा केंद्र निर्माणाधीन हैं. आस्ट्रेलिया से यूरेनियम की आपूर्ति के लिए सरकार उसे भुनाने के वास्ते रातदिन एक किए हुए है. तब आप कैसे कह सकते हैं कि पश्चिम की छोड़ी तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

सरकार को निश्चित रूप से गैरपरंपरागत ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने चाहिए.  इस में शोध प्रक्रिया को विकसित किया जाना चाहिए ताकि स्वच्छ रोशनी हमारे जीवन को रोशन कर सके और क्षति पहुंचाने वाली रोशनी से हमें छुटकारा मिल सके. सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा अथवा अन्य तरह की ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए तेज कदम बढ़ेंगे, तभी पश्चिम की त्यागी बिजली उत्पादन तकनीक से मुक्ति मिल सकेगी.