युवा बेरोजगारों के फर्जी रोजगार के झांसे में फंसने की खबरें इन दिनों बहुत पढ़ने को मिल रही हैं. देश के हर कोने में बेरोजगार युवकों को लूटा जा रहा है. रोजगार पाने के लिए जमीन, जायदाद तथा जेवर बेच कर दलालों को पैसा सौंपने वाले युवकों की संख्या में नित इजाफा हो रहा है. हालात सिर्फ रिश्वत दे कर लुटने तक सीमित नहीं रह गए हैं. रेलवे, मैट्रो, यहां तक कि गृहमंत्रालय में रिक्त पदों के लिए भी फर्जी फौर्म किताब की दुकानों पर बिक रहे हैं. ये सब फर्जी फौर्म महज 20-30 रुपए की कमाई के लिए बिक रहे हैं. मतलब यह कि जहां जिस को मौका मिला, बेरोजगारों को लूटने में लगा हुआ है.

हद तो तब हो गई जब पिछले दिनों केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने आम जनता के लिए परामर्श जारी करते हुए कहा कि बेरोजगार युवक कृषि मंत्रालय में रोजगार दिलाने के नाम पर ठगी करने वाली फर्जी एजेंसियों के जाल में नहीं फंसें. कृषि मंत्रालय ने यह परामर्श देश की राजधानी दिल्ली के एक संगठन किसान मित्र योजना की रोजगार की पेशकश को देखते हुए जारी किया है. यह एजेंसी इस कदर अराजक हो कर काम कर रही थी कि वह स्वयं को सरकार की रोजगार एजेंसी की तरह पेश कर रही थी. यह एजेंसी

14/2 किसान भवन, शहीद भगतसिंह मार्ग पीरागढ़ी, नई दिल्ली से संचालित हो रही थी.

भारत सरकार की रोजगार देने वाली एजेंसी के तौर पर स्वयं की पहचान बता कर लूटने वाली इस एजेंसी के संचालक को सलाखों के पीछे भेजने के बजाय सरकार ने परामर्श जारी किया है. सरकार का यही लचीलापन और सरकारी एजेंसियों के इसी निकम्मेपन की बदौलत युवकों को लूटने वाले डकैतों का संसार दिल्ली जैसे महानगर में बेझिझक पनप रहा है.

दिल्ली में बस अड्डों और रेलवे स्टेशनों जैसी जगहों पर पोस्टर चिपके हैं, जिन पर लिखा है, ‘अनपढ़ से ग्रेजुएट युवक चाहिए’. फोन नंबर पर संपर्क करने पर पता चलता है कि बेरोजगार युवकों से 5-5 हजार मांगे जाते हैं और फर्जी जगह उन्हें नौकरी करने के लिए भेजा जाता है. सरकारी एजेंसियां इन गिरोहों पर अंकुश लगाने में असमर्थ हैं. इस डकैती का पैसा पुलिस तक भी पहुंचता है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमारी 40 फीसदी आबादी युवा है. वर्ष 2014 के आंकड़े के अनुसार, हर 3 स्नातक में हमारे यहां एक व्यक्ति बेरोजगार है.