सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एअर इंडिया के निजीकरण की चर्चा है और अटकलें हैं कि देश के प्रमुख औद्योगिक समूह टाटा को इस के शेयर बेचे जा रहे हैं. एअर इंडिया के अध्यक्ष अश्विनी लोहानी की मानें तो कंपनी पर 50 हजार करोड़ रुपए का कर्ज है. इस के बावजूद वह 72 सीटों वाले छोटे विमान खरीद कर जल्द ही करीब एक हजार पायलट और कैबिन स्टाफ की भरती करेगा. कंपनी के कई कर्मचारी संगठन एअर इंडिया के निजीकरण का जम कर विरोध कर रहे हैं.

एअर इंडिया घरेलू स्तर पर विमानन सेवा देने वाली इंडिगो और जेट एअर के बाद तीसरी सब से बड़ी कंपनी है. इंडिगो की परिचालन हिस्सेदारी एअर इंडिया के 13.8 प्रतिशत से करीब तीनगुना ज्यादा 40 प्रतिशत है जबकि जेट एअर 18 प्रतिशत, स्पाइस जेट 12.8 प्रतिशत और गो इंडिया की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत है.

देश में किफायती दर पर हवाई सेवा देने वाली कंपनियों के बीच जम कर प्रतिस्पर्धा चल रही है. इसी प्रतिस्पर्धा के बीच स्पाइक जेट ने बोइंग कंपनी के साथ पौने 5 अरब डौलर का समझौता किया है जिस के तहत उसे अत्याधुनिक बोइंग विमान सौंपे जाएंगे.

कंपनी का लक्ष्य अगले 3 वर्षों में अपने बेड़े में 100 विमान शामिल करना है. इंडिगो के बाद स्पाइस जेट कम दर पर विमानन सेवा देने वाली दूसरी महत्त्वपूर्ण एअरलाइंस है. दोनों कंपनियां तेजी से बढ़ रही हैं लेकिन वाणिज्यिक क्षेत्र की एअर इंडिया अब भी सफेद हाथी बनी हुई है. वह सरकार पर बोझ बन कर परिचालन कर रही है. उस की सेवाएं भी संतोषजनक नहीं हैं जबकि सरकार की तरफ से इस में खूब पैसा बहाया जा रहा है.

सवाल यह है कि जिस कंपनी पर सरकारी क्षेत्र का ठप्पा लग जाता है वहां प्रतिस्पर्धा खत्म क्यों होती है. जबकि उसी कारोबार में लगी नई निजी कंपनियां सोना उगलती हैं.

सरकारी सेवाओं में जिम्मेदारी का अभाव है. एअर इंडिया किन कारणों से घाटे में है और इस की दुर्दशा की वजह क्या है, इस की तह में जाने की किसी को जरूरत महसूस नहीं होती. आखिर सफेद हाथी बाजार में खड़े करने का क्या औचित्य है?