सरिता विशेष

एक बार फिर ‘औस्कर’ अवार्ड में भारत को नाकामी ही हासिल हुई. भारतीय फिल्म उद्योग की तरफ से से औस्कर में विदेशी भाषा की फिल्म खंड में भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में राज कुमार राव अभिनीत फिल्म ‘‘न्यूटन’’ को भेजा गया था. ‘न्यूटन’ की कहानी प्रजातंत्र में चुनाव को लेकर है. एक सरकारी मुलाजिम किस तरह नक्सल प्रभावित आदिवासी क्षेत्र के एक गांव के लोगों से वोट डलवाता है, उसकी पूरी कथा है. मगर अफसोस ‘न्यूटन’ को विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी में चुनी गई नौ फिल्मों में स्थान नहीं मिल पाया.

बहरहाल, विदेशी भाषा की फिल्म श्रेणी में जिन 9 फिल्मों को चुना गया है, वह हैं-चिली की फिल्म ‘‘ए फैंटास्टिक वूमन’’, जर्मनी की ‘इन ड फेड’, हंगरी की ‘औन बौडी एंड सोल’, इजराइल की ‘फौक्सर्टाट’, लेबनान की ‘द इंसल्ट’, रूस की ‘लवलेस’, सेनेगल की ‘फेलिसिटी’, दक्षिण अफ्रीका की ‘द वाउंड’,स्वीडन की ‘एंड द स्क्वायर’. अब वोटिंग के आधार पर इन नौ फिल्मों में से ही कोई एक फिल्म 4 मार्च को डौल्बी थिएटर मे आयोजित समारोह में विजेता घोषित की जाएगी.

किसी फिल्म ने नही जीता औस्कर

यहां ये जानना जरूरी है कि भारत ने अब तक एक बार भी विदेशी भाषा कैटेगरी में कोई औस्कर नहीं जीता है. बीते साल तमिल फिल्म ‘विसारानाई’ को भी इस कैटेगरी में नामित किया गया था, लेकिन ये भी बहुत जल्द ही इस रेस से बाहर हो गई थी. इससे पहले ‘अपुर संसार’ (1959), ‘गाइड’ (1965), ‘सारांश (1984)’, ‘नायकन’ (1987), ‘परिंदा’ (1989), ‘अंजलि’ (1990), ‘हे राम’ (2000), ‘देवदास’ (2002), ‘हरिचन्द्रा फैक्ट्री’ (2008), ‘बर्फी’ (2012) और ‘कोर्ट’ (2015) को भी भारत की तरफ से औस्कर के लिए चुना गया था.

यहां तक कि फाइनल लिस्ट तक पहुंचने वाली फिल्मों में भी भारत की ओर से सिर्फ तीन फिल्मों के नाम महबूब खान की ‘मदर इंडिया’ (1957), मीरा नायर की ‘सलाम बौम्बे’ (1988) और आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ (2001) ही शामिल हैं.

वैसे साल 2002 में औस्कर के लिए भारत की दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही थी. इस दौरान नामित की गई आशुतोष गोवारिकर की फिल्म लगान के जीतने की पूरी उम्मीद थी. लेकिन यह फिल्म आखिरी दौर में बाहर हो गई थी.

साल 2013 में जब रितेश बत्रा की फिल्म ‘लंच बौक्स’ की बजाय ज्ञान कोरिया की ‘द गुड रोड’ को औस्कर में भेजा गया है, तब कहा गया था कि ‘लंच बौक्स’ औस्कर की दावेदारी के हिसाब से ज्यादा मजबूत फिल्म थी.