‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने जब से किसी भी फिल्म को पारित करने के लिए ‘‘सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952’’ की धारा 41 का सख्ती से पालन करते हुए फिल्म के सेंसर प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करने के 68 दिन बाद सेंसर प्रमाण पत्र देने का ऐलान किया है, तब से बौलीवुड में एक नई बहस शुरू हो गयी है.

भारतीय सिनेमा से जुड़ा हर फिल्मकार यह तो मानता है कि ऐसा नियम 1952 से ही था. कई निर्माताओं का मानना है कि फिल्म निर्माण बहुत कठिन काम है. यह रचनात्मक दबाव के साथ ही अति खर्चीला मसला है. इसलिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के अफसर अब तक फिल्म निर्माताओं की तकलीफ को समझकर, मानवता के आधार पर 68 दिन के नियम का सख्ती से पालन नहीं कर रहे थे. तो अब ऐसा करने से उन्हें परहेज क्यों हो रहा है?

जबकि कुछ फिल्म निर्माता राम रहीम की फिल्म‘मैसेंजर आफ गौड’का उदाहरण देते हुए ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’पर सवाल उठा रहे हैं कि कैसे कुछ फिल्में सिर्फ एक दिन के अंदर सेंसर से पारित की गयी थी. अब लोग सवाल कर रहे हैं कि सेंसर बोर्ड उन फिल्मों के नाम बताए, जिन्हें 68 दिन के नियम का पालन करते हुए सेंसर प्रमाणपत्र दिया गया हो.

इतना ही नहीं केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के इस नियम के चलते हौलीवुड के फिल्मकारों के भी हाथ पांव फूल गए हैं. अब हर किसी को अपनी प्रदर्शन योग्य फिल्म के भविष्य को लेकर आशंकाओं ने घेर लिया है. कई हौलीवुड फिल्मों के वितरण और बौलीवुड फिल्मों के निर्माण व वितरण से जुड़े एक स्टूडियो के अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हुए कि 68 दिन का नियम था, कहते हैं, ‘‘68 दिन का नियम था. मगर अब तक हम सभी यह मानकर अपनी फिल्में सेंसर बोर्ड के पास 21 दिन पहले भेजते रहे हैं कि फिल्म को सेंसर प्रमाण पत्र मिल जाएगा और अब तक ऐसा होता भी रहा है.’’

तो वहीं तमाम फिल्मकार ‘‘सिनेमैटोग्राफी एक्ट 1952’’ का हवाला देते हुए यह भी कह रहे हैं कि इस नियम के तहत‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’के अध्यक्ष अपने विवेक से 68 दिन के इस नियम को अनदेखा कर सकते हैं. तो फिर अब प्रसून जोशी क्यों 68 दिन के नियम पर सख्ती बरत रहे हैं.

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