Romantic Story in Hindi : राजेश और प्रज्ञा एकदूसरे की ओर खिंचे जा रहे थे. दिल ने दिल की भाषा पढ़ ली थी. फिर क्यों इन दोनों चाहने वालों की चाहत अधूरी ही रह गई?
प्रज्ञा जब अस्पताल पहुंची तब तक राजेश की हालत और खराब हो चुकी थी. उसे कुछ दिनों पहले ही समाचार मिल गया था कि राजेश अस्पताल में भरती है लेकिन वह जानबूझ कर अनदेखा करती रही, ‘उसे क्या लेना राजेश से’ वह मन में सोचती लेकिन सच यह था कि ऐसा सोच लेने के बाद भी उस का मन राजेश में ही लगा था.
भले ही वह सालों पहले राजेश से दूर हो चुकी हो पर राजेश था तो उस का पहला प्यार. उस ने उस के साथ जाने कितने हसीन पल गुजारे हैं. उस की आंखों के सामने एकएक दृश्य सजीव होते चले गए.
‘सुनिए मिस्टर, आप जो इस तरह मेरा पीछा कर रहे हैं न, यह ठीक नहीं है.’
राजेश घबरा गया, ‘पीछा, नहीं मैम, आप को कुछ गलतफहमी हुई है.’
‘कोई गलतफहमी नहीं हुई है. मैं आप जैसे लड़कों को अच्छी तरह जानती हूं,’ वह गुस्से से लाल हो चुकी थी.
राजेश कुछ नहीं बोला, अपनी आंखें झकाए वह निकल गया.
प्रज्ञा बहुत देर तक उसे जाते हुए देखती रही. उसे वाकई उस पर तेज गुस्सा आ रहा था. उसे लग रहा था कि राजेश जानबूझ कर बारबार उस के सामने आ रहा है.
वैसे यह तो सच ही था कि राजेश कई बार उस के सामने से निकल रहा था पर ऐसा वह जानबूझ कर नहीं कर रहा था. वह तो प्रज्ञा को जानता तक नहीं था. दरअसल, प्रज्ञा उस के महल्ले में रहने के लिए कुछ ही दिनों पहले आई थी. किसी कंपनी में उस की फर्स्ट जौइनिंग हुई थी. राजेश भी किसी कंपनी में नौकरी करता था और वह भी इसी महल्ले में एक कमरे में रह रहा था.
यह संयोग ही था कि दोनों लगभग एक ही समय अपने घर से निकलते और दोनों ही एकसाथ ही बसस्टौप पर पहुंचते. दोनों एक ही बस में चढ़ते और एक ही स्थान पर उतरते. कुछ दूर तक साथ जाने के बाद दोनों के रास्ते एक होते हुए भी बदल जाते. यह क्रम शाम को भी चलता था. शाम को राजेश बस से उतरते हुए होटल से अपना भोजन पैक करा कर वापस होता पर प्रज्ञा सीधे अपने महल्ले की ओर बढ़ जाती.
राजेश होटल से भोजन का पैकेट ले कर पतली गली से निकलता तो प्रज्ञा फिर उस के सामने पड़ जाती. हालांकि राजेश का ध्यान प्रज्ञा की ओर नहीं जाता था, उस ने कभी इंट्रैस्ट भी नहीं लिया था पर प्रज्ञा राजेश की हर गतिविधि को देख रही थी. उस को लग रहा था कि राजेश जानबूझ कर उस का पीछा कर रहा है. उस ने दोतीन दिनों तक राजेश की गतिविधियों को देखा.
उस के दिमाग में यह बात जम गई कि राजेश उस का पीछा कर रहा है. चूंकि वह भी अपने शहर से दूर नए शहर में अकेले रहने आई है तो उसे सतर्क तो रहना ही होता था. यही कारण था कि जैसे ही उस के दिमाग में राजेश के पीछा करने की बात आई तो वह बिफर पड़ी.
इस घटना के बाद राजेश उस के सामने नहीं पड़ा. राजेश ने दिनचर्या बदल ली थी. अब वह प्रज्ञा के निकलने के पहले ही अपने घर से निकल जाता और पहली बस से ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ जाता. शाम को भी वह लेट आने लगा था. वह प्रज्ञा को जाते देखता रहता और जब वह बस में बैठ जाती, तब वह अपने औफिस से निकलता और दूसरी बस में बैठ कर लौटता.
राजेश के पीछा छोड़ देने से प्रज्ञा को राहत मिल गई थी. उस के चेहरे पर जो अनावश्यक सा तनाव आ गया था उस से अब वह मुक्त होती जा रही थी. वैसे, उसे अब भी लग रहा था कि राजेश उसे अकेला समझ कर उस का पीछा ही कर रहा था, यदि उस ने दमदारी से उसे डांटा न होता तो उस का हौसला बढ़ जाता.
प्रज्ञा अपने हाथों में एक फाइल लिए अपने सीनियर के रूम की ओर बढ़ रही थी. वह नईनई ही इस कंपनी में आई थी, इसलिए उसे काम को समझना पड़ता था. बहुतकुछ तो वह अपने सहकर्मियों की मदद ले लेती थी पर वह उस से संतुष्ट न हो पा रही थी. उस ने तय कर लिया था कि वह अपने सीनियर के साथ बैठ कर पूरा काम समझ ही लेगी. वैसे भी, वह अभी तक अपने सीनियर और अन्य अधिकारियों से मिली ही कहां थी.
प्रज्ञा रूम के सामने जा कर खड़ी हो गई थी. रूम का दरवाजा खोलने में उसे हिचकिचाहट हो रही थी पर उस के पास और कोई विकल्प था भी नहीं. उस ने धीरे से दरवाजे को खोला.
‘मे आई कम इन, सर?’
कोई तो था जिस का चेहरा फाइलों की ओट में था, ‘यस.’
प्रज्ञा हलके कदमों से कमरे के अंदर दाखिल हो गई और चुपचाप खड़ी हो गई. फाइल की ओट में छिपा चेहरा बहुत देर तक अनदेखा ही रहा. वे शायद भूल गए थे कि उन के कमरे में कोई आया है. प्रज्ञा कुछ देर तक यों ही मौन खड़ी रही.
‘गुडमौर्निंग सर.’ उसे फाइल में छिपे चेहरे को याद दिलाना था कि कोई उन के सामने खड़ा है. आवाज कानों तक पहुंच गई थी पर आवाज अभी भी फाइल की ओट से ही आ रही थी, ‘यस.’
‘वो सर, मैं आप की जूनियर, अभी अपौइंट हुई हूं.’
इस बार प्रज्ञा की आवाज ने फाइल की ओट वाले को चौंका दिया था.
उत्सुकता के भाव लिए सीनियर ने अपना चेहरा फाइल की ओट से बाहर निकाला,
‘तुम.’ उस की आवाज में आश्चर्यमिश्रित घबराहट थी. घबरा तो प्रज्ञा भी गई थी.
‘आप.’
दोनों को सामान्य होने में समय लगा पर जब सामान्य हो गए तो सबकुछ विस्मृत कर बात करने लगे. ‘यस, बताएं प्रज्ञाजी.’
प्रज्ञा को आश्चर्य हुआ कि उन्हें उन का नाम कैसे मालूम हुआ पर वह खामोश ही रही. वैसे तो वह भी सामान्य होने की चेष्टा कर रही थी पर सच तो यह है कि वह सामान्य हो ही नहीं पा रही थी.
‘सौरी सर,’ उस की आवाज में पश्चात्ताप था.
‘किस बात की सौरी, अभी तो तुम ने कोई बात की ही नहीं.’
‘वो, उस दिन…’
‘हम अभी औफिस में हैं. तो हम औफिस की ही बात करें.’
‘जी,’ अब की बार प्रज्ञा घबरा गई थी. उसे मालूम नहीं था कि कुछ दिनों पहले उस ने जिस लड़के पर अपना पीछा करने का आरोप लगाया था वह उस की ही कंपनी में काम करने वाला उस का सीनियर है. वह कुछ देर तक अपने मन को ही समझती रही, भले ही सीनियर हो पर यदि वह उस का पीछा कर रहा था तो वह बोलेगी नहीं क्या. पर कहीं ऐसा न हो कि वह उस दिन का बदला निकालने लगे.
यदि ऐसा हुआ तो उस की नौकरी तो खतरे में पड़ जाएगी. पड़ जाने दो. नौकरी के भय से वह अन्याय सहन नहीं करेगी. उस के मन के कुरुक्षेत्र में द्वंद्व चल रहा था. द्वंद के भाव उस के चेहरे पर आजा रहे थे पर इस का परिणाम यह हुआ कि उस का आत्मविश्वास बढ़ गया. यदि इस ने कुछ बोला तो वह उस दिन जैसी ही डांट देगी भले ही उसे नौकरी से अलग कर दिया जाए.
राजेश सामने खड़ी प्रज्ञा के चेहरे पर आ रहे भावों को देख रहा था.
‘यस, आप बताएं मैं आप की क्या मदद कर सकता हूं?’ उस का स्वर शांत था. उस के शांत स्वर ने प्रज्ञा का हौसला बढ़ा दिया. ‘वो सर, मैं इस फाइल को ले कर आप के पास आई हूं, इस में मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है.’
‘हां, बताएं.’
राजेश बहुत देर तक प्रज्ञा को काम के बारे में समझता रहा. काम खत्म हो जाने के बाद उस ने चपरासी को चाय ले आने का बोल दिया था. प्रज्ञा और राजेश सामने के सोफे पर आ कर बैठ गए थे. प्रज्ञा इतनी देर में राजेश के स्वभाव को समझ चुकी थी. उसे एहसास होने लगा था कि उस ने राजेश पर उस का पीछा करने का जो आरोप लगाया है वह सच नहीं हो सकता. उस ने जल्दबाजी में बगैर जांचेसमझे उस से कह दिया था.
‘वो सर, उस दिन मैं ने आप को कुछ ज्यादा ही बोल दिया था. क्षमा चाहती हूं.’ ‘नहीं, आप ने जो समझ, उस की प्रतिक्रिया तो ऐसी होनी ही चाहिए.’
प्रज्ञा कुछ नहीं बोली.
‘केवल एक बात कहनी है कि आप प्रतिक्रिया देने के पहले सही और गलत को समझ अवश्य लें ताकि कोई भला आदमी आप की कठोर बातों से आहत न हो सके.’
राजेश की आवाज अभी भी शांत ही थी. प्रज्ञा के चेहरे पर भी पश्चात्ताप के भाव थे.
‘मैं आप का पीछा नहीं कर रहा था. यह तो मात्र संयोग ही था कि हम दोनों एक ही महल्ले में रहते हैं और एक ही समय पर घर से निकलते हैं और हमारा गंतव्य भी एक ही है.’
‘सौरी,’ बहुत धीमी आवाज में प्रज्ञा बोली.
‘ओके.’
चाय खत्म हो चुकी थी.
‘मैं चलूं, सर?’
‘यस.’
लौटते समय प्रज्ञा के कदमों में उत्साह परिलक्षित हो रहा था. शाम को औफिस से निकल कर वह अपने नियमानुसार सीधे बसस्टौप की ओर नहीं बढ़ी. वह एक ओर जा कर खड़ी हो गई. उसे राजेश की प्रतीक्षा थी. उस ने अंदाज लगाया था कि राजेश भी इसी समय औफिस से निकलता होगा. यह अलग बात है कि वह उस के सामने नहीं आता था. उस की आंखें कंपनी के गेट को एकटक देख रही थीं.
वैसे तो राजेश को भी सभी के साथ औफिस से निकल जाना चाहिए होता था और पहले वह ऐसा करता भी था पर जब से प्रज्ञा ने उस को आरोपों के घेरे में लिया है तब से उस ने प्रज्ञा के निकल जाने के बाद ही निकलना शुरू कर दिया था. आज भी वह कुछ देर बाद ही अपनी केबिन से निकला और रोज की तरह बसस्टौप की ओर बढ़ गया. वह कुछ कदम ही बढ़ा था कि पीछे से आई आवाज ने उस के कदमों को रोक दिया. किसी ने तो उसे पुकारा था. राजेश ने पलट कर देखा. उसे आश्चर्य हुआ प्रज्ञा को अपने सामने देख कर.
‘जी.’
‘अरे, मैं आप की ही राह देख रही थी,’ तेज चलने के कारण प्रज्ञा की सांस फूल रही थी.
राजेश सशंकित हो गया, कहीं उस से फिर से तो कोई गलती नहीं हो गई. वैसे, आज जब वह अपने औफिस में प्रज्ञा से मिला था तो उसे उस से मिल कर अच्छा लगा था. उस ने प्रज्ञा के बारे में जो छवि बनाई थी, प्रज्ञा उस से विपरीत थी. इस के पहले कि राजेश कुछ बोल पाता, प्रज्ञा ने ही उत्तर दे दिया, ‘मैं आप को सौरी नहीं बोल पाई थी न.’
‘किस बात के लिए?’
‘वो कुछ दिनों पहले मैं ने आप को…’ उस ने जानबूझ कर वाक्य पूरा नहीं किया.
‘हां, वो तो ठीक है लेकिन मैं ने इस के बारे में ज्यादा नहीं सोचा है, केवल अपनी राह बदल ली है ताकि कोई गलतफहमी न हो.’
‘मैं वही कह रही थी कि मैं ने अपनी गलती मान ली है तो आप अब राह क्यों बदल रहे हैं.’
‘क्या मतलब?’ राजेश सच में नहीं समझ था प्रज्ञा की बातों को.
‘अरे, मेरा मतलब है कि हम दोनों का औफिस एक है, दोनों का औफिस एक ही समय पर छूटता है और हम को एक ही कालोनी में जाना होता है. सो, हम अकेलेअकेले क्यों जाते हैं?’
राजेश चुप रहा. सच तो यह है कि वह प्रज्ञा की बातों को समझ ही नहीं पा रहा था.
प्रज्ञा उसे एकटक देख रही थी. उसे लग रहा था कि राजेश को उस के प्रश्नों के उत्तर देने चाहिए पर राजेश तो मौन था.
‘सर, मैं यह कह रही थी कि मैं आप के साथ ही औफिस आना चाहती हूं और आप के साथ ही अपने घर लौटना चाहती हूं ताकि मुझे आप की कंपनी मिल सके.’ प्रज्ञा ने यह कह कर अपनी नजरों को दूसरी ओर कर लिया था.
‘देखो, पहले तो आप मुझे सर कहना बंद करें. ऐसा लगता है कि मैं बहुत सीनियर हो चुका हूं. वैसे भी, हम सहकर्मी ही हैं. सो आप मुझे मेरे नाम से ही बुलाएं.’
‘जी. पर आप मुझे जो बारबार ‘आप’ कह रहे हैं, वह भी तो…’
‘ओके.’ राजेश को भी उसे आप कहना अच्छा नहीं लग रहा था.
‘अब मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर?’ प्रज्ञा ने उस की आंखों में झंकना शुरू कर दिया था.
‘अच्छा, ठीक है, मुझे क्या परेशानी,’ कहते हुए राजेश ने अपने कदम आगे बढ़ा दिए. प्रज्ञा भी उस के साथ कदमताल करते हुए चल रही थी. कालेनी के बसस्टौप पर दोनों साथ ही उतरे. ‘देखो, अब तुम कालोनी में चली जाओ, मुझे खाना लेने के लिए होटल पर रुकना पड़ेगा.’
‘अच्छा, आप यहां से खाना लेते हैं, खुद नहीं बनाते?’
‘नहीं. मुझ से खाना बनाते नहीं बनता,’ कहते हुए राजेश होटल की ओर बढ़ गया.
प्रज्ञा कुछ देर तक तो ठिठकी खड़ी रही, फिर वह धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ गई. प्रज्ञा को आज राजेश के साथ बात करने में और साथ घर लौटने में बहुत आनंद आया था.
दूसरे दिन प्रज्ञा कालोनी के मेन गेट पर खड़ी हो कर राजेश की प्रतीक्षा करती रही. राजेश के आते ही दोनों साथ ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ गए. अब तो यह सिलसिला शुरू ही हो चुका था. दोनों साथ ही आतेजाते और औफिस में ज्यादातर समय साथ ही रहते. दोपहर में लंच साथ होता और चाय भी. दोनों की झिझक खत्म हो गई थी और वे बेतकल्लुफ होते जा रहे थे.
शाम को औफिस से लौटते समय जैसे ही राजेश के कदम नियमानुसार होटल की ओर बढ़े, प्रज्ञा ने उसे रोक दिया, ‘आज आप हमारे साथ डिनर करेंगे, होटल जाने की जरूरत नहीं है.’ प्रज्ञा ने पूरे अधिकार के साथ बोला था.
राजेश के कदम ठिठक गए. ‘पर?’
‘परवर कुछ नहीं. मैं बहुत अच्छा खाना बनाती हूं, सच में.’
वैसे तो प्रज्ञा ने कई बार लंच पर भी कोशिश की थी कि राजेश उस के डब्बे से ही लंच करे पर हर बार राजेश कोई न कोई बहाना ले कर बात को टाल देता था. प्रज्ञा जानती थी कि रोजरोज होटल का खाना खाने में ऊब होने लगती है. वह तो अपने लिए खाना बनाती ही है, उस में से राजेश के लिए भी बना सकती है पर यह बात कहने में उसे हिचक हो रही थी, इसलिए उस ने राजेश को नहीं बोला था पर आज तो दोपहर में ही उस ने तय कर लिया था कि आज राजेश को वह अपने हाथ का भोजन जरूर कराएगी.
उस ने राजेश से पूछा भी नहीं था, सीधा आदेशात्मक बोला था. वह जानती थी कि यदि उस ने राजेश से पूछा तो वह मना कर देगा. राजेश ने उस के आदेशात्मक स्वर को सुना था. उसे अच्छा लगा पर वह उस के साथ डिनर करने में हिचक रहा था.
‘देखो प्रज्ञा, मुझे तो रोज ही होटल में खाना है. ऐसे में एकाध दिन तुम्हारे हाथ का खाना खा लिया तो मुझे होटल का खाना स्वादिष्ठ नहीं लगेगा. इसलिए…’
प्रज्ञा कुछ देर तक चुप रही, फिर बोली, ‘मैं ने आप से पूछा नहीं है. आप को बोला है कि आप आज मेरे साथ डिनर लेंगे. आप के पास कोई विकल्प नहीं है, इसलिए आप सारे बहानों को कोनों में रख दो और मेरे साथ चलो.’
इस बार भी प्रज्ञा का स्वर आदेशात्मक ही था बल्कि कुछ और कठोर भी था. राजेश कुछ देर तक असमंजस की स्थिति में खड़ा रहा, फिर उस ने अपने कदमों को प्रज्ञा के साथ कालोनी की ओर बढ़ा दिया. दोनों साथ ही साथ अपनेअपने घरों की ओर बढ़े.
‘आप हाथमुंह धो कर तैयार हो जाएं, मैं आप को लेने आऊंगी.’
‘अरे, मैं आ जाऊंगा.’
‘नहीं, मैं ही आऊंगी. आप तैयार रहना,’ कहते हुए प्रज्ञा के कदम अपने घर की ओर बढ़ गए.
खाना बहुत अच्छा बना था. प्रज्ञा ने पिंक कलर का सूट पहना था. ऐसा लग रहा था कि वह आज विशेष रूप से तैयार हो रही थी. उस के बाल तो वैसे भी लंबे थे जिन्हें वह औफिस जाते समय जूड़ा बना कर ढंक लेती थी पर आज उस ने अपने बालों को यों ही अवारागर्दी करने के लिए खुला छोड़ दिया था. हवा के झंके के साथ उस के बालों की कोई न कोई लट उस के गालों पर आ कर टकरा जाती. वह हौले से उन्हें अपने हाथों से अलग कर देती. उस के चेहरे पर आज अजीब सी ताजगी दिखाई दे रही थी.
राजेश कनखियों से उसे बारबार देख रहा था. कई बार उस की नजरें प्रज्ञा की नजरों से मिलीं तो वह झेंप गया पर प्रज्ञा नहीं झेंपी. वह एकटक राजेश को देख रही थी. आमतौर पर सादे कपड़ों में रहने वाला राजेश आज जीन्स और बंद गले की टीशर्ट पहन कर आया था. उस के ऊपर कोट भी पहने हुए था. राजेश भी बहुत सुंदर लग रहा था.
प्रज्ञा और राजेश खाना खाने के बाद बहुत देर तक यों ही बैठे बातें करते रहे. वैसे तो प्रज्ञा का मन नहीं था कि राजेश अभी जाए, वैसे भी कल तो रविवार था यानी अवकाश का दिन. सो, कोई जल्दबाजी की जरूरत थी भी नहीं पर राजेश को इस बात का इल्म था कि प्रज्ञा अकेली रहती है, ऐसे में देररात तक उस के घर पर रुकना ठीक नहीं है.
इस डिनर के बाद राजेश और प्रज्ञा दोनों और नजदीक आ गए थे. वे शब्दों में भले ही न कह पाए हों पर उन के हावभाव बताने लगे थे कि वे एकदूसरे के प्यार में पड़ चुके हैं. राजेश ने कई बार प्रज्ञा से कहने की कोशिश तो की पर प्रज्ञा के सामने आते ही उस की जबान लड़खड़ा जाती. वह कुछ कह ही न पाता. प्रज्ञा जानती तो सबकुछ थी पर वह भी राजेश के ही कह देने का इंतजार कर रही थी.
राजेश और प्रज्ञा इस रविवार को दोपहर में लंच लेने साथ ही एक होटल में गए थे. राजेश ने ही उसे औफर किया था- ‘क्या है कि मैं तुम को घर पर तो खाना खिला नहीं सकता, सो चलें हम होटल में ही खाना खा लेते हैं.’
‘अच्छा, वैसे आप चाहें तो मैं घर पर भी खाना बना कर खिला सकती हूं.’
‘नहीं, खाना मुझे खिलाना है तो तुम क्यों बनाओगी?’
‘अच्छा, मेरे डिनर का कर्ज उतारना चाह रहे हो?’
‘कर्ज नहीं फर्ज. अरे, इस बहाने हम दोनों रिलैक्स हो कर बैठ तो सकते हैं, इसलिए.’
प्रज्ञा तैयार हो गई. उसे तो तैयार होना ही था. वह राजेश के साथ समय बिताने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी. वैसे भी, दिनरात राजेश के ही खयालों में डूबी रहती थी. अवकाश के दिन तो उस को एकएक पल काटना कठिन हो जाता था. वह फोन लगा लेती पर फोन पर ज्यादा देर तक बातें न करती. उसे लगता, मालूम नहीं राजेश कहीं डिस्टर्ब तो नहीं हो रहा है.
आज प्रज्ञा ने साड़ी पहनी थी और बालों का जूड़ा बना लिया था. जूड़े में एक गुलाब का फूल भी लगा लिया था. राजेश ने एक दिन बातों ही बातों में उस को बोला था, ‘प्रज्ञा, ये गुलाब है न, इसे ही हम प्रेम का प्रतीक मानते हैं. जानती हो, क्यों?’ उस ने कोई उत्तर नहीं दिया तो राजेश ने ही बोला था, ‘जैसे प्रेम कांटों की चुभन के साथ पल्लवित होता है न, ठीक वैसे ही गुलाब भी कांटों का कष्ट सहन कर अपनी मुसकराहट बिखेरता है. मुझे गुलाब केवल इसीलिए ही बहुत पसंद है.’ उस ने गमले में खिले गुलाब की पंखुडि़यों को सहलाते हुए बोला था.
प्रज्ञा ने कोई विशेष साजसज्जा नहीं की थी पर फिर भी वह बहुत सुंदर दिख रही थी. राजेश और प्रज्ञा साथ ही साथ कालोनी से निकले. प्रज्ञा का मन हो रहा था कि वह राजेश का हाथ अपने हाथों में ले ले पर वह ऐसा नहीं कर सकती थी. वैसे भी, राजेश उस से कुछ दूरी बना कर ही चल रहा था. वे औटो से होटल पहुंचे थे.
प्रज्ञा पहली बार राजेश के इतने करीब बैठी थी. यदि औटो की मजबूरी न होती तो राजेश अब भी उस के इतना करीब न बैठता. दोनों की सांसें एकदूसरे की सांसों से टकरा रही थीं. राजेश ने शायद पहले से ही केबिन बुक करा लिया था, इसलिए वे दोनों सीधे केबिन में जा कर बैठ गए थे. वेटर सूप का प्याला रख गया था. दोनों सूप की चुस्कियां ले रहे थे.
‘प्रज्ञा, तुम आज बहुत खूबसूरत लग रही हो.’
प्रज्ञा के चेहरे पर लाज की गरिमा दौड़ गई.उस की उंगलियां अपनी ही साड़ी के पल्लू के साथ खेलने लगी थीं. राजेश प्रज्ञा को एकटक देखे जा रहा था.
‘सौरी प्रज्ञा.’
‘क्यों, क्या हुआ?’
‘मुझे शायद यह नहीं बोलना
था, सौरी.’
प्रज्ञा का चेहरा उतर गया, ‘क्यों?’
‘तुम्हारा मुख देख कर अंदाज लगाया कि तुम्हें मेरी यह बात अच्छी नहीं लगी.’
‘नहीं, नहीं. ऐसी कोई बात नहीं है.’ प्रज्ञा की नजरें राजेश के चेहरे पर जा कर टिक गईं.
‘अच्छा, तो तुम्हें अच्छा लगा मेरा
ऐसा कहना?’
‘जी.’ शर्म से लाल हो गई थी प्रज्ञा.
‘तो फिर मैं एक बात और पूछ ही लूं यदि तुम इजाजत दो तो?’
‘अरे, आप को इजाजत मांगने की क्या जरूरत है?’
‘कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें बगैर इजाजत के नहीं कहना चाहिए.’
‘अच्छा, यानी आप कोई गहरी बात कहना चाहते हैं?’
‘हां.’
‘तो फिर कहिए न, मैं बहुत
उत्सुक हूं.’
‘तुम मुझ से प्यार करती हो?’
प्रज्ञा अचंभित हो गई. उसे ऐसे प्रश्न की उम्मीद न थी. उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या उत्तर दे.
उसे मौन देख कर राजेश के चेहरे पर पश्चात्ताप के भाव उभर आए.
‘सौरी, शायद मुझे यह प्रश्न नहीं करना था?’
प्रज्ञा अभी भी चुप ही थी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या उत्तर दे. वह राजेश से प्यार करती थी, यह तो सच था. वह यह भी जानती थी कि राजेश भी उस से प्यार करता है परंतु न तो वह खुद भी यह कह पा रही थी और न ही राजेश ने कहा था. आज तो उसे इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि होटल के केबिन में राजेश उस के सामने यह प्रस्ताव रख देगा. उस के चेहरे पर अचंभितमिश्रित प्रसन्नता हिलोरें मार रही थीं.
‘आप यह बारबार सौरी क्यों बोल रहे हैं?’
‘और क्या, जब तुम्हारे पास कोई उत्तर नहीं है तो इस का मतलब है कि मैं ने गलत प्रश्न कर दिया.’
‘अरे वाह, किसी को सोचने का मौका भी न दो,’ अब की बार प्रज्ञा के चेहरे पर अनोखी मुसकराहट छा गई थी.
‘यदि सामने वाले को उत्तर देने के लिए सोचना पड़े तो फिर प्रश्न बेकार ही है.’
राजेश गंभीर बना हुआ था. उसे वाकई लगने लगा था कि उस ने कुछ गलत प्रश्न कर दिया है.
प्रज्ञा उस के चेहरे पर आने जानेवाले भावों को पढ़ रही थी. एकाएक वह अपनी कुरसी से उठी. उस ने अपने जूड़े में जो गुलाब का फूल लगाया हुआ था उसे निकाल कर अपने हाथों में ले लिया. प्रज्ञा राजेश के सामने घुटने के बल बैठी थी, ‘आई लव यू, डियर.’ लाज के कारण उस के गालों पर लालिमा फैल चुकी थी.
सभी को राजेश और प्रज्ञा की लव स्टोरी के बारे में पता चल चुका था. दोनों ने छिपाने का प्रयास किया भी नहीं था. दोनों साथ औफिस जाते और साथ ही लौटते भी. अकसर प्रज्ञा राजेश के लिए भी खाने का डब्बा ले कर आती. उन के बीच प्रेम की गहराई बढ़ती जा रही थी. एकाएक प्रज्ञा को अपने घर से बुलावा आया था. पिताजी ने फोन पर ही बोला था कि वह तुरंत आ जाए. कारण उन्होंने नहीं बताया था.
प्रज्ञा का मन अनेक शंकाओं से ग्रसित हो चुका था. उस ने राजेश को केवल इतना ही बताया कि उसे तत्काल अपने घर जाना पड़ रहा है. इस से ज्यादा उसे भी नहीं मालूम था.
राजेश उसे स्टेशन तक छोड़ने आया.
‘यदि तुम कहो तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूं?’
‘नहीं. आप अच्छे से रहना. मैं वहां पहुंच कर आप को फोन लगाऊंगी.’
पर प्रज्ञा का फोन नहीं आया. एकदो दिन तक तो राजेश प्रतीक्षा करता रहा पर जब फोन नहीं आया तो उस ने ही फोन लगाने का प्रयास किया. प्रज्ञा का फोन बंद बता रहा था.
प्रज्ञा का कोई पता नहीं चला. एक लंबा समय व्यतीत हो चुका था. इस बीच राजेश प्रज्ञा के शहर भी हो कर आ चुका था पर वहां भी उस का कोई पता नहीं चला. राजेश हताश हो चुका था. उसे प्रज्ञा के साथ बिताए एकएक पल अपनी आंखों के सामने झलते दिखाई देते. राजेश का मन अब यहां नहीं लग रहा था. एक दिन उस ने कंपनी से इस्तीफा दे दिया और अपने शहर चला गया. कुछ दिनों तक वह यों ही बेकाम सा पड़ा रहा, फिर उस ने एक प्राइवेट स्कूल में जाना शुरू कर दिया था यह सोच कर कि उस का मन तो लगे कैसे भी.
प्रज्ञा का आवेदनपत्र उस के सामने टेबल पर रखा हुआ था. इस आवेदनपत्र में उस की वही पुरानी फोटो लगी थी. वह अवाक सा उस फोटो को देख रहा था, अरे, प्रज्ञा, यह यहां है. ओह, मैं ने तो कहांकहां नहीं ढूंढ़ा इसे. उस की आंखों से आंसू बह निकले. उस ने घंटी बजा कर चपरासी को अंदर बुलाया, ‘यह आवेदन कौन ले कर आया है?’
‘एक मैडम ले कर आई थीं, सर.’
राजेश समझ गया कि प्रज्ञा ही आई होगी.
‘उन्हें अंदर बुलाओ.’
‘वे तो आवेदन दे कर चली गईं.’
‘ओह, अच्छा.’
राजेश के चेहरे पर निराशा के भाव उभर आए थे. वह आवेदन को बारबार पढ़ रहा था. उस के सामने प्रज्ञा का चेहरा जीवंत होता जा रहा था. उस ने कितना तो खोजा प्रज्ञा को पर मिली ही नहीं. उस ने अपने जीवन के इतने वर्ष प्रज्ञा की यादों के सहारे ही तो काटे हैं. काश, वह मेरे सामने होती तो मैं उसे बताता कि देखो प्रज्ञा, तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा ही रह गया.
उस ने आवेदन के नीचे लिखे फोन नंबर को देखा, क्या मैं फोन लगा लूं, राजेश के चेहरे पर असमंजस के भाव थे.
मोबाइल की घंटी कुछ देर तक यों ही बजती रही. राजेश का दिल बहुत तेज धड़क रहा था. उस का मन हुआ कि जब फोन रिसीव नहीं हो रहा है तो काट ही दूं पर तभी दूसरी ओर से आवाज गूंजी, ‘यस, कौन?’
प्रज्ञा की ही आवाज थी. इतनी मीठी आवाज भला किसी और की हो ही कैसे सकती है.
‘प्रज्ञा, तुम यों ही लगातार बोलते रहा करो. मुझे तुम्हारी आवाज बहुत कर्णप्रिय लगती है.’
‘अच्छा, मैं पागल हूं क्या कि मैं ही बोलती रहूं,’ कुछ देर चुप रहने के बाद वह ही बोली, ‘अच्छा, ओके. कहो तो गाना भी सुना दिया करूं.’
‘अरे हां, मैं यह तो भूल ही गया. जब तुम्हारी इतनी सुरीली आवाज है तो तुम गाना भी बहुत अच्छा गा सकती हो.’
‘आप को तो मेरी हर चीज अच्छी लगती है,’ उस के चेहरे पर शरारत के भाव उभर आते.
‘अरे, अब जब तुम हो ही इतनी अच्छी तो मैं क्यों बुरा कहने लगूं.’
‘हां, ठीक है. मान लिया.’
‘तो अब गाना भी सुना ही दो.’
प्रज्ञा धीरे से गाने की दो पंक्तियां सुना देती.
राजेश उस आवाज में खो सा जाता.
दूसरी ओर से फिर आवाज गूंजी, ‘कौन?’
राजेश सकपका गया. ‘मैं स्कूल से बोल रहा हूं. आप आवेदन दे कर गई थीं न.’
‘ओह, अच्छा.’
राजेश ने जानबूझ कर अपना नाम नहीं बताया था. उसे उम्मीद थी कि जैसे उस ने प्रज्ञा को आवाज से पहचान लिया है वैसे ही प्रज्ञा भी उसे आवाज से पहचान लेगी.
पर प्रज्ञा ने नहीं पहचाना.
‘जी बताएं, कोई कमी रह गई है क्या आवेदन में या निरस्त कर दिया गया है.’
‘नहीं, मैं ने यह बताने के लिए फोन किया कि आप का सलैक्शन हो गया है. आप कल से स्कूल आ सकती हैं.’ राजेश का मन निराशा से भरता जा रहा था.
‘आप राजेश सर बोल रहे हैं न?’
राजेश की उमंगें हिलोरें लेने लगीं. ‘जी, पर आप ने कैसे पहचाना?’
‘वह मैं आवेदन देने गई थी न, तब प्यून ने बताया था कि राजेश सर ही सलैक्शन करते हैं, इसलिए.’
‘ओह,’ राजेश फिर निराशा में डूब गया मतलब कि प्रज्ञा ने उसे उस की आवाज से नहीं पहचाना है.
‘आप कैसे हैं, राजेशजी?’ एक बार फिर राजेश का चेहरा खिल गया.
‘मैं ठीक हूं, आप कैसी हैं?’
‘आप! अरे, मैं ने कितने वर्ष पहले बोला था न कि मुझे आप नहीं कहा करें.’
राजेश का चेहरा खिल गया, ‘यानी आप ने मुझे पहचान लिया.’
‘क्यों नहीं. वह तो तब ही पहचान लिया था जब आप ने हैलो कहा था. हैलो कहने की आप की अपनी स्टाइल जो है. वैसे हैलो कोई और बोल ही नहीं सकता.’
‘ओह अच्छा. फिर बताया क्यों नहीं?’
‘मुझे लगा कि आप ने मुझे नहीं पहचाना है, इसलिए.’
‘अरे, तुम्हारी आवाज को मैं भला कैसे भूल सकता हूं, सौरी.’
‘अब यह सौरी क्यों?’
‘ऐसे ही.’
‘अच्छा, फिर ठीक है.’
‘क्या हम मिल सकते हैं, प्रज्ञा. ढेर सारी बातें करनी हैं.’
‘बात तो मुझे भी करनी है पर कल तो मिलेंगे ही न.’
‘ओके,’ राजेश को उस की बात यों काटे जाने पर दुख हुआ.
प्रज्ञा जानती थी कि राजेश को उस की बात काटा जाना अच्छा नहीं लगा होगा. वह तब भी झझंला पड़ता था, ‘यार, तुम मेरी बात को मान ही लिया करो वरना मुझे गुस्सा आ जाता है.’
वह मान भी लेती थी. उस ने राजेश की कोई बात कभी नहीं काटी थी. राजेश के कहने पर ही तो उस ने औफिस सूट पहन कर जाना छोड़ दिया था. उसे साड़ी में परेशानी होती थी पर साड़ी पहन कर ही औफिस जाती थी. आज तो उस ने जानबूझ कर ऐसा किया था. सच तो यह है कि वह राजेश पर बहुत नाराज थी. वह अपने पिता से विद्रोह कर जब उस से मिलने कंपनी पहुंची तो वहां पता चला कि जनाब कंपनी छोड़ कर भाग गए हैं. वह कहांकहां नहीं उसे ढूंढ़ती फिरी पर जनाब का पता ही नहीं चला.
पापा ने उसे तत्काल बुलाया था वो केवल इसलिए कि उन्होंने उस के लिए एक लड़का पसंद कर रखा था और वे चाहते थे कि उस के साथ उस की शादी तुरंत ही हो जाए. शायद उन को मेरे और राजेश के प्यार के बारे में पता चल गया था. उस ने भी अपने पापा को साफसाफ सबकुछ बता दिया था और कह दिया था कि वह विवाह तो राजेश के साथ ही करेगी. पापा का गुस्सा सातवें आसमान पर था.
‘नहीं, तुम जानती नहीं हो वे दलित समुदाय से आता है.’
‘तो, वे भी इंसान ही तो होते हैं. और फिर, राजेश तो पढ़ालिखा है, अच्छी जौब कर रहा है, देखने में भी खूबसूरत है. सो, फिर क्या दिक्कत है?’
‘दिक्कत, अरे, समाज के लोग क्या कहेंगे. क्या हमारे समाज में लड़के नहीं हैं जो तुम गैरसमाज में शादी करना चाहती हो.’
‘देखो पापा, मुझे अपना जीवन गुजारना है तो मैं उस लड़के के साथ ही जीवन गुजारूंगी जिसे मैं पसंद करती हूं. इस में समाज कहां से बीच में आ गया?’
‘प्रज्ञा, तुम समझने की कोशिश करो. मुझे अपनी एक बेटी और ब्याहनी है. तुम इस तरह गलत आदमी से ब्याह कर लोगी तो समाज तो हमारे खिलाफ ही हो जाएगा न.’
‘बेकार की बातें हैं, पापा. समाज बहुत आगे निकल चुका है. आप भी अपनी सोच को बदल लो.’
‘नहीं, तुम को वहां ही शादी करनी होगी जहां मैं चाह रहा हूं.’
‘सौरी पापा. शादी तो मैं राजेश से ही करूंगी,’ प्रज्ञा ने दोटूक बोल दिया था.
प्रज्ञा की बातें सुनते ही पापा अस्वस्थ हो गए. उन्हें अस्पताल में एडमिट करना पड़ा. वह उन्हें यों अस्पताल में छोड़ कर तो आ नहीं सकती थी. सो उसे समय लग गया. उस ने राजेश को एकदो बार फोन लगाने का मन भी बनाया पर वह जानती थी कि राजेश को जैसे ही वह सारा कुछ बताएगी, वह दौड़ता हुआ वहां पहुंच जाएगा. पापा उसे देखेंगे तो उन की बीमारी और बढ़ जाएगी, यह सोच कर वह वक्त का इंतजार करती रही.
पापा नहीं बच सके. प्रज्ञा बहुत समय तक पापा की हुई अचानक मौत के सदमे में रही. उसे लग रहा था कि जैसे पापा को उस ने ही मार दिया हो. यदि वह उन के बताए रिश्ते को स्वीकार कर लेती तो आज पापा जिंदा होते पर वह दुखी ही रहती न. पापा का जीवन तो वैसे भी कम बचा था पर उस का तो पूरा ही जीवन सामने था. वह कैसे घुटघुट कर अपना जीवन काटती?
प्रज्ञा को पापा की मौत के सदमे से उबरने में समय लगा. इस बीच वह चाह कर भी राजेश से संपर्क नहीं कर पाई. एकदो बार प्रयास किया पर उस का फोन लगा ही नहीं. बहुत समय बाद प्रज्ञा वापस कंपनी पहुंची थी.
वह राजेश के गले से लग कर फूटफूट कर रोना चाहती थी पर राजेश नहीं मिला. कंपनी से केवल राजेश के शहर का ही पता ज्ञात हुआ था तो वह इस शहर में आ कर रहने लगी थी, यह सोच कर कि कभी तो राजेश से मुलाकात हो जाएगी. उसे नहीं मालूम था कि राजेश तो कभी का यहां आ चुका है. राजेश निकलता कहां था घर से कि वह कभी उस से टकराती. वह दूसरे स्कूल में पढ़ा कर अपना जीवनयापन कर रही थी. उस स्कूल के प्राचार्य ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह भनभना कर स्कूल से इस्तीफा दे आई.
जब वह इस स्कूल में आवेदन देने गई थी तो राजेश की नेमप्लेट को देख कर उसे शक अवश्य हुआ था कि वही राजेश है. ‘पर वह यहां क्यों होगा, इतना बड़ा अधिकारी था उस कंपनी में तो दूसरी कंपनी में तो और बड़ी पोस्ट पर होगा पर मन मान नहीं रहा था. जैसे ही उस ने फोन पर राजेश की आवाज सुनी, उस का चेहरा खिल उठा था, हालांकि उसे राजेश से बहुत सारी शिकायतें भी थीं.
उसे अपने हर प्रश्न के उत्तर चाहिए थे. जौइनिंग बाद में, पहले लड़ाई, फिर राजेश के गले से लग कर फूटफूट कर रोना चाहती थी वह पर जब वह स्कूल पहुंची तो राजेश स्कूल में नहीं मिला. किसी ने बताया था कि उस की तबीयत खराब है, वह किसी अस्पताल में भरती है.
अरे, कल तो अच्छे से बात कर रहे थे. फिर एकाएक क्या हो गया? उस के माथे पर चिंता के भाव आ गए थे. उस ने अस्पताल जा कर राजेश को देख आने के बारे में सोचा ही नहीं. जब राजेश स्वस्थ हो कर आ जाएंगे तब बात करेंगे.
स्कूल में ही पता चलता रहा कि राजेश की अस्वस्थता बढ़ती जा रही है.
आज जब वह स्कूल आई तो उसे पता चला कि राजेश की हालत बहुत खराब है. अब उस का मन किसी काम में नहीं लगा. वह स्कूल बीच में ही छोड़ कर अस्पताल की ओर दौड़ पड़ी. उस का दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था. वह लगभग दौड़ती हुई सी अस्पताल पहुंची थी. रिसैप्शन पर ही राजेश का कमरा पता किया और सीढि़यों से होती हुई उस के कमरे के सामने जा कर खड़ी हो गई.
कमरे का दरवाजा खोलते समय उसे कुछ असमंजस सा महसूस हुआ पर उसे तो हर हाल में राजेश को देखना ही था. सो, उस ने हौले से कमरे का दरवाजा खोल दिया और कमरे के अंदर दाखिल हो गई. राजेश के चेहरे पर औक्सीजन मास्क लगा था. नर्स उस के हाथों में बौटल लगा रही थी. एक बुजुर्ग औरत प्यार से उस के माथे को सहला रही थी. शायद राजेश की मां होंगी, उस ने अंदाजा लगाया. दरवाजा खुलने की आहट से सभी चौंक गए थे.
‘‘जी, मैं, प्रज्ञा.’’
नर्स के चेहरे पर उस का नाम सुनते ही अजीब से भाव आ गए, ‘‘अरे, आप ही प्रज्ञा हैं. देखिए, ये मरीज तो कब से आप का ही नाम पुकार रहे हैं.’’
बुजुर्ग महिला ने भी ममतामयी नजरों से प्रज्ञा की ओर देखा मानो उन्हें उम्मीद हो कि उन का बेटा जिसे पुकार रहा था वह आ गई है तो वह भी आंख खोल कर उठ खड़ा हो जाएगा.
प्रज्ञा ने बोझिल वातावरण को महसूस कर लिया था. उस की आंखों में भी आंसू झलझला आए. वह राजेश के नजदीक पहुंच गई और उस ने प्यार से राजेश को सहलाया. राजेश के शरीर में कुछ हलचल सी हुई. राजेश ने प्रज्ञा का हाथ अपने हाथों में जकड़ लिया. उस की सांस तेजतेज चलने लगी थी. नर्स घबरा गई थी. उस ने डाक्टर को आवाज लगाई. जब तक डाक्टर आते तब तक राजेश की सांसें थम चुकी थीं. कमरे में राजेश की मां और प्रज्ञा के रुदन की आवाजें गूंज रही थीं. Romantic Story in Hindi





