लेखिका- Sharad Upadhyay

शिखा ने कमरे में घुसते ही दरवाजा बंद कर लिया और धम्म से पलंग पर बैठ गई. नयानया घर, नईनई दुलहन... सबकुछ उसे बहुत अजीब सा लग रहा था. 25 वर्ष की उम्र में इतना सबकुछ देखा था कि बस, ऐसा लगता था कि जीवन खत्म हो जाए. अब बहुत हो चुका. हर क्षण उसे यही एहसास होता कि असंख्य निगाहें उस के शरीर को भेदती हुई पार निकल जातीं और आत्मा टुकड़ेटुकड़े हो कर जमीन पर बिखर जाती.

पलंग पर लेटते ही उस की निगाहें छत पर टिक गईं. पंखा पूरी तेजी से घूम रहा था. कमरे की ट्यूबलाइट बंद थी. एक पीला बल्ब बीमार सी पीली रोशनी फेंक रहा था. अचानक उस की निगाहें कमरे के कोने में फैले एक जाले पर पड़ीं, जिस में एक बड़ी सी मकड़ी झूल रही थी. कम रोशनी के कारण जाला पूरी तरह दिख नहीं रहा था, लेकिन मकड़ी के झूलने की वजह से उस का आभास जरूर हो रहा था.

वह एकटक उसे देखती रही. पता नहीं क्यों जाला उसे सम्मोहित कर देता है. उसे लगता है कि इस जाल में फंसी मकड़ी की तरह ही उस का जीवन भी है. आज एक महीना हो गया उस की शादी को, पर हर पल बेचैनी और घबराहट उसे घेरे रहती है. रोज मां का फोन आता है. हमेशा एक ही बात पूछती हैं, ‘कैसे लोग हैं शिखा, शेखर कैसा है, उस के मातापिता का व्यवहार ठीक है. चल बढि़या, वैसे भी पढ़ेलिखे लोग हैं.’

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