Psychological Trauma : रगड़-रगड़ कर उस के शरीर की चमड़ी उधड़ गई थी लेकिन बदबू थी कि जा ही नहीं रही थी. कैसे छुटकारा मिलेगा उसे इस बदबू से? बस, अब तो एक ही रास्ता उसे सूझ रहा था.

आनंद आने वाला था. ऐसा नहीं था कि वे दोनों पहली बार मिल रहे थे. फिर भी पता नहीं क्यों निद्रा बेचैन थी. हालांकि आनंद ने ही उसे बुलाया था लेकिन वह अभी तक आया नहीं था. वह बेचारी पार्क में बैठी कब से उस का इंतजार कर रही थी.

आनंद आया हाथों को पीछे बांधे. शायद, कुछ छुपाने की कोशिश. उस की मूरत देख उस की आंखों में चमक उठी. अधर पर हल्की मुस्कान तैरने लगी. इंतजार करवाने का जो मासूम गुस्सा था वह आनंद के आने की खुशी में पिघल गया. वह आया, उस के नजदीक बैठा. फूली हुई नाक से उसे एहसास हो गया था कि थोड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. हर बार की तरह इस बार भी वह सामने की ओर देखने लगी थी मानो गुस्सा दिखाने का एक छोटा सा प्रयास ताकि अगली बार इंतजार न करना पड़े पर वैसा करना मुश्किल था. आंखें यहां-वहां हो रही थीं शायद आनंद का अगला कदम देखने की कोशिश थी यह. पर वह भी उस की तरह ही सामने की ओर देखने लगा. पता नहीं दोनों उस खाली आसमान में क्या ढूंढ़ रहे थे.

‘‘सौरी,’’ आनंद ने कहा.

‘‘अब तुम्हें पता है मैं माफ तो करूंगी ही. क्या करूं ज्यादा देर तक एक ही मूड में रह नहीं सकती न,’’ निद्रा ने उस की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘रिश्ता आया था, इसलिए थोड़ा रुकना पड़ा.’’ निद्रा पलभर के लिए सहम सी गई. कुछ नहीं कहा. बस, आनंद को देख रही थी. कुछ पल देखा और एकाएक उस ने अपनी गर्दन सामने की ओर मोड़ दी. अक्सर ऐसा ही होता है जिन बातों को बयां करने में हमें थोड़ी कठिनाई होती है तब अकसर हम सामने वालों से नजरें चुराते हैं ताकि थोड़ी हिम्मत कर पाएं, जो कहना चाहते हैं वह कह पाएं या हमारी बात सुन कर सामने वाले के चेहरे पर जो भाव पैदा हो जाएंगे या वह हमारे बारे में क्या सोचेगा, यही बातें आंखें चुराने को मजबूर कर देती हैं यही बातें मन को हल्का कर देने में विलंब कर देती हैं.

‘‘आनंद मुझे लगता है कि जल्दबाजी करने से अच्छा है कि हम एक-साथ रहें. इस से एकदूसरे को और जान जाएंगे,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘और क्या जानना है, निद्रा? मेरी शादी हो जाएगी, तुम समझ नहीं रही हो. और वैसे भी, इतने दिन तो हो गए हमारे रिलेशनशिप को,’’ आनंद ने कहा.

‘‘मैं एक-साथ रहने की बात कर रही हूं,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘लिवइन?’’ आनंद ने कहा.

‘‘हूं. मतलब, ऐसे तो सब ठीक ही लगता है पर जब साथ रहेंगे तो और बेहतर समझ पाएंगे और सही डिसीजन ले पाएंगे,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘पर अचानक यह सब? हम ने जब फोन पर बात की थी तो तुम ने ‘हां’ कहा था. अब यह,’’ आनंद ने कहा. निद्रा ने इस का कोई जवाब नहीं दिया. शायद उस की आंखें भी जवाब तलाश रही थीं.

‘‘तुम अखबार नहीं पढ़तीं न, लिवइन भी पॉसिबल नहीं है. हर तरफ से. वेट करते रहे तो वेट ही करते रहेंगे,’’ आनंद ने कहा.

‘‘फिर क्या करें? सीधा शादी? अरे, अभी तुम्हें आसान लग रहा है पर बाद में. मैं, बस, इतना कहना चाहती हूं कि मुझे लगता है हमें थोड़ा और वेट करना चाहिए,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘तुम समझ नहीं रही हो, मेरी शादी हो जाएगी. मुश्किल से मैं ने मम्मी को बताया. वे कुछ तो कर के पापा को रोके हुए हैं. पर यह ज्यादा दिन तक नहीं चल सकता,’’ आनंद ने कहा.

निद्रा ने कुछ नहीं कहा. दुविधा में पड़ गई थी. क्या कहे क्या करे?

‘‘क्या हुआ निद्रा, कुछ हुआ है क्या?’’ आनंद ने कहा.

‘‘रानी आई है. सब-कुछ छोड़-छाड़ कर.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो कहा था अविनाश और वह रिलेशनशिप में थे, फिर?’’

‘‘कह रही थी शादी के बाद सब बदल जाता है. कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता. अविनाश काफी असुरक्षित सा हो गया था. हमेशा डाउट, क्यों कैसे कहां कब. फिर यह आए-दिन होता रहा और. गहरी चोट आई है उसे,’’ निद्रा ने कहा.

‘‘ओह,’’ आनंद ने कहा.

‘‘कह रही थी तुम से न मिला करूं,’’ निद्रा ने कहा तो आनंद ने कुछ पल उस की आंखों में देखा. शायद वह कोशिश कर रहा था… समझने की कि यह रानी कह रही है या.

‘‘अच्छा हुआ वह निकल आई वहां से. वैरी गुड डिसिजन. सिंपल ही तो है, नहीं वर्कआउट होता तो निकल जाओ, टॉक्सिसिटी क्यों बढ़ाएं लेकिन कुछ लोगों के गलत करने से हर कोई गलत साबित नहीं होता. सब की अपनी-अपनी सोच होती है. सेल्फ कंट्रोल भी कुछ होता है. रानी के साथ जो हुआ उस बेसिस पर तुम कैसे अपना डिसीजन ले सकती हो? दूसरों का छोड़ो, तुम क्या चाहती हो?’’ आनंद ने कहा.

‘‘आनंद, मैं तुम्हें जानती हूं. मैं जानती हूं तुम नहीं हो वैसे. मैं तुम्हारे साथ सुरक्षित महसूस करती हूं लेकिन रानी ने भी तो शादी ही की थी. अगर एकदूसरे को ठीक से समझ होता तो ऐसी स्थिति न आती.’’

‘‘और कितना समझते? नहीं होतीं वर्कआउट शादियां. अब रानी के साथ वैसा हुआ, इस का मतलब यह नहीं कि मैं भी तुम्हारे साथ वही सब करूंगा. मैं मानता हूं तुम्हारा डर सही है पर सब को जनरलाइज करना भी सही नहीं है न,’’ आनंद ने कहा.

निद्रा की आंखें भर आई थीं. आनंद ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. अकसर किसी अपने की आगोश में अंदर का सारा दर्द क्षणभर में मिट जाता है.

‘‘चलो, चलो बस हो गया. यह देखो, मैं क्या लाया,’’ उस ने नीचे जमीन की ओर बेंच के पाए के पास जो गुलदस्ता रखा हुआ था उसे उठाया और कहा, ‘‘हैप्पी एनिवर्सरी’’ 2 साल हुए थे उन के इस खूबसूरत से सफर को. यह ट्रेन आज जरा सी लड़खड़ाई पर फिसली नहीं. उसी पटरी पर मौजूद रही क्योंकि विश्वास की बुनियादी ढांचे पर ये पटरियां उभरी हुई थीं. दोनों एक-दूसरे की आगोश में इस तरह खो गए मानो उस कल्पना की दुनिया में अपना ऐसा घर बसा रहे हों जहां सिर्फ प्रेम हो. कोई रोक-टोक, सवाल कुछ नहीं. बस, एक-दूसरे की प्रति गहरा विश्वास हो. उन्होंने एक-दूसरे के इस तरह भींच लिया था जैसे उस घर की दीवारों को और मजबूती दिलाने की कोशिश कर रहे हों. धड़कनें और सांसों की आवाज स्पष्ट सुनाई दे रही थीं. कुछ और नहीं, न कहीं जाना न आना. बस, यहीं रहना चाहते थे वे दोनों. उसी वक्त में. उसी क्षण में. एकदूसरे को इस तरह कसा हुआ था जैसे अलग होने का डर भीतर कहीं पनप रहा हो. आस-पास कोई नहीं था. बस, वे दोनों.

प्रेम एक पौधे की तरह होता है जो धीरे-धीरे आकाश की ओर बढ़ता जाता है और एक विशालकाय वृक्ष का रूप धारण कर निस्वार्थ भाव से उस की गोद में पलने वालों को अपने-पन की छाया में जिलाता रहता है लेकिन प्रेम सच में हो तो. क्योंकि हाल ही में प्रेम की व्याख्या बहुत बदल गई है वगैरह-वगैरह.

कुछ देर बाद उन्होंने आंखें खोलीं. धक्का लगा. कुछ समय पहले तो यह मैदान खाली था. पर अब, उन दोनों के इर्दगिर्द और चार आ गए. चार कथित मर्द. संस्कृति बचाने वाले. उन्होंने निद्रा और आनंद को अलग कर दिया. मारपीट कर. लातों से, घूसों से. निद्रा ताकत लगा रही थी आनंद के पास जाने की, उस को बचाने की पर उस को 2 गुंडों ने जकड़ रखा था. जिसे बचपन से ही कोमल बने रहने का अभिशाप मिला हो वह क्या ही इन भेड़ियों का सामना कर पाती. आनंद चिल्ला रहा था पर आसमान में हवा इस कदर गुमसुम थी कि उस की आवाज उस हवा में गूंजने के बजाय गायब हो रही थी. कोई नहीं था आसपास. कोई नहीं. बहुत मारा आनंद को. खून बहने लगा था मुंह से. फिर भी रुके नहीं. अब बची निद्रा. आनंद को बेसुध अवस्था में छोड़ वे 2 भेड़िए अब निद्रा की ओर बढ़ते चले आ रहे थे. शिकार नजर आई थी न. मादा.

मादा सदियों से शिकार ही बनती आई है. सदियों से उस ने अपनी इस तस्वीर को बदलने की बहुत कोशिश की पर उस के शरीर पर लगे मांस के पुर्जे, जो सृष्टि को आगे बढ़ाने की क्षमता रखते हैं, को मैला होने से बचाने में वह कई बार हारती आई है. उन भेड़ियों की नजर में निद्रा शरीफ लड़की नहीं थी, उन को लगा वह यों कर के तैयार हो जाएगी. मना नहीं करेगी.

शरीफ लड़की. कौन होती है? चौखट के भीतर रहने वाली. बाहर घूमती है तो वेश्या, इशारे-भर से टांगें फैलाती है, शायद यही सोचा होगा भेड़ियों ने. एक ने उस की कुर्ती को हाथ लगाना चाहा.

निद्रा ने जोर से धक्का दिया पर भेड़िये इतने में रुकने वाले थोड़ी थे. उन्होंने उस के कंधों को दबोचना चाहा. फिर वही. अब वे जबरदस्ती पर उतर आए. पता नहीं निद्रा में कहां से इतनी ताकत आई थी, उस ने जोर से लात मारी. वह झटपटा कर फिर उठा. गुस्सा आया उसे. था तो मर्द ही. औरत कैसे उस पर हावी हो सकती थी. उस के मैं को ठेस पहुंची.

एक इशाराभर था कि सारे के सारे टूट पड़े निद्रा पर. मानो बीच में एक मांस का टुकड़ा पड़ा हो और कई भूखे भेडि़ए उस को खाने के लिए फड़फड़ा रहे हों. फिर भी वह उन चारों पर भारी पड़ रही थी. सदियों से समाज ने जो यह इज्जत का ठप्पा उस के बदन पर लगाया था उस को बचाने के लिए. ठप्पा मिट गया तो सब-कुछ खत्म.

आनंद फड़फड़ा रहा था अपनी ही जगह पर. उस की आंखों के सामने यह सब हो रहा था और वह कुछ नहीं कर पा रहा था. हिलने-डुलने की भी ताकत नहीं बची था उस में. और तभी, थक-हार कर दिमाग चलाया एक भेड़िए ने. नजर गई उस की आनंद की ओर. चाकू निकाला और सीधा आनंद की गर्दन पर. फिर भी निद्रा कैसे तैयार हो जाती. उस भेड़िए ने आनंद की छाती पर सट से वार किया.

निद्रा ऐसे चिल्लाई कि गगन को चीर कर उस की आवाज उस ‘कृष्णा’ तक पहुंच गई होगी जिस ने कभी द्रौपदी की आबरू बचाई थी पर कोई नहीं आया और एक वार हुआ आनंद के शरीर पर. उस की तो आवाज भी नहीं निकल रही थी. बस, फड़फड़ा रहा था. यह देख निद्रा निढाल हो गई. हाथ-पैर छोड़ दिए. आंखें अभी भी आनंद की ओर पर पूरा शरीर पत्थर बन गया था. आनंद से प्रेम था न उसे. भेड़ियों ने इस तरह उस के कपड़े फाड़े जैसे मुरगी छील रहे हों. आनंद और फड़फड़ाने लगा. उस तरह जैसे मुर्गी की गर्दन मरोड़ी जाती है. वह फड़फड़ाती है आखिर तक लेकिन हलक से एक आवाज तक नहीं आती.

कभी जिन छातियों का दूध पी-पी कर ये भेड़िए इस दुनिया में संभल गए होंगे उन्हीं छातियों को देख उन के भीतर हवस पैदा होने लगी. वह कोमल शरीर अब भेड़ियों के हाथों में था. वक्ष को इस कदर मसलने लगे जैसे कीचड़ पैरों तले कुचल रहे हों. टांगों को कस के पकड़ा. फिर क्या, एक के बाद एक आता रहा, जाता रहा. शायद वे भूल गए थे कि वे आए तो थे संस्कृति बचाने, पर उन्होंने संस्कृति को अपने ही हाथों रौंद डाला था. अब तो टांगों के बीच में से खून बह रहा था. फिर भी कोई रुका नहीं. एक के बाद एक. एक के बाद एक. आनंद क्या कर सकता था. बीच में उस ने सोचा भी, ‘अपने हाथ से ही खुद की गर्दन काट डाले, कम से कम निद्रा तो बच जाएगी पर अगर मेरे मरने के बाद भी उन्होंने नहीं छोड़ा तो?’ उस की आंखों से बस आंसू बह रहे थे. वह भी पत्थर बन गया था. बस, आंसू बहाता पत्थर.

छोड़ दिया तीन भेड़ियों ने निचोड़ के. कुछ नहीं बचा पर एक अब भी बाकी था उस की बारी थी.

उस ने शायद बड़प्पन दिखाया होगा ‘पहले तुम बांट कर खाओ, फिर मैं.’ अब उस की बारी थी.

उस ने आनंद को फेंक दिया घास पर और वह अपना हिस्सा बटोरने आया. निद्रा का नंगा शरीर देखा. टांगों के बीच से खून बह रहा था तो डर गया बेचारा पर मौका कैसे छोड़े. उस ने उस पत्थर को पलट दिया. अपनी पैंट खोली, फिर पूरी ताकत से निचोड़ने लगा. थक गया. फिर एहसास हुआ कि मर जाएगी बेचारी. जिंदा छोड़ देते हैं. भाग गए.

‘बदबू सी आती है बदन से, कितना खरोंच-खरोंच कर घिसाया, यहां तक कि चमड़ी भी उधेड़ दी खुद की ही. बावजूद इस के, यह बदबू मिट ही नहीं रही है. कोई साबुन जो इस को मिटा कर नई शुरुआत की महक भर दे. है कोई साबुन जो जहां से मिटा दे इस घटना को, समाज से, लोगों के जेहन से, उस के दिल से, मेरे अपनों के दिल से, खुद मेरे बदन से भी. कोई क्षण हो जो मिटा दे उस बीते हुए को मोड़ दे, मेरी जिंदगी को फिर से उसी खूबसूरत पटरी पर ला दे जहां से कभी यह प्रेम नाम की ट्रेन गुजरा करती थी. सोचती हूं, आज जिंदा क्यों हूं, मुझे मार देते तो बेहतर होता. यह कहानी ही मिट जाती. फिर गलती से भी इस जहां में कभी कदम न रखती मैं.

‘पर होता कुछ इस से? मिट जाता वह सब?

‘नहीं. क्योंकि यह कहानी ही कुछ ऐसी है.

‘लिखने वाले से ज्यादा जिन पर लिखी जाती है उन को उम्र भर जलाती रहती है. कोई कितनी भी कोशिश करे, पन्ने फाड़ दे, जला दे, गाड़ दे, कभी मिट नहीं सकती यह कहानी. वह एक जिंदगी के साथ इर्द-गिर्द की कितनी ही जिंदगियों को ले कर दफन हो जाती है.’

मुकदमे चलते रहते हैं. केस आते हैं,

जाते हैं. या तो दफन हो जाते हैं या सालों-साल चलते रहते हैं. इस से होता क्या है? कुछ नहीं. पीड़ित बार-बार आपबीती बताती रहती है. न चाहते हुए भी उसे बार-बार घावों को ताजा करना पड़ता है. वही सवाल, वही जवाब.

अब वे अपराधी कैदी तो बन जाते हैं पर वह सोच जो उन के भीतर पनपती है उस का क्या? और लोग भी उन्हें ‘हैवान’ ‘राक्षस’ या सोसाइटी से अलग कह कर भूल जाते हैं. जबकि बात यह है कि वे राक्षस या दानव नहीं हैं. इंसान हैं. चलते-फिरते इंसान. उन के भीतर जो सोच पनप रही है, उस के बारे में सोचने की जरूरत है क्योंकि उन को अगर फांसी भी दे दी गई तो सिर्फ उन का शरीर मर जाएगा पर वह सोच उन के बाद भी किसी न किसी के भीतर पाई जाएगी.

निद्रा को घर लाया गया. अस्पताल में थी. सदमे में चली गई थी. मतलब, अब भी है. कुछ कहती नहीं. एक जगह पर बैठी है तो बैठी है. सोई है तो सोई है. कुछ महसूस नहीं होता उसे. कौन आया. क्या कहा. कुछ नहीं. पत्थर सी बन गई थी. कोई भाव नहीं. न खाने का ध्यान न पहनने का. अब तो बदन पर कपड़े भी चुभने लगे थे उसे. इसलिए कभी-कभी उतार फेंकती.

उस की मां अपना रोना-धोना छोड़ कर उसे संभाल रही थी मासूम बच्ची की तरह. और कोई था नहीं. मां उस के कमरे में ही रहने लगी थी क्योंकि निद्रा अचानक नींद से उठ जाती, चिल्लाने लगती, खुद को नोचने लगती. ऐसे में एक अकेली औरत का उस को संभालना मुश्किल तो था पर संभाल रही थी क्योंकि उस के पिताजी उस के कमरे में जा नहीं सकते थे. न भाई जा सकता था.

निद्रा के दिमाग पर जिन चेहरों ने गहरा आघात किया था वही चेहरे उसे हर एक मर्द में नजर आने लगे थे. जब भी कोई आदमी उस से मिलने आता तो उस का नियंत्रण टूट जाता और वह कुछ न कुछ फेंक कर मारने लगती. इसलिए डाक्टर ने कहा भी था कि घर के और बाहर के आदमियों को इस से दूर ही रखिए. दिमाग पर गहरा असर हो गया है. जब-जब यह किसी आदमी को देखेगी, वह बीता हुआ फिर एक बार दिमाग में ताजा हो जाएगा और वह अपना आपा खो देगी. बस, कुछ दिनों के लिए.

जब दिन बीतते जाएंगे तो चीजें बेहतर होती जाएंगी और कुछ कह नहीं सकती. डाक्टर ने यह बस यों ही कहा था ताकि उस के माता-पिता का हौसला बना रहे. एक औरत होने के नाते और रेप पीड़िताओं का इलाज करने के बाद उन को यह तो मालूम हुआ था कि ये कहानियां पीड़िताओं के बदन पर से इतनी आसानी से नहीं मिटतीं. वह अगर मिटाना भी चाहे तब भी कुछ न कुछ ऐसा हो ही जाता है जिस कारण यह घाव फिर से हरा हो जाता है और वह उस घाव की पीड़ा से कराहने लगती है.

दूसरी ओर आनंद अब पहले से बेहतर था लेकिन किसी से बात नहीं करता था. तबीयत ठीक थी. शरीर के तौर पर बस. दिमागी तौर पर नहीं. चल तो सकता था लेकिन चौखट लांघने की कोशिश नहीं कर पाया. लोगों के सवाल, उस का क्या? लोग सवाल पूछने से पहले सवाल की गहराई तक थोड़े जाते हैं, जबान पर जो आया बक दिया. लोगों के लिए वह भी रेपिस्ट बन गया था. निद्रा का रेपिस्ट. जिस से वह प्रेम करता था उसी का. ऐसे वक्त में खुद को संभाल पाना मुश्किल होता है पर अच्छी बात यह थी कि घर वालों का साथ था. बावजूद इस के, उस के भीतर एक गिल्ट पनप रहा था. निद्रा को बचा न पाने का गिल्ट.

उस की आंखों के सामने यह सब हुआ था न. वह जब भी खाली बैठा होता उस बीते हुए का अंधियारा उस के इर्द-गिर्द मंडराने लगता. वह कांप उठता, सिसकता. इस के अलावा कर भी क्या सकता था. उस बीते हुए को मिटा तो नहीं सकता था. एक सवाल अब भी उसे पछतावे की आग में जला रहा था- ‘क्यों? क्यों उस ने निद्रा को वहां बुलाया था. अगर उस दिन न बुलाता तो शायद यह होता ही न.’

यह ‘क्यों’ बड़ा परेशान करता है. जब भी हम कुछ करने की चाहत में कुछ कर बैठते हैं और वह चाहत गलत मोड़ लेती है तब यही सवाल हमें बारबार परेशान करने लगता है- ‘क्यों?’ क्यों मैं ने बुलाया? क्यों मैं वहां चला गया? क्यों मैं ने यह किया? क्यों मैं ने सोचा नहीं? क्यों मैं ने किया नहीं? या क्यों मैं ने किया? क्यों? वगैरह-वगैरह. यह ‘क्यों’ का पछतावा बड़ा ही लंबा होता है. खत्म ही नहीं होता. जीवन के हर पड़ाव पर अचानक मौजूद हो जाता है. फिर हम खाली हाथ, बस, उस सवाल को देखते रहते हैं क्योंकि हमारे पास इस ‘क्यों’ का कोई जवाब नहीं होता.

निद्रा अपने ही जिस्म से नफरत करने लगी थी. बू आती थी उसे. ऐसी बू जो किसी भी साबुन से मिट नहीं रही थी. एक बार सूंघती तो सारा पुराना एकदम से ताजा हो जाता. एकदम से आपा खो देती. उभरी हुई छातियों को इस कदर मसलने लगती मानो वह उन मांस के गोलों को तोड़ कर कहीं फेंकना चाहती हो. बदन को नाखूनों से खरोंचने लगती. खुद से ही घिन आ रही थी. सोच रही थी कि ये छातियां जो किसी को अमृत पिलाया करती होंगी, मेरे किस काम की. इन्हीं को देख कर ही तो उन हरामजादों ने

मेरे कपड़े फाड़े. मुझे नंगा किया. टांगें दबोचीं. बहुत दर्द होता है पर कोई मरहम भी नहीं मिल रहा जो आराम दे. ‘क्यों जिंदा हूं मैं? मर जाती तो बेहतर होता. यह बदबू मिट ही नहीं रही.’ पता नहीं वह क्या-क्या छिड़क रही थी अपने बदन पर. उस के नियंत्रण का बांध टूट गया था.

मां नहीं थी कमरे में. शायद कुछ लाने गई हो. निद्रा अकेली थी. वह जो कुछ कर रही थी उस को भी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कर रही है. कहां से उस ने चुन्नी निकाली. कब लटकाई. कुरसी पैरों के नीचे से खिसक गई. फंदा फंस गया. उस की देह फड़फड़ाने लगी. एक पल में बीता हुआ आंखों के सामने तैरने लगा. बेंच पर बैठी निद्रा. इंतजार करती हुई. फिर आनंद, वह साथ रहने के वादे. दोनों खामोश से एक-दूसरे की आगोश में डूबे हुए. आनंद को देख ऐसा लगा जैसे निद्रा में फिर एक बार जीने की उम्मीद जगी हो. वह जीना चाहती थी.

बचने की कोशिश करने लगी पर वह फंदा और ज्यादा कसता जा रहा था. आंखें बाहर आने लगीं. जबान मुंह से बाहर लटकने लगी. फिर भी शरीर में जान अब भी थी. उसे जीना था. आनंद के लिए. उन वादों के लिए. सपनों के लिए पर कौन बचाएगा. कोई नहीं था उस कमरे में. हलक से आवाज नहीं निकल रही थी. अब गई, अब गई. मां ने देखा. वह जोर से चिल्लाई मदद की उम्मीद में. उस ने अपनी पूरी ताकत से निद्रा को उठाए रखा. निद्रा के शरीर ने जान छोड़ दी थी. उस का भाई और उस के पापा भागते हुए कमरे में आए.

निद्रा को नीचे उतार कर अस्पताल ले जाया गया. जान बाकी थी उस में. थोड़ी सी. एंबुलेंस से नीचे उतरने तक. नीचे उतारा गया पर अब वह निद्रा नहीं रही थी, खामोश खला में तकती हुई लाश बन गई थी. खला में एक शोर सा बरपा. परिवारजनों का. अब निद्रा बिना किसी अपेक्षा के खामोश इस जहां से उस जहां की हो गई थी. पता नहीं अदालत का नतीजा कब और क्या आएगा, पर उस से पहले ही निद्रा ने यह फैसला कर लिया था बदन से आ रही बदबू को मिटाने का. Psychological Trauma :

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