UGC New Rules 2026 :
क्यों पढ़ें? - यूजीसी की गाइड लाइन्स ने जो हंगामा मचाया था वह सुप्रीम कोर्ट के स्टे से भले ही ठंडा पड़ा हो लेकिन इस बहाने समाज का कडवा सच तो एक बार फिर उजागर हुआ कि हम जातिवाद के घोड़े पर सवार होकर विश्वगुरु बनने का दिवास्वप्न देखने की मूर्खता कर रहे हैं और इसी के तहत चाहते हैं कि दलित पिछड़े और आदिवासी अपनी बदहाली को पूर्वजन्म के कर्मों का फल और भाग्य मानते उसे बर्दाश्त करते रहें.
शिक्षा में उत्पीड़न तो द्वापर युग से ही शुरू हो गया था जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा ही गुरुदाक्षिणा में ले लिया था. इस का और कोई दूसरा प्रमाण इसलिए नहीं मिलता कि शूद्रों को पढ़ने की इजाजत ही नहीं थी. गुरुकुलों में ऊंची जाति वाले ही पढ़तेपढ़ाते थे. आजादी के बाद हालात थोड़े बदले तो सवर्णों को दिक्कत होने लगी जो यूजीसी की नई गाइडलाइन आने के बाद फिर दिखी थी.
यह सब अचानक नहीं हुआ है बल्कि पिछले 10-12 साल से जो तरहतरह की प्रताड़नाएं खासतौर से तकनीकी और उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षित कोटे के छात्रों के प्रति बढ़ रहीं थी उन्हें रोकने की एक और कोशिश थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पानी फेर दिया है. यह वही सुप्रीम कोर्ट और वही जस्टिस साहबान हैं जिन की टिप्पणियां जिन्हें कटाक्ष कहना बेहतर होगा, बारबार यूजीसी को कटघरे में खड़ा कर रहीं थीं.
यह सिलसिला जिस पर 13 जनवरी 2026 के बाद बवंडर मचा की शुरुआत दरअसल में 20 सितंबर 2019 से हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तडवी की मांओं द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किए थे. याचिका में शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया गया था.
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
- 24 प्रिंट मैगजीन





