कुछ पुराने पत्र मैं
रातभर पढ़ता रहा
एक युग मेरी आंखों में
चलचित्र सा चलता रहा
मैं समझा था समझ लोगे
मगर तुम कब समझ पाए
मगर क्यों दोष दूं तुम को
हम भी तो न कह पाए
जो भेज न पाए जिन्हें
लिखलिख कर मैं रखता रहा
कुछ पुराने पत्र मैं
रातभर पढ़ता रहा
तुझे चाहत तो थी मेरी
मुझे चाहत थी बस तेरी
मगर कर न सका पूरी
वो जो शर्त थी तेरी
धनुष तेरे स्वयंवर का
मैं दूर से तकता रहा
कुछ पुराने पत्र मैं
रातभर पढ़ता रहा.
आगे की कहानी पढ़ने के लिए सब्सक्राइब करें
डिजिटल
(1 साल)
USD99USD49
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
डिजिटल + 24 प्रिंट मैगजीन
(1 साल)
USD150USD129
सरिता सब्सक्रिप्शन से जुड़ेें और पाएं
- सरिता मैगजीन का सारा कंटेंट
- देश विदेश के राजनैतिक मुद्दे
- 7000 से ज्यादा कहानियां
- समाजिक समस्याओं पर चोट करते लेख
- 24 प्रिंट मैगजीन
और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...
सरिता से और





