Satirical Story In Hindi : सरकारी मकान का भी जवाब नहीं. कभी कमरे में बारिश का पानी भरता है, कभी छत टपकती है तो कभी पंखा खराब हो जाता है...और मरम्मत के लिए जो कर्मचारी आते हैं उन की अपनीअपनी अदाएं हैं. सारा तमाशा देख कर मंजरी हैरान भी थी और परेशान भी.

छप छप, छपाक के लयबद्ध संगीत  से मंजरी की आंख खुल गई.  अलसाते हुए  उस ने घड़ी की ओर देखा तो वह चौंक कर उठ खड़ी हुई.

‘अरे, साढ़े 7 बज गए... बारिश के कारण समय का पता ही नहीं चला,’ बुदबुदाते हुए मंजरी ने अंगड़ाई ली और खिड़की के पास जा कर खड़ी हो गई.

बाहर हर तरफ पानी से भरे गड्ढे दिख रहे थे, ‘इस का मतलब रात से ही लगातार बारिश हो रही है. मौसम कितना खुशगवार है पर मैं कितनी अकेली हूं. दोनों बच्चे होस्टल में हैं और समीर...जब देखो तब बाहर ही रहते हैं. वैसे देखा जाए तो कितनी सुखी हूं मैं. कर्मठ व ईमानदार पति, होनहार बच्चे, बंगला, गाड़ी, नौकर सबकुछ तो है. बस, है नहीं तो केवल समीर का साथ. समीर रेलवे में उच्च पद पर हैं, जो अकसर काम की देखरेख के सिलसिले में बाहर ही रहते हैं.’

‘‘मेम साहब, मेम साहब...’’ रामू की आवाज से मंजरी की तंद्रा टूटी.

एक लंबी सांस ले कर वह दरवाजा खोलने के लिए बाहर आई. वापस आते हुए बैठक का नजारा देख कर उस की चीख निकलतेनिकलते बची, कमरे के एक तरफ की छत से टपटप पानी गिर रहा था और कीमती कालीन का एक बड़ा हिस्सा पानी से पूरी तरह भीग चुका था.

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