मैं कमरे में पिछले 21 दिनों से बैठ इस बात का इंतजार कर रही हूं कि कब यह दरवाजे खुलें और मैं बाहर जा सकुं. एक बार फिर घूम सकूँ और उस गली में एक बार फिर खड़ी हो सकूँ जहां पेड़ के नीचे उस चबूतरे पर बैठ में इस बात का अंदाजा लगाया करती थी कि अब सामने गेट से कौन निकल कर आने वाला है. कितना अच्छा लगता था बाहर उस दुकान से जूस पीना जहां एक बार मैं ने खाँस दिया था तो अंकल ने मेरे हाथों पर पानी डाल मेरे हाथ धुलवाए थे.

Tags:
COMMENT