शरद रोज सुबह नौ बजे अपने औफिस के लिए निकल जाता था और शाम को छह बजे वापस लौटता था. वापसी में वह कभी गर्मागरम समोसे तो कभी ताजी बनी जलेबी सबके लिए लेता आता था. एक बार विजय सिंह ने उसको टोका भी कि ‘ये क्या फिजूलखर्ची करते हो...?’

वो कहने लगा, ‘बाबूजी, अपना तो कोई है नहीं... आप लोगों से जो स्नेह मिला है इसी से कुछ लाने की हिम्मत हो जाती है... अगर आपको बुरा लगता है, तो कल से....’ वह कहते-कहते उदास सा हो गया.

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